मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
११२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
मीराँ पोवै मोतीडारो हार, भल गूँथे राखड़ी।
फडूूँके म्हॉरी आंखडी।
आज म्हॉरा प्रभु जी आया बनवास, फरूखै म्हारी आखँडी।
यूँ कहै मीराँ बाई।
इस पाठान्तर की एक पक्ति "ना म्हॉरो पियो दूर ना सासु लडी"
विशेष विचारणीय है, क्योकि इससे मीराँ का सधवा होना सिद्ध
होता है।
पाठान्तर ३,
(तू तो) सॉवड़ली गोरी नार, मारग बिच क्यो खडी।
(मीराँ) कोई थॉरी दूषै छै आँख कै घरोँ सास लडी।
(मीरा) कॉइ थॉरो पिया परदेस सदेसै यो पडी।
(तू तो) चल्यो जा रे असल गँवार, तुझे तो मेरी क्या रे पडी।
(तू तो) उड़ रे हरिया बनका सूवटा¹ तू तो उड रे द्वारिका मे जाय
सॉवरिया ने कहियो ओलमा²।
मीराँ क्याँ पर लिखोला³ सलाम⁴, क्याँ पर तो करडा⁵ ओलमा।
सूआ चूँचा पै लिखूँली सलाम परैवा⁶ पै करडा ओलमा।
मीराँ ग्यारसने करो जी निहार⁷ बारस ने खोलो पारनो⁸।
मीराँ तेरस ने चालै दीनानाथ, चौदस ने हरि आ मिले।
राणा थे छो म्हॉरा झूठा भरतार, साचा छै श्री हरि सॉवरा।
यह पाठान्तर अन्य पदो से कुछ अलग पडता है। इसकी कुछ
पक्तियाँ खडी बोली से प्रभावित है और शैली राजस्थानी लोक गीतो
से। "सलाम" लिखने की जैसी अभिव्यक्ति राजस्थान के अन्य लोकगीतो
मे भी मिलती है। मुगलो के विरुद्ध अपने कठिन विरोध के होते हुए भी
१ तोता, २ शिकायत, ३ लिखोगी, ४ नमस्कार, ५ कठिन,
६ पख, ७ निराहार, ८ व्रत।
संघर्षाभिव्यक्ति ११३
राजपूतो की भाषा पर, वेशभूषा पर, रहन सहन पर मुगल दरबार का
प्रभाव पडा था। कुछ ऐसे लोकगीतो मे जिनकी अभिव्यक्ति के
आधार पर परवर्त्ती काल का कहा जा सकता है, “सलाम” लिखने
की अभिव्यक्ति मिलती है। इस पाठान्तर की भाषा और शैली के
आधार पर इसको भी गेय रूपान्तर मात्र ही समझना सगत होगा।
पद की अन्तिम पक्ति से व्यक्त होती भावना भी विचारणीय
है। मीराँ के पदों की अभिव्यक्तियो व परम्परागत मान्यताओ दोनो
के ही आधार पर मीराँ का विधवा होना प्रमाणित नही होता।
१८
सिसोद्यो रूठ्यो तो म्हारो काई कर लेसी।
म्हे तो गुण गोविन्द का गास्या हो माई।
राणो जी रूठ्यो वारो देस रखासी।
हरि रूठ्या कुम्हलास्यां हो माई।
लोक लाज की काण न मानूं।
निरभै निसाण घूरास्या हो माई।
राम नाम का झाझ¹ चलास्यां भव सागर तिरजास्या हो माई।
मीराँ सरण सावल गिरधर की, चरण कवल लपटास्या हो माई।
॥१८॥
कही पद की चतुर्थ पंक्ति मे प्रयुक्त “कुम्हलास्या” के बदले
“कठे जास्या” “किये जास्या” या “कोठे जास्या” का प्रयोग भी मिलता
है। “किथे” राजस्थानी भाषा का शब्द नही है और ‘झेठे’ अर्थहीन
प्रतीत होता है। “केंठे जास्या” पाठ असगत भी नही ठहरता तथापि
यह कहना कि “कुम्हलास्यां” या “कठे जास्या” दोनो मे से कौन पाठ
प्रामाणिक है, सम्भव नही।
१ जहाज।
८
११४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
१९
राणे जी मेवाडॊ, म्हारो काईं करसी ।
म्हे तो गोविन्दरा गुण गास्या हो माय ।
राणा जी रूससी गाव रखासी ।
हरि रूस्या कुम्लास्या हो माय ।
म्हारो तो पण चरणामत रो,
नित उठि मदिर जास्या हे माय ।
मदिरया मे माधुरी मूरति निरख निरख गुण गास्या हे माय ।
राणे जी भेज्या विषरा प्याला, कर चरणामृत पीस्या हे माय ।
राणे जी भेज्या साप पिटारा, तुलसी की माला कर पैरा हे माय ।
हाथा से करताल बजावा घूघरिया धमकास्या१ हे माय ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर हरि चरणा चित ध्यास्या२ हे माय ।
॥१८२॥
२०
राणा जी मेवाडो म्हारो काईं करसी ।
मै रूसियो राम रिझाया ये माय ।
राणे जी रूठ्या गाव रखासी,
हरि रूस्या कुम्हलास्या ये माय ।
तन करताल, मना कर मोहचिंग,३
घूघरिया धमकास्या ये माय ।
राणे जी भेज्या विष को प्यालो,
कर चरणामृत पीस्या ये माय।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर,
हरि चरणा चित लास्या ये माय ॥१८३॥
१ बजाऊँगी, २ ध्यान करूँगी, ३ डफली ।
संघर्षाभिव्यक्ति ११५
२१
रसियो राम रिझास्या हे माय
राणो जी मेवाडो म्हारो काई करसी ।
राणो रूससी गाव रखासी,
हरि रूस्या कुम्हलास्या हे माय ।
गोपी चन्दन गगारी माटी,
घसि घसि अग लगास्या हे माय ।
श्री तिलक तुलसी की माल,
नित उठि मदिर जास्या हे माय ।
बाँध घूघरा निरत करा म्हे,
कर सूँ ताल बजास्या हे माय ।
राणो भेज्यो विषरो प्यालो,
चरणामृत करि पीस्या हे माय ।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर
हरि चरणा चित लास्या हे माय ॥१८४॥
पद सं० २० की द्वितीय पंक्ति के पूर्वाद्ध में निम्नांकित पाठ
भेद मिलता है, 'हरि रूठ्या मर जास्या' । इस पाठ मे भी सर्प भेजे जाने
की कथा का वर्णन नही मिलता। साथ ही, वैष्णव प्रभाव का विशेष
स्पष्ट हो उठना इस पाठ की विशेषता है ।
२२
मेरे राणा जी मै गोविन्द गुण गाना ।
राजा रूठे नगरी राखै, हरि रूठ्या कहां जाना ।
राणा भेज्यो जहर पियाला अमृत कहि पी जाना ।
डबिया मे काला नाग भेजिया, सालगराम कर जाना ।
मीराँ बाई प्रेम दिवानी सांवरिया वर पाना ॥१८५॥
११६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
पद की भाषा पर आधुनिक प्रभाव विचारणीय है । सर्प भेजे जाने
की कथा का भी वर्णन इस पाठ मे हुआ है । परन्तु यहाँ “नाग” का
“सालिगराम” हो जाना ही सिद्ध होता है, जब कि पद स० १९ के
अनुसार वही “नाग”, “तुलसी की माला' मे परिवर्तित हो जाता
है । “नाग” भज जाने की कथा ही प्रक्षिप्त सिद्ध होती है ।
२३
राणा जी मै तो गोविन्द का गुण गास्या ।
चरणामृत को नेम हमारे, नित उठि दरसन जास्या ।
हरि मदिर मे निरत करास्या, घूघरिया धमकास्या ।
शनम नाम का जहाज चलास्या, भवसागर तर जास्या ।
मीराँ कहे प्रभु गिरधर नागर,निरख परख गुण गास्या ॥१८४॥
२४
राणो म्हारो कहाई कर लेसी राज, म्हे तो छोडी कुल की लाज ।
पगा तो बाध्या घूघरा जी, हाथा बनावा ताल ।
भो सागर महां रो माहिरो१ जी, हरि चरणा सूं प्यार ।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, जास्या द्वारिकानाथ ॥१८७॥†
उपर्युक्त पद की अन्तिम दो पंक्तियो मे निम्नाकित पाठान्तर
मिलता है —
‘भो सागर तुमरो जी ससुराल हरि चरणां पीहर छै जी ।
मीराँ कहै जास्यां द्वारिका जी बैकुंठश बास ।”
उपर्युक्त पद की अन्तिम दोनो पंक्तियो के दोनो पाठ विशेष
विचारणीय हे । अन्य पदो से दोनो की तुलना करने पर उनकी
प्रक्षिप्तता ही इंगित होती है ।
१ पीहर ।
संघर्षाभिव्यक्ति ११७
२५
म्हारो मनडो राजी राजा जी।
काइ करैसा म्हारो दुरजन पुरजन।
काई करैला झूठा पाजी जी।
काई करैला म्हांरो राजा राणी।
काई करैला मुल्ला काजी जी।
राम प्रीतम सूं हिलूमिल खेलूं।
परत न छोड़ू बाजी जी ।
मोराँ के प्रभु प्रात पुरबली।
तुम मत जाणो आजी१ जी ॥ १८८॥
सम्पूर्ण पद विशेष विचारणीय है। "मुँल्ला काजी" आदि वर्णन
स पद की प्रामाणिकता विशेष संदिग्ध है। पद मे प्रथम पक्ति को
छोडकर हर जगह "करैला" क्रिया का प्रयोग हुआ है जिसका अर्थ
है, करेगे। केवल प्रथम पक्ति मे यह 'करैला' 'करैसा' मे परिवर्तित हो
गया है। सम्पूर्ण पद की सगति देखते हुए "करैला" होना ही
अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है।
२६
गिरधर म्हारा साचा पति छै, मै गिरधर री दासी हे माय
राणो जी म्हासू रूस रह्यो छै, कडा वचन निकासै हे माय।
राणो कहै सोरा कन माना म्हे, साध दुवारै नित आसी है माय।
मीराँ के प्रभु सेज चढै जब, ठाढी करै खवासी हे माय ॥१८६॥
पदाभिव्यक्ति विशेष विचारणीय है।
२७
गिरधर म्हारे मन भाया मोरी माय, राणो जी म्हांरे दाय न आवै।
राणा जी म्हासे रूस रहा छै, कूडा बचन सुनाया।
१ सम्भवतः इसका भावार्थ "इस समय" हो सकता है।
११८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
गुरू कृपा से सत पधार्या, सता स्याम मिलाया ।
मीराँ की प्रभु आस पुजोई१, गिरिधर सगा आया ॥१९०॥
पदाभिव्यक्ति विशेष विचारणीय है। अन्तिम पंक्ति से आनन्द
ही लक्षित होता है।
२८
राणे जी हट माडचो२ म्हासू,गिरधर प्रीतम प्यारा जी ।
वो तो मद माया रो आधो, थे मत हो ज्यो न्यारा जी ।
साची प्रीत लगी है तुम सूं झक मारो ससारा जी ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर थाने,भक्त पियारा जी ।
॥१९१॥†
२९
राणा जी म्हारे गिरधर प्रीतम प्यारो हो,
राणा जी म्हारे गिरधर प्रीतम प्यारे ।
व्यापक होय रह्यो घट घट मे, है सब ही से न्यारे ।
सबको सरजण हारो, अन्तर घट की सबही जाणे ।
आप तो भेज्या विषरो प्याला दे मीराँ ने मारो ।
कर चरणामृत पी गईं जी, गिरधर संकट टारो ।
जनम जनम रो पति परमेश्वर राणी जी कोन विचारो ।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, साचो बसंरी वारो ॥१९२॥†
३०
निन्दा म्हारी भलाई करो नै सोने काट न लागै
जोग लियो जग जातौ देख्यौ हरि भजवा के काजै ।
१ परिपूर्ण की, २ बनाया, यहाँ होगा जिद्द की ।
संघर्षाभिव्यक्ति ११६
जो कोई करणी मे चूक पडै तो सतगुरु म्हारा लाजै।
धन रे लोक थांरी करणी कीडी रो कुजर बरगायो।
अण दीठी अण सामलेरे, वद वद बाद उठायौ।
कुल कूँ छाडि कड्बो छाड्यो छाँडी ममता भाई !
और दुनिया को दावो छोड्यो मन मरवै ज्यूँ कहियौ।
यो जस मीराँबाई गावै ज्यूँ कहीयौ ज्यौ सहीयौ ॥१९३॥†
३१
तुलसा की माला हिवड लागी जी “मेवाड राणा” राम ताण गुण गास्या।
लिख पत्तर राणूं मीराँ नै भेज्या सग साध पिस्तास्यो जी।
लिख रे पत्तर मीरा राणा जी नै भेज्या साधूडा सग सुख पास्यां जी।
बिसरा पियाला राणा जी भेज्या पिवतां पिवता म्हानै आवै हासी जी।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर हरि चरणां मे चितल्यास्या जी ॥१९४॥†
पदाभिव्यक्ति का प्रथम अर्द्धांश अन्य पुरुष मे है, जब कि द्वितीय
अर्द्धांश प्रथम पुरुष मे है। अत पद की प्रामाणिकता विशेष संदिग्ध है।
मीराँ और राणा द्वारा एक दूसरे को पत्र भेजे जाने की अभिव्यक्ति
और भी पदो मे मिलती है।
३२
मेड़तिया रा कागद आया, बाई मीराँ ने जा खीज्यो१ जी।
भोहूत२ भात से लिख्या ओलमा, कुल कै दाग३ मति दीज्यो जी।
साधा को सग परो निवारो, वेद साख४ सुण लीज्यो जी।
मीराँ प्रभु को संग छाड्यो, पति आज्ञा मे रीज्यो जी ॥१९५॥†
१ नाराज होना, २ बहुत, ३.कलक, ४ साक्षी।
१२० मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
पद विशेष महत्वपूर्ण है। यह एक ही पद ऐसा है जिसमे
“मेडतिया रा कागद” (मेडतिया के यहाँ से आया हुआ पत्र) का वर्णन है।
इस पद के आधार पर मीराँ का सधवा होना ही प्रामाणित हो जाता है।
पद का किसी अन्य व्यक्ति द्वारा कहा जाना भी अभिव्यक्ति से ही
सुस्पष्ट हो उठता है। अत ऐसे पदो की प्रामाणिकता की विशेष
विवेचना आवश्यक है।
३३
हो जी हो सिसोद्या राजा मनडो वैरागी धन¹ रो क्या करू।
जहर का प्याला राणा जी भेज्या कोई द्यो मीराँ के हाथ।
कर चरणामृत मीराँ पी गई कोई आप जाणो रघुनाथ।
साप पिटारा राणा जी ने भेज्या कोई द्योने मीराँ ने जाय।
कर खग वालो पहिरयो कोई आप जानो दीनानाथ।
राणा जी दासी भेज्या कोई जावो ने मीराँ पास।
मर गया होय तो जला दीज्यो नातर नदी मे बहाय।
हो जी हो सिसोद्या राजा मनडो, वैरागी धन रो क्या करू।
।।१९६।।
राणा जी द्वारा मीराँ के पास दासी भेजे जाने की सर्वथा नवीन
कथा ही इस पद की विशेषता है। कथानक की प्रामाणिकता सर्वथा
संदिग्ध होते हुए भी राणा और मीराँ के पारस्परिक सबध के प्रति
चली आती परम्परागत भावना सुस्पष्ट हो जाती है। पद की शैली
वर्णनात्मक ह। अस्तु, यह पद तत्कालीन भावनाओ का प्रतिबिम्ब
ही कहा जा सकता है।
३४
राणौ म्हाने ऐसी कही महाराज।
भक्तन² होय मीराँ जगत लजायो,कीन्हों सारो साज।
१ स्त्री। २ विशेष उत्सव के अवसरो पर नाचने गाने वाली एक निम्नजाति
विशेष की स्त्री जो 'भगतन' के अर्थ मे रूढ़ि वाचक हो गया है।
संघर्षाभिव्यक्ति १२१
जावो ने मीराँ म्हाने मुख न दिखावो, म्हाने आवै थारी लाज ।
लाजै मीराँ पीहर सासरो, और लाजै म्हारो साज¹।
गोपी चन्दन तुलसी की माला, भीख मागत्यारो² साज ।
धन मीराँ धनि मेडतो, धनि राठोडारो राज ।
मीराँ के प्रभु अविनासी, चलि आयो व्रजराज ।।१९७।।†
३५
राणा जी हो जाति रो कारण म्हाँरै को नही
लागो म्हांरो हरि भगतां सूं हेत।
बिदुर कुला घरि जनमिया ज्या कै पावणा हुवा गोपाल
वदि छुडाई बसुदेव की कस कियो खो काल।
पाचू पाडू छठी द्रोपदी ज्या की न्यारी न्यारी जात,
सहस अठ्यासी मुनि आविया जाकी पण राखी रघुनाथ ।
वन मे होती स्योरी भीलणी ज्यांहका ओरग्य³ ठाकुर बोर ।
ऊच नीच हरि ना गिणै ऐसी म्हारा हरि भगतां की कोर ।
येक बेल दोय तूंबड़ा ज्याहूं की छै न्यारी न्यारी जात,
एक तूंबो जतर⁴ चढ़ै, दूजो हरि भगता कै हाथ ।
सख समदा५ नीपजै ज्याहू की न्यारी न्यारी जात,
एक सख सेवा६ चढै दूजौ भो पडता के हाथ ।
एक माटी दोय कलस है ज्याहूं की न्यारी न्यारी जात,
एक कलस सेवा चढै दूजो कलाला रै हाथ ।
कलक कटोरे विष धोलियो दियो मीराँ के हाथ,
हरि चरणोदक करि पी लियो हरि जी भयो सुनाथ ।
सब मिलि मत उपाइयौ मीराँ नै विष चौहा कहियौ,
। सुण्यो मानै नाहि नीच लग्यो हूठ. योह।
१ विभव, ठाठ, २ माँगने वालो का, ३ खाया, ४ वाद्य-यन्त्र
५ समुद्र, ६ पूजा ।
१२२ मीरॉँ-वृहद्-पद-संग्रह
नगर बसै बामण बाणिया भीतर शुद्र पवार,
मुहुँ मोडे मुलबया हसे समझे नही गवार।
गढ चितौडा न रहा नही रहणा को जोग,
बसस्या सूडी द्वारिका जहाँ हरि भगता का भोग।
पंरख लेत परचो भयो मन उपज्यो विस्वास,
सिर पर सिरजन हार रहै पूगी म्हा मन की आस।
कुम्भ श्याम के देवरे मिली है राणौ राणूँ,
मीराँ ने गिरधर मिलिया कोई पूरबली पहिचाण।
।।१९८।।†
पदाभिव्यक्ति के प्रथम और द्वितीय अर्द्धांशो मे कोई सगति नही
बैठती प्रतीत होती। मीराँ द्वारा किए गए गृहत्याग का कारण भी
अति स्पष्ट हो उठता है। कुम्भश्याम के मदिर के साथ मीराँ के जीवन
की किसी घटना का सम्पर्क भी उपर्युक्त पदाभिव्यक्ति से स्पष्ट हो
उठता है। ऐसी अभिव्यक्ति इस पद की नवीनता है। इस पद की
शैली भी वर्णनात्मक ही है।
३६
प्रभु जी अरज बन्दी री सुण हो।
मो निगुणी ए सुगुण साहब अवगुण धारी ए गुण हो।
राणा जी विष को प्यालो भेज्यो मो चरणामृत को पण हो।
म्हारी पत परमेश्वर राखत, मारण वालो कुण हो।
प्रभु जी उचले¹ मदिर (सीतारामजी) बिराजे दरसण रोयण हो
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, मै जाणु प्रभु जी कुण हो।
।।१९९।।
पदाभिव्यक्ति में संगति नही है।
१ ऊँचे।
संघर्षाभिव्यक्ति १२३
मिश्रित भाषा में प्राप्त पद
१
म्हारे सिर पर सालिगराम, राणाजी म्हारे काईं करसी।
मीराँ सूं राणा ने कही थे, सुण मीराँ मोरी बात।
साधो की सगत छोड हो रे, सखिया सब सकुचात।
मीराँ ने सुन यो कही रे, सुण राणाजी बात।
साध तो भाई बाप हमारे, सखियाँ क्यूँ घबरात।
जहर का प्याला भेजिया रे, दीजो मीराँ हाथ।
अमृत कर के पी गई रे, भली करें दीनानाथ।
मीराँ प्याला पी लिया रे, बोली दोऊ कर जोड।
तै तो मारण की करी रे, मेरी राखणहारो और।
आधे जोहड कीच है रे, आधे जोहड हौंज।
आधे मीराँ एकली रे, आधे राणा की फौज।
काम क्रोध को डाल केरे सील लिए हथियार।
जीती मीराँ एकली रे, हारी राणा की धार।
काचागेरी का चौतरा रे, बैठे साध पचास।
जिनमे मीराँ ऐसी दमके रे, लख तारो मे परकास।
टाडा जब वे लादिया रे, बेगी दीन्हा जाण।
कुल की तारण अस्तरी रे, चली हे पुष्कर न्हाण ॥२००॥†
अधिकांश संघर्ष द्योतक पदो की तरह यह पद भी वर्णन और
कथनोपकथन दोनो ही शैलियो मे है। “काचगिरी का चोतरा”
का वर्णन इस पद के महत्व को विशेष रुपसे बढा देता है। “पुष्कर
न्हाण” की अभिव्यक्ति प्राय. अन्य पदो मे भी मिलती है।
२
राणा जी थे जहर दियो म्हैं जाणी।
जैसे कंचन दहत अगिन भें, निकसत बारह बाणी।
१२४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
लोक लाज कुल काण¹ जगत की, दइ बदाय जस पाणी ।
अपने घर का परदा कर ले, मै अबला बौराणी ।
तरकस तीर लाग्यो मेरे हिय रे, गरक गयो सनकाणी ।
सब संतन पर तन मन बारो, चरण कवल लपटाणी ।
मीराँ के प्रभु राखि लईं है, दासी अपनी जाणी ॥२०१॥
पाठान्तर १,
राणा जी जहर दियो हम जानी ।
जानबूझ चरणामृत सुन के पियो, नही बौराणी ।
जिन हरी मेरी नाव निवेरियो, छान्यो दूध अरु पानी ।
कचन असत कसौटी जैसे, तन रह्यो बारह बानी ।
राणा कोट करु न्योछावर, मै हरि हाथ बिकानी ।
मीराँ प्रभु गिरिधर नागर, के चरण कवल लिपटानी ।
पाठान्तर २,
राणा जी जहर दियो हम जानी ।
अपने कुल को परदा कर ले, मै अबला बौराणी ।
राणा जी परधान पठायो, सुन जो जी थे राणी ।
जो साधन को सग निबरो, करा तुमे पटराणी ।
हथलेवी राणा सग जुड़ियो, गिरधर घर पटराणी ।
क्रोड भूप साधन पर वारुं, जिन की सरण रहाणी ।
मीराँ को पति एक रमैया, चरण कवल लपटानी ।
पाठान्तर ३,
जहर दियो म्हे जाणी ।
राणा जी थे तो अपने कुल को परदो कर ले मै अबला बौराणी ।
१ मर्यादा ।
१२६ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह
साधू रो सग परो निवररो, थाने करा पटराणी ।
कोट भूप वारा रतन पर, जिनके हाथ बिकाणी ।
हथलेवा मै थास्यूँ जोडयो, गिरधररी पटराणी ।
पीहर म्हारो देस मेडतो, छाडी कुल की काणी ।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, चरण कवल लिपटानी ।
उपर्युक्त दोनो पाठान्तर एक दूसरे के गेय रूपान्तर मात्र प्रतीत
होते है ।
सभी पाठो से व्यक्त होती भावना "अपने घर का परदा कर ले,
मै अबला बौराणी" भाव और भाषा दोनो ही दृष्टिकोण से विशेष
विचारणीय है । दूसरी विचारणीय अभिव्यक्ति है "हथलेवी राणा सग
जुहियो, मै गिरधर पटराणी" जो सभी पाठो मे मिलती है । यह पद
और उसके सभी पाठान्तर भाव और भाषा दोनो ही दृष्टिकोण से
विशेष रूप से विचारणीय है ।
३
म्हारा नटनागर गोपाल लाल बिन, कारज कौन सुधारे ।
घूम रह्यो दुरयोधन राजा, जैसे गज मतवारो ।
सिह होय केर हस्ती¹ मारे, बड़ो भरोसो थारो ।
मीराँ ने राणा जी बरजै, मतना जनम बिडारे² ।
थे सगत साध की सीख्या, मत आयो महल हमारे ।
म्हे सगत साध की सीख्या, थांरे कछ्यु³ न सारे⁴ ।
तन मे रीस भई राणा के, उठ खडग ले मारे ।
प्याला मे विष घोल राणा जी, मन मे कपट बिचारे ।
अमृत कर के मीराँ पी गई, जहर सावरों झारे ।
जब जब पीड परी भक्तन पर, आप ही कृष्ण पधारे ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, हरि भक्ताने न्यारे ॥२०२॥†
१ हाथी, २ व्यर्थ खोना, ३ जरा भी, ४ सहारे ।
संघ गी अभिव्यक्ति १२७
“मीराँ ने ˙ ˙ ˙ न सारे” जैसी तीन पक्तियाँ कथोपकथन
शैली मे लिखी गयी है । शेष सम्पूर्ण पद वर्णनात्मक शैली मे है ।
अन्तिम पक्ति अर्थ हीन है ।
४
राणो म्हांरो काई करिहै, मीराँ छोड दई कुल लाज ।
विष को प्यालो राणाजी ने भेज्यो, मीराँ मारन काज ।
हँस के मीरा पाय गई है, प्रभु परसाद पर राग ।
डब्बो खोल मीराँ जब देख्यो, हैं गये सालिगराम ।
जै जै धुनि सब सत सभा भई, कृपा करि घनश्याम ।
सजि सिगार पग बाँध घूँघरू, दोऊ पर देती ताल ।
ठाकुर आगे नृत्य करत ही, गावत श्री गोपाल ।
साध हमारे हम साधन के, साध हमारे जीवन ।
साधुन मीराँ मिलि जा रही है, जिमि माखन मे घीव ॥२०३॥†
प्रथम पक्ति के अतिरिक्त जो कथनोपकथन की शैली मे है,
सम्पूर्ण पद वर्णनात्मक शैली मे है ।
५
मेरो मन हरिसूँ जोर्यो, हरि सूं जोर्यो सकल सूं तोर्यो ।
मेरी प्रीति निरन्तर हरि सूं, ज्यूँ खेलत बाजीगर गोर्यो ।
जब मै चली साध के दरसण कूँ, तब राणा मारण को दोर्यो ।
जहर देन की घात विचारी, निरमल जल मे ले विष घोर्यो ।
जब चरणोदक सुण्यो सखणा१, राम भरोसे मुखमे ढोर्यो ।
नाचन लागी तब घूंघट कैसो, लोक लाज तिणका ज्यूँ तोर्यो ।
नेक बदी हूँ सिर पर धारी, मन हस्ती अंकुस दे मार्यो ।
प्रकट निसान बजाय चली मै, राणा राव सकल जग जोर्यो ।
॥२०४॥†
१ कानो से ।
१२८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
सम्पूर्ण पद में मीराँ का नाम या ऐसी कोई अभिव्यक्ति, जिसव
आधार पर पद मीराँ रचित होना स्पष्ट हो सके, नही है ।
६
यो तो रग धत्ता लाग्यो ए माय ।
पिया पियाला अमर रस का, चढ गई धूप घुमाय ।
या तो अमल म्हारे कबहुँ न ऊतरे, कोटि करो उपाय ।
सांप पिटारो राणा जी भेज्यो, द्यो मेडतणी गल डार ।
हँस हँस मीराँ कठ लैगायो, यो तो म्हारे नौसर हार ।
विष को प्यालो राणा जी भेज्यो, द्यो मेड़तणी प्याय ।
कर चरणामृत पी गई रे, गुण गोविन्दरा गाय ।
पिया पियाला नाम का रे, और न रग सुहाय ।
मीराँ कहै प्रभु गिरिधर नागर, काची रंग उड जाय ।
॥२०५॥†
प्रथम पक्ति का निम्नाकित पाठान्तर भी मिलता है —
“यो तो रग म्हारे श्यामसुन्दर को जनम जनम नहि जाय ।”
पाठान्तर १,
किण विध कहूँ, कहण नही आवै, रह्यो घुमाय घुमाय ।
गुरु प्रताप साध री सगत, हरिजन मिलिया आय ।
किरपा करो तो प्रभु जी ऐसी कीज्यो, दूजी नाही सुहाय ।
राणा जी विषरा प्याला भेज्यो, म्हे सिर ल्यो चढाय ।
चरणामृत को जब लीनो पीगी प्रेम अघाय ।
पीवत ही अति चढी खुमारी, रह गई कहत सुमाय ।
जिन मीराँ की पनवारी कीन्ही, पूरब जनम के भाय ।
पाठान्तर २,
किंण विध कहूँ कहण नही आवै, चढ्यो घुमाय ।
गुरु प्रताप साध री सगत, हरिजन मिलिया आय ।
संघर्षाभिव्यक्ति १२९
किरपा करि मोहि अपनाई, सब दुख दियो मिटाय।
राणा जी विषरा प्याला भेज्यो, म्हे सिर लियो चढाय।
चरणामृत को नामज लीनो पीगी प्रेम बहाय।
पीवत ही अति चढि खुमारी अब थिर रह्यो न जाय।
जिन मीराँ मनवारी कीन्ही, पूरब जनम के भाय।
पद के तीनो ही पाठो पर सत मत का प्रभाव दृष्टिगत होता है।
यह प्रभाव पहले और दूसरे पाठान्तरो पर कुछ विशेष स्पष्ट हो जाता
है। पहले और दूसरे पाठान्तरो मे 'जिन मीराँ' का प्रयोग भी
विचारणीय है। राजस्थानी गेय परम्परा के अनुसार लय संगति के
हेतु जिण शब्द का जिन हो जाना स्वाभाविक है।
७
गिरधर के मन भाई हो राणा जी!
लोकलाज कुल की मरजादा, मै तो छोडी है सकल बड़ाई।
पूरब जनम की मै तो गोपिका चूक पडी मुझ मांही।
जगत लहर व्यापी घट भीतर दीनी हरि छिटकाई।
जैमल के घर जनम लियो है राणा ने परणाई।
भोग रोग होय लागा मोरी सजनी गति प्रगट होय आई।
मात पिता सुत बाधव भाई, या सब झूठी सगाई।
परम सनेही प्रीतम प्यारो, जासूं मै प्रीत लगाई।
जो थे पकडोरा हाथ हमारो तो खबरदार मनमाही।
देवगी सराप मै साचां मन सूं, कल जल भसम होय जाई।
जनम जनम की दासी राम की थांरी नही लुगाई।
थारे मारे१ फीरो सो२ सगपण३ गावै मीराँबाई ॥२०६॥+
अभिव्यक्ति के आधार पर ही पद की प्रमाणिकता विशेष रुपेण
संदिग्ध है। "जैमल घर जन्म लियो है" जैसी अभिव्यक्ति का कोई
१ म्हारे राजस्थानी के अनुसार शुद्ध है, २ फीरोसो (फिरोसो)
हलका सा, ३ सम्बन्ध।
६
१६० मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
ऐतिहासिक आधार अद्यावधि प्राप्त नही। कुछ विद्वानो के मतानुसार
मीराँ जैमलकी ही पुत्री ठहरती है, परन्तु इस पहलू के समर्थन मे पर्याप्त
प्रमाण नही मिलते है। पद की छठी पंक्ति मे अर्थ सगति का
अभाव है।
ब्रजभाषा में प्राप्त पद
१
माई री मे सावन्निया जान्यो नाथ।
लेन परचो अकबर आयो, तानसेन ले साथ।
राग तान इतिहास श्रवन करि, नाय नाय सिर माथ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, कीन्ह्यो मोहि सनाथ ॥२०७॥
तानसेन को साथ लेकर मीराँ के पास अकबर के आने की जन-
श्रुति है। परन्तु सामग्री के आधार पर ऐतिहासिक दृष्टिकोण से ऐसा
होना सम्भव नही। अस्तु, जब तक ऐसे पदो के समर्थन मे कोई विशेष
प्रमाण न मिले इनको प्रक्षिप्त मान लेना ही युक्तियुक्त प्रतीत होता है।
२
मीराँ मगन भई हरि के गुण गाय।
साप पेटारा राणा भेज्या, मीराँ हाथ दियो जाय।
न्हाय धोय जब देखण लागी, सालिगराम गई पाय।
जहर का प्याला राणा भेज्या, अमृत दीन्ह बनाय।
न्हाय धोय जब पीवण लागी हो अमर अचाय।
सूल सेज राणा ने भेजी, दीज्यो मीरा सुलाय।
मीराँ के प्रभु सदा सहाई, राखे विधन हटाय।
भजन भाव मे मस्त डोलती, गिरधर पै बलि जाय ॥२०८॥†
“सूल सेज ˙ ˙ सुलाय” के बाद निम्नांकित एक और पंक्ति
भी कही कंही मिल जाती है।
“साझ भई मीरा सोवण लागी, मानो फूल बिछाय।”
संघर्षाभिव्यक्ति १३१
“सूल सेज” भेजे जाने की कथा का वर्णन इस पद की विशेषता है।
सम्पूर्ण पद की शैली वर्णनात्मक है। अतः यह कहा जा सकता
है कि किसी अन्य व्यक्ति ने मीराँ की प्रशंसा मे यह पद लिखा है।
खड़ी बोली में प्राप्त पद
१
तेरा मेरा जिवडा यक कैसे होय राम।
हमने कहा सुरझावन राणा, तुम जाने मुरझाय राम।
हमने कहा निर्मोहित रहना, तुमतो जान मोहाय राम।
तेल जले तो जलती है बाती, दिवरा झलमल सोय राम।
जल गया तेल रे बुझ गई बाती, लच्चर लच्चर होय राम।
हमने कहा आंखिन का देखा, तुम कानों सुनि सोय राम।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, होनहार सो होय राम। ॥२०९॥†
पदाभिव्यक्ति मे संगति का अभाव है।
गुजराती में प्राप्त पद
१
आदि वैरागिण हुँ राणा जी मै आदि वैरागिण हुँ।
मीराँ बाघ घूघरा रे, हाथ लिये करतार।
अमोरे गिरधर आगे नाची सुँरे, गुनगाई सुँ रे गोपाल।
विषना प्याला राना मोकलियो रे, दीज्यो मीराँ के हाथ।
कर चरणामृत पी गया रे, अमोरे बासी श्री रघुनाथ ॥२१०॥†
२
आज मोरे साधु जन नो संगेरे, राणा, मारा भाग्य भला रे।
साधु जननो सग जो करिये, पिया जो चढे ते चौगुणो रंग रे।
साक्ट जन नो सग न करिये, पिया जी पाड़े भजन मे भंग रे।
१३२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
अड़सठ तीरथ सतो ने चरणे, पिया जी, कोटि काशी ने कोटि गंगरे ।
निन्दा करसे तो नरक कुंड मा जशे, पिया जी, थशे आधला अपगरे ।
मीराँ कहै गिरधर ना गुण गायो, पिया जी, सतोनी रझमा शीरसगे रे ।
॥२११॥
३
मै तो छाडी छाडी कुल की लाज, रगीलो राणा काई करसे माणा राज ।
पाव मे बाधूगी घुँघरा, हाथ मे लेऊंगी सितार ।
हरि के चरणो आगे नाचती रे, काई रीझेगो करतार ।
जहेर को प्यालो राणा जी भेज्यो, धरियो मीराँबाई हाथ ।
करि चरणामृत पी गई रे श्री ठाकुर को परसाद ।
राणा जी ये रीस करी भेज्यो, झेरी नाग असार ।
पकड गले बिच डालियो, कांई हो गयो चन्दन हार ।
मीराँ को गिरधारी मिलिया, जनम जनम भरतार ।
मै तो दासी जनम जनम की, कृष्ण कत सरदार ॥२१२॥†
४
गोविन्दो प्राणो अमारो रे, मने जग लाग्यो खारो रे । गोविन्द ।
मने मारो राम जी भावे रे, बीजो मारे नजरो न आवै रे । ,,
मीराँ बाई माँ महल मा रे, हरि संतन नो वास । ,,
कपटी थी हरि दूर बसे, मारा सतन केरी पास । ,,
राणा जी कागज मोकले रे, दो राणी मीराँ ने हाथ । ,,
साधुनी संगत छोड़ि दो, तमो वसो नी हमारे साथ । ,,
मीराँ बाई कागज मोकले रे, दीजो राणा जी ने हाथ । ,,
राज पाट तमे छोड़ी राणा जी, वसो साधु ने साथ । ,,
विष नो प्यालो राणो मोकलिया रे, पीजो मीराँ ने हाथ । ,,
अमृत जानी मीरा पी, जे ने सहाय श्री विश्वनाथ । ,,
साढ़वाला साढ़ शनगारजे रे,-जावुं सो सो रे कोश । ,,