सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा

DevanagariRajasthanipublished365 पृष्ठ

पृष्ठ 175, कुल 365 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 175

११६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
पद की भाषा पर आधुनिक प्रभाव विचारणीय है । सर्प भेजे जाने
की कथा का भी वर्णन इस पाठ मे हुआ है । परन्तु यहाँ “नाग” का
“सालिगराम” हो जाना ही सिद्ध होता है, जब कि पद स० १९ के
अनुसार वही “नाग”, “तुलसी की माला' मे परिवर्तित हो जाता
है । “नाग” भज जाने की कथा ही प्रक्षिप्त सिद्ध होती है ।
२३
राणा जी मै तो गोविन्द का गुण गास्या ।
चरणामृत को नेम हमारे, नित उठि दरसन जास्या ।
हरि मदिर मे निरत करास्या, घूघरिया धमकास्या ।
शनम नाम का जहाज चलास्या, भवसागर तर जास्या ।
मीराँ कहे प्रभु गिरधर नागर,निरख परख गुण गास्या ॥१८४॥
२४
राणो म्हारो कहाई कर लेसी राज, म्हे तो छोडी कुल की लाज ।
पगा तो बाध्या घूघरा जी, हाथा बनावा ताल ।
भो सागर महां रो माहिरो१ जी, हरि चरणा सूं प्यार ।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, जास्या द्वारिकानाथ ॥१८७॥†
उपर्युक्त पद की अन्तिम दो पंक्तियो मे निम्नाकित पाठान्तर
मिलता है —
‘भो सागर तुमरो जी ससुराल हरि चरणां पीहर छै जी ।
मीराँ कहै जास्यां द्वारिका जी बैकुंठश बास ।”
उपर्युक्त पद की अन्तिम दोनो पंक्तियो के दोनो पाठ विशेष
विचारणीय हे । अन्य पदो से दोनो की तुलना करने पर उनकी
प्रक्षिप्तता ही इंगित होती है ।
१ पीहर ।