मलूकदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - ज्ञानपरोछी, साखी एवं अमर पद संग्रह)
Malukdas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
सन्त मलूकदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
३८ मलूकदासजी की बानी
मेहर का जामा और तोमा१ भी मेहर का।
मेहर का आपा इस दिल को पिलाइये ॥ २ ॥
मेहर का आसा२ और तमासा भी मेहर का।
मेहर के महल बिच मेहरबान को मनाइये ॥ ३ ॥
कहता मलूक बन्दे कहर की लहर में।
कोटिक बह गये बिन मेहर मेहरबान किस राह से पाइये ॥४॥
( १२ )
अदम कबित्त का जिसकी कबिताई करूँ,
याद करूँ उसको जिन पैदा मुझे किया है ॥ १ ॥
गर्भ बास पाला आतस में नहिं जाला,
तिसको मैं बिसारूँ तो मैं किसकी आस जिया हूँ ॥ २ ॥
नालत इस दुनियाँ को जो दीन से बेदीन करै,
खाक ऐसे खाने जिन ईमान बेंच लिया है ॥ ३ ॥
कहता मलूक मैं बिकाना हरि मूरत पर,
जिस के दीदार से जुड़ाता मेरा हिया है ॥ ४ ॥
( १३ )
सुपने के सुख देख मोह रहे मूढ़ नर,
जानत हमारे दिन ऐसहिं बिहायँगे ॥ १ ॥
क्या करेंगे भोग अच्छी सुन्दरी रमेंगे नित्त,
छाँह कौ लै चारि जून खूँद खूँद खायँगे ॥ २ ॥
सीकरा सो काल है कलसरी३ सी लपेट लेहै,
चंगुल के तले दबे चिचयायँगे ॥ ३ ॥
कहत मलूकदास लेखा देत होइहै दुक्ख,
बड़े दरबार जाय अन्त पछितायँगे ॥ ४ ॥
( १४ )
दीन-दयाल सुनी जब तैं तब तैं हिया में कछु ऐसी बसी है।
तेरो कहाय के जाउँ कहाँ मैं तेरे हित की पट४ खैंच कसी है ॥१॥
(१) तोंबा। (२) डण्डा, छड़ी। (३) गौरैया चिड़िया। (४) पटका।
साखी २६
तेरोई एक भरोस मलूक को तेरे समान न दूजो जसी है।
एहो मुरारि पुकारि कहौं अब मेरी हँसी नहिं तेरो हँसी है ॥२॥
साखी
॥ गुरुदेव ॥
जीती बाजी गुर प्रताप तें, माया मोह निवार।
कहैं मलूक गुरु कृपा तें, उतरा भवजल पार ॥ १ ॥
सुखद पंथ गुरुदेव यह, दीन्हो मोहिं बताय ।
ऐसो ऊपट१ पाय अब, जग मग चलै बलाय ॥ २ ॥
भ्रम भागा गुरु बचन सुनि, मोह रहा नहिं लेस।
तब माया छल हित किया, महा मोहनी भेस ॥ ३ ॥
ता को आवत देखि कै, कही बात समुझाय ।
अब मैं आया हरि सरन, तेरी कछु न बसाय ॥ ४ ॥
मलूका सोई पीर है, जो जानै पर पीर ।
जो पर पीर न जानही, सो फकीर बेपीर ॥ ५ ॥
बहुतक पीर कहावते, बहुत करत हैं भेस ।
यह मन कहर खोदाय का, मारे सो दुरवेस ॥ ६ ॥
पीर पीर सब कोई कहे, पीरे चीन्हत नाहिं ।
जिन्दा पीर को मारि के, मुरदहिं ढूँढ़न जाहिं ॥७ ॥
॥ साध जन ॥
जहाँ जहाँ बच्छा फिरै, तहाँ तहाँ फिरै गाय ।
कहैं मलूक जहाँ संत जन, तहाँ रमैया जाय ॥ ८ ॥
भेष फकीरी जे करै, मन नहिं आवै हाथ ।
दिल फकीर जे हो रहे, साहेब तिनके साथ ॥ ६ ॥
॥ नाम ॥
जीवहुँ तें प्यारे अधिक, लागैं मोहीं राम ।
बिन हरि नाम नहीं मुझे, और किसी से काम ॥१०॥
(१) ऊपरवार।
३० मलूकदासजी की बानी
कह मलूक हम जबहि तें, लीन्ही हरि की ओट ।
सोवत हैं सुख नींद भरि, डारि भरम की पोट ॥११॥
उहाँ न कबहुँ जाइये, जहाँ न हरि का नाम ।
डीगंबर१ के गाँव में, धोबी का क्या काम ॥१२॥
राम राम के नाम को, जहाँ नहीं लवलेस ।
पानी तहाँ न पीजिये, परिहरिये सो देस ॥१३॥
गाँठो सत कुपीन२ में, सदा फिरै निःसंक ।
नाम अमल माता रहे, गिने इन्द्र को रंक ॥१४॥
राम नाम जिन जानिया, तेई बड़े सपूत ।
एक राम के भजन बिन, काँगा३ फिरै कपूत ॥१५॥
राम नाम एकै रती, पाप के कोटि पहाड़ ।
ऐसी महिमा नाम की, जारि करै सब छार ॥१६॥
राम नाम औषध करो, हिरदै राखो याद ।
संकट में लौ लाइये, दुर करै सब व्याध ॥१७॥
धर्महिं का सौदा भला, दाया जग व्योहार ।
राम नाम की हाट ले, बैठा खोल किवार ॥१८॥
रहूँ भरोसे राम के, बनिजे४ कबहुँ न जावँ ।
दास मलूका यों कहै, हरि बिड़वे५ मैं खावँ ॥१६॥
साहेब मेरा सिर खड़ा, पलक पलक सुधि ले ।
जबहीं गुरु किरपा करें, तबहिं राम कछु दे ॥२०॥
मोदी सब संसार है, साहेब राजा राम ।
जा पर चिट्ठो ऊतरे, सोई खरचे दाम ॥२१॥
औरहिं चिन्ता करन दे, तू मत मारै आह ।
जा के मोदी राम से, ताहि कहा परवाह ॥२२॥
(१) नागा। (२) लँगोटी। (३) कंगाल । (४) ब्यौपार को । (५) कमाय ।
साखी ३१
॥ बिनती ॥
नमो निरंजन निरंकार, अविगति पुरुष अलेख ।
जिन संतन के हित धर्यो, जुग जुग नाना भेख ॥२३॥
हरि भक्तन के काज हित, जुग जुग करी सहाय ।
सो सिव सेस न कहि सकै, कहा कहूँ मैं गाय ॥२४॥
राम राय असरन सरन, मोहिं आपन करि लेहु ।
संतन सँग सेवा करौं, भक्ति मजूरी देहु ॥२५॥
भक्ति मजूरी दीजिये, कीजै भवजल पार ।
बोरत है माया मुझे, गहे बाँह वरियार ॥२६॥
॥ प्रेम ॥
प्रेम नेम जिन ना कियो, जीतो नाहीं मैन १ ।
अलख पुरुष जिन ना लख्यो, छार परो तेहि नैन ॥२७॥
कठिन पियाला प्रेम का, पिये जो हरि के हाथ ।
चारो जुग माता रहै, उतरै जिय के साथ ॥२८॥
बिना अमल माता रहै, बिन लस्कर बलवंत ।
बिना विलायत साहेबी, अंत माहिं बेअंत ॥२६॥
रात न आवै नींदड़ी, थरथर काँपै जीव ।
ना जानूँ क्या करेगा, जालिम मेरा पीव ॥३०॥
करै भक्ति भगवंत की, करै कबहूँ नहिं चूक ।
हरि रस में राचो रहै, साँची भक्ति मलूक ॥३१॥
मलूक सो माता सुंदरी, जहाँ भक्त औतार ।
और सकल बाँझे भई, जनमे खर कतवार ॥३२॥
सोई पूत सपूत है, जो भक्ति करे चित लाय ।
जरा मरन तें छुटि परै, अजर अमर होइ जाय ॥३३॥
सब बाजे हिरदे बजैं, प्रेम पखावज तार ।
मंदिर ढूँढ़त को फिरै, मिल्यो बजावनहार ॥३४॥
(१) कामदेव ।
३२ मलूकदासजी की बानी
करै पखावज प्रेम का, हृदय बजावै तार ।
मनै नचावै मगन होय, तिन का मता अपार ॥३५॥
॥ ज्ञान ॥
जब लग थो अँधियार घर, मूस थके सब चोर ।
जब मंदिल दीपक बरयो, वही चोर धन मोर ॥३६॥
मन मिरगा बिन मूड़ का, चहुँदिस चरने जाय ।
हाँक ले आया ज्ञान तब, बाँधा ताँत लगाय ॥३७॥
॥ गुप्त की महिमा ॥
जो तेरे घट प्रेम है, तो कहि कहि न सुनाव ।
अंतरजामी जानिहै, अंतरगत का भाव ॥३८॥
गुप्त प्रगट जेती करी, मेरे मन की खूम ।
अंतरजामी रामजी, सब तुम को मालूम ॥३६॥
सुमिरन ऐसा कीजिये, दूजा लखै न कोय ।
ओंठ न फरकत देखिये, प्रेम राखिये गोय ॥४०॥
माला जपौं न कर जपौं, जिभ्या कहौं न राम ।
सुमिरन मेरा हरि करै, मैं पाया बिसराम ॥४१॥
॥ मूर्त्ति पूजा, तीर्थ भ्रमन, कर्म्म धर्म्म ॥
साधो दुनियाँ बावरी, पत्थर पूजन जाय ।
मलूक पूजै आतमा, कछु माँगै कछु खाय ॥४२॥
जेती देखै आतमा, तेते सालिग्राम ।
बोलनहारा पूजिये, पत्थर से क्या काम ॥४३॥
आतम राम न चीन्हही, पूजत फिरै पषान ।
कैसेहु मुक्ति न होयगी, कोटिक सुनो पुरान ॥४४॥
किरतिम देव न पूजिये, ठेस लगे फुटि जाय ।
कहैं मलूक सुभ आतमा, चारो जुग ठहराय ॥४५॥
देवल पुजे कि देवता, की पूजे पहाड़ ।
पूजन को जाँता भला, जो पीस खाय संसार ॥४६॥
साखी ३३
हम जानत तीरथ बड़े, तीरथ हरि की आस।
जिनके हिरदे हरि बसै, कोटि तिरथ तिन पास ॥४७॥
संध्या तरपन सब तजा, तीरथ कबहुँ न जाउँ ।
हरि हीरा हिरदे बसै, ताही भीतर न्हाउँ ॥४८॥
मक्का मदिना द्वारका, बद्री और केदार ।
बिना दया सब झूठ है, कहैं मलूक बिचार ॥४६॥
राम राय घट में बसे, ढूँढ़त फिरैं उजाड़ ।
कोइ कासी कोइ प्राग में, बहुत फिरैं झख मार ॥५०॥
॥ दया ॥
दुखिया जन कोइ दुखवै, दुखिए अति दुख होय ।
दुखिया रोय पुकारिहै, सब गुड़ माटी होय ॥५१॥
हरी डारि ना तोड़िये, लागै छूरा बान ।
दास मलूका यौं कहै, अपना सा जिव जान ॥५२॥
जे दुखिया संसार में, खोवो तिन का दुख ।
दलिद्दर सौंप मलूक को, लोगन दीजै सुख ॥५३॥
॥ हिंसा ॥
पीर सभन की एक सी, मूरख जानत नाहिं ।
काँटा चूभे पीर होय, गला काट कोउ खाय ॥५४॥
कुंजर चींटी पशू नर, सब में साहेब एक ।
काटे गला खोदाय का, करै सूरमा लेख ॥५५॥
सब कोउ साहेब बन्दते, हिन्दू मूसलमान ।
साहेब तिन को बन्दता, जिसका ठौर इमान ॥५६॥
॥ दया ॥
दया धर्म हिरदे बसै, बोलै अमृत बैन ।
तेई ऊँचे जानिये, जिन के नीचे नैन ॥५७॥
सब पानी की चूपरी, एक दया जग सार ।
जिन पर-आतम चीन्हिया, तेही उतरे पार ॥५८॥
कलपि!
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॥ दुर्जन ॥
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मलूक बाद न कीजिये, क्रोधै देव बहाय ।
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मलूक(Maluk)
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देव(deva)
बहाय ।(bahāya .)
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Line 4:
`हार मानु अनजान तैं, बक बक मरै बलाय
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साखी ३५
॥ माया ॥
माया मिसरी की छुरी, मत कोई पतियाय ।
इन मारे रसबाद के, ब्रह्महिं ब्रह्म लड़ाय ॥७१॥
माया मगन महंत के, तुम मत बैठो पास ।
कौड़ी कारन लड़ि मरै, कथनी कथै पचास ॥७२॥
नारी नाहिं निहारिये, करै नैन की चोट ।
कोइ एक हरि जन ऊबरे, पारब्रह्म की ओट ॥७३॥
नारी घोंटी अमल की, अमली सब संसार ।
कोइ ऐसा सूफी ना मिला, जो सँग उतरै पार ॥७४॥
॥ चेतावनी ॥
जागो रे अब जागो भैया, सिर पर जम की धार ।
ना जानूँ कौने घरी, केहि लेजैहै मार ॥७५॥
गर्ब भुलाने देंह के, रचि रचि बाँधे पाग ।
सो देंही नित देखि के, चोंच सँवारे काग ॥७६॥
सुन्दर देंही पाय के, मत कोइ करै गुमान ।
काल दरेरा खायगा, क्या बूढ़ा क्या ज्वान ॥७७॥
सुन्दर देंही देखि के, उपजत है अनुराग ।
मढ़ी न होती चाम की, तो जीवत खाते काग ॥७८॥
उतरे आय सराय में, जाना है बड़ कोह ।
अटका आकिल काम बस, ली भठियारी मोह ॥७९॥
जेते सुख संसार के, इकट्ठे किये बटोर ।
कन थोरे काँकर घने, देखा फटक पछोर ॥८०॥
इस जीने का गर्ब क्या, कहाँ देंह की प्रीत ।
बात कहत ढह जात है, बारू की सी भीत ॥८१॥
मलूक कोटा झाँझरा, भीत परी भहराय ।
ऐसा कोई ना मिला, जो फेर उठावै आय ॥८२॥
३६ मलूकदासजी की बानी
देंही होय न आपनी, समझ परी है मोहिं ।
अबहीं तें तजि राख तूँ, आखिर तजिहै तोहिं ॥८३॥
॥ मिश्रित ॥
काम मिलावै राम को, जो राखै यह जीत ।
दास मलूका यों कहै, जो मन आवै परतीत ॥८४॥
वहाँ न कोई पहूँचा, जहाँ बसत हैं राम ।
महा बिकट वो पंथ है, पैंड़ा मारै काम ॥८५॥
जहाँ जहाँ दुख पाइया, गुरु को थापा सोय ।
जबहीं सिर टक्कर लगै, तब हरि सुमिरन होय ॥८६॥
आदर मान महत्व सत, बालापन को नेह ।
यह चारो तबहीं गये, जबहिं कहा कछु देह ॥८७॥
हरि रस में नाहीं रचा, किया काँच व्योहार ।
कह मलूक वोही पचा, प्रभुता को संसार ॥८८॥
प्रभुताही को सब मरै, प्रभु को मरै न कोय ।
जो कोई प्रभु को मरै, तो प्रभुता दासी होय ॥८९॥
मानुष बैठे चुप करे, कदर न जानै कोय ।
जबहीं मुख खोलै कली, प्रगट बास तब होय ॥९०॥
सब कलियन में बास है, बिना बास नहि कोय ।
अति सुचित्त में पाइये, जो कोइ फूली होय ॥९१॥