केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
९८ केनोपनिषद् [ खण्ड ३
९८ केनोपनिषद् [ खण्ड ३
पद-भाष्य
तदेव हि ब्रह्म सर्वप्रकारेण | वह ब्रह्म ही सब प्रकारसे शासन
प्रशास्तृ देवानामति परोदेवः, | करनेवाला, देवताओंका भी परम देव,
ईश्वराणामपि परमेश्वरः, दुर्विज्ञेयः, | ईश्वरोंका भी परम ईश्वर, दुर्विज्ञेय
देवानां जयहेतुः, असुराणां | तथा देवताओंकी जयका कारण और असुरोंकी पराजयका हेतु है।
वाक्य-भाष्य
सर्वविषया चेश्वरशक्तिर्विपरीते- | और सर्वतोमुखी है तथा जीवकी
तरस्य। कर्म च चित्स्वरूपात्म- | इसके विपरीत है। ईश्वरका कर्म भी
सत्तामात्रनिमित्तमीश्वरस्य। औ- | उसके चित्स्वरूपकी सत्तामात्रसे ही होनेवाला है जैसे कि उष्णतारूप
ष्ण्यस्वरूपद्रव्यसत्तामात्रनिमित्त- | [सूर्यकान्तमणि आदि] द्रव्योंकी सत्तामात्रसे दहनकार्य निष्पन्न हो जाता
दहनकर्मवत् । राजाद्यस्कान्त- | है, अथवा जैसे राजा, चुम्बक और प्रकाशसे होनेवाले कार्य [उनकी
प्रकाशकर्मवच्च स्वात्माविक्रिया- | सन्निधिमात्रसे] होते हैं उसी प्रकार ईश्वरके कर्म उसके स्वरूपमें विकार
रूपम्। विपरीतमितरस्य। उपासी- | उत्पन्न करनेवाले नहीं हैं, किन्तु जीवके कर्म इससे विपरीत हैं।
तेतिवचनादुपास्य ईश्वरो गुरु- | "उपासीत" इस श्रुतिके अनुसार
राजवत् । उपासकश्चेतरः | ईश्वर गुरु एवं राजाके समान उपासनीय
शिष्यभृत्यवत्। अपहतपाप्मादि- | है तथा जीव शिष्य और सेवकके समान उपासक है। "अपहतपाप्मा" आदि
श्रवणान्नित्यशुद्ध ईश्वरः। | श्रुतियोंके अनुसार ईश्वर नित्यशुद्ध है
पुण्यो वै पुण्येनेतिवचनाद्विपरीत | तथा "पुण्यो वै पुण्येन" आदि
इतरः। | श्रुतिवाक्योंसे जीव इसके विपरीत-स्वभाववाला है।
अत एव नित्यमुक्त एवेश्वरो | अतः ईश्वर तो नित्यमुक्त ही है
नित्याशुद्धियोगात्संसारीतरः । | किन्तु जीव नित्य अशुद्धिके योगके कारण संसारी है। तथा जहाँ ज्ञानादि
अपि च यत्र ज्ञानादिलक्षणभेदः | लक्षणोंमें भेद रहता है वहाँ सर्वदा भेद
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९९
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९९
पद-भाष्य
पराजयहेतुः; तत्कथं नास्तीत्येत- | तब वह है किस प्रकार नहीं ?
स्वार्थस्यानुकूलानि ह्युत्तराणि | [ अर्थात् अवश्य ही है ] । इस अर्थके अनुकूल ही इस खण्डके आगेके
वचांसि दृश्यन्ते । | वाक्य देखे जाते हैं ।
वाक्य-भाष्य
अस्ति तत्र भेदो दृष्टः; यथाश्व- | ही देखा गया है; जैसे घोड़े और
महिषयोः । तथा ज्ञानादिलक्षण- | भैंसमें । अतः इसी प्रकार ज्ञानादि
भेदादीश्वरादात्मनां भेदोऽस्तीति | लक्षणोंमें भेद रहनेके कारण ईश्वर और
चेत् । | जीवोंमें भेद ही है ।
न । | सिद्धान्ती—यह बात नहीं है ।
कस्मात् ? | पूर्व०—कैसे ?
"अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति | सिद्धान्ती—क्योंकि "यह (ब्रह्म)
न स वेद" (बृ० उ० १।४।१०) | अन्य है और मैं अन्य हूँ—ऐसा जो
"ते क्षय्यलोका भवन्ति" (छा० | जानता है वह [ब्रह्मके यथार्थ स्वरूप-
उ० ७।२५।२) "मृत्योः स | को] नहीं जानता" "वे नाशवान्
मृत्युमाप्नोति" (क० उ० २।१।१०) | लोकोंको प्राप्त होते हैं" "वह मृत्युसे
इति भेददृष्टिर्ह्यपोद्यते । एकत्व- | मृत्युको प्राप्त होता है" इत्यादि
प्रतिपादिन्यश्च श्रुतयः सहस्रशा | वाक्योंसे भेददृष्टिका निषेध किया जाता
विद्यन्ते । | है और एकत्वका प्रतिपादन करने-
| वाली तो सहस्रों श्रुतियाँ विद्यमान हैं।
यदुक्तं ज्ञानादिलक्षणभेदादि- | तथा तुमने जो कहा कि ज्ञानादि
त्यत्रोच्यते—न | लक्षणोंमें भेद होनेके कारण जीव और
ज्ञानादिभेदस्य औपाधिकत्वम् | ईश्वरका भेद ही है, सो इस विषयमें
अनभ्युपगमात् । | मेरा यह कथन है कि उनमें कुछ भी
बुद्ध्यादिभ्यो व्यति- | भेद नहीं है, क्योंकि हमें उनके ज्ञानादि-
रिक्ता विलक्षणाश्चेश्वराद्भिन्न- | का भेद मान्य नहीं है। बुद्धि आदि
लक्षणा आत्मानो न सन्ति। एक | उपाधियोंसे व्यतिरिक्त और विलक्षण
एवेश्वरश्चात्मा सर्वभूतानां | ऐसे कोई जीव नहीं हैं जो ईश्वरसे
| भिन्न लक्षणवाले हों। एक ही नित्यमुक्त
| ईश्वर सम्पूर्ण प्राणियोंका आत्मा माना
१०० केनोपनिषद् [ खण्ड ३
१०० केनोपनिषद् [ खण्ड ३
पद-भाष्य
अथवा ब्रह्मविद्यायाः स्तुतये । | अथवा इस ( आख्यायिका )
कथम् ? ब्रह्मविज्ञानाद्धि अग्न्या- | का आरम्भ ब्रह्मविद्याकी स्तुतिके
दयो देवा देवानां श्रेष्ठत्वं जग्मुः । | लिये है । किस प्रकार ? क्योंकि
ततोऽप्यतितरामिन्द्र इति । | ब्रह्मज्ञानसे ही अग्नि आदि देवगण
| देवताओंमें श्रेष्ठत्वको प्राप्त हुए थे और
| उनमें भी इन्द्र सबसे बढ़कर हुआ ।
वाक्य-भाष्य
नित्यमुक्तोऽभ्युपगम्यते । बाह्य- | जाता है; क्योंकि चक्षु और बुद्धि
श्चक्षुर्बुद्ध्यादिसमाहारसन्तानाहं- | आदि संघातकी परम्परासे प्राप्त हुए
कारममत्वादि विपरीतप्रत्ययप्र- | अहंकार और ममतारूप विपरीत
बन्धाविच्छेदलक्षणो नित्यशुद्ध- | ज्ञानका विच्छेद न होना ही जिसका
बुद्धमुक्तविज्ञानात्मेश्वरगर्भो नित्य- | लक्षण है, नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त
विज्ञानाभासश्चित्तचैत्यबीजबीजि- | विज्ञानस्वरूप ईश्वर ही जिसका
स्वभावः कल्पितोऽनित्यविज्ञान | अन्तर्यामी है, जो स्वयं नित्यविज्ञानका
ईश्वरलक्षणविपरीतोऽभ्युपगम्यते; | अवभास ( प्रतिबिम्ब ) चित्त, चैत्य
यस्याविच्छेदे संसारव्यवहारः | ( सुखादि विषय ), बीज (अविद्यादि)
विच्छेदे च मोक्षव्यवहारः । | और बीजी ( शरीरादि ) से तादात्म्यको
| प्राप्त होकर तद्रूप हो गया है तथा जो
| कल्पित, अनित्य विज्ञानवान् और
| ईश्वरके लक्षणसे विपरीत है वही बाह्य
| जीव माना गया है; जिसके इस
| औपाधिक स्वरूपका विच्छेद न होनेसे
| संसारका व्यवहार होता है तथा विच्छेद
| हो जानेपर मोक्षव्यवहार होता है ।
अन्यश्च मृत्प्रलेपवत्प्रत्यक्षप्र- | इसमें जो देव, पितृ और मनुष्यरूप
ध्वंसो देवपितृमनुष्यादिलक्षणो | भूतोंका संघातविशेष है वह मृत्तिकाके
भूतविशेषसमाहारो न पुनश्चतु- | लेपके समान प्रत्यक्ष नष्ट हो जानेवाला
र्थोऽन्यो भिन्नलक्षण ईश्वरादभ्यु- | और [ चेतन आत्मासे ] सर्वथा भिन्न
पगम्यते । | है; किन्तु जो [ स्थूल, सूक्ष्म और
| कारण तीनों प्रकारके शरीरोंसे ]
| विलक्षण चौथा आत्मा है वह ईश्वरसे
| भिन्न लक्षणोंवाला नहीं माना जा सकता ।
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०१
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०१
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पद-भाष्य
| मूल संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अथवा दुर्विज्ञेयं ब्रह्मेत्येतत् | अथवा इससे यह दिखलाया |
| प्रदर्श्यते—येनाग्न्यादयोऽति- | गया है कि ब्रह्म दुर्विज्ञेय है, क्योंकि |
| तेजसोऽपि क्लेशेनैव ब्रह्म विदित- | अग्नि आदि परम तेजस्वी होनेपर |
| वन्तस्तथेन्द्रो देवानामीश्वरोऽपि | भी कठिनतासे ही ब्रह्मको जान |
| सके थे तथा देवताओंका स्वामी | |
| सन्निति । | होनेपर भी इन्द्रने उसे बड़ी |
| कठिनतासे पहचाना था । |
वाक्य-भाष्य
| मूल संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| बुद्ध्यादिकल्पितात्मव्यतिरे- | यदि कहो कि बुद्धि आदि कल्पित |
| आत्मासे [ निरुपाधिक चेतनस्वरूप ] | |
| काभिप्रायेण तु लक्षणभेदात् | आत्मा भिन्न है इस अभिप्रायसे हमने |
| 'लक्षणभेद होनेके कारण' ऐसा हेतु | |
| इत्याश्रयासिद्धो हेतुः ईश्वरात् | दिया है, तो तुम्हारा यह हेतु |
| आश्रयासिद्ध * है, क्योंकि ईश्वरसे भिन्न | |
| अन्यस्यात्मनोऽसत्त्वात् । | और किसी आत्माकी सत्ता नहीं है । |
| ईश्वरस्यैव विरुद्धलक्षणत्वम- | पूर्व०—[ यदि ईश्वरसे भिन्न और |
| कोई आत्मा नहीं है तो ] ईश्वरमें ही | |
| विरुद्धलक्षणत्व तथा सुख-दुःख | |
| युक्तमिति चेत्सुखदुःखादियोगश्च । | आदिका योग होना तो ठीक नहीं है । |
| न । निमित्तत्वे सति लोक- | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है क्योंकि |
| आत्मा सूर्यके समान केवल निमित्तमात्र | |
| विपर्ययाध्यारोपणात्सविट्वत् । | है; लोगोंकी उसमें जो विपरीत बुद्धि है |
| वह केवल आरोपके कारण है । जिस | |
| यथा हि सविता नित्यप्रकाशरूप- | प्रकार सूर्य नित्यप्रकाशस्वरूप होनेके |
पादटिप्पणी:
* जहाँ पक्षमें पक्षतावच्छेदकका अभाव होता है वहाँ आश्रयासिद्ध हेत्वाभास
माना जाता है; जैसे—'आकाशकुसुम सुगन्धिमान् है, कुसुम होनेके कारण, अन्यकुसुमवत्,
इस अनुमानमें 'आकाशकुसुम' जो पक्ष है उसमें पक्षतावच्छेदकाल यानी कुसुमत्वका
अभाव है, क्योंकि आकाशकुसुम कभी किसीने नहीं देखा । इसी प्रकार यहाँ समझना चाहिये ।
१०२ केनोपनिषद् [ खण्ड ३
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पद-भाष्य
वक्ष्यमाणोपनिषद्विधिपरं वा | अथवा आगे कही जानेवाली
सर्वं ब्रह्मविद्याव्यतिरेकेण प्राणिनां | समस्त उपनिषद् विधिपरक है।
कर्तृत्वभोक्तृत्वाद्यभिमानो मिथ्या | और ब्रह्मविद्यासे अतिरिक्त प्राणियों-
| का जो कर्तृत्व-भोक्तृत्वादिका अभि-
वाक्य-भाष्य
त्वाल्लोकाभिव्यक्त्यनभिव्यक्ति- | कारण लौकिक पदार्थोंकी अभिव्यक्ति
निमित्तत्वे सति लोकदृष्टिविपर्य- | और अनभिव्यक्तिका निमित्तमात्र होता
येणोदयास्तमयाहोरात्रादिकर्तृ- | है तथापि लोकोंकी दृष्टिमें विपरीत
त्वाध्यारोपभाग्भवत्येवमीश्वरे | भाव आ जानेके कारण इस अध्यारोप-
नित्यविज्ञानशक्तिरूपे लोकज्ञाना- | का पात्र बनता है कि वह उदय-अस्त
पोहसुखदुःखस्मृत्यादिनिमित्तत्वे | और दिन-रात्रि आदिका कर्ता है, उसी
सति लोकविपरीतबुद्ध्याध्यारो- | प्रकार नित्यविज्ञानशक्तिस्वरूप ईश्वरमें
पितं विपरीतलक्षणत्वं सुख- | भी लोकोंके ज्ञानका विनाश तथा सुख,
दुःखाश्रयश्च न स्वतः। | दुःख और स्मृति आदिकी निमित्तता
आत्मदृष्ट्यनुरूपाध्यारोपाच्च। | उपस्थित होनेपर लोकोंकी विपरीत
यथा घनादिविप्रकीर्णेऽम्बरे येनैव | बुद्धिसे विपरीतलक्षणत्व तथा सुख-
सवितृप्रकाशो न दृश्यते स | दुःखाश्रयत्वका आरोप कर लिया
आत्मदृष्ट्यनुरूपमेवाध्यस्यति | जाता है, उसमें स्वतः ऐसा कोई भाव
सवितेदानीमिह न प्रकाशयतीति | नहीं है।
सत्येव प्रकाशेऽन्यत्र भ्रान्त्या। | इसके सिवा सभी जीव अपनी-
| अपनी दृष्टिके अनुरूप ही उसमें
| आरोप करते हैं [ इसलिये भी वह उन
| सब आरोपोंसे अछूता है]। जिस प्रकार
| आकाशके मेघ आदिसे आच्छादित हो
| जानेपर जिस-जिसको सूर्यका प्रकाश
| दिखलायी नहीं देता वही-वही अन्यत्र
| प्रकाश रहनेपर भी भ्रान्तिवश अपनी
| दृष्टिके अनुसार ऐसा आरोप करता है
| कि 'इस समय यहाँ सूर्य प्रकाशमान
| नहीं है।' इसी प्रकार इस आत्मतत्त्वमें
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०३
पद-भाष्य
इत्येतद्दर्शनार्थं वा आख्यायिका, मान है वह देवताओंके जय
आदिके अभिमानके समान मिथ्या
यथा देवानां जयाद्यभिमानः है—यह बात दिखानेके लिये ही
तद्वदिति । प्रस्तुत आख्यायिका है।
वाक्य-भाष्य
एवमिह बौद्धादिवृत्त्युद्भववि- भी बुद्धि आदिकी वृत्तियोंके उदय
भवाकुलभ्रान्त्याध्यारोपितः सुख- और अस्तसे वैचित्र्यको प्राप्त हुई
भ्रान्तिसे आरोपित सुख-दुःखादिका
दुःखादियोग उपपद्यते । योग हो सकता है।
तत्स्मरणाच्च । तस्यैवेश्वरस्यैव इस विषयमें उसीकी स्मृति भी है
हि स्मरणम्—"मत्तः स्मृतिर्ज्ञान- अर्थात् उस ईश्वरके ही स्मृतिवाक्य
भी हैं; जैसे—"मुझहीसे प्राणियोंको
मपोहनं च" (गीता १५ । १५) स्मृति, ज्ञान और अज्ञान प्राप्त
"नादत्ते कस्यचित्पापम्" (गीता होते हैं" "ईश्वर किसीके पापको
५ । १५) इत्यादि । अतो नित्य- स्वीकार नहीं करता" इत्यादि । अतः
मुक्त एकस्मिन्सवितरीव लोका- सूर्यके समान एक ही नित्यमुक्त ईश्वरमें
विद्याध्यारोपितमीश्वरे संसारि- लोकने अविद्यावश संसारित्वका आरोप
कर रखा है, तथा शास्त्रादि प्रमाणों-
त्वम् । शास्त्रादिप्रामाण्यादभ्युप- से उसका असंसारित्व जाना गया है;
गतमसंसारित्वमित्यविरोध इति। इसलिये इसमें कोई विरोध नहीं है।
एतेन प्रत्येकं ज्ञानादिभेदः इससे प्रत्येक जीवके ज्ञानादि भेदका
प्रत्युक्तः सौक्ष्म्यचैतन्यसर्वगतत्वा- प्रत्याख्यान हो गया, क्योंकि उन सभीमें
सूक्ष्मता, चैतन्य और सर्वगतत्वादि धर्म
द्यविशेषे च भेदहेत्वभावात् । समानरूपसे रहनेके कारण भेदके हेतुका
अभाव है। यदि उन्हें विकारी माना जाय
विक्रियावत्त्वे चानित्यत्वात् । तो वे अनित्य हो जायेंगे । इसके सिवा
मुक्तावस्थामें किसीने भी आत्माका
मोक्षे च विशेषानभ्युपगमादभ्युप- कोई विशेष भाव नहीं माना, यदि
कोई मानेगा तो अनित्यत्वका प्रसंग
गमे चानित्यत्वप्रसङ्गात्। अविद्या- उपस्थित हो जायगा। तथा भेद तो
वदुपलभ्यत्वाच्च भेदस्य । केवल अविद्यावान्को ही उपलब्ध होता
१०४ केनोपनिषद् [ खण्ड ३
देवताओंका गर्व
ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिग्ये तस्य ह ब्रह्मणो विजये
देवा अमहीयन्त ॥ १ ॥
यह प्रसिद्ध है कि ब्रह्मने देवताओंके लिये विजय प्राप्त की। कहते
हैं, उस ब्रह्मकी विजयमें देवताओंने गौरव प्राप्त किया ॥ १ ॥
पद-भाष्य
ब्रह्म यथोक्तलक्षणं परं ह किल देवेभ्योऽर्थाय विजिग्ये जयं लब्धवत् देवानामसुरार्णा च | यह प्रसिद्ध है कि उपर्युक्त लक्षणोंवाले परब्रह्मने देवताओंके लिये जय प्राप्त की। अर्थात् देवता और असुरोंके संग्राममें संसारके
वाक्य-भाष्य
तत्क्षयेऽनुपपत्तिरिति सिद्धम् एकत्वम् । | है, अविद्याका क्षय होनेपर उसकी सिद्धि नहीं होती। अतः [जीव और ईश्वरका] एकत्व ही सिद्ध होता है।
तस्माच्छरीरेन्द्रियमनोबुद्धि- | अतः अहंकारके सम्बन्धसे अज्ञानके बीजभूत शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि,
[बन्धमोक्ष-व्यवस्था] विषयवेदनासन्तानस्य अहङ्कारसम्बन्धादज्ञान-बीजस्य नित्यविज्ञाना-न्यनिमित्तस्यात्मतत्त्वयाथात्म्यवि-ज्ञानाद्विनिवृत्तावज्ञानबीजस्य वि-च्छेद आत्मनो मोक्षसंज्ञा; विपर्यये च बन्धसंज्ञा, स्वरूपापेक्षत्वा-दुभयोः । | विषय और इन्द्रियज्ञानके प्रवाहका, जो नित्यविज्ञानस्वरूप आत्मासे भिन्न किसी अन्य निमित्तसे स्थित है, आत्म-तत्त्वके यथार्थ ज्ञानसे उस निमित्तके निवृत्त हो जानेपर जो अज्ञानके बीजका उच्छेद हो जाना है वही आत्माका मोक्ष कहलाता है और उससे विपरीत-का नाम बन्ध है, क्योंकि वे [बन्ध और मोक्ष] दोनों ही [बुद्ध्यादि उपाधिविशिष्ट] स्वरूपकी अपेक्षासे हैं।
ब्रह्म ह इत्यैतिहासार्थः । पुरा किल देवासुरसंग्रामे जगत्स्थिति-परिपिपालयिष्यात्मानुशासनानु-वर्तिभ्यो देवेभ्योऽर्थिभ्योऽर्थाय | 'ब्रह्म ह' इसमें 'ह' ऐतिह्य (इतिहास) का द्योतक है। कहते हैं, पूर्वकालमें देवासुरसंग्राममें ब्रह्मने जगत्-स्थिति (लोक-मर्यादा) की रक्षाके लिये अपनी आज्ञामें चलनेवाले विजयार्थी देवताओंके लिये असुरोंको
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०५
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०५
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पद-भाष्य
संग्रामेऽसुराञ्जित्वा जगदराती- | शत्रु तथा ईश्वरकी मर्यादा भङ्ग
नीश्वरसेतुभेत्तॄन् देवेभ्यो जयं | करनेवाले असुरोंको जीतकर जगत्-
तत्फलं च प्रायच्छज्जगतः स्थेम्ने । | की स्थितिके लिये वह जय और
तस्य ह किल ब्रह्मणो विजये | उसका फल देवताओंको दे दिया ।
देवाः अग्न्यादयः अमहीयन्त | कहते हैं, ब्रह्मकी उस विजयमें अग्नि
महिमानं प्राप्तवन्तः ॥ १ ॥ | आदि देवगण महिमाको प्राप्त हुए ॥१॥
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यक्षका प्रादुर्भाव
त ऐक्षन्तास्माकमेवायं विजयोऽस्माकमेवायं महिमेति ।
तद्धैषां विजज्ञौ तेभ्यो ह प्रादुर्बभूव तन्न व्यजानत
किमिदं यक्षमिति ॥ २ ॥
उन्होंने सोचा हमारी ही यह विजय है, और हमारी ही यह
महिमा है । कहते हैं, वह ब्रह्म देवताओंके अभिप्रायको जान गया और
उनके सामने प्रादुर्भूत हुआ । तब देवतालोग [ यक्षरूपमें प्रकट
हुए ] उस ब्रह्मको 'यह यक्ष कौन है ?' ऐसा न जान सके ॥ २ ॥
वाक्य-भाष्य
विजिग्येऽजैषीदसुरान् । ब्रह्मण | जीत लिया । अर्थात् ब्रह्मकी इच्छारूप
इच्छानिमित्तो विजयो देवानां | निमित्तसे देवताओंकी विजय हो
बभूवेत्यर्थः । तस्य ह ब्रह्मणो | गयी । ब्रह्मकी उस विजयमें देवताओं-
विजये देवा अमहीयन्त । यज्ञा- | को महत्ता प्राप्त हुई । लोककी स्थितिके
दिलोकस्थित्यपहारिष्वसुरेषु परा- | हेतुभूत यज्ञादिको नष्ट करनेवाले
जितेषु देवा वृद्धिं पूजां वा | असुरोंके पराजित हो जानेपर देवताओं-
प्राप्तवन्तः ॥ १ ॥ | ने वृद्धि अथवा खूब सत्कार प्राप्त
| किया ॥ १ ॥
───⊱⊰○⊱⊰───
त ऐक्षन्त इति मिथ्याप्रत्यय- | 'त ऐक्षन्त' इत्यादि शास्त्रवाक्य,
| मिथ्याप्रत्ययरूप होनेके कारण
त्वाद्धेयत्वख्यापनार्थमाम्नायः । | [ अभिमानका ] हेयत्व प्रतिपादन
| करनेके लिये है ।
१०६ केनोपनिषद् [ खण्ड ३
१०६ केनोपनिषद् [ खण्ड ३
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पद-भाष्य
तदा आत्मसंस्थस्य प्रत्यगात्मन | तत्र, अन्तःकरणमें स्थित,
ईश्वरस्य सर्वज्ञस्य सर्वक्रियाफल- | प्रत्यगात्मा, सर्वज्ञ, प्राणियोंके
| सम्पूर्ण कर्मफलोंका संयोग कराने-
संयोजयितुः प्राणिनां सर्वशक्तेः | वाले, सर्वशक्तिमान् एवं जगत्की
जगतः स्थितिं चिकीर्षोः अयं | रक्षा करनेके इच्छुक ईश्वरकी ही
| यह सम्पूर्ण जय और महिमा है यह
जयो महिमा चेत्यजानन्तः ते देवाः | न जानते हुए आत्माको अग्नि
ऐक्षन्त ईक्षितवन्तः अग्न्यादि | आदि रूपोंसे परिच्छिन्न माननेवाले
स्वरूपपरिच्छिन्नात्मकृतोऽस्माक- | देवता सोचने लगे कि--हमलोगों-
| की ही यह विजय हुई है, और इस
मेवाय विजयः अस्माकमेवायं | विजयकी फलभूत अग्नित्व, वायुत्व
महिमा अग्निर्वाय्विन्द्रत्वादि- | एवं इन्द्रत्वरूप यह महिमा भी
| हमारी ही है; अतः हमारे द्वारा ही
लक्षणो जयफलभूतोऽस्माभिरनु- | इसका अनुभव किया जाता है; यह
भूयते; नास्मत्प्रत्यगात्मभूतेश्वर- | विजय अथवा महिमा हमारे अन्तरात्म-
| भूत ईश्वरकी की हुई नहीं है।
कृत इति ।
एवं मिथ्याभिमानेक्षणवतां | इस प्रकार मिथ्या अभिमानसे
| विचार करनेवाले उन देवताओंके
तत् ह किल एषां मिथ्येक्षणं | इस मिथ्या विचारको ब्रह्मने जान
विजज्ञौ विज्ञातवद्ब्रह्म । सर्वेशितृ | लिया, क्योंकि समस्त जीवोंके
वाक्य-भाष्य
ईश्वरनिमित्ते विजये स्वसाम- | जो विजय ईश्वरके निमित्तसे प्राप्त
| हुई थी उसमें 'यह हमारी सामर्थ्यसे
र्थ्यनिमित्तोऽस्माकमेवायं विजयोऽ- | प्राप्त हुई हमारी ही विजय है, हमारी
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०७
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०७
पद-भाष्य
हि तत् सर्वभूतकरणप्रयोक्तृ- | अन्तःकरणोंका प्रेरक होनेके कारण
त्वात् देवानां च मिथ्याज्ञान- | वह सबका साक्षी है । देवताओंके
| इस मिथ्या ज्ञानको जानकर 'इस
मुपलभ्य मैवासुरवद्देवा मिथ्या- | मिथ्या ज्ञानसे असुरोंकी ही भाँति
| देवताओंका भी पराभव न हो जाय'
भिमानात्पराभवेयुरिति तदनु- | इस प्रकार उनपर अनुकम्पा करते
कम्पया देवान्मिथ्याभिमाना- | हुए यह सोचकर कि 'देवताओंके
| मिथ्याज्ञानको निवृत्त करके मैं उन्हें
पनोदनेनानुगृह्णीयामिति तेभ्यः | अनुगृहीत करूँ' वह उन देवताओं-
देवेभ्यः ह किलार्थाय प्रादुर्बभूव | के लिये प्रादुर्भूत हुआ अर्थात्
वाक्य-भाष्य
स्माकमेवायं महिमेत्यात्मनो | ही महिमा है' इस प्रकार [ अभिमान
जयादि श्रेयोनिमित्तं सर्वात्मा- | करके ] अपनी विजय आदि कल्याणके
| हेतुभूत सर्वात्मा सर्वकल्याणास्पद
नमात्मस्थं सर्वकल्याणास्पदमी- | आत्मस्थ ईश्वरको ही आत्मभावसे न
श्वरमेवात्मत्वेनावुद्ध्य पिण्ड- | जानकर पिण्डमात्रके अभिमानी होकर
| उन्होंने जो मिथ्या प्रत्यय कर लिया था
मात्राभिमानाः सन्तो यं मिथ्या- | वह केवल पिण्डमात्रसे सम्बन्ध रखने-
प्रत्ययं चक्रुस्तस्य पिण्डमात्रविषय- | वाला होनेसे मिथ्या ज्ञानस्वरूप था ।
| अतः सर्वात्मा ईश्वरके यथार्थ स्वरूपके
त्वेन मिथ्याप्रत्ययत्वात्सर्वात्मे- | बोधसे उसका हेयत्व प्रकट करनेके
श्वरयाथात्म्यावबोधेन हातव्यता- | लिये ही यह 'तद्वैषाम्' ( वह ब्रह्म उन
१०८ केनोपनिषद् [ खण्ड ३
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पद-भाष्य
स्वयोगमाहात्म्यनिर्मितेनात्यद्भु- | अपनी योगमायाके प्रभावसे सबको
तेन विस्मापनीयेन रूपेण देवाना- | विस्मित करनेवाले अति अद्भुतरूपसे
मिन्द्रियगोचरे प्रादुर्बभूव प्रादु- | देवताओंकी इन्द्रियोंका विषय होकर
र्भूतवत् । तत् प्रादुर्भूतं ब्रह्म | प्रादुर्भूत अर्थात् प्रकट हुआ । उस
न व्यजानत नैव विज्ञातवन्तः | प्रकट हुए ब्रह्मको देवतालोग यह
देवाः किमिदं यक्षं पूज्यं | न जान सके कि यह यक्ष अर्थात्
महद्भूतमिति ॥२॥ | पूजनीय महान् प्राणी कौन है ?॥२॥
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वाक्य-भाष्य
ख्यापनार्थस्तद्धैषामित्याद्याख्या- | देवताओंके अभिप्रायको जान गया)
यिकाम्नायः। | आदि आख्यायिकारूप आम्नाय
| (शास्त्र) है।
तद्ब्रह्म ह किलैषां देवानामभि- | कहते हैं, वह ब्रह्म इन देवताओंके
प्रायं मिथ्याहङ्काररूपं विज्ञज्ञौ | मिथ्या अहंकाररूप अभिप्रायको समझ
विज्ञातवत् । ज्ञात्वा च मिथ्याभि- | गया—उसे इसका ज्ञान हो गया ।
मानशातनेन तदनुजिघृक्षया | उसे जानकर उस मिथ्याभिमानके
देवेभ्योऽर्थाय तेषामेवेन्द्रियगोचरे | छेदनद्वारा देवताओंपर अनुग्रह करने-
नातिदूरे प्रादुर्बभूव । महेश्वर- | की इच्छासे वह देवताओंके ही लिये
शक्तिमायोपात्तेनात्यन्ताद्भुतेन | उनकी इन्द्रियोंका विषय होकर उनसे
प्रादुर्भूतं किलकेनचिद्रूपविशेषेण। | थोड़ी ही दूरपर प्रकट हुआ। यह
तत्किलोपलभमाना अपि देवा | महेश्वरकी मायाशक्तिसे ग्रहण किये हुए
न व्यजानत न विज्ञातवन्तः | किसी बड़े ही विचित्र रूपविशेषसे
किमिदं यदेतद्यक्षं पूज्यमिति ॥ २॥ | प्रकट हुआ, जिसे देखकर भी देवता
| लोग यह न जान सके—न पहचान
| सके कि यह यक्ष अर्थात् पूज्य
| कौन है ? ॥ २ ॥
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खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०९
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०९
अग्निकी परीक्षा
तेऽग्निमब्रुवञ्जातवेद एतद्विजानीहि किमिदं यक्षमिति
तथेति ॥ ३ ॥
उन्होंने अग्निसे कहा—‘हे अग्ने ! इस बातको मालूम करो कि
यह यक्ष कौन है ?’ उसने कहा—‘बहुत अच्छा’ ॥ ३ ॥
पद-भाष्य
ते तदजानन्तो देवाः सान्त- | उसे न जाननेवाले देवताओंने
र्भयास्तद्विजिज्ञासवः अग्निम् | भीतरसे डरते-डरते उसे जाननेकी
अग्रगामिनं जातवेदसं सर्वज्ञ- | इच्छासे सत्रसे आगे चलनेवाले
कल्पम् अब्रुवन् उक्तवन्तः । हे | सर्वज्ञकल्प जातवेदा अग्निसे कहा—
जातवेदः एतद् अस्मद्गोचरस्थं | ‘हे जातवेदः ! हमारे नेत्रोंके सम्मुख
यक्षं विजानीहि विशेषतो बुध्य- | स्थित इस यक्षको जानो—विशेष-
स्व त्वं नस्तेजस्वी किमेतद्य- | रूपसे मालूम करो कि यह यक्ष
क्षमिति ॥ ३ ॥ | कौन है; क्योंकि तुम हम सत्रमें तेजस्वी हो’ ॥ ३ ॥
तदभ्यद्रवत्तमभ्यवदत्कोऽसीत्यग्निर्वा अहमस्मीत्य-
ब्रवीज्जातवेदा वा अहमस्मीति ॥ ४ ॥
अग्नि उस यक्षके पास गया । उसने अग्निसे पूछा, ‘तू कौन है ?’
उसने कहा, ‘मैं अग्नि हूँ, मैं निश्चय जातवेदा ही हूँ’ ॥ ४ ॥
पद-भाष्य
तथा अस्तु इति तद् यक्षम् | तब ‘बहुत अच्छा’ ऐसा कहकर
अभि अद्रवत् तत्प्रति गतवा- | अग्नि उस यक्षकी ओर अभिद्रुत
नग्निः । तं च गतवन्तं | हुआ अर्थात् उसके पास गया ।
पिपृच्छिषुं तत्समीपेऽप्रगल्भत्वा- | इस प्रकार गये हुए और धृष्ट न
तूष्णींभूतं तद्यक्षम् अभ्यवदद् | होनेके कारण अपने समीप चुपचाप खड़े हुए प्रश्न करनेकी इच्छावाले उस अग्निसे यक्षने कहा—‘तू
११० केनोपनिषद् [ खण्ड ३
११० केनोपनिषद् [ खण्ड ३
पद-भाष्य
अग्निं प्रति अभाषत कोऽसीति । | कौन है ?' ब्रह्मके इस प्रकार
एवं ब्रह्मणा पृष्टोऽग्निः अब्रवीत्— | पूछनेपर—'मैं अग्नि हूँ—मैं अग्नि
अग्निर्वे अग्निनामाहं प्रसिद्धो जात- | नामसे प्रसिद्ध जातवेदा हूँ'— इस
वेदा इति च नामद्वयेन प्रसिद्ध- | प्रकार अग्निने दो नामसे प्रसिद्ध
तयात्मानं श्लाघयन्निति ॥ ४ ॥ | होनेके कारण अपनी प्रशंसा करते
| हुए कहा ॥ ४ ॥
तस्मिंस्त्वयि किं वीर्यमित्यपीदँ सर्वं दहेयं यदिदं
पृथिव्यामिति ॥ ५ ॥
[ फिर यक्षने पूछा— ] 'उस [ जातवेदारूप ] तुझमें सामर्थ्य क्या
हैं ?' [ अग्निने कहा— ] 'पृथिवीमें यह जो कुछ है उस सभीको जला
सकता हूँ' ॥ ५ ॥
पद-भाष्य
एवमुक्तवन्तं ब्रह्मावोचत् | इस प्रकार बोलते हुए उस
तस्मिन् एवं प्रसिद्धगुणनामवति | अग्निसे ब्रह्मने कहा—'ऐसे प्रसिद्ध
त्वयि किं वीर्यं सामर्थ्यम् इति । | गुण और नामवाले तुझमें क्या
सोऽब्रवीद् इदं जगत् सर्वं दहेयं | वीर्य—सामर्थ्य है ?' वह बोला—
भस्मीकुर्यां यद् इदं स्थावरादि | 'पृथिवीपर जो यह चराचररूप
पृथिव्याम् इति । पृथिव्यामि- | जगत् है इस सबको जला सकता
त्युपलक्षणार्थम्, यतोऽन्तरिक्षस्थ- | हूँ—भस्म कर सकता हूँ।' 'पृथिवीमें'
मपि दह्यत एवाग्निना ॥ ५ ॥ | यह केवल उपलक्षणके लिये है,
| क्योंकि जो वस्तु आकाशमें रहती
| है वह भी अग्निसे जल ही
| जाती है ॥ ५ ॥
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १११
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १११
तस्मै तृणं निदधावेतद्दहेति । तदुपप्रेयाय सर्वजवेन
तन्न शशाक दग्धुं स तत एव निववृते नैतदशकं
विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति ॥ ६ ॥
तब यक्षने उस अग्निके लिये एक तिनका रख दिया और कहा—
'इसे जला' । अग्नि उस तृणके समीप गया, परन्तु अपने सारे वेगसे भी
उसे जलानेमें समर्थ नहीं हुआ । वह उसके पाससे ही लौट आया और
बोला, 'यह यक्ष कौन है—इस बातको मैं नहीं जान सका' ॥ ६ ॥
पद-भाष्य
तस्मै एवमभिमानवते ब्रह्म | इस प्रकार अभिमान करनेवाले
तृणं निदधौ पुरोग्रेः स्थापितवत् । | उस अग्निके लिये ब्रह्मने एक तृण
ब्रह्मणा 'एतत् तृणमात्रं ममाग्रतः | रखा अर्थात् उसके आगे तृण डाल
दह; न चेदसि दग्धुं समर्थः, | दिया । ब्रह्मके ऐसा कहनेपर कि
मुञ्च दग्धृत्वाभिमानं सर्वत्र' | 'तू मेरे सामने इस तिनकेको जला;
इत्युक्तः तत् तृणम् उपप्रेयाय | यदि तू इसे जलानेमें समर्थ नहीं है
तृणसमीपं गतवान् सर्वजवेन | तो सर्वत्र जलानेवाला होनेका
सर्वोत्साहकृतेन वेगेन । गत्वा | अभिमान छोड़ दे' वह अपने सारे
तत् न शशाक नाशकद्दग्धुम् । | बल अर्थात् उत्साहकृत सम्पूर्ण
सः जातवेदाः तृणं दग्धुम- | वेगसे उस तृणके पास गया ।
शक्तो व्रीडितो हतप्रतिज्ञः तत | किन्तु वहाँ जाकर भी वह उसे
एव यक्षादेव तूष्णीं देवान्प्रति | जलानेमें समर्थ न हुआ ।
निववृते निवृत्तः प्रतिगतवान् न | इस प्रकार उस तिनकेको
एतत् यक्षम् अशकं शक्तवानहं | जलानेमें असमर्थ वह अग्नि हतप्रतिज्ञ
विज्ञातुं विशेषतः यदेतद्यक्ष- | होनेके कारण लज्जित होकर उस
मिति ॥ ६ ॥ | यक्षके पाससे चुपचाप देवताओंके
प्रति निवृत्त हुआ—अर्थात् उनके
पास लौट आया [और बोला—]
'इस यक्षको मैं विशेषरूपसे ऐसा
नहीं जान सका कि यह यक्ष
कौन है ?' ॥ ६ ॥
११२ केनोपनिषद् [ खण्ड ३
११२ केनोपनिषद् [ खण्ड ३
वायुकी परीक्षा
अथ वायुमब्रुवन्वायवेतद्विजानीहि किमेतद्यक्षमिति
तथेति ॥ ७ ॥
तदनन्तर, उन देवताओंने वायुसे कहा—'हे वायो ! इस बातको
मालूम करो कि यह यक्ष कौन है?' उसने कहा—'बहुत अच्छा' ॥ ७ ॥
तदभ्यद्रवत्तमभ्यवदत्कोऽसीति वायुर्वा अहमस्मीत्य-
ब्रवोन्मातरिश्वा वा अहमस्मीति ॥ ८ ॥
वायु उस यक्षके पास गया, उसने वायुसे पूछा—'तू कौन है?'
उसने कहा—'मैं वायु हूँ—मैं निश्चय मातरिश्वा ही हूँ' ॥ ८ ॥
तस्मिंस्त्वयि किं वीर्यमित्यपीदँ सर्वमाददीय
यदिदं पृथिव्यामिति ॥ ९ ॥
[ तत्र यक्षने पूछा—] 'उस [ मातरिश्वारूप ] तुझमें क्या सामर्थ्य
है ?' [ वायुने कहा—] 'पृथिवीमें यह जो कुछ है उस सभीको ग्रहण
कर सकता हूँ ॥ ९ ॥
तस्मै तृणं निदधावेतदादत्स्वेति तदुपप्रेयाय सर्वजवेन
तन्न शशाकादातुं स तत एव निववृते नैतदशकं विज्ञातुं
यदेतद्यक्षमिति ॥ १० ॥
तत्र यक्षने उस वायुके लिये एक तिनका रखा और कहा—'इसे
ग्रहण कर'। वायु उस तृणके समीप गया । परन्तु अपने सारे वेगसे भी
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३
वह उसे ग्रहण करनेमें समर्थ न हुआ। तब वह उसके पाससे लौट
आया और बोला—'यह यक्ष कौन है—इस बातको मैं नहीं जान
सका' ॥१०॥
पद-भाष्य
अथ अनन्तरं वायुमब्रुवन् | तदनन्तर उन्होंने वायुसे कहा—
हे वायो एतद्विजानीहीत्यादि | 'हे वायो ! इसे जानो' इत्यादि सब अर्थ पहलेहीके समान है।
समानार्थं पूर्वेण। वानाद्गमना- | [ वायुको ] वान अर्थात् गमन या गन्धग्रहण करनेके कारण 'वायु'
द्वन्धनाद्वा वायुः। मातर्यन्त- | कहा जाता है। 'मातरि' अर्थात्
रिक्षे श्वयतीति मातरिश्वा। इदं | अन्तरिक्षमें श्वयन (विचरण) करनेके कारण वह 'मातरिश्वा'
सर्वमपि आददीय गृह्णीयाम् | है। पृथिवीमें जो कुछ है मैं इस सभीको ग्रहण कर सकता हूँ—
यदिदं पृथिव्यामित्यादिसमान- | इत्यादि शेष अर्थ पहलेहीके समान है ॥१०॥
मेव ॥१०॥
वाक्य-भाष्य
तद्विज्ञानायाग्निमब्रुवन्। तृण- | देवताओंने उसे जाननेके लिये अग्निसे कहा। अग्नि और वायुके
निधानेऽयमभिप्रायोऽत्यन्तसम्भा- | सामने तृण रखनेमें ब्रह्मका यह
वितयोरग्निमारुतयोस्तृणदहनादा- | अभिप्राय था कि एक तिनकेको जलाने और ग्रहण करनेमें असमर्थ होनेसे इन
नाशकत्यात्मसम्भावना शातिता | अत्यन्त प्रतिष्ठित अग्नि और वायुका आत्माभिमान क्षीण हो जाय ॥३-१०॥
भवेदिति ॥ ३-१० ॥
११४ केनोपनिषद् [ खण्ड ३
११४ केनोपनिषद् [ खण्ड ३
इन्द्रकी नियुक्ति
अथेन्द्रमब्रुवन्मघवन्नेतद्विजानीहि किमेतद्यक्षमिति
तथेति तदभ्यद्रवत्तस्मात्तिरोधधे ॥ ११ ॥
तदनन्तर देवताओंने इन्द्रसे कहा—'मघवन् ! यह यक्ष कौन
है—इस बातको मालूम करो।' तब इन्द्र 'बहुत अच्छा' कह उस यक्षके
पास गया, किन्तु वह इन्द्रके सामनेसे अन्तर्धान हो गया ॥ ११ ॥
पद-भाष्य
अथेन्द्रमब्रुवन्मघवन्नेतद्विजा- | फिर देवताओंने इन्द्रसे 'हे
नीहीत्यादि पूर्ववत् । इन्द्रः | मघवन् ! इसे जानो' इत्यादि पूर्ववत्
परमेश्वरो मघवा बलवत्त्वात् | कहा । इन्द्र अर्थात् परमेश्वर, जो
तथेति तदभ्यद्रवत् । तस्मात् | बलवान् होनेके कारण 'मघवा'
इन्द्रादात्मसमीपं गतात् तद्ब्रह्म | कहा गया है, बहुत अच्छा—ऐसा
तिरोधधे तिरोभूतम् । इन्द्रस्ये- | कहकर उसकी ओर चला । अपने
न्द्रत्वाभिमानोऽतितरां निरा- | समीप आये हुए उस इन्द्रके सामने-
कर्तव्य इत्यतः संवादमात्रमपि | से वह ब्रह्म अन्तर्धान हो गया ।
नादाद्ब्रह्मेन्द्राय ॥ ११ ॥ | इन्द्रका सबसे बढ़ा हुआ इन्द्रत्वका
अभिमान तोड़ना चाहिये— | इसलिये इन्द्रको ब्रह्मने संवादमात्रका
भी अवसर नहीं दिया ॥ ११ ॥
वाक्य-भाष्य
इन्द्र आदित्यो वज्रभृद्वा ; | इन्द्र आदित्य अथवा वज्रधारी
अविरोधात् । इन्द्रोपसर्पणे ब्रह्म | देवराजका नाम है, क्योंकि दोनों ही
तिरोधध इत्यत्रायमभिप्रायः— | अर्थोंमें कोई विरोध नहीं है । ब्रह्म जो
इन्द्रोऽहमित्यधिकतमोऽभिमानो- | इन्द्रके समीप आते ही अन्तर्धान हो
ऽस्य सोऽहमग्न्यादिभिः प्राप्तं | गया इसमें यह अभिप्राय था कि
[ब्रह्मने देखा—] इसे 'मैं इन्द्र
(देवराज) हूँ' ऐसा सोचकर सबसे
अधिक अभिमान है, अतः मेरे साथ
अग्नि आदिको जो वाणीका सम्भाषण-
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११५
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खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११५
उमाका प्रादुर्भाव
स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहुशोभमाना-
मुमाँहैमवतीं ताँहोवाच किमेतद्यक्षमिति ॥१२॥
वह इन्द्र उसी आकाशमें [ जिसमें कि यक्ष अन्तर्धान हुआ था ]
एक अत्यन्त शोभामयी स्त्रीके पास आया और उस सुवर्णभूषणभूषिता
[ अथवा हिमालयकी पुत्री ] उमा ( पार्वतीरूपिणी ब्रह्मविद्या ) से बोला—
'यह यक्ष कौन है ?' ॥ १२ ॥
पद-भाष्य
तद्यक्षं यस्मिन्नाकाशे आकाश- | वह यक्ष जिस आकाशमें—
प्रदेशे आत्मानं दर्शयित्वा तिरो- | आकाशके जिस भागमें अपना दर्शन
भूतमिन्द्रश्च ब्रह्मणस्तिरोधान- | देकर तिरोहित हुआ था और उसके
काले यस्मिन्नाकाशे आसीत्, | तिरोहित होनेके समय इन्द्र जिस
स इन्द्रः तस्मिन्नेव आकाशे | आकाशमें था, वह इन्द्र यह सोचता
तस्थौ किं तद्यक्षमिति ध्यायन्; | हुआ कि 'यह यक्ष कौन है ?' उसी
न निवृत्तेऽग्न्यादिवत् । | आकाशमें खड़ा रहा । अग्नि आदि-
| के समान पीछे नहीं लौटा ।
वाक्य-भाष्य
वाक्सम्भाषणमात्रमप्यनेन न | मात्र भी प्राप्त हो गया था उसके
| लिये भी मैं इसे प्राप्त न हो सका—
प्राप्तोऽस्मीत्यभिमानं कथं न नाम | ऐसा सोचकर यह किसी तरह अपना
जह्यादिति तदनुग्रहायैवान्तर्हितं | अभिमान छोड़ दे । अतः उसपर
| कृपा करनेके लिये ही ब्रह्म अन्तर्धान
तद्ब्रह्म बभूव ॥ ११ ॥ | हो गया ॥ ११ ॥
स शान्ताभिमान इन्द्रोऽत्यर्थं | इस प्रकार अभिमान शान्त हो
ब्रह्म विजिज्ञासुर्यस्मिन्नाकाशे | जानेपर इन्द्र ब्रह्मका अत्यन्त जिज्ञासु
ब्रह्मणः प्रादुर्भाव आसीत्तिरोधानं | होकर उसी आकाशमें, जिसमें कि
च तस्मिन्नेव स्त्रियमतिरूपिणीं | ब्रह्मका आविर्भाव एवं तिरोभाव हुआ
| था, एक अत्यन्त रूपवती स्त्री—
११६ केनोपनिषद् [ खण्ड ३
पद-भाष्य
तस्येन्द्रस्य यक्षे भक्तिं बुद्ध्वा | उस इन्द्रकी यक्षमें भक्ति
विद्या उमारूपिणी प्रादुरभूत्स्त्री- | जानकर स्त्रीवेषधारिणी उमारूपा
रूपा । स इन्द्रः ताम् उमां | विद्यादेवी प्रकट हुई । वह इन्द्र उस
बहुशोभमानाम्—सर्वेषां हि | अत्यन्त शोभामयी हैमवती उमाके
शोभमानानां शोभनतमा विद्या, | पास गया । समस्त शोभायमानोंमें
तदा बहुशोभमानेति विशेषण- | विद्या ही सबसे अधिक शोभामयी
मुपपन्नं भवति; हैमवतीं हेम- | है; इसलिये उसके लिये 'बहु
कृताभरणवतीमिव बहुशोभ- | शोभमाना' यह विशेषण उचित ही
मानामित्यर्थः; अथवा उमैव | है। हैमवती अर्थात् हेम ( सुवर्ण )
हिमवतो दुहिता हैमवती नित्य- | निर्मित आभूषणोंवालीके समान
मेव सर्वज्ञेनेश्वरेण सह वर्तत | अत्यन्त शोभामयी । अथवा हिमवान्-
इति ज्ञातुं समर्थेति कृत्वा ताम्— | की कन्या होनेसे उमा ( पार्वती )
उपजगाम इन्द्रस्तां ह उमां किल | ही हैमवती है। वह सर्वदा उस सर्वज्ञ
उवाच पप्रच्छ—ब्रूहि किमेतद्दर्श- | ईश्वरके साथ वर्तमान रहती है; अतः
यित्वा तिरोभूतं यक्षमिति ॥१२॥ | उसे जाननेमें समर्थ होगी—यह
| सोचकर इन्द्र उसके पास गया,
| और उससे पूछा—'बतलाइये, इस
| प्रकार दर्शन देकर छिप जानेवाला
| यह यक्ष कौन है?' ॥ १२ ॥
इति तृतीयः खण्डः ॥ ३ ॥
वाक्य-भाष्य
विद्यामाजगाम । अभिप्रायोद्बोध- | विद्यादेवीके पास आया । ब्रह्मके गुप्त
हेतुत्वादुद्रपत्न्युमा हैमवतीव सा | हो जानेके अभिप्रायको प्रकट करनेके
शोभमाना विद्यैव । विरूपोऽपि | कारण रुद्रपत्नी हिमालयपुत्री पार्वती-
विद्यावान्बहु शोभते ॥ १२ ॥ | के समान शोभामयी यह ब्रह्मविद्या ही
| थी, क्योंकि विद्यावान् पुरुष रूपहीन
| होनेपर भी बहुत शोभा पाता है॥१२॥
इति तृतीयः खण्डः ॥ ३ ॥
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११७
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११७
चतुर्थ खण्ड
उमाका उपदेश
सा ब्रह्मेति होवाच ब्रह्मणो वा एतद्विजये महीय-
ध्वमिति ततो हैव विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥ १ ॥
उस विद्यादेवीने स्पष्टतया कहा—'यह ब्रह्म है, तुम ब्रह्मके ही
विजयमें इस प्रकार महिमान्वित हुए हो'। कहते हैं, तभीसे इन्द्रने यह
जाना कि यह ब्रह्म है ॥ १ ॥
पद-भाष्य
सा ब्रह्मेति होवाच ह किल | उसने 'यह ब्रह्म है' ऐसा कहा।
ब्रह्मणो वै ईश्वरस्यैव विजये— | 'निस्सन्देह ब्रह्म—ईश्वरके विजयमें
ईश्वरेणैव जिता असुराः; यूयं | ही [ तुम महिमाको प्राप्त हुए हो ]।
असुरोंको ईश्वरने ही जीता था;
तत्र निमित्तमात्रम्; तस्यैव | तुम तो उसमें निमित्तमात्र थे ।
अतः उसके ही विजयमें तुम्हें
विजये—यूयं महीयध्वं महिमानं | यह महिमा मिली है।' मूलमें
प्राप्नुथ । एतदिति क्रियाविशेष- | 'एतत्' यह क्रियाविशेषणके लिये
वाक्य-भाष्य
तां च पृष्ट्वा तस्या एव वचनाद् | इन्द्रने उस उमासे पूछकर उसीके
विदाञ्चकार विदितवान् । अत | वचनसे [ ब्रह्मको ] जाना था; अतः
इन्द्रस्य बोधहेतुत्वाद्विद्यैवोमा । | इन्द्रके बोधकी हेतुभूता होनेसे उमा
विद्यासहायवानीश्वर इति | विद्या ही है। 'ईश्वर विद्यासहायवान् है'
ऐसी स्मृति भी है। क्योंकि इन्द्रके
स्मृतिः। यस्मादिन्द्रविज्ञानपूर्वकम् | विज्ञानपूर्वक अग्नि वायु और इन्द्र
अग्निवाय्विन्द्रास्ते ह्येनन्नेदिष्ठमति- | इन देवताओंने ही ब्रह्मको, उसके