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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

१२७ उत्तरकाण्ड
मति रामहि सों, गति रामहि सों, रति रामसों, रामहि को बलु है।
सबकी न कहै, तुलसीके मतें इतनो जग जीवनको फलु है ॥३७॥
श्रीराम और जानकीजीका अनुपम सौन्दर्य नेत्ररूपी मछलियों-
के लिये अगाध जल है । कानोंमें श्रीरामकी कथा, मुखसे
रामका नाम और हृदयमें रामजीका ही स्थान है । बुद्धि भी
राममें लगी हुई है, रामहीतक गति है, रामहीसे प्रीति है और
रामहीका बल है । और सबकी बात तो नहीं कहता, परन्तु
तुलसीदासके मतमें तो जगत्में जीनेका फल यही है ।
दसरथके दानिसिरोमनि राम ! पुरानप्रसिद्ध सुन्यो जसु मैं ।
नर नाग सुरासुर जाचक जो, तुमसों मनभावत पायो न कैं ॥
तुलसी कर जोरि करै विनती, जो कृपा करि दीनदयाल सुनैं ।
जैहि देह सनेहु न रावरे सों असि देह धराइ कै जायँ जियैं ॥३८॥
हे दशरथजीके पुत्र दानियोंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी ! मैंने आपका
पुराणोंमें प्रसिद्ध यश सुना है । नर, नाग, सुर तथा असुरोंमें जितने
भी आपके याचक बने, उनमेंसे किसने आपसे अपना मनोवाञ्छित
पदार्थ नहीं पाया ? यदि दीनवत्सल प्रभु राम कृपा करके सुनें तो
तुलसीदास हाथ जोड़कर विनय करता है कि जिस देहसे आपके
प्रति स्नेह न हो ऐसा देह धारण कर जीवित रहना व्यर्थ है ।
झूठो है, झूठो है, झूठो सदा जगु, संत कहंत, जे अंतु लहा है ।
ताको सहै सठ ! संकट कोटिक, काढ़त दंत, करंत हहा है ॥
जानपनीको गुमानु बड़ो, तुलसीके बिचार गँवार महा है ।
जानकीजीवनु जान न जान्यो तौ जान कहावत जान्यो कहा है ३९

कवितावली १२८
तुलसीदासजी अपने लिये कहते हैं कि अरे दुष्ट ! जिन
संतोंने इस संसारकी थाह पा ली है, वे कहते हैं कि संसार झूठा है,
झूठा है, झूठा है; परन्तु तू उसीके लिये करोड़ों संकट सहता है
और दाँत निकालकर हाय-हाय करता है । तुझे अपने ज्ञानीपनेका
बड़ा अभिमान है, परन्तु तुलसीके विचारसे तो तू महागँवार है ।
यदि तूने ज्ञानके द्वारा जानकीजीवन ( श्रीरामचन्द्रजी ) को नहीं
जाना तो तूने ज्ञानी कहलाते हुए भी ( वस्तुतः ) क्या जाना ?
[ अर्थात् कुछ भी नहीं जाना । ]
तिन्ह तें खर, सूकर, स्वान भले, जड़ता बस ते न कहैं कछु वै ।
'तुलसी' जेहि रामसों नेहु नहीं, सो सही पसु पूँछ, बिषान न द्वै ॥
जननी कत भार मुई दस मास, भई किन बाँझ, गई किन च्वै ।
जरि जाउ सो जीवनु, जानकीनाथ ! जियै जगमें तुम्हरो बिनु है ॥
गोसाईंजी कहते हैं कि जिन्हें श्रीरामजीसे स्नेह नहीं है, वे
सचमुच पशु ही हैं, उनके केवल एक पूँछ और दो सींगोंकी कसर
है । उनसे तो गधे और सूअर भी अच्छे हैं, क्योंकि वे बेचारे कुछ
जड़ होनेके कारण कहते तो नहीं । उनकी माँ दस महीनेतक
उनके भारसे क्यों मरी ? बाँझ क्यों नहीं हो गयी ? अथवा उसका
गर्भ ही क्यों नहीं गिर गया ? हे जानकीनाथ ! जो पुरुष संसारमें
तुम्हारा हुए बिना जीता है उसका जीवन जल जाय
( जला देनेके योग्य है ) ।
गज-बाजि-घटा, भले भूरि भटा, बनिता, सुत भौंह तकैं सब वै ।
धरनी, धनु, धाम सरीरु भलो, सुरलोकहु चाहिइहै सुखु स्वै ॥
सब फोकट साटक है तुलसी, अपनो न कछू सपनो दिन द्वै ।
जरि जाउ सो जीवनु जानकीनाथ ! जियै जगमें तुम्हरो बिनु है ४१

१२९. उत्तरकाण्ड
हाथी-घोड़ोंके समूह-के-समूह हैं, अनेक अच्छे-अच्छे वीर हैं,
स्त्री-पुरुष सब भौंहें ताकने रहते हैं; पृथ्वी, धन, घर, शरीर—सब
कुछ अच्छे हैं; देवलोकसे भी यह सुख बढ़कर है, किन्तु गोसाईंजी
कहते हैं कि यह सब निरर्थक और निःसार हैं, अपना कुछ नहीं
है। सब दो दिनका स्वप्न है। हे जानकीनाथ ! जो संसारमें
तुम्हारा हुए बिना जीता है, उसका जीवन जल जाय।
सुरराज-सो राज-समाजु, समृद्धि विरंचि, धनाधिप-सो धनु भो।
पवमानु-सो, पावकु-सो, जमु, सोमु-सो, पूषनु-सो, भवभूषनु भो॥
करि जोग, समीरन साधि, समाधि कै धीर बड़ो, बसहू मनु भो।
सब जाय, सुभायँ कहै तुलसी, जो न जानकीजीवनको जनु भो ४२
इन्द्रके समान राजसामग्री हो गयी, ब्रह्माके समान ऐश्वर्य हो
गया और कुबेरके समान धन हो गया तथा वायुके समान
(वेगवान्), अग्निके समान (तेजस्वी), यमराजके समान
दण्डधारी, चन्द्रमाके समान शीतल एवं आह्लादकारी और सूर्यके
समान संसारको प्रकाशित करनेवाला और संसारका भूषण बन गया
हो; वायुको साधकर (प्राणायाम कर) योगाभ्यास करता हुआ
समाधिके द्वारा बड़ा धीर हो गया हो और मन भी वशमें
हो गया हो, तो भी गोसाईंजी सच्चे भावसे कहते हैं—यदि
जानकीनाथका सेवक न हुआ तो सब व्यर्थ है।
कामु-से रूप, प्रताप दिनेसु-से, सोमु-से सील, गनेसु-से मानें।
हरिचंदु-से साँचे, बड़े विधि-से, मघवा-से, महीप विषै-सुख-साने॥
सुक-से मुनि, सारद-से वकता, चिरजीवन लोमस तें अधिकाने।
ऐसे भए तौ कहा 'तुलसी', जो पै राजिवलोचन रामु न जाने।४३।
क० ९-

कवितावली १३०
यदि मनुष्यने कमलनयन भगवान् श्रीरामको नहीं जाना तो
वह रूपमें कामदेव-सा, प्रतापमें सूर्य-सा, शीलमें चन्द्रमाके समान,
मानमें गणेशके सदृश तथा हरिश्चन्द्र-सा सच्चा, ब्रह्मा-जैसा महान्,
विषय-सुखमें आसक्त, इन्द्रके समान राजा, शुकदेव-मुनि-सा महात्मा,
शारदाके सदृश वक्ता और लोमशसे भी अधिक चिरजीवी हो जाय
तो भी ऐसा होनेसे क्या लाभ हुआ ?
झूमत द्वार अनेक मतंग जँजीर-जरे, मद-अंबु चुचाते।
तीखे तुरंग मनोगति-चंचल, पौनके गौनहु तें बढ़ि जाते ॥
भीतर चंद्रमुखी अवलोकति, बाहर भूप खरे न समाते।
ऐसे भए तौ कहा, तुलसी! जो पै जानकीनाथके रंग न राते॥४४॥
द्वारपर जंजीरोंसे जकड़े हुए तथा जिनके गण्डस्थलसे मद चू
रहा है, ऐसे अनेकों हाथी झूमते हों और मनके समान तीव्र
वेगवाले चञ्चल घोड़े हों, जो वायुकी गतिसे भी बढ़ जाते हों,
घरमें चन्द्रमुखी स्त्री देखती हो, बाहर बड़े-बड़े राजा खड़े हों, जो
(बहुत अधिक होनेके कारण) भीतर न समा सकते हों—
गोसाईंजी कहते हैं कि यदि जानकीपति (श्रीरामचन्द्र) के रंगमें
न रँगा तो ऐसा होनेपर भी क्या हुआ ?
राज सुरेस पचासकको बिधिके करको जो पटो लिखि पाए।
पूत सपूत, पुनीत प्रिया, निज सुंदरताँ रतिको मदु नाएँ ॥
संपति-सिद्धि सबै 'तुलसी' मनकी मनसा चितवैं चितु लाएँ।
जानकीजीवनु जाने बिना जग ऐसेउ जीव न जीव कहाए ॥४५॥
पचासों इन्द्रके (राज्यके) समान राज्यका ब्रह्माजीके हाथका
लिखा हुआ पट्टा मिल गया हो, सपूत लड़के हों, पतिव्रता स्त्री
हो, जो अपनी सुन्दरतामें रतिके मदको भी नीचा दिखानेवाली हो,

सब प्रकारकी सम्पत्तियाँ और सिद्धियाँ उसके मनकी रुखको
ध्यानपूर्वक देखती हुई खड़ी हों; किन्तु गोसाईंजी कहते हैं कि यदि
जानकीनाथ (श्रीरामचन्द्र) को न जाना तो ऐसे जीव भी वास्तवमें
जीव कहलानेके योग्य नहीं हैं।

कुसगात ललात जो रोटिनको, घरवात घरैं खुरपा-खरिया ।
तिन्ह सोनेके मेरुसे ढेर लहे, मनु तौ न भरो, घरु पै भरिया ॥
'तुलसी' दुखु दूनो दसा दुहुँ देखि, कियो मुखु दारिदको करिया ।
तजि आस भो दासु रघुप्पतिको, दसरत्थको दानि दया-दरिया४६

जिनका शरीर अत्यन्त दुबला है, जो रोटीके लिये बिल-
बिलाते फिरते हैं और जिनके घरमें एक खुरपा और घास बाँधनेकी
जाली ही सारी पूँजी है, उन्हें यदि सुमेरु पर्वतके बराबर सोनेके
ढेर भी मिल गये, तो इससे उनका घर तो भर गया, परन्तु मन
नहीं भरा। गोसाईंजी कहते हैं कि मैंने दोनों अवस्थाओंमें दूना
दुःख देखकर दरिद्रताका मुख काला कर दिया और सब आशा
त्यागकर दशरथसुवन श्रीरामचन्द्रका दास हो गया, जो दयाके
मानो दरिया हैं।

को भरिहै हरिकैं रितएँ, रितवै पुनि को, हरि जौ भरिहै ।
उथपै तेहि को, जेहि रामु थपै, थपिहै तेहि को, हरि जौ टरिहै ॥
तुलसी यहु जानि हिएँ अपनें सपनें नहि कालहु तें डरिहै ।
कुमयाँ कछु हानि न औरन कीं, जो पै जानकीनाथु मया करिहै ४७

जिसको भगवान्‌ने खाली कर दिया उसे कौन भर सकता
है और जिसको भगवान् भर देंगे उसे कौन खाली कर सकता
है। जिसे श्रीरामचन्द्रजी स्थापित कर देते हैं उसे कौन उखाड़

कवितावली १३२
सकता है और जिसे वे उखाड़ेंगे उसे कौन स्थापित कर सकता है।
तुलसीदास अपने हृदयमें यह जानकर स्वप्नमें भी कालसे भी नहीं
डरेगा। क्योंकि यदि जानकीनाथ श्रीरामचन्द्र कृपा करेंगे तो औरोंकी
अकृपासे कुछ भी हानि नहीं होगी !
ब्याल कराल, महाविष, पावक, मत्तगयंदहु के रद तोरे।
साँसति संकि चली, डरपे हुते किंकर, ते करनी मुख मोरे ॥
नेकु बिषादु नहीं प्रहलादहि कारन केहरिके बल हो रे।
कौनकी त्रास करै तुलसी जोपै राखिहै रामु, तौ मारिहै को रे ४८
विकराल सर्प, भयंकर विष, अग्नि और मतवाले हाथियोंके
दाँतोंको भी तोड़ डाला। कष्ट भी सशङ्कित होकर भाग गया, जो
सेवक (राजासे) डरते थे; उन्होंने भी (आज्ञापालनस्वरूप) कर्तव्यसे
मुँह मोड़ लिया। तो भी प्रह्लादको कुछ भी विषाद नहीं हुआ;
क्योंकि वह नृसिंह भगवान्‌के बलके आश्रित था। अतः अब
तुलसीदास ही किसका भय करे। यदि रामजी रक्षा करेंगे तो उसे
कौन मार सकता है।
कृपाँ जिनकीं कछु काजु नहीं, न अकाजु कछू जिनके मुख मोरें।
करैं तिनकी परवाहि ते, जो बिनु पूँछ-विषान फिरैं दिन दौरैं ॥
तुलसी जेहिके रघुनाथु से नाथु, समर्थ सुसेवत रीझत थोरें।
कहा भवभीर परी तेहि धौं, बिचरै धरनीं तिनसों तिनु तोरें॥४९॥
जिनकी कृपासे कुछ काम नहीं बनता और न जिनके मुख
मोड़नेसे कुछ हानि ही होती है, उनकी परवा वही लोग करेंगे जो
बिना सींग-पूँछके होकर भी सर्वदा दौड़े फिरते हैं [अर्थात् पशु
न होनेपर भी अपने वास्तविक लक्ष्यको छोड़कर रात-दिन

१३३ उत्तरकाण्ड
पेटकी ही चिन्तामें लगे रहते हैं ] । गोसाईंजी कहते हैं कि जिसके
श्रीरामचन्द्रके समान समर्थ स्वामी हैं, जो थोड़ी-सी सेवा करनेपर ही
रीझ जाते हैं, उसे संसारकी क्या चिन्ता पड़ी है, वह तो ऐसे
लोगोंसे सम्बन्ध तोड़कर पृथ्वीपर विचरता है ।
कानन, भूधर, वारि, बयारि, महाविषु, ब्याधि, दवा-अरि घेरें ।
संकट कोटि जहाँ 'तुलसी', सुत, मातु, पिता, हित, बंधु न नेरे ॥
राखिहैं रामु कृपालु तहाँ, हनुमानु से सेवकु हैं जेहि केरे ।
नाक, रसातल, भूतलमें रघुनायकु एकु सहायकु मेरे ॥५०॥
वनमें, पर्वतपर, जलमें, आँधीमें, महाविष खा लेनेपर, रोगमें,
अग्नि और शत्रुसे घिर जानेपर तथा गोसाईंजी कहते हैं, जहाँ
करोड़ों संकट हों और माता-पिता, पुत्र, मित्र और भाई-बन्धु कोई
समीप न हों, वहाँ भी दयालु भगवान् राम, जिनके हनुमान्-सा-जैसे
सेवक हैं, रक्षा करेंगे । आकाश, पाताल और पृथ्वीमें एक
श्रीरघुनाथजी ही मेरे सहायक हैं ।
जबै जमराज-रजायततें मोहि लै चलिहैं भट बाँधि नटैया ।
तातु न मातु, न स्वामि-सखा, सुत-बंधु बिसाल बिपत्ति-बँटैया ॥
साँसति घोर, पुकारत आरत कौन सुनै, चहुँ ओर डटैया ।
एकु कृपाल तहाँ 'तुलसी' दसरत्थको नंदनु बंदि-कटैया ॥५१॥
जब यमराजकी आज्ञासे मेरे गलेको बाँधकर यमदूत मुझे ले
चलेंगे उस समय वहाँ न बाप, न माँ, न स्वामी, न मित्र, न पुत्र
और न भाई ही उस भारी विपत्तिको बाँटनेवाले होंगे । वहाँ घोर
कष्ट सहना होगा । उस आर्त्त पुकारको सुनेगा भी कौन ? चारों
ओर डाँटनेवाले [ यमदूत ] ही होंगे । गोस्वामीजी कहते हैं कि

कवितावली १३४
वहाँ केवल एक दयानिधान दशरथ-कुमार ही बन्धन काटनेवाले होंगे।
जहाँ जमजातना, घोर नदी, भट कोटि जलचर दंत-टेवैंया।
जहँ धार भयंकर, वार न पार, न बोहितु नाव, न नीक खेवैंया॥
'तुलसी' जहँ मातु-पिता न सखा, नहि कोउ कहूँ अवलंब-देवैया।
तहाँ बिनु कारन रामु कृपाल विसाल भुजा गहि काढ़ि लेवैंया ५२
जहाँ यमयातना देनेवाले करोड़ों यमदूत हैं, घोर वैतरणी नदी
है, जिसमें दाँतोंकी धार तेज करनेवाले (काटनेवाले) जलजन्तु हैं,
जिसकी भयङ्कर धारा है, और जिसका कोई वार-पार नहीं है, जिसमें
न जहाज है, न नाव और न सुचतुर नाविक ही है; इसके सिवा
जहाँ माता, पिता, सखा अथवा कोई अवलम्बन देनेवाला भी नहीं
है, वहाँ श्रीगोसाईंजी कहते हैं, बिना ही कारण कृपा करनेवाले
श्रीरामचन्द्रजी ही अपनी विशाल भुजासे पकड़कर निकाल
लेनेवाले हैं।
जहाँ हित स्वामि, न संग सखा, वनिता, सुत, बंधु, न बापु, न मैया।
काय-गिरा-मनके जनके अपराध सबै छल छाड़ि छमैया॥
तुलसी! तेहि काल कृपाल बिना दूजो कौन है दारुन दुःख दमैया।
जहाँ सब संकट, दुर्घट सोचु, तहाँ मेरो साहेबु राखै रखैया ॥५३॥
श्रीगोसाईंजी कहते हैं कि जहाँ कोई हितैषी स्वामी नहीं
है और न साथमें मित्र, स्त्री, पुत्र, भाई, बाप या माँ ही है वहाँ
कृपालु श्रीरामचन्द्रके बिना अपने जनके शरीर, मन और वचनद्वारा
किये हुए समस्त अपराधोंको छल छोड़कर क्षमा करनेवाला तथा
उस दारुण दुःखका नाश करनेवाला दूसरा कौन हो सकता है ?
जहाँ ऐसे-ऐसे सब प्रकारके संकट और दुर्घट सोच हैं वहाँ मेरे

१३५ उत्तरकाण्ड
स्वामी जगत्में रमण करनेवाले श्रीरामचन्द्र ही मेरी रक्षा करते हैं।
तापसको बरदायक देव, सबै पुनि बैरु बढ़ावत बाढ़ैं ।
थोरेंहि कोपु, कृपा पुनि थोरेंहि, बैठि कै जोरत, तोरत ठाढ़ें ॥
ठोंकि-बजाइ लखे गजराज, कहाँ लौं कहौं केहि सों रद काढें ।
आरतके हित,नाथु अनाथके रामु सहाय सही दिन गाढ़ें ॥५४॥
देवतालोग तपस्वियोंको वर देनेवाले हैं, किन्तु बढ़नेपर वे सब
वैर बढ़ाते हैं । थोड़ेहीमें कोप और थोड़ेहीमें कृपा करते हैं । वे
बैठकर प्रीति जोड़ते और खड़े होते ही उसे तोड़ देते हैं ( अर्थात्
उनकी प्रीति बहुत थोड़ी देर टिकनेवाली होती है ) । हम किस-
किससे और कहाँतक दाँत निकालकर कहें ? गजराजने सबको
ठोंक-बजाकर देख लिया, दुखियोंके मित्र, अनाथोंके नाथ तथा
विपत्तिके दिनोंमें सच्चे सहायक श्रीरामचन्द्र ही हैं ।
जप, जोग, बिराग, महामख-साधन, दान, दया, दम कोटि करै ।
मुनि-सिद्ध, सुरेसु, गनेसु, महेसु-से सेवत जन्म अनेक मरै ॥
निगमागम-ग्यान, पुरान पढ़े, तपसानलमें जुगपुंज जरै ।
मनसों पनु रोपि कहै तुलसी, रघुनाथ विना दुख कौन हरै ॥
चाहे कोई जप, योग, वैराग्य बड़े-बड़े यज्ञानुष्ठान, दान, दया,
इन्द्रिय-निग्रह आदि करोड़ों उपाय करे; मुनि, सिद्ध, सुरेश (इन्द्र),
गणेश और महेश-जैसे देवताओंका अनेकों जन्मतक सेवन करते-
करते मर जाय, वेद-शास्त्रोंका ज्ञान प्राप्त करे और पुराणोंका
अध्ययन करे, अनेकों युगोंतक तपस्याकी अग्निमें जलता रहे; परन्तु
तुलसी मनसे प्रण रोपकर कहता है कि श्रीरामचन्द्रके बिना कौन
दुःख दूर कर सकता है ?

कवितावली १३६
पातक-पीन, कुदारिद-दीन मलीन धरें कथरी-करवा है।
लोकु कहै, विधिहूँ न लिख्यो सपनेहूँ नहीं अपने बर बाहैं ॥
रामको किंकरु सो तुलसी, समुझेंहि भलो, कहिबो न रवा है।
ऐसेको ऐसो भयो कबहुँ न भजे बिनु बानरके चरवाहै ॥
लोक [ मेरे विषयमें ] कहता था कि यह पापोंमें बढ़ा हुआ
एवं कुत्सित दरिद्रताके कारण दीन है तथा मलिन कन्था और
करवा धारण किये है । विधाताने इसके भाग्यमें कुछ भी नहीं
लिखा तथा यह सपनेमें भी अपने बलपर नहीं चलता था । परन्तु
आज वही तुलसी श्रीरामचन्द्रजीका किंकर हो गया । इस बातको
समझना ही अच्छा है, कहना उचित नहीं है । वह ऐसे ( दीन और
पापी ) से ऐसा ( महामुनि ) बिना वानरोंके चरवाहे (श्रीरामचन्द्रजी)
को भजे नहीं हुआ ।
मातु-पिताँ जग जाइ तज्यो, बिधिहूँ न लिखी कछु भाल भलाई ।
नीच, निरादरभाजन, कादर, कूकर-टूकन लागि ललाई ॥
राम-सुभाउ सुन्यो तुलसीं, प्रभुसों कह्यो बारक पेटु खलाई ।
स्वारथको परमारथको रघुनाथु सो साहेबु, खोरि न लाई ॥
माता-पिताने जिसको संसारमें जन्म देकर त्याग दिया, ब्रह्माने
भी जिसके भाग्यमें कुछ भलाई नहीं लिखी, उस नीच, निरादरके
पात्र कायर, कुक्कुरके मुँहके टुकड़ेके लिये ललचानेवाले तुलसीदास-
ने जब श्रीरामचन्द्रका स्वभाव सुना और एक बार पेट खोलकर
[ अपना सारा दुःख ] कहा तो प्रभु रघुनाथजीने उसके स्वार्थ
और परमार्थको सुधारनेमें तनिक भी कोर-कसर नहीं रक्खी ।

१३७ उत्तरकाण्ड
पाप हरे, परिताप हरे, तनु पूजि भो हीतल सीतलताई ।
हंसु कियो बकतें, बलि जाउँ, कहाँ लौं कहौं करुना-अधिकाई ॥
कालु विलोकि कहैं तुलसी, मनमें प्रभुकी परतीति अघाई ।
जन्मु जहाँ, तहँ रावरे सों निवहैं भरि देह सनेह-सगाई ॥
तुलसीदासजी कहते हैं—हे श्रीराम ! आपने मेरे पाप नष्ट
कर दिये, सारे सन्ताप हर लिये, शरीर पूज्य बन गया । हृदयमें
शीतलता आ गयी । और मैं आपकी बलिहारी जाता हूँ, आपने मुझे
बगुले (दंभी) से हंस (विवेकी) बना दिया, आपकी कृपाकी
अधिकताका कहाँतक वर्णन करूँ । अब समय देखकर तुलसी कहता
है कि मेरे मनमें प्रभुका पूरा भरोसा है, अतः जहाँ कहीं भी मेरा
जन्म हो वहाँ आपसे शरीर रहनेतक प्रेमके सम्बन्धका निर्वाह
होता रहे ।
लोग कहैं, अरु हौंहु कहौं, जनु खोटो-खरो रघुनायकही को ।
रावरी राम ! बड़ी लघुता, जसु मेरो भयो सुखदायक हीको ॥
कै यह हानि सहौ, बलि जाउँ, कि मोहू करौ निज लायकहीको ।
आनि हिएँ हित जानि करौ, ज्यों हों ध्यानु धरौं धनु-सायकही को॥
लोग कहते हैं और मैं भी कहता हूँ कि खोटा या खरा मैं
श्रीरामचन्द्रजीहीका सेवक हूँ । हे राम ! इससे आपकी तो बड़ी
तौहीन हुई, परन्तु आपके सदृश स्वामीका सेवक होनेका जो यश
मुझे प्राप्त हुआ वह मेरे हृदयको तो सुख देनेवाला ही है । मैं
बलिहारी जाऊँ, अब या तो आप इस हानिको सहिये अथवा मुझे ही
अपनी सेवाके योग्य बना लीजिये । अपने हृदयमें विचारकर और
मेरे लिये हितकारी जानकर ऐसा ही कीजिये जिससे मैं आपके

७. उत्तरकाण्ड (राम राज्याभिषेक व कलियुग वर्णन)

कवितावली १३८
धनुषधारी रूपका ही ध्यान कर सकूँ [ अर्थात् आपको छोड़कर
किसी और पदार्थकी ओर मेरा चित्त ही न जाय ] ।
आपु हौं आपुको नीकें कै जानत, रावरो राम ! भरायौ-गढायो ।
कीरु ज्यों नामु रटै तुलसी, सो कहै जगु जानकीनाथ पढ़ायो ॥
सोई है खेदु, जो बेदु कहै, न घटै जनु जो रघुबीर बढ़ायो ।
हौं तौ सदा खरको असवार, तिहारोइ नामु गयंद चढ़ायो ॥
मैं स्वयं अपनेको अच्छी तरह जानता हूँ । हे राम ! मैं तो
आपहीका रचा और बढ़ाया हुआ हूँ । यह तुलसीदास सुग्गेकी भाँति
नाम रटता है, उसपर संसार यही कहता है कि यह पढ़ाया हुआ
है । इसीका मुझे खेद है । किन्तु वेद कहता है कि जिस मनुष्यको
रघुनाथजीने बढ़ा दिया वह कभी घट नहीं सकता । मैं सदासे गधे-
पर ही चढ़नेवाला (अत्यन्त निन्दनीय आचरणोंवाला) था, आपके
नामने ही मुझे हाथीपर चढ़ा दिया है (अर्थात् इतना गौरव प्रदान
किया है) ।
छारतें सँवारि कै पहारहू तें भारी कियो,
गारो भयो पंचमें पुनीत पच्छु पाइ कै ।
हौं तौ जैसो तब तैसो अब अधमाई कै कै,
पेटु भरौं, राम ! रावरोई गुनु गाइकै ॥
आपने निवाजेकी पै कीजै लाज, महाराज !
मेरी ओर हेरि कै न बैठिए रिसाइ कै ।
पालि कै कृपाल ! ब्याल-बालको न मारिए,
औ काटिए न नाथ ! विषहूको रूखु लाइ कै ॥६१॥

१३९ उत्तरकाण्ड
आपने मुझ धूलके समान तुच्छ प्राणीको सँभालकर पहाड़से
भी भारी (गौरवान्वित) बना दिया और आपका पवित्र पक्ष पाकर
मैं पंचोंमें बड़ा हो गया। मैं तो अपनी अधमतामें जैसा पहले था
वैसा ही अब भी हूँ। हे राम! बस, आपका ही गुण गाकर पेट
पालता हूँ। परन्तु हे महाराज! आप अपनी कृपाकी लाज रखिये
और मेरी ओर देखकर क्रोध करके न बैठ जाइये। हे कृपालु!
सर्पके बालकको भी पाल-पोषकर नहीं मारना चाहिये और न विषका
वृक्ष भी लगाकर उसे काटना चाहिये।
वेद न पुरान-गानु, जानौं न बिग्यानु ग्यानु,
ध्यान-धारना-समाधि-साधन-प्रवीनता ।
नाहिन विरागु, जोग, जाग भाग तुलसीकें,
दया-दान-दूवरो हौं, पापही की पीनता ॥
लोभ-मोह-काम-कोह-दोस-कोसु मोसो कौन ?
कलिहूँ जो सीखि लई मेरियै मलीनता ।
एकु ही भरोसो राम ! रावरो कहावत हौं,
रावरे दयालु दीनबंधु ! मेरी दीनता ॥६२॥
मैं न तो वेद या पुराणोंका गान जानता हूँ और न विज्ञान
अथवा ज्ञान ही जानता हूँ, और न मैं ध्यान, धारणा, समाधि आदि
साधनोंमें प्रवीणता ही रखता हूँ। तुलसीके भाग्यमें वैराग्य, योग
और यज्ञादि नहीं हैं। मैं दया और दानमें दुर्बल हूँ [अर्थात् दान
और दयासे रहित हूँ] तथा पापमें पुष्ट हूँ। मेरे समान लोभ, मोह,
काम और क्रोधरूप दोषोंका भण्डार कौन है? कलियुगने भी मुझसे
ही मलिनता सीखी है। हाँ, एक ही भरोसा मुझे है कि मैं आपका

कहलाता हूँ। आप दीनोंके बन्धु और दयालु हैं मेरी यह
दीनता है।
रावरो कहावौं, गुनु गावौं राम ! रावरोई,
रोटी द्वै हौं पावौं राम ! रावरी हीं कानि हौं।
जानत जहानु, मन मेरेहूँ गुमानु बड़ो,
मान्यो मैं न दूसरो, न मानत, न मानिहौं ॥
पाँचकी प्रतीति न भरोसो मोहि आपनोई,
तुम्ह अपनायो हौं तबै हीं परि जानिहौं।
गढ़ि-गुढ़ि, छोलि-छालि कुंदकी-सी भाईं वातैं
जैसी मुख कहौं, तैसी जीयँ जब आनिहौं ॥६३॥
हे राम ! मैं आपका कहलाता हूँ और आपहींका गुण गाता
हूँ और हे रघुनाथजी ! आपहीके लिहाजसे मुझे दो रोटियाँ भी मिल
जाती हैं। संसार जानता है और मेरे मनमें भी बड़ा अभिमान है
कि मैंने दूसरेको न माना, न मानता हूँ और न मानूँगा। मुझे न
पंचोंका ही विश्वास है और न अपना ही भरोसा है, मैं गढ़-गुढ़
और छील-छालकर खरादपर चढ़ाई हुई-सी चिकनी-चुपड़ी बातें
बनाता हूँ। वैसी ही जब हृदयमें भी ले आऊँगा तब समझूँगा कि
आपने मुझे अपनाया है।
बचन बिकारु, करतबउ खुआर, मनु
बिगत-बिचार, कलिमलको निधानु है।
रामको कहाइ, नामु बेचि-बेचि खाइ, सेवा-
संगति न जाइ, पाछिलेको उपखानु है॥
तेहू तुलसीको लोगु भलो-भलो कहै, ताको

१४१ उत्तरकाण्ड
दूसरो न हेतु, एकु नीकें कै निदानु है।
लोकरीति विदित बिलोकिअत जहाँ-तहाँ,
स्वामीकें सनेहँ स्वानहू को सनमानु है ॥६४॥
(जिसकी) बोलीमें विकार है, करनी भी बहुत बुरी है तथा
मन भी विवेकशून्य और कलिमलका भण्डार है। जो श्रीरामचंद्र-
जीका कहलाकर नामको बेंच-बेंचकर खाता है और जैसी कि पुरानी
कहावत है, सेवा और सत्संगमें प्रवृत्त नहीं होता। उस तुलसीको
भी लोग भला कहते हैं। इसका कोई दूसरा कारण नहीं है, केवल
एक निश्चित हेतु है यह प्रसिद्ध लोकरीति और जहाँ-तहाँ देखनेमें
भी आता है कि स्वामीका जहाँ-तहाँ स्नेह होनेपर उसके कुत्तेका
भी सम्मान होता है।
नाम-विश्वास
स्वारथको साजु न समाजु परमारथको,
मोसो दगाबाज दूसरो न जगजाल है।
कै न आयौं, करौं न करौंगो करतूति भली,
लिखी न बिरंचिहूँ भलाई भूलि भाल है ॥
रावरी सपथ, रामनामही की गति मेरें,
इहाँ झूठो, झूठो सो तिलोक तिहूँ काल है।
तुलसी को भलो पै तुम्हारें ही किएँ कृपाल,
कीजै न बिलंबु, बलि, पानीभरी खाल है ॥६५॥
मेरे पास न तो कोई स्वार्थसाधनका ही सामान है और न
परमार्थकी ही सामग्री है। विश्व ब्रह्माण्डमें मेरे समान कोई दूसरा
दगाबाज भी नहीं है। सुकर्म तो न मैं करके आया हूँ, न करता

कवितावली १४२
हूँ और न करूँगा ही ! ब्रह्माने भूलकर भी मेरे भाग्यमें भलाई नहीं
लिखी। आपकी शपथ है, हे रामजी ! मुझको केवल आपके नाम-
हीकी गति है। जो यहाँ (आपके सामने) झूठा है वह तो तीनों लोक
और तीनों कालमें झूठा ही है। हे कृपालो ! तुलसीकी भलाई तो
तुम्हारे ही किये होगी; बलिहारी जाऊँ, अब विलम्ब न कीजिये,
क्योंकि मेरी दशा ठीक पानीसे भरी हुई खालके समान है। अर्थात्
जैसे पानीभरी खाल बहुत जल्दी सड़ जाती है वैसे ही मेरे भी नष्ट
होनेमें देरी नहीं है।
रागको न साजु, न बिरागु, जोग, जाग जियँ,
काया नहि छाड़ि देत ठाटिबो कुठाटको।
मनोराजु करत अकाजु भयो आजु लगि,
चाहै चारु चीर, पै लहै न टूकु टाटको ॥
भयो करतारु बड़े कूरको कृपालु, पायो
नामप्रेमु-पारसु, हौं लालची बराटको ।
‘तुलसी’ बनी है राम ! रावरें बनाएँ, ना तो
धोबी-कौसो कूकरु, न घरको, न घाटको ॥६६॥
मेरे पास न तो राग अर्थात् सांसारिक सुख-भोगकी सामग्री
है और न मेरे जीमें वैराग्य, योग या यज्ञ ही है; और यह शरीर
कुचाल चलना नहीं छोड़ता । मनोराज्य (वासनाएँ) करते-करते
आजतक हानि ही होती रही। यह चाहता तो अच्छे-अच्छे वस्त्र
है, परन्तु इसे मिलता टाटका टुकड़ा भी नहीं । हे जगत्कर्ता प्रभो !
आप इस अत्यन्त कुटिलपर भी कृपालु हुए, मुझ कौड़ी (तुच्छ
भोगों) के लालचीने भगवन्नामका प्रेमरूप पारस पाया। हे श्रीरामजी !
यह सब आपके बनाये बनी है, नहीं तो धोबीके कुत्तेके समान

१४३ उत्तरकाण्ड
मैं न घरका था और न घाटका ही (अर्थात् न मैं इस लोकको
सुधार सकता था, न परलोकको)।
ऊँचो मनु, ऊँची रुचि, भागु नीचो निपट ही,
लोकरीति-लायक न, लंगर लवारु है।
स्वारथु अगमु, परमारथकी कहा चली,
पेटकीं कठिन जगु जीवको जवारु है॥
चाकरी न आकरी, न खेती, न बनिज-भीख,
जानत न कूर कछु किसब कबारु है।
तुलसीकी बाजी राखी रामहीकें नाम, नतु
भेंट पितरन को न मूड़हू में बारु है॥६७॥
इसका मन ऊँचा है तथा रुचि भी ऊँची है, परन्तु भाग्य
इसका अत्यन्त खोटा है। यह लोक-व्यवहारके लायक भी नहीं है
तथा बड़ा ही नटखट और गप्पी है। इसके लिये तो स्वार्थ भी अगम
है, परमार्थकी तो बात ही क्या है! पेटकी कठिनाईके कारण इसे
संसार जीका जंजाल हो रहा है। यह न तो कोई चाकरी ही
करता है और न खान खोदनेका काम करता है; इसके न खेती
है, न व्यापार है; न यह भीख माँगता है और न कोई अन्य प्रकार-
का धंधा या पेशा ही जानता है। तुलसीकी बाजी रामनामहीने
रक्खी है, अन्यथा इसके पास तो पितरोंको भेंट चढ़ानेके लिये
सिरपर बाल भी नहीं है।
अपत-उतार, अपकारको अगारु, जग
जाकी छाँह छुएँ सहमत ब्याध-बाधको।
पातक-पुहुमि पालिबेको सहसाननु सो,

कवितावली १४४
काननु कपटको, पयोधि अपराधको ॥
तुलसी-से वामको भो दाहिनो दयानिधानु,
सुनत सिहात सब सिद्ध, साधु, साधको ।
रामनाम ललित ललामु कियो लाखनि को,
बड़ो क्रूर कायर कपूत कौड़ी आधको ॥६८॥
यह नीच निर्लज्जोंकी न्यौछावर और अपकारोंका आगार है,
जिसकी छायाका स्पर्श होनेपर संसारमें व्याध और हिंसक जीव
भी सहम जाते हैं। पापरूप पृथ्वीकी रक्षा करनेके लिये यह
शेषजीके समान है तथा कपटका वन और अपराधोंका समुद्र है।
तुलसी-जैसे उलटी प्रकृतिके पुरुषके लिये दयानिधान (श्रीरामचन्द्र-
जी) दाहिने हो गये—यह सुनकर सब सिद्ध, साधु और साधक-
लोग सिहाते हैं। रामनामने बड़े कुटिल, कायर, कपूत और आधी
कौड़ीके मनुष्यको भी लाखोंका सुन्दर रत्न बना दिया।
सब अँग हीन, सब साधन विहीन, मन-
बचन मलीन, हीन कुल-करतूति हौं ।
बुधि-बल-हीन, भाव-भगति-विहीन, हीन
गुन, ग्यानहीन, हीन भाग हूँ, बिभूति हौं ॥
तुलसी गरीब की गई-बहोर रामनामु,
जाहि जपि जीहँ रामहू को बैठो धूति हौं ।
प्रीति रामनामसों, प्रतीति रामनामकी,
प्रसाद रामनामकें पसारि पाय सूतिहौं ॥६९॥

१४५ उत्तरकाण्ड
मैं (योगके आठों) अङ्गोंसे हीन हूँ, सब साधनोंसे रहित
हूँ, मन-वचनसे मलिन हूँ तथा कुल और कर्मोंमें भी बड़ा पतित
हूँ। मैं बुद्धि-बलहीन, भाव और भक्तिमे रहित, गुणहीन, ज्ञानहीन
तथा भाग्य और ऐश्वर्यसे भी रहित हूँ। इस दीन तुलसीदासकी
हीन अवस्थाका उद्धार करनेवाला तो रामका नाम ही है जिसे
जिह्वासे जपकर मैं रामजीको भी छल चुका हूँ। मुझे रामनामसे
ही प्रीति है, रामनाममें ही विश्वास है और मैं रामनामके ही
कृपासे पैर पसारकर (निश्चिन्त होकर) सोता हूँ।
मेरें जान जबतें हौं जीव है जनम्यो जग,
तबतें बेसाह्यो दाम लोभ, कोह कामको।
मन तिन्हीकी सेवा, तिन्ही सों भाउ नीको,
बचन बनाइ कहौं 'हौं गुलामु रामको'॥
नाथहूँ न अपनायो, लोक झूठी है परी, पै
प्रभुहू तें प्रबल प्रतापु प्रभुनामको।
आपनीं भलाई भलो कीजै तौ भलाई, न तौ
तुलसीको खुलैगो खजानो खोटे दामको ॥७०॥
मेरी समझसे जबसे मैं जगत्में जीव होकर जन्मा हूँ तबसे
मुझे लोभ, क्रोध और कामने दाम देकर मोल ले लिया है।
(अतएव) मनसे उन्हींकी सेवा होती है और उन्हींसे गहरा प्रेम
है; परन्तु बात बनाकर कहता हूँ कि मैं तो श्रीरामका गुलाम हूँ।
हे नाथ! आपने भी (अयोग्य समझकर) नहीं अपनाया; किन्तु
लोकमें झूठी प्रसिद्धि हो गयी (कि मैं रामका गुलाम हूँ)।
परन्तु प्रभुसे भी प्रभुके नामका प्रताप अधिक प्रचण्ड है। (अतः)
क० १०-

कवितावली १४६
अपनी भलाईसे यदि आप मेरा भला कर दें तो अच्छा ही है,
नहीं तो तुलसीके कपटका खजाना खुलेगा ही ।
जोग न बिरागु,जप, जाग, तप, त्यागु,ब्रत,
तीरथ न धर्म जानौं, वेदविधि किमि है ।
तुलसी-सो पोच न भयो है, नहिं हैहै कहूँ,
सोचैं सब, याके अघ कैसे प्रभु छमिहैं ॥
मेरें तौ न डरु, रघुवीर ! सुनौ, साँची कहौं,
खल अनखैहैं तुम्हें, सज्जन न गंमिहैं ।
भले सुकृतीके संग मोहि तुलाँ तौलिए तौ,
नामकें प्रसाद भारु मेरी ओर नमिहै ॥७१॥
मैं न तो अष्टाङ्गयोग जानता हूँ और न वैराग्य, जप, यज्ञ,
तप, त्याग, व्रत, तीर्थ अथवा धर्म ही जानता हूँ । मैं यह भी नहीं
जानता कि वेदका विधान कैसा है । तुलसीके समान पामर न
तो कोई हुआ है और न कहीं होगा । ( इसीलिये ) सभी सोचते
हैं, न जाने, प्रभु इसके पापोंको कैसे क्षमा करेंगे । किन्तु हे
रघुनाथजी ! सुनिये, मैं ( आपसे ) सच कहता हूँ, मुझे कुछ भी
डर नहीं है । ( यदि आप मुझे क्षमा कर देंगे तो ) दुष्ट लोग तो
अवश्य आपसे अप्रसन्न होंगे, किन्तु सज्जनोंको इससे कुछ भी दुःख
नहीं होगा । यदि आप मुझे किसी बड़े पुण्यवान्के साथ तराजू-
पर तोलेंगे तो आपके नामकी कृपासे मेरी ओरका पलड़ा ही
झुकता हुआ रहेगा ।
जातिके, सुजातिके, कुजातिके पेटागि बस
खाए टूक सबके, बिदित बात दुनीं सो ।