कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली १३६
पातक-पीन, कुदारिद-दीन मलीन धरें कथरी-करवा है।
लोकु कहै, विधिहूँ न लिख्यो सपनेहूँ नहीं अपने बर बाहैं ॥
रामको किंकरु सो तुलसी, समुझेंहि भलो, कहिबो न रवा है।
ऐसेको ऐसो भयो कबहुँ न भजे बिनु बानरके चरवाहै ॥
लोक [ मेरे विषयमें ] कहता था कि यह पापोंमें बढ़ा हुआ
एवं कुत्सित दरिद्रताके कारण दीन है तथा मलिन कन्था और
करवा धारण किये है । विधाताने इसके भाग्यमें कुछ भी नहीं
लिखा तथा यह सपनेमें भी अपने बलपर नहीं चलता था । परन्तु
आज वही तुलसी श्रीरामचन्द्रजीका किंकर हो गया । इस बातको
समझना ही अच्छा है, कहना उचित नहीं है । वह ऐसे ( दीन और
पापी ) से ऐसा ( महामुनि ) बिना वानरोंके चरवाहे (श्रीरामचन्द्रजी)
को भजे नहीं हुआ ।
मातु-पिताँ जग जाइ तज्यो, बिधिहूँ न लिखी कछु भाल भलाई ।
नीच, निरादरभाजन, कादर, कूकर-टूकन लागि ललाई ॥
राम-सुभाउ सुन्यो तुलसीं, प्रभुसों कह्यो बारक पेटु खलाई ।
स्वारथको परमारथको रघुनाथु सो साहेबु, खोरि न लाई ॥
माता-पिताने जिसको संसारमें जन्म देकर त्याग दिया, ब्रह्माने
भी जिसके भाग्यमें कुछ भलाई नहीं लिखी, उस नीच, निरादरके
पात्र कायर, कुक्कुरके मुँहके टुकड़ेके लिये ललचानेवाले तुलसीदास-
ने जब श्रीरामचन्द्रका स्वभाव सुना और एक बार पेट खोलकर
[ अपना सारा दुःख ] कहा तो प्रभु रघुनाथजीने उसके स्वार्थ
और परमार्थको सुधारनेमें तनिक भी कोर-कसर नहीं रक्खी ।