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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

पृष्ठ 140, कुल 228 में से

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पृष्ठ 140

१३७ उत्तरकाण्ड
पाप हरे, परिताप हरे, तनु पूजि भो हीतल सीतलताई ।
हंसु कियो बकतें, बलि जाउँ, कहाँ लौं कहौं करुना-अधिकाई ॥
कालु विलोकि कहैं तुलसी, मनमें प्रभुकी परतीति अघाई ।
जन्मु जहाँ, तहँ रावरे सों निवहैं भरि देह सनेह-सगाई ॥
तुलसीदासजी कहते हैं—हे श्रीराम ! आपने मेरे पाप नष्ट
कर दिये, सारे सन्ताप हर लिये, शरीर पूज्य बन गया । हृदयमें
शीतलता आ गयी । और मैं आपकी बलिहारी जाता हूँ, आपने मुझे
बगुले (दंभी) से हंस (विवेकी) बना दिया, आपकी कृपाकी
अधिकताका कहाँतक वर्णन करूँ । अब समय देखकर तुलसी कहता
है कि मेरे मनमें प्रभुका पूरा भरोसा है, अतः जहाँ कहीं भी मेरा
जन्म हो वहाँ आपसे शरीर रहनेतक प्रेमके सम्बन्धका निर्वाह
होता रहे ।
लोग कहैं, अरु हौंहु कहौं, जनु खोटो-खरो रघुनायकही को ।
रावरी राम ! बड़ी लघुता, जसु मेरो भयो सुखदायक हीको ॥
कै यह हानि सहौ, बलि जाउँ, कि मोहू करौ निज लायकहीको ।
आनि हिएँ हित जानि करौ, ज्यों हों ध्यानु धरौं धनु-सायकही को॥
लोग कहते हैं और मैं भी कहता हूँ कि खोटा या खरा मैं
श्रीरामचन्द्रजीहीका सेवक हूँ । हे राम ! इससे आपकी तो बड़ी
तौहीन हुई, परन्तु आपके सदृश स्वामीका सेवक होनेका जो यश
मुझे प्राप्त हुआ वह मेरे हृदयको तो सुख देनेवाला ही है । मैं
बलिहारी जाऊँ, अब या तो आप इस हानिको सहिये अथवा मुझे ही
अपनी सेवाके योग्य बना लीजिये । अपने हृदयमें विचारकर और
मेरे लिये हितकारी जानकर ऐसा ही कीजिये जिससे मैं आपके