कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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तुलसीदासजी अपने लिये कहते हैं कि अरे दुष्ट ! जिन
संतोंने इस संसारकी थाह पा ली है, वे कहते हैं कि संसार झूठा है,
झूठा है, झूठा है; परन्तु तू उसीके लिये करोड़ों संकट सहता है
और दाँत निकालकर हाय-हाय करता है । तुझे अपने ज्ञानीपनेका
बड़ा अभिमान है, परन्तु तुलसीके विचारसे तो तू महागँवार है ।
यदि तूने ज्ञानके द्वारा जानकीजीवन ( श्रीरामचन्द्रजी ) को नहीं
जाना तो तूने ज्ञानी कहलाते हुए भी ( वस्तुतः ) क्या जाना ?
[ अर्थात् कुछ भी नहीं जाना । ]
तिन्ह तें खर, सूकर, स्वान भले, जड़ता बस ते न कहैं कछु वै ।
'तुलसी' जेहि रामसों नेहु नहीं, सो सही पसु पूँछ, बिषान न द्वै ॥
जननी कत भार मुई दस मास, भई किन बाँझ, गई किन च्वै ।
जरि जाउ सो जीवनु, जानकीनाथ ! जियै जगमें तुम्हरो बिनु है ॥
गोसाईंजी कहते हैं कि जिन्हें श्रीरामजीसे स्नेह नहीं है, वे
सचमुच पशु ही हैं, उनके केवल एक पूँछ और दो सींगोंकी कसर
है । उनसे तो गधे और सूअर भी अच्छे हैं, क्योंकि वे बेचारे कुछ
जड़ होनेके कारण कहते तो नहीं । उनकी माँ दस महीनेतक
उनके भारसे क्यों मरी ? बाँझ क्यों नहीं हो गयी ? अथवा उसका
गर्भ ही क्यों नहीं गिर गया ? हे जानकीनाथ ! जो पुरुष संसारमें
तुम्हारा हुए बिना जीता है उसका जीवन जल जाय
( जला देनेके योग्य है ) ।
गज-बाजि-घटा, भले भूरि भटा, बनिता, सुत भौंह तकैं सब वै ।
धरनी, धनु, धाम सरीरु भलो, सुरलोकहु चाहिइहै सुखु स्वै ॥
सब फोकट साटक है तुलसी, अपनो न कछू सपनो दिन द्वै ।
जरि जाउ सो जीवनु जानकीनाथ ! जियै जगमें तुम्हरो बिनु है ४१