कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३३ उत्तरकाण्ड
पेटकी ही चिन्तामें लगे रहते हैं ] । गोसाईंजी कहते हैं कि जिसके
श्रीरामचन्द्रके समान समर्थ स्वामी हैं, जो थोड़ी-सी सेवा करनेपर ही
रीझ जाते हैं, उसे संसारकी क्या चिन्ता पड़ी है, वह तो ऐसे
लोगोंसे सम्बन्ध तोड़कर पृथ्वीपर विचरता है ।
कानन, भूधर, वारि, बयारि, महाविषु, ब्याधि, दवा-अरि घेरें ।
संकट कोटि जहाँ 'तुलसी', सुत, मातु, पिता, हित, बंधु न नेरे ॥
राखिहैं रामु कृपालु तहाँ, हनुमानु से सेवकु हैं जेहि केरे ।
नाक, रसातल, भूतलमें रघुनायकु एकु सहायकु मेरे ॥५०॥
वनमें, पर्वतपर, जलमें, आँधीमें, महाविष खा लेनेपर, रोगमें,
अग्नि और शत्रुसे घिर जानेपर तथा गोसाईंजी कहते हैं, जहाँ
करोड़ों संकट हों और माता-पिता, पुत्र, मित्र और भाई-बन्धु कोई
समीप न हों, वहाँ भी दयालु भगवान् राम, जिनके हनुमान्-सा-जैसे
सेवक हैं, रक्षा करेंगे । आकाश, पाताल और पृथ्वीमें एक
श्रीरघुनाथजी ही मेरे सहायक हैं ।
जबै जमराज-रजायततें मोहि लै चलिहैं भट बाँधि नटैया ।
तातु न मातु, न स्वामि-सखा, सुत-बंधु बिसाल बिपत्ति-बँटैया ॥
साँसति घोर, पुकारत आरत कौन सुनै, चहुँ ओर डटैया ।
एकु कृपाल तहाँ 'तुलसी' दसरत्थको नंदनु बंदि-कटैया ॥५१॥
जब यमराजकी आज्ञासे मेरे गलेको बाँधकर यमदूत मुझे ले
चलेंगे उस समय वहाँ न बाप, न माँ, न स्वामी, न मित्र, न पुत्र
और न भाई ही उस भारी विपत्तिको बाँटनेवाले होंगे । वहाँ घोर
कष्ट सहना होगा । उस आर्त्त पुकारको सुनेगा भी कौन ? चारों
ओर डाँटनेवाले [ यमदूत ] ही होंगे । गोस्वामीजी कहते हैं कि