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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

५२० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण

५२० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण

(१) नेति कौटिल्यः । सुमहतापि क्षयव्ययेन शत्रुविनाशोऽभ्युपगन्तव्यः ।
(२) तुल्ये क्षयव्यये यः पुरस्ताद् दूष्यबलं घातयित्वा निश्शल्यः पश्चा-दूष्यबलो युद्ध्येत, सोऽतिसन्धत्ते ।
(३) द्वयोरपि पुरस्ताद्दूष्यबलघातिनोर्यो बहुलतरं शक्तिमत्तरमत्यन्त-दूष्यं च घातयेत्, सोऽतिसन्धत्ते ।
(४) तेनामित्राटवीबलघातो व्याख्यातः ।
(५) पाष्णिग्राहोऽभियोक्ता वा यातव्यो वा यदा भवेत् ।
विजिगीषुस्तदा तत्र नैत्रेमेतत्समाचरेत् ॥
(६) पाष्णिग्राहो भवेन्नेता शत्रोर्मित्राभियोगिनः ।
विग्राह्य पूर्वमाक्रन्दं पाष्णिग्राहाभिसारिणा ॥
(७) आक्रन्देनाभियुञ्जानः पाष्णिग्राहं निवारयेत् ।
तथाक्रन्दाभिसारेण पाष्णिग्राहाभिसारिणम् ॥


कहलाता है । इन दोनों में मन्त्रयुद्ध ही उन्नति का कारण है, क्योंकि व्यायाम युद्ध में क्षय-व्यय होता है । तथैव युद्ध में जीत जाने पर भी सेना और कोष के क्षीण हो जाने के कारण वह राजा प्रायः पराजित-सा ही हो जाता है । यह प्राचीन आचार्यों की राय है ।

( १ ) इसके विपरीत कौटिल्य का कहना है कि चाहे कितना ही क्षय-व्यय क्यों न हो, हर हालत में शत्रु का नाश करना ही उद्देश्य होना चाहिए ।

( २ ) मनुष्य तथा धन की बराबर हानि होने पर जो राजा पहिले अपने दूष्य-बल को समाप्त कर फिर निष्कंटक हो अपनी नियमित सेना को साथ लेकर युद्ध करता है वही विशेष लाभ में रहता है ।

( ३ ) यदि दोनों राजा पहिले अपने दूष्यबल को ही समाप्त कर डालते हैं तो उनमें से वही अधिक लाभ में रहता है, जो पहिले बहुसंख्यक शक्तिशाली दूष्यबल को समाप्त करवा डालता है ।

( ४ ) दूष्यबल की ही भाँति शत्रुबल और अटवीबल के संबंध में भी समझ लेना चाहिए ।

( ५ ) विजिगीषु जब पाष्णिग्राह, अभियोक्ता अथवा यातव्य हो, उस समय उसे नीचे बताये तरीकों से नेतृत्व करना चाहिए ।

( ६ ) विजिगीषु को यही उचित है कि वह अपने मित्र पर आक्रमण करने वाले शत्रु के पृष्ठवर्ती मित्र ( आक्रंद ) को पहिले अपने मित्र की सेना के साथ भिड़ाकर फिर स्वयं उसकी पाष्णि को ग्रहण करे ।

( ७ ) यदि विजिगीषु स्वयं ही आक्रमणकारी हो तो वह अपने पाष्णिग्राह को अपने मित्र राजा द्वारा वारित करे और पाष्णिग्राह की सेना का मुकाबला अपने मित्र की सेना के द्वारा करे ।

प्र० ११७ : अ० १३ ] पार्ष्णिग्राह-चिन्ता ५२१

(१) अरिमित्रेण मित्रं च पुरस्तादवघट्टयेत् ।
मित्रमित्रमरेश्चापि मित्रमित्रेण वारयेत् ॥
(२) मित्रेण ग्राहयेत्पार्ष्णिमभियुक्तोऽभियोगिनः ।
मित्रमित्रेण चाक्रन्दं पार्ष्णिग्राहात्निवारयेत् ॥
(३) एवं मण्डलमात्मार्थं विजिगीषुर्निवेशयेत् ।
पृष्ठतश्च पुरस्ताच्च मित्रप्रकृतिसम्पदा ॥
(४) कृत्स्ने च मण्डले नित्यं दूतान् गूढांश्च वासयेत् ।
मित्रभूतः सपत्नानां हत्वा हत्वा च संवृतः ॥
(५) असंवृतस्य कार्याणि प्राप्तान्यपि विशेषतः ।
निस्संशयं विपद्यन्ते भिन्नप्लव इवोदधौ ॥

इति षाड्गुण्ये सप्तमेऽधिकरणे पार्ष्णिग्राहचिन्ता नाम त्रयोदशोऽध्यायः आदितो दशोत्तरशततमः ।

—: ० :—

( १ ) इस प्रकार अपने पीछे का प्रबन्ध कर सामने से कोई शत्रु मुकाबले में आये तो उससे अपने मित्र को भिड़ा दे । मदद के लिए यदि शत्रु के मित्र का मित्र आवे तो उसका मुकाबला अपने मित्र के मित्र से करे ।

( २ ) यदि विजिगीषु के ऊपर ही चढ़ाई की गई हो तो अपने मित्र को अपने उस आक्रमणकारी का पार्ष्णिग्राह बना दे । यदि आक्रमणकारी का कोई मित्र उस पार्ष्णिग्राह का मुकाबला करने के लिए आवे तो उस अपने मित्र पार्ष्णिग्राह के मित्र द्वारा उसका निवारण करे ।

( ३ ) इस प्रकार विजिगीषु, मित्ररूप प्रकृति की पूर्वोक्त गुणसमृद्धि से युक्त राज-मण्डल को अपनी सहायता के लिए आगे और पीछे ठीक तरह से स्थापित करे ।

( ४ ) अपनी सहायता के लिए स्थापित किये हुए उस संपूर्ण राजमण्डल में गुप्तचरों और दूतों का सदा उत्तम प्रबंध रखे और शत्रुओं के साथ ऊपर से मित्रता के भाव रखकर एक-एक करके उन्हें मार दे तथा ऊपर से उदासीन एवं निष्पक्ष बना रहे ।

( ५ ) जो राजा अपने गुप्त विचारों या गुप्त मन्त्रणाओं को छिपा कर नहीं रख सकता है वह उच्चतावस्था में पहुँचकर भी नीचे गिर जाता है । समुद्र में नाव के फट जाने से जो दशा सवार की होती है, ठीक वही दशा मन्त्र के फूट जाने पर राजा की होती है ।

षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिकरण में पार्ष्णिग्राहचिन्ता नामक तेरहवाँ अध्याय समाप्त ।

—: ० :—

प्रकरण ११८# हीनशक्तिपूरणम्
अध्याय १४

(१) सामवायिकैरेवमभियुक्तो विजिगीषुर्यस्तेषां प्रधानस्तं ब्रूयात्— ‘त्वया मे सन्धिः, इदं हिरण्यमहं च मित्रम्, द्विगुणा ते वृद्धिः, नार्हस्यात्म-क्षयेण मित्रमुखानमित्रान् वर्धयितुम्, एते हि वृद्धास्त्वामेव परिभविष्यन्ति’।

(२) भेदं वा ब्रूयात्—‘अनपकारो यथाऽहमेतैः सम्भूयाभियुक्तः तथा त्वामप्येते संहितबलाः स्वस्था व्यसने वाऽभियोक्ष्यन्ते । बलं हि चित्तं विकरोति, तदेषां विघातय’ इति ।

(३) भिन्नेषु प्रधानमुपगृह्य हीनेषु विक्रमयेत् । हीनाननुग्राह्य वा प्रधाने । यथा वा श्रेयोऽभिमन्येत, तथा । वैरं वा परैर्ग्राहयित्वा विसं-वादयेत् ।


दुर्बल विजिगीषु के लिए शक्ति-संचय के साधन

( १ ) यदि अनेक राजा मिलकर विजिगीषु पर एक साथ आक्रमण करें तो विजिगीषु उन राजाओं के मुखिया से इस प्रकार कहे : 'मैं आपसे संधि करना चाहता हूँ; यह रहा हिरण्य । अब से मैं आपका मित्र हूँ । आपका भी दुगुना लाभ हो गया है । इसलिए अपने जन-धन का नुकसान कर इन ऊपरी मित्रों को बढ़ावा देना अब आपको उपयुक्त नहीं है । बाद में ये आप पर ही टूट पड़ेंगे । इसलिए आपको इनका साथ नहीं देना चाहिए ।'

( २ ) यदि ऐसा संभव न हो तो उनकी आपस में फूट करा दे । फूट डालने के लिए वह कहे कि 'जैसे मुझ निरपराध पर इन सबने आक्रमण किया है, वैसे स्वयं उन्नत होने पर या आपके विपत्तिकाल ये आप पर भी अवश्य आक्रमण करेंगे क्योंकि एकत्र बल अवश्य ही चित्त को विकृत कर देता है । इसलिए आपके लिए उचित यही है कि अभी से आप इनके संगठित बल को छिन्न-भिन्न कर दें ।'

( ३ ) इस प्रकार जब उनमें फूट हो जाय तब उनमें किसी प्रधान को अग्रसर करके हीनबल वाले शत्रु पर आक्रमण कर दे । अथवा हीनबल वाले राजाओं को अपनी ओर मिलाकर सामवायिकों के प्रधान पर ही चढ़ाई कर दे । अथवा जिस तरह अपना काम बन सके, वैसा करे । अथवा उनमें से प्रत्येक के हृदय में परस्पर घृणाभाव पैदा कर उन्हें विघटित कर दे ।

प्र० ११८ : अ० १४ ] शक्ति-संचय के साधन ५२३

(१) फलभूयस्त्वेन वा प्रधानमुपजाप्य सन्धि कारयेत् । अथोभयवेतनाः फलभूयस्त्वं दर्शयन्तः सामवायिकान् 'अतिसंहिताः स्थ' इत्युद्दूषयेयुः । दुष्टेषु सन्धि दूषयेत् । अथोभयवेतना भूयो भेदमेषां कुर्युः—'एवं तद्यदस्माभिर्दर्शितम्' इति । भिन्नेष्वन्यतमोपग्रहेण वा चेष्टेत ।
(२) प्रधानाभावे सामवायिकानामुत्साहयितारं स्थिरकर्माणमनुरक्तप्रकृतिं लोभाद्भयाद्वा सङ्घातमुपगतं विजिगीषोर्भीतं राज्यप्रतिसम्बन्धं मित्रं चलामित्रं वा पूर्वानुत्तराभावे साधयेत् ।
(३) उत्साहयितारमात्मनिसर्गेण, स्थिरकर्माणं सान्त्वप्रणिपातेन, अनुरक्तप्रकृतिं कन्यादानयापनाभ्यां, लुब्धमंशद्वैगुण्येन, भीतमेभ्यः कोशदण्डानुग्रहेण, स्वतो भीतं विश्वासयेत्प्रतिभूप्रदानेन, राज्यप्रतिसम्बन्धमेकी-


( १ ) अथवा बहुत-सा धन देकर उस मुखिया को फोड़ ले और खुद जाकर दूसरे राजाओं से चुपचाप सन्धि कर ले । उसके बाद विजिगीषु के उभय वेतन भोगी गुप्तचर उन संगठित राजाओं से, मुखिया को मिली भारी रकम की बात सुनाते हुए उनसे 'तुम सबको उसने ठग लिया है' ऐसा कह कर भड़काये । जब संगठित राजा मुखिया के विरुद्ध हो जाँय तो मुखिया के साथ की गई संधि को तोड़ दे । उसके बाद उभयवेतनभोगी गुप्तचर कहे 'देखो, मैंने पहिले ही कहा था कि मुखिया राजा ने भारी रकम मारी है । तभी तो गड़बड़ हो जाने के कारण इसने विजिगीषु के साथ संधि को तोड़ दिया है । हम इस बात को पहले ही कह चुके थे ।' जब वे आपस में फूट जाँय तो दोनों पक्षों में से किसी एक का सहारा लेकर पक्ष के साथ लड़ाई आरंभ कर दे ।

( २ ) यदि उन संगठित राजाओं से कोई प्रधान न हो तो उनको उत्साहित करने वाला, स्थिरकर्मा, अनुरक्तप्रकृति, लोभ या भय से संधि में शामिल न होने वाला, विजिगीषु से भयभीत, अपने राज्य से संबन्धित, अपना ही मित्र और चल शत्रु हो तो इन्हें ही वश में करना चाहिए । इनमें अगले-अगले राजा को वश में करने का यत्न करे ।

( ३ ) उत्साही राजा से विजिगीषु यों कहे 'मैं अपनी सारी प्रकृति और पुत्रादिसहित आपके अधीन हूँ । अपनी इच्छानुसार जिस कार्य पर चाहें मुझे लगा सकते हैं; किन्तु मेरा उच्छेद न कीजिए ।' इस प्रकार आत्मसमर्पण करके उसको वश में करे । स्थिरकर्मा को 'आपने मुझे जीत लिया है' कह कर वश में करे । अनुरक्तप्रकृति राजा को अपनी कन्या देकर वश में करे । लोभी राजा को दुगुना हिस्सा देकर; अपने आप से डरे हुए राजा को विश्वास दिला कर वश में करे । इसी प्रकार अपने राज्य से संबंध रखने वाले राजा को—मैं और आप एक ही हैं । मेरी पराजय में आपकी

५२४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण

भावोपगमनेन, मित्रमुभयतः प्रियहिताभ्यामुपकारत्यागेन वा, चलामित्रमवधूतमनपकारोपकाराभ्याम् ।

(१) यो वा यथायोगं भजेत, तं तथा साधयेत् । सामदानभेददण्डैर्वा यथापत्सु व्याख्यास्यामः ।

(२) व्यसनोपघातत्वरितो वा कोशदण्डाभ्यां देशे काले कार्ये वावधृतं सन्धिमुपेयात् । कृतसन्धिर्हीनमात्मानं प्रतिकुर्वीत ।

(३) पक्षे हीनो बन्धुमित्रपक्षं कुर्वीत, दुर्गमविषह्यं वा । दुर्गमित्रप्रतिस्तब्धो हि स्वेषां परेषां च पूज्यो भवति ।

(४) मन्त्रशक्तिहीनः प्राज्ञपुरुषोपचयं विद्यावृद्धसंयोगं वा कुर्वीत । तथाहि सद्यः श्रेयः प्राप्नोति ।

(५) प्रभावहीनः प्रकृतियोगक्षेमसिद्धौ यतेत । जनपदः सर्वकर्मणां योनिः, ततः प्रभावः ।


भी पराजय है । दूसरों के साथ मिल कर मुझ पर आक्रमण करना आपको शोभा नहीं देता है ।' ऐसी आत्मीयता का भाव जताकर अपने वश में करे । मित्र राजा को प्रिय और हितकर वचनों से तथा उससे लिया गया कर उसे वापिस दे, इस प्रकार अपने वश में करे । अस्थिर शत्रु राजा को, उसका उपकार करने तथा अपकार न करने की प्रतिज्ञा से, वश में करे ।

( १ ) अथवा इन संगठित राजाओं में जो जिस तरीके से वश में किया जा सके उसके साथ वैसा ही व्यवहार करे; अथवा साम, दाम आदि उपायों से उनको वश में करे; जैसा कि आपत्प्रकरण में आगे बताया जायेगा ।

( २ ) अथवा विजिगीषु राजा आसन्न विपत्ति को शीघ्र ही दूर करने की इच्छा रखकर संगठित राजाओं से, सेना और कोष के द्वारा सहायता देने की शर्त पर, संधि कर ले और अपनी कमजोरियों को दूर करने का यत्न करे ।

( ३ ) मित्र-रहित विजिगीषु को चाहिए कि वह अधिकाधिक राजाओं को अपना मित्र बनाये । या अभेद्य दुर्गों को बनवाये, क्योंकि मित्रसंपन्न और दुर्गसंपन्न विजिगीषु के विरोध में कोई खड़ा नहीं हो सकता है ।

( ४ ) बुद्धिवल ( मंत्रशक्ति ) से हीन राजा को चाहिए कि वह बुद्धिमान् पुरुषों का संग्रह कर विद्यावृद्ध एवं अनुभवी व्यक्तियों की संगति करे । ऐसा करने से राजा शीघ्र ही अपना कल्याण करता है ।

( ५ ) प्रभुशक्ति ( प्रभाव ) से हीन राजा को चाहिए कि वह अपनी अमात्य प्रकृति तथा प्रयोजनों के योग-क्षेम के लिए महान् यत्न करे । क्योंकि जनपद ही सभी

प्र० ११८ : अ० १४ ] शक्ति-संचय के साधन ५२५

(१) तस्य स्थानमात्मनश्च आपदि दुर्गम् ।
(२) सेतुबन्धः सस्यानां योनिः । नित्यानुषक्तो हि वर्षगुणलाभः सेतुवापेषु ।
(३) वणिक्पथः परातिसन्धानस्य योनिः, वणिक्पथेन हि दण्डगूढपुरुषातिनयनं शस्त्रावरणयानवाहनक्रयश्च क्रियते । प्रवेशो निर्नयनं च ।
(४) खनिः संग्रामोपकरणानां योनिः ।
(५) द्रव्यवनं दुर्गकर्मणां, यानरथयोश्च ।
(६) हस्तिवनं हस्तिनाम् ।
(७) गजाश्वखरोष्ट्राणां च व्रजः ।
(८) तेषामलाभे बन्धुमित्रकुलेभ्यः समार्जनम् ।
(९) उत्साहहीनः श्रेणीप्रवीरपुरुषाणां चोरगणाटविकम्लेच्छजातीनां परापकारिणां गूढपुरुषाणां यथालाभमुपचयं कुर्वीत ।


कार्यों की सिद्धि का मूल है। उसी से कोष तथा सेना का संग्रह और दुर्गों का निर्माण किया जाता है। तभी प्रभावशाली बना जा सकता है।

( १ ) उस प्रभाव का मूल दुर्ग ही है और उसी दुर्ग से विपत्तिकाल में अपनी भी रक्षा होती है।

( २ ) अन्न आदि की उत्पत्ति के प्रमुख कारण बांध हैं। क्योंकि जो अन्न हमें केवल वृष्टि के द्वारा ही प्राप्त हो सकते हैं, बांधों एक जलाशयों के द्वारा उन अन्नों को को हम सदा ही प्राप्त कर सकते हैं।

( ३ ) व्यापारिक मार्ग शत्रुओं को धोखा देने के प्रधान कारण हैं, क्योंकि इन्हीं मार्गों द्वारा शत्रुदेश में सेना, तीक्ष्ण, रसद आदि पुरुषों को तथा अस्त्र, शस्त्र को भेजा जा सकता है और घोड़े आदि के क्रय-विक्रय का कार्य शत्रु देश में किया जा सकता है। इन्हीं मार्गों के द्वारा दूसरे देशों के साथ वस्तु-विनिमय और यातायात होता है।

( ४ ) युद्ध के सभी उपकरणों का मूल स्थान खान है।

( ५ ) दुर्गों और राजप्रासादों के मूल कारण लकड़ियों के जंगल हैं। इसी प्रकार रथ तथा अन्य सवारियों के कारण भी जंगल ही है।

( ६ ) हाथियों की उत्पत्ति के मूल कारण हस्तिवन हैं।

( ७ ) हाथी, घोड़े, गधे और ऊँट आदि पशुओं की उत्पत्ति का कारण व्रज ( गोष्ठ ) है।

( ८ ) यदि उपर्युक्त साधन अपने राज्य में उपलब्ध या उत्पन्न न हों तो उन्हें अपने मित्रों तथा बंधुओं के कुलों से प्राप्त करना चाहिए।

( ९ ) उत्साहहीन राजा को चाहिए कि वह श्रेणीपुरुषों, शूरवीरों, शत्रुओं का