कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
१३४ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ दूसरा अधिकरण
| १३४ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ दूसरा अधिकरण |
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(१) अष्टप्लोतिसङ्घात्या कृष्णा भिङ्गिसी वर्षवारणम्, अपसारक इति नैपालकम् ।
(२) संपुटिका चतुरश्रिका लम्बरा कटवानकं प्रावरकः सत्तलिकेति मृगरोम ।
(३) वाङ्गकं श्वेतं स्निग्धं दुकूलं, पौण्ड्रकं श्यामं मणिस्रिग्धं, सौवर्णकुड्यकं सूर्यवर्णम् । मणिस्रिग्धोदकवानं चतुरश्रवानं व्यामिश्रवानं च ।
(४) एतेषामेकांशुकमध्यर्धद्वित्रिचतुरंशुकमिति ।
(५) तेन काशिकं पौण्ड्रकं च क्षौमं व्याख्यातम् ।
(६) मागधिका पौण्ड्रिका सौवर्णकुड्यका च पत्रोर्णाः नागवृक्षो
( १ ) काले रंग के आठ टुकड़ों को जोड़कर भिंगिसी बनाई जाती है, जो कि वर्षा में भींगने से बचाती है । इसी तरह एक ही साबूत कपड़े का बना अपसारक कहलाता है । ये कपड़े नैपाल देश में बनते हैं ।
( २ ) मृग के बालों से छह प्रकार का कपड़ा बनाया जाता है : १. संपुटिका, ( जांघिया या सुथनी ), २. चतुरश्रिका, ३. लम्बरा, ४. कटवानक, ५. प्रावरक और ६. सत्तलिका ।
( ३ ) दुशाला देश भेद से तीन प्रकार का होता है : १. वांगक, २. पौण्ड्रक ३. सौवर्णकुड्यक । वांगक अर्थात् बङ्गाल में बना हुआ दुशाला सफेद एवं चिकना होता है, पौंड्रक अर्थात् पुंड्र देश में बना हुआ दुशाला काला एवं मणि के समान स्निग्ध होता है, और असम के सुवर्णकुड्य नामक स्थान में बना हुआ दुशाला सूर्य के समान चमकदार होता है । इन दुशालों की बुनावट तीन प्रकार की होती है १. दुशाले बनाने के साधनभूत तन्तु पहिले पानी में भिगो दिए जाय, फिर मणिवन्ध में रगड़कर उन्हें मजबूत बना दिया जाय २. ताना और बाना दोनों का तागा एक-सा बारीक हों, इस प्रकार की बनावट ३. कपास, रेशम, ऊन आदि मिले हुए तन्तुओं से रंगीन बुनावट करना ।
( ४ ) जिसके ताने और बाने में एक जैसे बारीक तन्तु हों, वह उत्तम दुशाला है, इनसे ड्योढ़े, दुगने, तिगुने आदि मोटे तन्तुओं के होने पर उत्तरोत्तर वह दुशाला कम कीमत का समझा जाता है ।
( ५ ) इसी प्रकार काशी तथा पुंड्र आदि में बनने वाले रेशमी वस्त्रों की उत्कृष्टता-निकृष्टता के सम्बन्ध में भी समझना चाहिए, अर्थात् रेशम के तन्तु जितने बारीक और एक सूत के होंगे, रेशम उतना ही उत्तम होगा और तन्तुओं के मोटे होने पर उत्तरोत्तर वह निकृष्ट समझा जायगा ।
( ६ ) मगध, पुंड्रक और सुवर्णकुड्यक, इन तीन देशों में पत्रोर्णा नाम की ऊन होती है । वह नागकेसर, बड़हर, मौलसरी और बरगद, इन चार पेड़ों से पैदा
प्र० २७ : अ० ११ ] रत्नों की परीक्षा १३५
लिकुचो वकुलो वटश्च योनयः । पीतिका नागवृक्षिका , गोधूमवर्णा लैंकुची, श्वेता वाकुली, शेषा नवनीतवर्णा ।
(१) तासां सौवर्णकुड्यका श्रेष्ठा । तया कौशेयं चीनपट्टाश्च चीनभूमिजा व्याख्याताः ।
(२) माधुरमापरान्तकं कालिङ्गकं काशिकं वाङ्गकं वात्सकं माहिषकं च कार्पासिकं श्रेष्ठमिति ।
(३) अतः परेषां रत्नानां प्रमाणं मूल्यलक्षणम् ।
जातिं रूपं च जानीयान्निधानं नवकर्म च ॥
(४) पुराणप्रतिसंस्कारं कर्मगुह्यमुपस्करान् ।
देशकालपरीभोगं हिंस्राणां च प्रतिक्रियाम् ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे कोशप्रवेश्यरत्नपरीक्षा नाम एकादशोऽध्यायः, आदितः एकत्रिंशः ।
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होती है । नागकेसर के पेड़ से निकाली जाने वाली पत्रोर्णा पीली होती है । बड़हर पर गेहुँए रंग की होती है । मौलसरी की सफेद होती है । बरगद तथा अन्य वृक्षों की पत्रोर्णा मक्खन के रंग की होती है ।
( १ ) उनमें सुवर्णकुड्यक ( असम ) की पत्रोर्णा उत्तम समझी जाती है । इसी प्रकार दूसरे रेशम और चीन में उत्पन्न होने वाले चीनपट्ट में सम्बन्ध में भी समझ लेना चाहिए ।
( २ ) मधुरा ( मदुरा ), अपरांतक ( कोंकण ), कलिंग, काशी, वंग, वत्स और महिषक ( मैसूर ), इन देशों में पैदा होने वाली कपास के कपड़े सर्वोत्तम समझे जाते हैं ।
( ३ ) कोषाध्यक्ष को चाहिए कि वह, मोती से लेकर कपास तक जिन रत्न, सार और फल्गु आदि पदार्थों का निरूपण किया गया है तथा जिनका निरूपण आगे किया जायगा, इसके अतिरिक्त रत्नों के प्रमाण, मूल्य, लक्षण, जाति, रूप, निधान और संस्कार-शुद्धि आदि विषयों के संबन्ध में विस्तार से जानकारी प्राप्त करे ।
( ४ ) पुराने रत्नों का पुनः संस्कार, उनको छीलना, उनका रंग बदलना, उनको साफ करना, देश-काल के अनुसार उनका उपयोग करना, कृमि-कीटों से उनकी सुरक्षा का प्रबन्ध करना आदि कार्य भी कोषाध्यक्ष की जानकारी से सम्बद्ध हैं ।
अध्यक्षप्रचार नामक दूसरे अधिकरण में कोशप्रवेश्यरत्नपरीक्षा नामक ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त ।
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| प्रकरण २८ | आकरकर्मान्तप्रवर्तनम् |
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| अध्याय १२ |
(१) आकराध्यक्षः शुल्बधातुशास्त्ररसपाकमणिरागज्ञस्तज्ज्ञसखो वा तज्जातकर्मकरोपकरणसम्पन्नः किट्टमूषाङ्गारभस्मलिङ्गं वाकरं भूतपूर्वमभूतपूर्वं वा भूमिप्रस्तररसधातुमत्यर्थवर्णगौरवमुग्रगन्धरसं परीक्षेत ।
(२) पर्वतानामभिज्ञातोद्देशानां बिलगुहोपत्यकालयनगूढखातेष्वन्तःप्रस्यन्दिनो जम्बूचूततालफलपक्वहरिद्राभेदहरितालक्षौद्रहिङ्गुलकपुण्डरीकशुकमयूरपत्रवर्णाः सवर्णोदकौषधिपर्यन्ताश्चिक्कणा विशदा भारिकाश्च रसाः काञ्चनिकाः ।
(३) अप्सु निष्च्यूतास्तैलवद्विसर्पिणः पङ्कमलग्राहिणश्च ताम्ररूप्ययोः शतादुपरि वेद्धारः ।
खान एवं खनिज की पहिचान और उनके विक्रय की व्यवस्था
( १ ) आकर ( खान ) के अध्यक्ष को चाहिये कि वह शुल्वशास्त्र, धातुशास्त्र, रसायन, पाकविधि और मणिराग आदि के विषयों में निपुणता प्राप्त करे अथवा उन विषयों के विशेषज्ञ पुरुषों तथा उन वस्तुओं के व्यापारियों के साथ रहकर, कुल्हाड़े, धौंकनी, सन्सी आदि आवश्यक सामग्री को साथ लेकर, कीटी, मूषा, राख आदि लक्षणों को देखकर पुरानी खान की परीक्षा करे, यदि मिट्टी, पत्थर, पानी आदि में धातु मिली हुई जान पड़े या उनका रंग चमकदार मालूम हो या वे वजनदार लगें अथवा उनमें तेज गन्ध आती हो तो इन लक्षणों से समझ लेना चाहिए कि उस स्थान पर खान है।
( २ ) परिचित पहाड़ों के गड्ढों, गुफाओं, तराइयों, पथरीले स्थानों एवं शिलाओं से ढके हुए छेदों द्वारा बहने वाले जल से, जिसका रङ्ग जामुन, आम, ताड़ का फल, पक्की हल्दी, हरताल, मैनसिल, शहद, शिंगरफ, कमल, तोता, मोर-पंख आदि के रङ्ग का हो और अपने समान रङ्ग के पानी तथा औषधि तक बहने वाले चिकने भारी जल को देखकर सोने की खान का अनुमान करना चाहिए ।
( ३ ) इस प्रकार के जल को यदि दूसरे जल में मिलाया जाय और वह तेल की तरह फैलने लगे, या निरबिसी फल के समान पानी को साफ करता हुआ नीचे
प्र० २८ : अ० १२ ] खनिज सम्बन्धी कार्य १३७
(१) तत्प्रतिरूपकमुग्रगन्धरसं शिलाजतु विद्यात् ।
(२) पीतकास्ताम्रकास्ताम्रपीतका वा भूमिप्रस्तरधातवो भिन्ना नील-राजीमन्तो मुद्गमाषकृसरवर्णा वा दधिबिन्दुपिण्डचित्रा हरिद्राहरीतकी-पद्मपत्रशैवलयकृत्प्लीहानवद्यवर्णा भिन्ना श्लक्ष्णबालुकालेखाबिन्दुस्वस्तिक-वन्तः सगुलिका अर्चिष्मन्तस्तप्यमाना न भिद्यन्ते बहुफेनधूमाश्च सुवर्ण-धातवः प्रतीवापार्थास्ताम्ररूप्यवेधनाः ।
(३) शङ्खकर्पूरस्फटिकनवनीतकपोतपारावतविमलकमयूरग्रीवावर्णाः सस्यकगोमेदकगुडमत्स्यण्डिकावर्णाः कोविदारपद्मपाटलीकलायक्षौमातसी-पुष्पवर्णाः ससीसाः साञ्जनाः विस्रा भिन्ना श्वेताभाः कृष्णाः कृष्णाभाः श्वेताः सर्वे वा लेखाबिन्दुचित्रा मृदवो ध्मायमाना न स्फुटन्ति बहुफेन-धूमाश्च रूप्यधातवः ।
(४) सर्वधातूनां गौरववृद्धौ सत्त्ववृद्धिः । तेषामशुद्धा मूढगर्भा वा
बैठ जाय अथवा सौ पल ताँबा या चांदी उसके ऊपर डालकर यदि वह उसको एक पल जल सुनहरा बना दे तो समझना चाहिए कि इस जल-स्रोत के नीचे अवश्य ही सोने की खान है।
( १ ) यदि किसी स्थान पर उसी के समान केवल तेज गन्ध या उग्र रस की संभावना हो तो समझना चाहिए कि वहाँ पर शिलाजीत का उत्पत्तिस्थान है।
( २ ) पीले या ताँबे अथवा दोनों रङ्गों की मिट्टी और पत्थर जिनके तोड़ने पर बीच में नीली रेखायें या मूंग, उड़द, तिल आदि के समान या दही के छोटे-छोटे कणों के समान छोटी-छोटी बूंदों वाला, हल्दी, हरीतकी, कमलपत्र, सेवार, यकृत, प्लीहा तथा केसर के समान या तोड़ने पर बारीक रेत की रेखाओं, बूंदों, स्वस्तिक-चिह्नों, मोटे रेत के कणों के समान, कान्ति युक्त और तपाये जाने पर न फटने वाली तथा बहुत झाग एवं धुआं देने वाली सुवर्ण धातु होती है। इस प्रकार की मिट्टी और पत्थर से ताँबा तथा चाँदी को सोना बनाया जा सकता है।
( ३ ) शंख, कपूर, स्फटिक मणि, मक्खन, जङ्गली कबूतर, पालतू कबूतर, सफेद तथा लाल रङ्ग की मणि, मयूर ग्रीवा, नील मणि, गोरोचन, गुड़, शक्कर, कचनार, कमल, पाटली, मटर, अलसी आदि के समान रङ्ग वाले, सीसा, अंजन, दुर्गन्ध से युक्त, तोड़ने पर बाहर से सफेद मालूम होने वाले किन्तु भीतर तथा बाहर से काले और भीतर से सफेद प्रतीत होने वाले अथवा हर प्रकार की रेखाओं तथा बूंदों से युक्त, मृदु, तपाये जाने पर जो फटे नहीं किन्तु बहुत झाग और धुआं उगलें, इस प्रकार की धातु रूप्यधातु कही जाती हैं।
( ४ ) इन सभी धातुओं के सम्बन्ध में यह समझना चाहिए कि उनमें जितना