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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

कण्टकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में कन्याप्रकर्म नामक बारहवाँ अध्याय समाप्त ।

प्र० ८७ : अ० १२ ] कुँवारी कन्या से सम्भोग का दण्ड ३९७

भुञ्जीत स्त्रियमन्येषां यथासम्भाषितं नरः ।
न तु राजप्रतापेन प्रमुक्तां स्वजनेन वा ॥
न चोत्तमां न चाकामां पूर्वापत्यवतीं न च ।
ईदृशीं त्वनुरूपेण निष्क्रयेणापवाहयेत् ॥

इति कण्टकशोधने चतुर्थेऽधिकरणे कन्याप्रकर्म नाम द्वादशोऽध्यायः,
आदितोऽष्टाशीतितमः ।

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परित्यक्ता रोग या मूर्च्छा से त्यागी हुई पराई स्त्रियों को, उद्धार करने वाला व्यक्ति, भोग सकता है; किन्तु राजाज्ञा या स्वजनों से त्यक्त, कुलीन, कामनारहित और बाल-बच्चों वाली स्त्रियों का, आपत्ति से बचाने पर भी; उपभोग नहीं किया जा सकता है; प्रत्युत उचित पुरस्कार प्राप्त कर ऐसी स्त्रियों को उनके घर पहुँचा दिया जाय ।

कण्टकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में कन्याप्रकर्म नामक बारहवाँ अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण ८८# अतिचारदण्डः
अध्याय १३

(१) ब्राह्मणमपेयमभक्ष्यं वा संग्रासयत उत्तमो दण्डः। क्षत्रियं मध्यमः, वैश्यं पूर्वः साहसदण्डः, शूद्रं चतुष्पञ्चाशत्पणो दण्डः।
(२) स्वयंग्रसितारो निर्विषयाः कार्याः।
(३) परगृहाभिगमने दिवा पूर्वः साहसदण्डः। रात्रौ मध्यमः। दिवा-रात्रौ वा सशस्त्रस्य प्रविशत उत्तमो दण्डः।
(४) भिक्षुकवैदेहकौ मत्तोन्मत्तौ बलादापदि चातिसन्निकृष्टाः प्रवृत्तप्रवेशाश्चादण्ड्याः। अन्यत्र प्रतिषेधात्।
(५) स्ववेश्मनो विरात्रादूर्ध्वं परिवार्यमारोहतः पूर्वः साहसदण्डः। परवेश्मनो मध्यमः। ग्रामारामवाटभेदिनश्च।


अतिचार का दण्ड

( १ ) जो व्यक्ति, किसी ब्राह्मण को अभक्ष्य या अपेय वस्तु खिलाये-पिलाये उसे उत्तम साहस दण्ड दिया जाय। यदि क्षत्रिय को खिलाये-पिलाये तो मध्यम साहस दण्ड, यदि वैश्य को खिलाये-पिलाये तो प्रथम साहस दण्ड और शूद्र को खिलाये-पिलाये तो चौवन पण दण्ड दिया जाय।

( २ ) यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि अभक्ष्य-अपेय वस्तुओं का सेवन करें तो उन्हें देश-निर्वासन का दण्ड दिया जाय।

( ३ ) जो पुरुष दिन में किसी के घर में घुसे उसे प्रथम साहस दण्ड, रात्रि में घुसे तो मध्यम साहस दण्ड और हथियार लेकर रात या दिन में प्रवेश करे तो उसको उत्तम साहस दण्ड दिया जाय।

( ४ ) भिखारी, फेरी वाले, शराबी, उन्मादी, व्यभिचारी, बंधु-बांधव और मित्र आदि एक दूसरे के घर में प्रवेश करें तो दण्डनीय नहीं हैं, बशर्ते कि उनको किसी पारिवारिक व्यक्ति ने रोका न हो।

( ५ ) यदि कोई व्यक्ति एक प्रहर रात बीत जाने पर बाहर से अपने ही घर की दीवार पर चढ़े तो उसे प्रथम साहस दण्ड दिया जाय। यदि इसी हालत में वह दूसरे के घर की दीवार पर चढ़े, और गाँव तथा बगीचों की बाड़ को तोड़े तो उसे मध्यम साहस दण्ड दिया जाय।

प्र० ८८ : अ० १३ ] अतिचार का दण्ड ३९९

(१) ग्रामेष्वन्तः सार्थिका ज्ञातसारा वसेयुः । मुषितं प्रवासितं चैषामनिर्गतं रात्रौ ग्रामस्वामी दद्यात् । ग्रामान्तेषु वा मुषितं प्रवासितं विवीताध्यक्षो दद्यात् । अविवीतानां चोररज्जुकः । तथाप्यगुप्तानां सीमावरोधविचयं दद्युः । असीमावरोधे पञ्चग्रामी दशग्रामी वा ।
(२) दुर्बलं वेश्म शकटमनुक्तबर्धमूर्ध्वस्तम्भं शस्त्रमनपाश्रयमप्रतिच्छन्नं श्वभ्रं कूपं कूटावपातं वा कृत्वा हिंसायां दण्डपारुष्यं विद्यात् ।
(३) वृक्षच्छेदने दम्यरश्मिहरणे चतुष्पदानाम्दान्तसेवने वाहने काष्ठलोष्ठपाषाणदण्डबाणबाहुविक्षेपेषु याने हस्तिना च सङ्घट्टने 'अपेहि' इति प्रक्रोशन्नदण्ड्यः ।
(४) हस्तिना रोषितेन हतो द्रोणान्नं कुम्भं माल्यानुलेपनं दन्तप्रमार्जनं च पटं दद्यात् । अश्वमेधावभृथस्नानेन तुल्यो हस्तिना वध इति पादप्रक्षालनम् । उदासीनवधे यात्तूत्तमो दण्डः ।


(१) यात्रा करते समय यदि कोई व्यापारी किसी गाँव में ठहरे तो अपने पूरे सामान की सूचना गाँव के मुखिया को दे । रात में उसकी यदि कोई चोरी हो जाय या गाँव में उसकी कोई वस्तु छूट जाय तो उस वस्तु को गाँव का मुखिया दे । यदि कोई वस्तु गाँव के बाहर छूट गई या चोरी गई हो तो उसकी पूर्ति चरागाह का अध्यक्ष (विवीताध्यक्ष) करे । यदि वहाँ पर चरागाहों की व्यवस्था न हो तो उस वस्तु को चोर पकड़ने वाले राजपुरुष (चोर-रज्जुक) अदा करें । यदि फिर भी वस्तु सुरक्षित न रह सके तो जिसकी सीमा में उसकी चोरी हुई हो वही सीमाध्यक्ष उसको दे । यदि फिर भी कोई प्रबंध न हो सके तो आस-पास के पाँच-दस गाँवों की पंचायतें उस वस्तु को ढूँढ़ कर व्यापारी को दें ।

(२) मकान की कच्ची दीवार के कारण, गाड़ी की पटरी की कमजोरी के कारण, हथियार को ठीक तरह से न रखने के कारण, गड्ढे न पूरे जाने के कारण और बिना जंगले के कुएँ के कारण यदि कोई व्यक्ति किसी की मृत्यु का कारण बन जाय तो उसे दण्डपारुष्य प्रकरण में निर्दिष्ट नियमों के अनुसार दण्ड दिया जाय ।

(३) पेड़ काटते समय, मारू जानवरों को खोलते समय, जानवरों को पहिले-पहिले सवारी में जोतते समय, अथवा दो दलों में लकड़ी, ढेला, पत्थर, बाण आदि चलते समय, हाथी की सवारी करते समय और बीच में आने से वारित करते समय यदि किसी का हाथ-टूट जाय तो किसी को दण्ड न दिया जाय ।

(४) यदि कोई व्यक्ति क्रुद्ध हाथी के चपेट में आकर मर जाय तो उसके परिवारजनों को यह आवश्यक है कि वे एक द्रोण अन्न, एक घड़ा शराब, माला, चंदन और दाँत साफ करने का वस्त्र उस हाथी को भेंट करें । क्योंकि जितना पुण्य अश्वमेध यज्ञ की समाप्ति पर पवित्र स्नान करने से होता है उतना ही पुण्य हाथी के द्वारा मारे

४०० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण

(१) शृङ्गिणा दंष्ट्रिणा वा हिंस्यमानममोक्षयतः स्वामिनः पूर्वः साहसदण्डः । प्रतिक्रुष्टस्य द्विगुणः ।
(२) शृङ्गिदंष्ट्रिभ्यामन्योन्यं घातयतस्तच्च तावच्च दण्डः ।
(३) देवपशुभृषभमुक्षाणं गोकुमारीं वा वाहयतः पञ्चशतो दण्डः । प्रवासयत उत्तमः । लोमदोहवाहनप्रजननोपकारिणां क्षुद्रपशूनामादाने तच्च तावच्च दण्डः । प्रवासने च, अन्यत्र देवपितृकार्येभ्यः ।
(४) छिन्ननस्यं भग्नयुगं तिर्यक्प्रतिमुखागतं च प्रत्यासरद्वा चक्रयुक्तं यानपशुमनुष्यसम्बाधे वा हिंसायामदण्ड्यः । अन्यथा यथोक्तं मानुषप्राणि-हिंसायां दण्डमभ्यावहेत् । अमानुषप्राणिवधे प्राणिदानं च ।
(५) बाले यातरि यानस्थः स्वामी दण्ड्यः । अस्वामिनि यानस्थः प्राप्तव्यवहारो वा याता । बालाधिष्ठितमपुरुषं वा यानं राजा हरेत् ।


जाने पर होता है; इसीलिए उक्त वस्तुओं द्वारा हाथी के पूजन का विधान बताया गया है । किन्तु यदि कोई व्यक्ति महावत की लापरवाही के कारण मारा जाय तो महावत को उत्तम साहस दण्ड दिया जाय ।

( १ ) यदि कोई स्वामी अपने सींग, खुर या दाँत वाले पशुओं द्वारा किसी व्यक्ति को मारते हुए देखकर न छुड़ाये तो उसे प्रथम साहस दण्ड दिया जाय । उस व्यक्ति के चिल्लाने पर भी यदि न छुड़ाये तो स्वामी को दुगुना दण्ड दिया जाय ।

( २ ) यदि सींग-दाँत वाले जानवर आपस में लड़कर एक-दूसरे को मार दें तो मारने वाले जानवर का मालिक मरे हुए जानवर की कीमत और उतना ही दण्ड भरे ।

( ३ ) जो कोई व्यक्ति देव निमित्त किसी पशु को, साँड़ को, बैल को या बछड़ी को हल या गाड़ी में जोते तो उस पर पाँच-सौ पण दण्ड किया जाय । यदि इन्हें कोई घर से निकाले या दूर छोड़ आवे तो उसे उत्तम साहस दण्ड दिया जाय । किन्तु उन्हें यदि किसी देवकार्य या पितृकार्य के लिए दूर छोड़ना पड़े तो कोई दोष नहीं है ।

( ४ ) यदि बैल की नाथ टूट जाय या जुआ टूट जाय अथवा जुता हुआ बैल ही तिरछा हो जाय या सामने की ओर उल्टा हो जाय या गाड़ियों एवं पशुओं की भारी भीड़ हो, ऐसे समय यदि किसी पशु को चोट पहुँच जाय तो गाड़ीवान को दोषी न समझा जाय । ऐसी स्थिति न हो और मनुष्य या पशु को कोई चोट पहुँचे तो, चोट पहुँचाने वाले को पूर्वोक्त यथोचित दण्ड दिया जाय । यदि कोई छोटा पशु दबकर मर जाय तो वही पशु लिया जाय ।

( ५ ) यदि गाड़ीवान नाबालिग हो तो उसका मालिक इन सब दण्डों को भुगते । यदि मालिक उपस्थित न हो सवारी अथवा दूसरा बालिग गाड़ीवान दण्डों को भुगते । यदि गाड़ी में बालक के अतिरिक्त कोई न हो तो राजपुरुष उसे जब्त कर लें ।

प्र० ८८ : अ० १३ ] अतिचार का दण्ड ४०१

(१) कृत्याभिचाराभ्यां यत्परमापादयेत्, तदापादयितव्यः ।
(२) कामं भार्यायामनिच्छन्त्यां कन्यायां वा दारार्थिनां भर्तरि भार्यायां वा संवननकरणम् । अन्यथा हिंसाया मध्यमः साहसदण्डः ।
(३) मातापित्रोर्भगिनीं मातुलानीमाचार्याणीं स्नुषां दुहितरं भगिनीं वाधिचरतस्त्रिलिङ्गच्छेदनं वधश्च । सकामा तदेव लभेत । दासपरिचारकाहितकभुक्ता च ।
(४) ब्राह्मण्यामगुप्तायां क्षत्रियस्योत्तमः, सर्वस्वं वैश्यस्य । शूद्रः कटाग्निना दह्येत । सर्वत्र राजभार्यागमने कुम्भीपाकः ।
(५) श्वपाकीगमने कृतकबन्धाङ्कः परविषयं गच्छेत् । श्वपाकत्वं वा शूद्रः ।
(६) श्वपाकस्यार्यागमने वधः । स्त्रियाः कर्णनासाच्छेदनम् ।
(७) प्रव्रजितागमने चतुर्विंशतिपणो दण्डः । सकामा तदेव लभेत ।


( १ ) जो व्यक्ति किसी को कृत्रिम उपायों (कृत्या) या तान्त्रिक प्रयोगों (अभिचार) द्वारा तंग करे उसे गिरफ्तार कर लिया जाय ।

( २ ) पति को न चाहने वाली स्त्री पर उसका पति, कन्या को पत्नी बनाने की इच्छा रखने वाला पुरुष और अपने पति पर उसकी पत्नी, यदि वशीकरण आदि प्रयोग करें तो अपराध न माना जाय । इनके अतिरिक्त तान्त्रिक प्रयोग करने वालों को मध्यम साहस दण्ड दिया जाय ।

( ३ ) जो पुरुष अपनी मौसी, बूआ, मामी, गुरुपत्नी, पुत्रवधू, लड़की और बहिन के साथ व्यभिचार करे उसका लिंग और अंडकोश काटकर उसको प्राणदण्ड की सजा दी जाय । यदि मासी, बूआ आदि स्वयं ऐसा करायें तो उनके दोनों स्तन काटकर और उनका भग-छेदन कर उन्हें भी प्राणदण्ड की सजा दी जाय । दास और परिचारक यदि व्यभिचार करें तो उन्हें भी यही दण्ड दिया जाय ।

( ४ ) लोक-लाज से रहने वाली ब्राह्मणी के साथ यदि क्षत्रिय व्यभिचार करे तो उसे उत्तम साहस दण्ड दिया जाय; यदि वैश्य करे तो उसकी सारी सम्पत्ति हड़प ली जाय, यदि शूद्र करे तो उसको तिनकों की आग में जला दिया जाय । राजा की स्त्री के साथ जो कोई भी व्यभिचार करे उसे तपे भाड़ में भून दिया जाय ।

( ५ ) चाण्डालिनी के साथ व्यभिचार करने वाले पुरुष के माथे पर योनि का निशान दाग कर उसे देश-निर्वासन का दण्ड दिया जाय, यदि ऐसा शूद्र करे तो उसे चाण्डाल बना दिया जाय ।

( ६ ) चांडाल यदि किसी आर्या स्त्री के साथ संभोग करे तो उसे प्राणदण्ड दिया जाय और उस पर स्त्री के नाक-कान काट दिये जाँय ।

( ७ ) संन्यासिनी के साथ संभोग करने वाले पर चौबीस पण दण्ड किया जाय,

२६ कौ०