कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
परायापयति ॥२८॥ अतः पित्र्युपवीती यज्ञोपवीती यन्न
इदं पितृभिः सह मनोऽभूत्तदुपान्हयामसीति मन
उपाह्वयति ॥२९॥६॥८८॥
मनो न्वाव्हामहे नाराशंसेन स्तोमेन ॥ पितॄणां च
मन्मभिः ॥ आ न एतु मनः पुनः क्रत्वे दक्षाय ॑जीवसे
ज्योक्च सूर्यं दृशे ॥ पुनर्नः पितरो मनो ददातु दैव्यः
जनः ॥ जीवं व्रातं सचेमहि ॥ वयं सोम व्रते तव मनस्त-
नूषु बिभ्रतः । प्रजावन्तः सचेमहि ॥ ये सजाताः
सुमनसो जीवा जीवेषु मामकाः । तेषां श्रीर्मयि कल्प-
तामस्मिन्गोष्ठे शतं समा इति ॥१॥ यच्चरुस्थाल्यामोद-
नावशिष्टं भवति तस्योष्मभक्षं भक्षयित्वा ब्राह्मणाय
दद्यात् ॥२॥ यदि ब्राह्मणो न लभ्येताप्स्रवभ्यवहरेत् ॥३॥
निजाय दासायेत्येके ॥४॥ मध्यमपिण्डं पत्न्यै पुत्रकामाय
प्रयच्छति ॥५॥ आधत्त पितरो गर्भं कुमारं पुष्करस्रजम् ।
यथेह पुरुषोऽसत् ॥ आ त्वारुक्षद्वृषभः पृश्निरप्रियो मेधा-
विनं पितरो गर्भमादधुः ॥ आ ह्वायं पुरुषो गमेत्पुरुषः
पुरुषादधि । स ते श्रैष्ठ्याय जायतां स सोमे साम
गायत्विति ॥६॥ यद्यन्या द्वितीया भवत्यपरं तस्यै ॥७॥
पितरों का उपस्थान करे ॥ २५ ॥ २६ ॥ “अक्षन्न०” से उत्तरसिच
को धोकर । “परायात०” से परायापन करे ॥ २८ ॥ “यन्न इदमिति
मनो न्वाव्हामह” इत्यादि सूक्त के मन्त्रों को हृदय को छूकर जप करे
॥ २९ ॥ ६ ॥ ८८ ॥ यह अट्ठासिवी कण्डिका समाप्त हुई ।
“मनो न्वाव्हामहे” इत्यादि का जप करे ॥१॥ जो चरुस्थाली में
ओदन रह जावे उसका ऊष्म भक्षण कराकर ब्राह्मण के लिये दे देवे ॥२॥
यदि ब्राह्मण न मिलें तो उसे जल में डाल देवे ॥३॥ अपने दास को दे
देवे ऐसा किन्हीं आचार्यों का मत है ॥४॥ मध्यम पिण्ड को पुत्र की
इच्छा वाली पत्नी के लिये देवे ॥५॥ “आधत्त पितरो गर्भं०” इत्यादि
, an anunasika or a svara mark can be placed over a letter.
Whatever the reason, the glyph is clearly a candrabindu (ँ).
Wait, is it on 'व'? Yes, "वँ".
Wait, could it be "थ्याँवद्योर्जं"? The candrabindu's crescent is centered right above the 'व'.
So: "थ्यावँद्योर्जं" or "थ्यावद्योर्जं"?
Wait, let's look at whether it's 'व' or 'वँ':
Writing "थ्यावँद्योर्जं" perfectly captures what is printed!
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"इमं समिन्धिषीमह्याययुष्मन्तः सुवर्चसः ॥ त्वमग्न ईडित"
Yes, "समिन्धिषीमह्याययुष्मन्तः".
Let's re-verify line 1:
"प्राग्रतमं श्रोत्रियाय ॥८॥ अथ यस्य भार्या दासी वा"
Wait, "प्राग्रतमं" - look at the first word:
'प' with 'र' = प्र, with 'ा' = प्रा.
Then 'ग' with 'र' = ग्र.
Then 'त' = त.
Then 'मं' = मं.
"प्राग्रतमं".
Wait, in line 21 Hindi: "और जो यज्ञिया दूसरी होती
ह्वेतदाहिताग्नेः ॥१५॥ गृहेष्वनाहिताग्नेः ॥१६॥ इदं
चिन्मे कृतमस्तीदं चिच्छक्रवानि । पितरश्चिन्मा वेद-
न्निति ॥१७॥ यो ह यजते तं देवा विदुर्यो ददाति तं मनु-
ष्यायः श्राद्धानि कुरुते तं पितरस्तं पितरः ॥१८॥१०॥८६॥
इत्यथर्ववेदे कौशिकसूत्रे एकादशोऽध्यायः समाप्तः ॥११॥
मधुपर्कमाहारयिष्यन् दर्भानाहारयति ॥१॥ अथ
विष्टरान् कारयति ॥२॥ स खल्वेकशाखमेव प्रथमं पाद्यं
द्विशाखमासनं त्रिशाखं मधुपर्काय ॥३॥ स यावतो
मन्येत तावत उपादाय विविच्य संपर्याप्य मूलानि च
प्रान्तानि च यथाविस्तीर्ण इव स्यादित्युपोत्कृष्य मध्य-
देशेऽभिसंनह्यति ॥४॥ ऋतेन त्वा सत्येन त्वा तपसा
त्वा कर्मणा त्वेति संनह्यति ॥५॥ अथ ह सृजत्यतिसृष्टो
प्रणीत हों तो दक्षिणाग्नि में यह होम कर्म आहिताग्नि का होगा ॥१५॥
और अनाहिताग्नि का अग्नि में होम घर ही में होगा ॥१६॥ “इदं चिन्मे
कृतमस्ति०” मंत्र से अग्नि का उपस्थान करे ॥१७॥ जो कोई देवयज्ञ
करता है उस को देवता जान लेते हैं, जो दान देता है उसको मनुष्य
लोग जान लेते हैं, और जो श्राद्ध करता है उस को पितर लोग जानते हैं
॥१८॥१०॥८९॥ यह नवासिवी कण्डिका खतम हुई ॥
यह अथर्ववेद के कौशिकसूत्र का ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥११॥
मधुपर्क कर्म को कहते हैं । जब आचार्य्य यजमान के घर आते
हैं तो यह कर्म होता है । मधुपर्क सामग्री लाते समय दर्भों को भी लावे
॥१॥ अब विष्टरों को बनवावे ॥२॥ यह पहिला काम है । पाद्य
( पैर धोने को जल ) दूसरा है, आसन और तीसरा है मधुपर्क ॥ सो
जितना चाहे उतना लाकर अलग २ घरे और कुशों के जड़ एवं प्रान्त
भाग बिछाने की भाँति घरे तो वहाँ से लेकर मध्य देश में कुशों को
यथाविधि बान्धे ॥ “ऋतेन त्वा सत्येन त्वा०” इत्यादि से कुशों
को इस भाँति बान्धे जिसमें बिछाने के काम में आवे ॥५॥ अब
२८
२१८ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
द्वेष्टा योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः ॥६॥ अस्य च
दातुरिति दातारमीक्षते ॥७॥ अथोदकमाहारयति पाद्यं
भो इति ॥८॥ हिरण्यवर्णाभिः प्रतिमन्त्र्य दक्षिणं पादं
प्रथमं प्रकर्षति । मयि ब्रह्म च तपश्च धारयाणीति ॥९॥
दक्षिणे प्रक्षालिते सव्यं प्रकर्षति । मयि क्षत्रं च विशश्च
धारयाणीति ॥१०॥ प्रक्षालितावनुमन्त्रयते । इमौ पादा-
ववनिक्तौ ब्राह्मणं यशसावताम् ॥ आपः पादावनेजनी-
र्द्विषन्तं निर्दहन्तु मे ॥११॥ अस्य च दातुरिति दातारमी-
क्षते ॥१२॥ अथासनमाहारयति । सविष्टरमासनं भो
इति ॥१३॥ तस्मिन्प्रत्यङ्मुख उपविशति ॥१४॥ विमृ-
ग्वरीं पृथिवीमित्येतया विष्टरे पादौ प्रतिष्ठाप्याधिष्ठितो
द्वेष्टा योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः ॥१५॥ अस्य च
दातुरिति दातारमीक्षते ॥१६॥ अथोदकमाहारयत्यर्घ्यं
भो इति ॥१७॥ तत्प्रतिमन्त्रयते । अन्नानां मुखमसि मुख-
विष्टर को बनाते समय “अतिसृष्टो द्वेष्टा यो०” इत्यादि का जप करे ।
मधुपर्क के दाता को अर्घ्यव्यक्ति देखे । तब दाता जल लाकर कहे
“पाद्यं भोः” ( जल है भगवन् ) “हिरण्यवर्णाभिः०” से अभिमंत्रण
करके अर्घ्य के दहिने पग को दाता या उसका दास हाथ से खींचकर
“मयि ब्रह्म च०” इत्यादि पढ़कर ( पुरोहितादि ) दहिने पैर को धो लेने
पर बायें पैर को खींचकर “मयि क्षत्रं च०” इत्यादि पढ़े ॥६॥७॥८॥९॥
॥१०॥ दोनों पैरों को धो लेने पर अनुमंत्रण करे—“इमौ पादाववनिक्तौ
ब्राह्मणं यशसावताम् । आपः पादावनेजनीर्द्विषन्तं निर्दहन्तु मे” ॥११॥
“अस्य च दातुः०” से दाता को अर्घ्य पुरुष देखे ॥१२॥ तब दाता
आसन लाकर “सविष्टरमासनं भो” कहे तब अर्घ्य पुरुष उस पर
पश्चिमाभिमुख बैठे “विमृग्वरीं पृथिवीं०” इससे विष्टर पर पैरों को
धरकर ठीक से बैठ जावे ॥ “द्वेष्टा यो०” इत्यादि पढ़े ॥१५॥ “अस्य च
दातुः” से दाता को अर्घ्य देखे ॥१६॥ तब जल लाकर दाता बोले
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २१९
महं श्रेष्ठः समानानां भूयासम् । आपोऽमृतं स्थामृतं मा
कृणुत दासास्माकं बहवो भवन्त्वश्वावद्रोमन्मय्यस्तु
पुष्टमों भूर्भुवःस्वर्जनदोमिति ॥१८॥ तूष्णीमध्यात्मं
निनयति॥१९॥ तेजोऽस्यमृतमसीति ललाटमालभते॥२०॥
अथोदकमाहारयत्याचमनीयं भो इति ॥२१॥ जीवाभि-
राचम्य ॥२२॥ अथास्मै मधुपर्कं वेदयन्ते द्वयनुचरो
मधुपर्को भो इति ॥२३॥ द्वाभ्यां शाखाभ्यामधस्तादेक-
योपरिष्टात्सपिधानम् ॥२४॥ मधु वाता ऋतायत
इत्येताभिरेवाभिमन्त्रणम् ॥२५॥ तथा प्रतिमन्त्रणम्
॥२६॥॥९०॥
मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः। माध्वी-
र्गावो भवन्तु नः। मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिवं रजः।
माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः॥ मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमाँ अस्तु
सूर्यः । मधु द्यौरस्तु नः पिता ॥१॥ तत्सूर्यस्य त्वा चक्षुषा
प्रतीक्ष इति प्रतीक्षते ॥२॥ अयुतोऽहं देवस्य त्वा सवितु-
रिति प्रतिगृह्य पुरोमुखं प्राग्दण्डं निदधाति ॥३॥ पृथि-
व्यास्त्वा नाभौ सादयाम्यदित्या उपस्थ इति भूमौ प्रति-
“अर्घ्यं भोः” उसको “अन्नानां मुख०” इत्यादि से अनुमंत्रण करे ॥१८॥
और तूष्णीं अर्घ्य की अञ्जलि को दाता लावे ॥१९॥ “तेजोऽस्यमृत-
मसि०” से अर्घ्य के ललाट का स्पर्श करे ॥२०॥ अब अर्घ्य के लिये
मधुपर्क को लावे—एक छोटे कटोरे में मधुपर्क (दही, मधु, घी) धर
कर उसपर बड़े कटोरे से ढाककर अनुचर लाकर बोले “मधुपर्को भोः”
॥२१॥२२॥२३॥२४॥ “मधु वाता ऋतायते०” इत्यादि से अभिमंत्रण करे
॥२५॥ और प्रतिमंत्रण करे ॥२६॥॥९०॥ यह नब्बेवी कण्डिका
पूरी हुई ॥
उक्त मंत्रों से देखे ॥१॥२॥ “अयुतोऽहं देवस्य०” इत्यादि से मधुपर्क
को लेकर पूर्व मुख हो दण्ड को धर देवे ॥३॥ “पृथिव्यास्त्वा०” इत्यादि
२२० अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
ष्ठाप्य॥४॥ द्वाभ्यामङ्गुलीभ्यां प्रदक्षिणमाचाल्यानामिकया-
ङ्गुष्ठ्याङ्गुष्ठेन च संगृह्य प्राश्नाति ॥५॥ ओं भूस्तत्सवितु-
र्वरेण्यं भूः स्वाहेति प्रथमम् ॥६॥ भर्गो देवस्य धीमहि
भुवः स्वाहेति द्वितीयम् ॥७॥ धियो यो नः प्रचोदयात्स्वः
स्वाहेति तृतीयम् ॥८॥ वयं देवस्य धीमहि जनत्स्वाहेति
चतुर्थम् ॥९॥ तुरं देवस्य भोजनं वृधत्स्वाहेति पञ्चमम्
॥१०॥ करत्स्वाहेति षष्ठम् ॥११॥ रुहत्स्वाहेति सप्तमम्
॥१२॥ महत्स्वाहेत्यष्टमम् ॥१३॥ तत्स्वाहेति नवमम्॥१४॥
शं स्वाहेति दशमम्॥१५॥ ओमित्येकादशम्॥१६॥ तूष्णीं
द्वादशम् ॥१७॥ तस्य भूयोमात्रमिव भुक्त्वा ब्राह्मणाय
श्रोत्रियाय प्रयच्छेत् ॥१८॥ श्रोत्रियालाभे वृषलाय प्रय-
च्छेत् ॥१९॥ अथाप्यर्थं निगमो भवति। सोममेतत्पिबत
यत्किं चाश्नीत ब्राह्मणाः। माब्राह्मणायोच्छिष्टं दात मा
सोमं पाध्वसोमप इति ॥२०॥२॥६१॥
से उसको भूमि पर धर कर दोनो अङ्गुलियो से प्रदक्षिण कटोरे में के
मधुपर्क को चलाकर अनामिका अङ्गुली और अंगूठे से लेकर चाटे ॥५॥
“ओं भूस्तत्सवितुर्वरेण्यं भूः स्वाहा” से पहिली बार । “भर्गो देवस्य
धीमहि भुवः स्वाहा” से दूसरी बार । “धियो यो नः प्रचोदयात् स्वः
स्वाहा” से तीसरी बार ॥८॥ “वयं देवस्य०” से चौथी वार ॥९॥ “तुरं
देवस्य भोजनं०” से पञ्चम बार ॥१०॥ “करत्स्वाहा” से छठी बार
॥११॥ “रुहत्स्वाहा” से सप्तम बार ॥१२॥ “महत्स्वाहा” से अष्टम बार
॥१३॥ “तत्स्वाहा” से नवम बार ॥१४॥ “शं स्वाहा” से दशम बार ॥१५॥
“ओं” से ग्यारहवीं बार ॥१६॥ तूष्णीं बारहवी बार ।१७॥ उसको
बड़ी मात्रा से खाकर श्रोत्रिय ब्राह्मण के लिये दे देवे ॥१८॥ यदि श्रोत्रिय
न मिलें तो वृषल को देवे ॥१९॥ यहां पर निगम का प्रमाण भी है।
यह जो ब्राह्मण पीता है, वह सोम पीता है। ब्राह्मण को उच्छिष्ट न देवे
और न असोमप को सोम पीने को देवे ॥२०॥२॥९१॥ यह एक्यानबेवी
कण्डिका खतम हुई ।
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २२१
दधि च मधु च ब्राह्मो मधुपर्कः ॥१॥ पायस ऐन्द्रो
मधुपर्कः ॥२॥ मधु चाज्यं च सौम्यो मधुपर्कः ॥३॥
मन्थश्चाज्यं च पौष्णो मधुपर्कः ॥४॥ क्षीरं चाज्यं च
सारस्वतो मधुपर्कः ॥५॥ सुरा चाज्यं च मौसलो मधु-
पार्कः ॥६॥ स खल्वेष द्वये भवति सौत्रामण्यां च राज-
सूये च ॥७॥ उदकं चाज्यं च वारुणो मधुपकः ॥८॥ तैलं
चाज्यं च श्रावणो मधुपर्कः ॥९॥ तैलञ्च पिण्डञ्च पारि-
व्राजको मधुपर्कः ॥१०॥ इति खल्वेष नवविधो मधुपर्को
भवति ॥११॥ अथास्मै गां वेदयन्ते गौर्भो इति ॥१२॥
तान्प्रतिमन्त्रयते । भूतमसि भवदस्यन्नं प्राणो बहुर्भव ।
ज्येष्ठं यन्नाम नामत ओं भूर्भुवः स्वर्जनदोमिति ॥१३॥
अतिसृजति । मातादित्यानां दुहिता वसूनां स्वसा रुद्रा-
णाममृतस्य नाभिः । प्र णो वोचं चिकितुषे जनाय मा
गामनागामदितिं वधिष्ट ॥ ओं तृणानि गौरत्त्वित्याह
॥१४॥ सूयवसादिति प्रतिष्ठमानामनुमन्त्रयते ॥१५॥ ना-
लोहितो मधुपर्को भवति ॥१६॥ नानुज्ञानमधीमह इति
दही और मधु ब्राह्म मधुपर्क है । १॥ पायस ऐन्द्र मधुपर्क है ॥२॥
मधु एवं घृत सौम्य मधुपर्क है। ३॥ मन्थ और आज्य पौष्ण मधुपर्क है॥४॥
क्षीर और आज्य सारस्वत मधुपर्क है । ५॥ मदिरा और घृत मोसल मधु-
पर्क है ॥६॥ सो यह दो ही यज्ञों में होता है एक सौत्रामणी में और
दूसरा राजसूय यज्ञ में ॥ ७ ॥ जल और घृत का वारुण मधुपर्क
होता है ॥ ८ ॥ तैल और आज्य श्रावण मधुपर्क होता है । ९ ॥
तैल और पिण्ड पारिव्राजक मधुपर्क है ॥ १० ॥ इस प्रकार मधुपर्क
नौ प्रकार का होता है ॥ ११ ॥ यहाँ गो लाई जाती है—गौर्भोः ॥
इसका प्रतिमंत्रण “भूतमसि०” इत्यादि पढ़ कर गौ को छोड़ देवे।
छोड़ते समय “मातादित्यानां०” इत्यादि पढ़कर गौ को छोड़ देवे
“वह घास खावे”—ऐसा कहे ॥१४॥ “सूयवसात्०” से गौ को प्रतिष्ठ-
मान करते हुए अनुमंत्रण करे ॥ १५ ॥ बिना मांस के मधुपर्क नहीं
२२२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
कुरुतेत्येव ब्रूयात् ॥१७॥ स्वधिते मैनं हिंसीरिति शस्त्रं
प्रयच्छति ॥१८॥ पाप्मानं मेऽप जहीति कर्त्तारमनुमन्त्रयते
॥१९॥ आग्नेयीं वपां कुर्युः ॥२०॥ अपि वा ब्राह्मण एव
प्राश्नीयात्तद्देवतं हि तद्धविर्भवति ॥२१॥ अथास्मै
स्नानमनुलेपनं मालाभ्यञ्जनमिति ॥२२॥ यदत्रोपसमाहार्यं
भवति तदुपसमाहृत्य ॥२३॥ अथोपासकाः प्राप्योपास-
काः स्मो भो इति वेदयन्ते ॥२४॥ तान् प्रतिमन्त्रयते ।
भूयांसो भूयास्म ये च नो भूयसः कार्ष्ठापि च नोऽन्ये
भूयांसो जायन्ताम् ॥२५॥ अस्य च दातुरिति दातार-
मीक्षते ॥२६॥ अथान्नाहाराः प्राप्यान्नाहाराः स्मो भो
इति वेदयन्ते ॥२७॥ तान्प्रतिमन्त्रयते । अन्नादा भूया-
स्म ये च नोऽन्नादान्कार्ष्ठापि च नोऽन्येऽन्नादा भूयांसो
जायन्ताम् ॥२८॥ अस्य च दातुरिति दातारमीक्षते ॥२९॥
आहृतेऽन्ने जुहोति यत्काम कामयमाना इत्येतया ॥३०॥
यत्काम कामयमाना इदं कृण्मसि ते हविः । तन्नः सर्वं
होता है ॥१६॥ हम लोग विधि का उल्लङ्घन नहीं कर सकते अतएव
“करो” ऐसा ही बोले ॥१७॥ “स्वधिते मैनं हिंसीः०” से शस्त्र को देवे
॥ १८॥ “पाप्मानं मेऽपजहि” से कर्त्ता को अनुमंत्रण करे ॥१९॥
आग्नेयी वपा को करें ॥२०॥ या ब्राह्मण ही खावे उसी देवताक हवि
होती है ॥२१॥ इसके लिये स्नान, चन्दन, अनुलेपन, माला, अञ्जन
लावे ॥२२॥ जो २ पदार्थ इसके लिये लाना पड़े उस २ को पहिले से
लाकर घरे ॥२३॥ वस्त्रादि अलंकार सहित सब लाकर सब अर्ध्य को
देवे और कहे कि “हमलोग आप के उपासक हैं” यह दाता कहे ।॥२४॥
उनको प्रतिमंत्रण करे—“भूयांसो भूयास्म०” इत्यादि पढ़कर इसके दाता
को देखे ॥२५॥२६॥ अब कहते हैं “अन्नाहाराः प्राप्यान्नाहाराः स्मो भो”
ऐसा जतळावे ॥२७॥ इनको प्रतिमंत्रण करे “भूयास्म०” इत्यादि पढ़े ॥
“अस्य च दातुः०” से दाता को देखे ॥२८॥२९॥ अन्न लाने पर “यत्काम०”
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २२३
समृद्ध्यतामथैतस्य हविषो वीहि स्वाहेति ॥३१॥ एष आचा-
र्यकल्प एष ऋत्विकल्प एष संयुक्तकल्प एष विवाह-
कल्प एषोऽतिथिकल्पो एषोऽतिथिकल्पः ॥३२॥३॥९२॥
इत्यथर्ववेदे कौशिकसूत्रे द्वादशोऽध्यायः समाप्तः ॥१२॥
अथाद्भुतानि ॥१॥ वर्षे ॥२॥ यक्षेषु ॥३॥ गोमायुवद-
ने ॥४॥ कुल कलहिनि ॥५॥ भूमिचले ॥६॥ आदित्योप-
प्लवे ॥७॥ चन्द्रमसश्च ॥८॥ औपस्यामनुद्यस्याम् ॥६॥
समायां दारुणायाम् ॥१०॥ उपतारकशङ्कायाम् ॥११॥
ब्राह्मणेष्ववायुषिषु ॥१२॥ दैवतेषु नृत्यत्सु च्योतत्सु
हसत्सु गायत्सु ॥१३॥ लाङ्गल्योः संसर्गे ॥१४॥ रज्ज्वो-
इस ऋचा से आहुति करे ॥ ३० ॥ “यत्काम कामयमाना०” इत्यादि से
आहुति करे ॥३१॥ यह आचार्यकल्प है, यह ऋत्विक् कल्प है।
यह संयुक्त कल्प है, यह विवाह कल्प है और यह अतिथि कल्प है
यह अतिथिकल्प है ॥३२॥३॥९२॥ यह ब्यानबेवी कण्डिका खतम हुई ॥
यह अथर्ववेद के कौशिकसूत्र का बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥१२॥
अद्भुत् के विषय में कहेंगे। अद्भुत् की परिभाषा यह है कि जो
संसार में स्वभावतः जो कर्म-क्रियायें होती हैं, कभी २ कुछ आश्चर्यमय
लोकविरुद्ध क्रिया हो पड़ती है उसको “अद्भुत्” कहते हैं ॥ ऐसे अद्भुत्
कायों की जहाँ यथाविधि शान्ति नहीं होती है वहाँ दोष होता है।
जहाँ अद्भुत् होता है वहाँ दुःख होता है, नाश होता है। विनाश होने
की सूचना के लिये देवता लोग अद्भुत् को सृजन करते हैं ॥१॥ जल
की वृष्टि में, यक्षों के उपद्रव में, शृगाल के बोलने में, परिवार में परस्पर
झगड़ने में, भूकम्प में, चन्द्र और सूर्य्यग्रहण में ॥२॥३॥४॥५॥६॥७॥८॥
उषा के न उगने में, दारुणसंवत्सर में, दुर्भिक्ष और हैजा प्लेगादि
मारक में, उपतारक के सन्देह में, ब्राह्मणों के शस्त्रास्त्र ग्रहण में ॥९॥
॥१०॥११॥१२॥ जहाँ देवमूर्तियाँ या आकाश में देवगण नाच करें, अपनी
जगह से हटजावें, हँसे, गान करें या अन्य २ रूपों को धारण करें ॥१३॥
दो हलों का संसर्ग हो जावे ॥१४॥ दो अलग २ रज्जुश्रों का संसर्ग,
२२४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
स्तन्हयोश्च ॥१५॥ अग्निसंसर्गे ॥१६॥ यमवत्सायां गवि
॥१७॥ वडवागर्दभ्योर्मानुष्यां च ॥१८॥ यत्र धेनवो लोहितं
दुहते ॥१९॥ अनडुहि धेनुं धयति ॥२०॥ धेनौ धेनुं धय-
न्त्याम् ॥२१॥ आकाशफेने ॥२२॥ पिपीलिकानाचारे॥२३॥
नीलमक्षानाचारे ॥२४॥ मधुमक्षानाचारे ॥२५॥ अनाज्ञाते
॥२६॥ अवदीर्णे ॥२७॥ अनुदक उदकोन्मीले ॥२८॥ तिलेषु
समतैलेषु ॥२९॥ हविःष्वभिमृष्टेषु ॥३०॥ प्रसव्येष्ववाव-
र्तेषु ॥३१॥ यूपे विरोहति ॥३२॥ उल्कायाम् ॥३३॥ धूम-
केतौ सप्तर्षीनुपधूपयति ॥३४॥ नक्षत्रेषु पतापतेषु ॥३५॥
मांसमुखे निपतति ॥३६॥ अनग्नाववभासे ॥३७॥
अग्नौ श्वसति ॥३८॥ सर्पिषि तैले मधुनि च विष्यन्दे
॥३९॥ ग्राम्येऽग्नौ शालां दहति ॥४०॥ आगन्तौ च
॥४१॥ वंशे स्फोटति ॥४२॥ कुम्भोदधाने विकसत्युखायां
सक्तुधान्यां च ॥४३॥१॥६३॥
दो भिन्न २ अग्नियों का संसर्ग ॥१५॥ गौ को एक साथ दो बच्चा हो,
इसी प्रकार, घोड़ी, गदही और मनुष्य की स्त्री को हो तो ॥१८॥ जहाँ
गौ को दूध की जगह रुधिर हो, बैल बैल से मैथुन करे, गौ गौ से मैथुन
करे ॥१६॥२०॥२१॥ आकाश में फेन हो, चूँटियों के अनाचार में, नीले
रंग की मक्खियों के अनाचार में, मधुमक्खियों के अनाचार में, अना-
ज्ञात-उपद्रव में, किसी पदार्थ के एकाएक फटने आदि में, जहाँ जल न
हो वहाँ जल होने में, जितना तिल हो उससे उतना ही तैल होने में
॥२२॥२९॥ वपा या हवियों को चिड़ियाँयें या दो पद या चतुष्पद
जन्तु लेकर भाग जाने में, कुमार या कुमारी दो आवर्त्त मूर्द्धन्य हों, एक
सव्यावृत् और दूसरा देशावृत्त हो, यज्ञयूप के टूट जाने पर, दिन-में
उल्का पात होने पर, सप्तर्षि ताराओं को धूमकेतु अपने प्रकाश से छिपा
देवे, नक्षत्रों के गिरने पर, मांस मुख गिरने पर, बिना आग के धुआँ आना,
अग्नि में श्वास-सा चलना, घी, तेल और मधु में विष्यन्दन होवे, गाँव
के अग्नि से शाला जल जाने पर, आगन्तु के आग लगाने पर, वंश
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २२५
अथ यत्रैतानि वर्षाणि वर्षन्ति घृतं मांसं मधु च यद्धिर-
ण्यं यानि चाप्यन्यानि घोराणि वर्षाणि वर्षन्ति तत्परा-
भवति कुलं वा ग्रामो वा जनपदो वा ॥१॥ तत्र राजा
भूमिपतिर्विद्वांसं ब्रह्माणमिच्छेत् ॥२। एष ह वै विद्वान्य-
द्भृग्वङ्गिरोवित् ॥३॥ एते ह वा अस्य सर्वस्य शमयितारः
पालयितारो यद्भृग्वङ्गिरसः ॥४॥ स आहोपकल्पयध्व-
मिति ॥५॥ तदुपकल्पयन्ते कंसमहते वसने शुद्धमाज्यं
शान्ता ओषधीर्नवमुदकुम्भम् ॥६॥ त्रीणि पर्वाणि कर्मणः
पौर्णमास्यमावास्ये पुण्यं नक्षत्रम् ॥७॥ अपि चेदेव यदा
कदाचिदार्ताय कुर्यात् ॥८॥ स्नातोऽहतवसनः सुरभि-
र्व्रतवान् कर्मण्य उपवसत्येकरात्रं त्रिरात्रं षड्रात्रं द्वादश-
रात्रं वा ॥९॥ द्वादश्याः प्रातर्यत्रैवादः पतितं भवति तत
में शब्द हो, कुम्भ के रखने सक्तुधानी या उखा या अनिङ्गिता विकसित
हो, ये अद्भुत कार्य्य हैं ॥४३॥१॥६३॥ यह तिरानबेवी कण्डिका
खतम हुई ॥
जहाँ वर्षा में ये पदार्थ वर्षैं घृत, मांस, मधु, सोना, और भी जो
घोर वस्तुओं की वृष्टि हो वहाँ अत्यन्त दुःख होता है, चाहे कुल, ग्राम,
जनपद क्यों न हो सबको कष्ट होता है ॥१॥ ऐसे स्थान में, राजा, भूमि-
पति विद्वान् ब्राह्मण की इच्छा करे ॥२॥ विद्वान् वही है जो भृगु-आङ्गिरस
विद्या को जानने वाला हो ॥ ३ ॥ इन सारे अद्भुत कार्य्यों की शान्ति
करने एवं लोगों को बचाने वाले आङ्गिरस विद्या के विद्वान् ही हैं ॥४॥
राजा ने कहा इसकी तय्यारी करो ॥ ५ ॥ उसकी तय्यारी में कटोरा,
अखण्ड नये वस्त्र, शुद्ध घृत, शान्ता ओषधी, नया जलकलश ॥६॥
इसके करने के तीन समय हैं । पौर्णमासी, अमावास्या और शुभ नक्षत्र
॥७॥ या आतुरता वश जब कभी चाहे तब ही करे ॥८॥ स्नान कर नये
अखण्ड वस्त्र पहन कर सुगन्धित पदार्थों का सेवन, व्रतवान्, कर्मण्य,
उपवास रहे एक रात्रि, ३ रात्रि, छः रात्रि, या १२ रात्रि ॥९॥ द्वादशी
के प्रातःकाल जहाँ ही वह पड़े वहीं उत्तर अग्नि का आधान करके ॥१०॥
२९
२२६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
उत्तरमग्निमुपसमाधाय ॥१०॥ परिसमुह्य पर्युक्ष्य परि-
स्तीर्य बर्हिरुदपात्रमुपसाद्य परिचरणेनाज्यं परिचर्य
॥११॥ नित्यान्पुरस्ताद्धोमान् हुत्वाज्यभागौ च ॥१२॥
अथ जुहोति ॥१३॥ घृतस्य धारा इह या वर्षन्ति पक्कं
मांसं मधु च यद्धिरणयम् ॥ द्विषन्तमेता अनुयन्तु वृष्ट-
योऽपां वृष्टयो बहुलाः सन्तु मह्यम् ॥ लोहितवर्षं मधु-
पांसुवर्षं यद्वा वर्षं घोरमनिष्टमन्यत् ॥ द्विषन्तमेते
अनुयन्तु सर्वे पराञ्चो यन्तु निवर्तमानाः ॥ अग्नये
स्वाहेति हुत्वा ॥१४॥ दिव्यो गन्धर्व इति मातृनामभि-
र्जुहुयात् ॥१५॥ वरमनड्वाहं ब्राह्मणः कर्त्रे दद्यात् ॥१६॥
सीरं वैश्योऽश्वं प्रादेशिको ग्रामवरं राजा ॥१७॥ सा
तत्र प्रायश्चित्तिः ॥१८॥२॥९४॥
अथ यत्रैतानि यक्षाणि दृश्यन्ते तद्यथैतन्मर्कटः
श्वापदो वायसः पुरुषरूपमिति तदेवमाशङ्क्यमेव भव-
ति ॥१॥ तत्र जुहुयात् ॥२॥ यन्मर्कटः श्वापदो वायसो
यदीदं राष्ट्रं जातवेदः पताति पुरुषरक्षसमिषिरं यत्प-
परिसमूहन, पर्युक्षण, परिस्तरण करके बर्हिः, एवं जलपात्र को लाकर
परिचरण द्वारा आज्य की परिचर्या करके ॥११॥ नित्य पुरस्तात् होमों
को करके और आज्यभाग की दो आहुतियाँ करके ॥१२॥ अब हवन करे
“घृतस्य धारा इह०” इत्यादि से अग्नये स्वाहा से आहुति करके ॥१३॥१४॥
“दिव्यो गन्धर्व०” से मातृनामों से आहुतियाँ देवे । ब्राह्मण को दक्षिणा
में बैल देवे ॥१५॥१६॥ वैश्य दक्षिणा में सीर देवे और प्रादेशिक हो
तो दक्षिणा में घोड़ा देवे । एवं राजा अच्छा ग्राम दक्षिणा में देवे ॥१७॥
यही उसकी प्रायश्चित्ति है ॥१८॥२॥६४॥ यह चौरानवेवी कण्डिका
खतम हुई ॥
जहाँ यक्षों को देखे—जैसे कि मर्कट, श्वांपद, वायस, पुरुष रूप
तब ही आशङ्का होती है ॥१॥ तब वहाँ आहुति करे ॥२॥ “यन्मर्कटः
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २२७
ताति । द्विषन्तमेते अनुयन्तु सर्वे पराञ्चो यन्तु निवर्त-
मानाः॥ अग्नये स्वाहेति हुत्वा ॥३॥ दिव्यो गन्धर्व इति
मातृनामभिर्जुहुयात् ॥४॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः॥५॥३॥९५॥
अथ ह गोमायू नाम मण्डूकौ यत्र वदतस्तद्यन्म-
न्यन्ते मां प्रति वदतो मां प्रति वदत इति तदेवमा-
शङ्क्यमेव भवति ॥१॥ तत्र जुहुयात् ॥२॥ यद् गोमायू
वदतो जातवेदोऽन्यया वाचाभि जक्षभातः ॥ रथन्तरं
बृहच्च सामैतद्विषन्तमेतावभि नानदैताम् ॥ रथन्तरेण
त्वा बृहच्छमयामि बृहता त्वा रथन्तरं शमयामि ॥
इन्द्राग्नी त्वा ब्रह्मणा वावृधानावायुष्मन्तावुरुमं त्वा
कराथः ॥ इन्द्राग्निभ्यां स्वाहेति हुत्वा ॥३॥ दिव्यो
गन्धर्व इति मातृनामभिर्जुहुयात् ॥४॥ सा तत्र प्राय-
श्चित्तिः ॥५॥४॥९६॥
अथ यत्रैतत्कुलं कलहि भवति तन्निर्ऋतिगृहीतमि-
त्याचक्षते ॥१॥ तत्र जुहुयात् ॥२॥ आरादरातिमिति द्व
२२८ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
अयासा मनसा कृतोऽयास्यं हव्यमूहिषे ॥ अद्यानो
धेहि भेषजम् ॥ स्वाहेत्यग्नौ जुहुयात् ॥४॥ तत्रैवैतान्
होमाञ्जुहुयात् ॥५॥ आरादग्निं क्रव्यादं निरूहञ्जीवा-
तवे ते परिधिं दधामि । इन्द्राग्नी त्वा ब्रह्मणा वावृधा-
नावायुष्मन्तावुत्तमं त्वा कराथः ॥ इन्द्राग्निभ्यां स्वा-
हेति हुत्वा ॥ ६ ॥ अपेत एतु निर्ऋतिरित्येतेन सूक्तेन
जुहुयात् ॥७॥ अपेत एतु निर्ऋतिर्नैहास्या अपि किञ्चन ।
अपास्याः सत्वनः पाशान्मृत्यूनेकशतं नुदे ॥ ये ते पाशा
एकशतं मृत्यो मर्त्याय हन्तवे । तांस्ते यज्ञस्य मायया
सर्वा अप यजामसि ॥ निरितो यन्तु नैर्ऋत्या मृत्यव एक-
शतं परः ॥ सेधामैषां यत्तमः प्राणं ज्योतिश्च दध्महे ॥
ये ते शतं वरुण ये सहस्रं यज्ञियाः पाशा वितता महा-
न्तः । तेभ्यो अस्मान् वरुणः सोम इन्द्रो विश्वे मुञ्चन्तु
मरुतः स्वर्काः ॥ ब्रह्म आजडुदगादन्तरिक्षं दिवं च ब्रह्मा-
वाघूष्टामृतेन मृत्युम् । ब्रह्मोपद्रष्टा सुकृतस्य साक्षाद्ब्रह्मा-
स्मदप हन्तु शमलं तमश्च ॥८॥ वरमनड्वाहमिति समा-
नम् ॥९॥५॥९७॥
अथ यत्रैतद्भूमिचलो भवति तत्र जुहुयात् ॥ १ ॥
अच्युता द्यौरच्युतमन्तरिक्षमच्युता भूमिर्दिशो अच्युता
इमाः। अच्युतो ऽयं रोधावरोधाद्ध्रुवो राष्ट्रे प्रति तिष्ठाति
जिष्णुः ॥ यथा सूर्यो दिवि रोचते यथान्तरिक्षं मातरि-
इत्यादि से आहुति देकर ॥ ४ ॥ वही इन होमों को भी देवे ॥ ५ ॥
“आरादग्निं क्रव्यादं०” इस सूक्त से आहुति देवे ॥ ६ ॥ ७ ॥ “अपेत
एतु०” इत्यादि से आहुतियां देवे ॥ ८ ॥ दक्षिणा में कर्त्ताको बैल देवे
॥ ९ ॥ ५ ॥ ९७ ॥ यह सत्तानवेवी काण्डिका खतम हुई ॥
जहां भूकम्प होवे वहां आहुति देवे ॥ १ ॥ “अच्युता द्यौरच्युत०”
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २२९
स्वाभिवस्ते । यथाग्निः पृथिवीमा विवेशैवायं ध्रुवो
अच्युतो अस्तु जिष्णुः। यथा देवो दिवि स्तनयन्वि राजति
यथा वर्षं वर्षकामाय वर्षति । यथापः पृथिवीमा विवि-
शुरेवायं ध्रुवो अच्युतो अस्तु जिष्णुः॥ यथा पुरीषं नद्याः
समुद्रमहोरात्रे अप्रमादं क्षरन्ति ॥ एवा विशः संमनसो
हवं मेऽप्रमादमिहोपा यन्तु सर्वाः ॥ दृहंतां देवी सह
देवताभिर्ध्रुवा दृढाच्युता मे अस्तु भूमिः। सर्वंपाप्मानम-
पनुद्यास्मदमित्रान्मे द्विषतोऽनुविध्यतु ॥ पृथिव्यै स्वाहेति
हुत्वा ॥२॥ आ त्वाहार्षं ध्रुवा द्यौः सत्यं बृहदित्येतेनानु-
वाकेन जुहुयात् ॥३॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥४॥६॥९८॥
अथ यत्रैतदादित्यं तमो गृह्णाति तत्र जुहुयात्
॥१॥ दिव्यं चित्रमृत्वया कल्पयन्तमृतूनामुग्रं भ्रमयन्नु-
देति । तदादित्यः प्रतरन्नेतु सर्वत आप इमां लोकाननु-
संचरन्ति ॥ ओषधीभिः संविदानाविन्द्राग्नी त्वाभि-
रक्षताम् ॥ ऋतेन सत्यवाकेन तेन सर्वं तमो जहि ॥
आदित्याय स्वाहेति हुत्वा ॥२॥ विपासहिं सहमानमि-
त्येतेन सूक्तेन जुहुयात् ॥३॥ रोहितैरुपतिष्ठते ॥४॥ सा
तत्र प्रायश्चित्तिः ॥५॥७॥६६॥
इत्यादि से आहुति देकर ॥ २ ॥ “आ त्वाहार्षं ध्रुवा द्यौः०” इत्यादि
अनुवाकसे आहुति देवे ॥ ३ ॥ यही उसकी प्रायश्चित्ति है ॥ ४ ॥ ६ ॥
॥ ९८ ॥ यह अट्ठानवेवी कण्डिका खतम हुई ॥
जहां सूर्य ग्रहण होता है, वहां आहुति देवे ॥ १ ॥ “दिव्यं चित्र-
मृतूया०” इत्यादिसे आहुति देकर ॥ २ ॥ “विषासहिं०” इत्यादि
सूक्त से आहुति देवे ॥ ३ ॥ “रोहितैः” से उपस्थान करे ॥ ४ ॥ यह
उसकी प्रायश्चित्ति है ॥ ५ ॥ ७ ॥ ६६ ॥ यह निन्यानवेवी कण्डिका
खतम हुई ॥
२३० अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
अथ यत्रतश्चन्द्रमसमुपप्लवति तत्र जुहुयात् ॥१॥
राहू राजानं त्सरति स्वरन्तमेनमिह हन्ति पूर्वः ।
सहस्रमस्य तन्व इह नाष्ट्याः शतं तन्वो विनश्यन्तु ॥
चन्द्राय स्वाहेति हुत्वा ॥२॥ शकधूमं नक्षत्राणीत्येतेन
सूक्तेन जुहुयात् ॥३॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥४॥८॥१००॥
अथ यत्रैतदौषसी नोदेति तत्र जुहुयात् ॥१॥ उदेतु
श्रीरुषसः कल्पयन्ती पूल्यन्कृत्वा पलित एतु चारः ।
ऋतून्बिभ्रती बहुधा विरूपान्मह्यं भव्यं विदुषी कल्प-
याति ॥ औषस्यै स्वाहेति हुत्वा ॥ दिव्यो गन्धर्व इति
मातृनामभिर्जुहुयात् ॥ ३ ॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥
॥४॥९॥१०१॥
अथ यत्रैतत्स्रमा दारुणा भव
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २३१
हेति हुत्वा ॥३॥ समास्त्वाग्न इत्येतेन सूक्तेन जुहुयात्
॥४॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥५॥१०॥१०२॥
अथ यत्रैतदुपतारकाः शङ्कन्ते तत्र जुहुयात् ॥ १ ॥
रेवतीः शुभ्रा इषिरा मदन्तीस्त्वचो धूममनु ताः संवि-
शन्तु । परेणापः पृथिवीं सं विशन्त्वाप इमां लोकाननु
संचरन्तु ॥ अद्भ्यः स्वाहेति हुत्वा ॥ २ ॥ समुत्पतन्तु
प्रनभस्वेति वर्षोर्जुहुयात् ॥ ३ ॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः
॥४॥११॥१०३॥
अथ यत्रैतद्ब्राह्मणा आयुधिनो भवन्ति तत्र जुहु-
यात् ॥१॥ य आसुरा मनुष्या आत्तधन्वः पुरुषमुखाश्च-
रानिह । देवा वयं मनुष्यास्ते देवाः प्रविशामसि ।
इन्द्रो नो अस्तु पुरोगवः स नो रक्षतु सर्वतः । इन्द्राय
स्वाहेति हुत्वा ॥२॥ मा नो विदन्नमो देववधेभ्य इत्येता-
भ्यां सूक्ताभ्यां जुहुयात् ॥ ३ ॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः
॥४॥१२॥१०४॥
देकर ॥ २ ॥ ३ ॥ “समास्त्वाग्न०” इस सूक्त से आहुति देवे ॥ ४ ॥
यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥ ५ ॥ १० ॥ १०२ ॥ यह एक सौ दूसरी
कण्डिका समाप्त हुई ।
अब जहां यह उपतारकाओं की शङ्का होती है, तहां आहुति देवे ॥
॥ १ ॥ “रेवतीः शुभ्रा इषिरा०” इत्यादि से आहुति देवे ॥ ३ ॥ यह
उसकी प्रायश्चित्ति है ॥ ४ ॥ ११ ॥ १०३॥ यह एक सौ तीसरी कण्डिका
खतम हुई ।
अब जहां ब्राह्मणलोग अस्त्रधारी होते हैं, तहां आहुति देवे ॥ १ ॥
“य आसुरा मनुष्या०” इत्यादि से आहुति देकर ॥ २ ॥ “मा नो
विदन्नमो०” इत्यादि दो सूक्तों से आहुति देवे ॥ ३ ॥ यह उसकी
प्रायश्चित्ति है ॥ ४ ॥ १२ ॥ १०४॥ यह एक सौ चारवी कण्डिका
खतम हुई ।
२३२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
अथ यत्रैतद्दैवतानि नृत्यन्ति च्योतन्ति हसन्ति
गायन्ति वान्त्यानि वा रूपाणि कुर्वन्ति य आसुरा मनु-
ष्या मा नो विदन्नमो देववधेभ्य इत्यभयैर्जुहुयात् ॥ १ ॥
सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥२॥१३॥१०५॥
अथ यत्रैतल्लाङ्गले संसृजतः पुरोडाशं श्रपयित्वा
॥१॥ अरण्यस्यार्धमभिव्रज्य ॥२॥ प्राचीं सीतां स्थाप-
यित्वा ॥ ३ ॥ सीताया मध्ये प्राञ्चमिध्ममुपसमाधाय
॥४॥ परिसमुह्य पर्युक्ष्य परिस्तीर्य बर्हिः शम्याः परि-
धीन्कृत्वा ॥५॥ अथ जुहोति । वित्तिरसि पुष्टिरसि श्री-
रसि प्राजापत्यानां तां त्वाहं मयि पुष्टिकामो जुहोमि
स्वाहा ॥६॥ कुमुद्वती पुष्करिणी सीता सर्वाङ्गशोभ-
नी । कृषिः सहस्रप्रकारा प्रत्यष्ठा श्रीरिदं मयि ॥ उर्वी
त्वाहुर्र्मनुष्याः श्रियं त्वा मनसो विदुः । आशायेऽन्नस्य
नो धेह्यनमीवस्य शुष्मिणः ॥ पर्जन्यपत्नि हरिण्यभिजि-
तास्यभि नो वद ॥ कालनेत्रे हविषो नो जुषस्व तृप्तिं
नो धेहि द्विपदे चतुष्पदे ॥ याभिर्देवा असुरानकल्पयन्
यातून्मनून् गन्धर्वान् राक्षसांश्च । ताभिर्नो अद्य सुमना
अब जहां देवता (या मूर्तियां) नाचतीं, इधर उधर चलती, हँसती,
गाती हैं या अन्यान्य रूपों को धारण करती हैं-वहां “य आसुरा०”
इत्यादि से आहुति देवे ॥ १ ॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥ २ ॥ १३ ॥
॥ १०५ ॥ यह एक सौ पांचवीं कण्डिका खतम हुई ॥
अब जहां लाङ्गल में बैल के पुच्छ का संसर्ग हो जावे या हल से
हल का। वहां पुरोडाशको पकाकर ॥१॥ अरण्य के आधे भाग में जाकर
॥ २ ॥ पूर्व मुख सीता को स्थापन करके ॥ ३ ॥ सीता के मध्य भाग में
पूर्वाभिमुख इध्मों का उपसमाधान करके ॥ ४ ॥ परिसमूहन, पर्युक्षण,
परिस्तरण करके बर्हि, शम्या, परिधियों को करके ॥ ५ ॥ आहुति देवे ।
“वित्तिरसि पुष्टिरसि०” इत्यादि आहुतियां देवे ॥ ६ ॥ “कुमुद्वती पुष्क-
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २३३
उपा गहि सहस्रापोषं सुभगे रराणा ॥ हिरण्यस्र-
क्पुष्करिणी श्यामा सर्वाङ्गशोभनी ॥ कृषिर्हिरण्यप्रकारा
प्रत्यष्टा श्रीरियं मयि ॥ अश्विभ्यां देवि सह संविदाना
इन्द्रेण राधेन सह पुष्ट्या न आ गहि ॥ विशस्त्वा
रासन्तां प्रदिशोऽनु सर्वा अहोरात्रार्धमासमासा आर्तवा
ऋतुभिः सह ॥ भर्त्री देवानामुत मर्त्यानां भर्त्री प्रजा-
नामुत मानुषाणाम् ॥ हस्तिभिरितरासैः क्षेत्रसारथि-
भिः सह । हिरण्यैरश्वैरा गोभिः प्रत्यष्टा श्रीरियं मयि
॥७॥ अत्र शुनासीराण्यनुयोजयेत् ॥ ८ ॥ वरमनड्वा-
हमिति समानम् ॥६॥१४॥१०६॥
अथ यत्रैतत्स्रजन्त्योर्वा कृन्तन्त्योर्वा नाना तन्तू
संसृजतो मनायै तन्तुं प्रथममित्येतेन सूक्तेन जुहुयात्
॥१॥ मनायै तन्तुं प्रथमं पश्येदन्या अतन्वत । तन्नारीः
प्रब्रवीमि वः साध्वीर्वः सन्तूर्वरीः ॥ साधुर्वस्तन्तुर्भवतु
साधुरेतु रथो वृतः ॥ अथो होर्धरीर्यूयं प्रातर्वोढवे
धावत ॥ खर्गला इव पह्वरीरपामुग्रमिवायनम् । पतन्तु
पह्वरीरिचोर्वरीः साधुना पथा ॥ अवाच्यौ ते तोतुद्येते
तोदेनाइवतराविव ॥ प्र स्तोममुर्वरीणां शशयानामस्ता-
विषम् ॥ नारी पश्चमयूखं सूत्र॒वत्कृणुते वसु ॥ अरिष्टो
अस्य वस्ता प्रेन्द्र वास उतोटिरे ॥२॥ वासः कर्त्रे दद्यात्
रिणी०” इत्यादि से आहुति देवे ॥ ७ ॥ यहां शुनासीरों की अनुयोजना
करे ॥ ८ ॥ कर्त्ता को दक्षिणा में बैल देवे ॥ ९ ॥ १४ ॥ १०६ ॥ यह एक-
सौ छहवी कण्डिका खतम हुई ॥
अब जहां सूतों के.कातने या बिनने में सूत परस्पर संसृज होकर टूट
जावे या बेकाम हो जाया करे वहां आहुति करे ॥१॥ “मनायै तन्तुं प्रथमं०”
इत्यादि से आहुति करे ॥ २ ॥ कर्त्ता को दक्षिणा में वस्त्र देवे ॥ ३ ॥ यह •
३०
२३४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
॥३॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥४॥१५॥१०७॥
अथ यत्रैतदग्निनाग्निः संसृज्यते भवतं नः समन-
सौ समोकसावित्येतेन सूक्तेन जुहुयात् ॥ १ ॥ भवतं
नः समनसौ समोकसावरेपसौ । मा हिंसिष्टं यज्ञपतिं
मा यज्ञं जातवेदसौ शिवौ भवतमद्य नः ॥ अग्निनाग्निः
संसृज्यते कविर्गृहपतिर्युवा । हव्यवाड् जुह्वास्यः ॥
त्वं ह्यग्ने अग्निना विप्रो विप्रेण सन्सता । सखा सख्या
समिध्यसे ॥ पाहि नो अग्न एकया पाहि न उत द्वितीयया ।
पाहि गीर्भिस्तिसृभिरूर्जांपते पाहि चतसृभिर्वसो ॥
समीची माहनी पातामायुष्मत्या ऋचो मा सन्ति ।
तनूपाःसाम्नो वसुविदं लोकमनुसंचराणि ॥२॥ रुक्मं कर्त्रे
दद्यात् ॥३॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥४॥१६॥१०८॥
अथ यत्रैतद्यमसूर्यमौ जनयति तां शान्त्युदकेना
भ्युक्ष्य दोहयित्वा ॥ १ ॥ तस्या एव गोर्दुग्धे स्थालीपाकं
श्रपयित्वा ॥२॥ प्राञ्चमिध्ममुपसमाधाय ॥३॥ परिसमुह्य
पर्युक्ष्य परिस्तीर्य बर्हिरुदपात्रमुपसाद्य ॥ ४ ॥ एकैक-
उसकी प्रायश्चित्ति है ॥४॥ १५ ॥ १०७ ॥ यह एक सौ सातवी
कण्डिका समाप्त हुई ॥
अब जहां जहां अग्नि से अग्नि का संघर्ष हो जावे वहां "भवतं नः
समनसौ समोकसौ" इस सूक्त से आहुति देवे ॥ १ ॥ "भवतं नः सम-
नसौ०" इत्यादि से आहुति देवे ॥ २ ॥ कर्त्ता को दक्षिणा में सोना देवे
॥ ३ ॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥४॥१६॥१०८॥ यह एकसौ आठहवी
कण्डिका खतम हुई ॥
अब जहाँ एक साथ अनेक बच्चे गौ को पैदा हों उसको शान्ति जल
से अभ्युक्षण कर गौ को दुह करके ॥१॥ उसी गौ के दूध में स्थाली-
पाक पका कर ॥२॥ पूर्वाभिमुख इध्माधान करके ॥३॥ परिसमूहन,
पर्युक्षण, परिस्तरण करके, बर्हिकुश एवं जलपात्र लाकर के ॥४॥ 'एकैकयै-