कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २२१
दधि च मधु च ब्राह्मो मधुपर्कः ॥१॥ पायस ऐन्द्रो
मधुपर्कः ॥२॥ मधु चाज्यं च सौम्यो मधुपर्कः ॥३॥
मन्थश्चाज्यं च पौष्णो मधुपर्कः ॥४॥ क्षीरं चाज्यं च
सारस्वतो मधुपर्कः ॥५॥ सुरा चाज्यं च मौसलो मधु-
पार्कः ॥६॥ स खल्वेष द्वये भवति सौत्रामण्यां च राज-
सूये च ॥७॥ उदकं चाज्यं च वारुणो मधुपकः ॥८॥ तैलं
चाज्यं च श्रावणो मधुपर्कः ॥९॥ तैलञ्च पिण्डञ्च पारि-
व्राजको मधुपर्कः ॥१०॥ इति खल्वेष नवविधो मधुपर्को
भवति ॥११॥ अथास्मै गां वेदयन्ते गौर्भो इति ॥१२॥
तान्प्रतिमन्त्रयते । भूतमसि भवदस्यन्नं प्राणो बहुर्भव ।
ज्येष्ठं यन्नाम नामत ओं भूर्भुवः स्वर्जनदोमिति ॥१३॥
अतिसृजति । मातादित्यानां दुहिता वसूनां स्वसा रुद्रा-
णाममृतस्य नाभिः । प्र णो वोचं चिकितुषे जनाय मा
गामनागामदितिं वधिष्ट ॥ ओं तृणानि गौरत्त्वित्याह
॥१४॥ सूयवसादिति प्रतिष्ठमानामनुमन्त्रयते ॥१५॥ ना-
लोहितो मधुपर्को भवति ॥१६॥ नानुज्ञानमधीमह इति
दही और मधु ब्राह्म मधुपर्क है । १॥ पायस ऐन्द्र मधुपर्क है ॥२॥
मधु एवं घृत सौम्य मधुपर्क है। ३॥ मन्थ और आज्य पौष्ण मधुपर्क है॥४॥
क्षीर और आज्य सारस्वत मधुपर्क है । ५॥ मदिरा और घृत मोसल मधु-
पर्क है ॥६॥ सो यह दो ही यज्ञों में होता है एक सौत्रामणी में और
दूसरा राजसूय यज्ञ में ॥ ७ ॥ जल और घृत का वारुण मधुपर्क
होता है ॥ ८ ॥ तैल और आज्य श्रावण मधुपर्क होता है । ९ ॥
तैल और पिण्ड पारिव्राजक मधुपर्क है ॥ १० ॥ इस प्रकार मधुपर्क
नौ प्रकार का होता है ॥ ११ ॥ यहाँ गो लाई जाती है—गौर्भोः ॥
इसका प्रतिमंत्रण “भूतमसि०” इत्यादि पढ़ कर गौ को छोड़ देवे।
छोड़ते समय “मातादित्यानां०” इत्यादि पढ़कर गौ को छोड़ देवे
“वह घास खावे”—ऐसा कहे ॥१४॥ “सूयवसात्०” से गौ को प्रतिष्ठ-
मान करते हुए अनुमंत्रण करे ॥ १५ ॥ बिना मांस के मधुपर्क नहीं