कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
३. अध्याय ८-१०: शान्ति-कर्म, पुष्टिकर कल्प, भैषज्य-प्रयोग एवं रोग-निवारण विधान
लनाचमनमुक्तम् ॥१०॥ पाणावुदकमानीय ॥११॥ अथा-
मुष्यौदनस्यावदानानां च मध्यात्पूर्वार्द्धाच्च द्विरवदायोप-
रिष्टादुदकेनाभिघार्य जुहोति सोमेन पूतो जठरे सीद
ब्रह्मणामार्षेयेषु निदध ओदन स्वेति ॥१२॥ अथ प्राश्ना-
ति ॥१३॥ अग्नेष्ट्वास्येन प्राश्नामि बृहस्पतेर्मुखेन । इन्द्र-
स्य त्वा जठरे सादयामि वरुणस्योदरे । तद्यथा हुत-
मिष्टं प्राश्नीयादेवात्मा त्वा प्राश्नाम्यात्मास्यात्मन्नात्मानं
मे मा हिंसीरिति प्राशितमनुमन्त्रयते ॥ १४ ॥ योऽग्नि-
र्नृमणा नाम ब्राह्मणेषु प्रविष्टः । तस्मिन्म एष सुहुतो-
ऽस्त्वोदनः स मा मा हिंसीत्परमे व्योमन् ॥ सो अस्म-
भ्यमस्तु परमे व्योमन्निति दातारं वाचयति ॥१५॥ वीक्ष-
णान्तं शतौदनायाः प्रातर्जपेन व्याख्यातम् ॥१६॥६॥६५॥
वाङ्ग आसन्निति मन्त्रोक्तान्यभिमन्त्रयते ॥ १ ॥
बृहता मनो द्यौश्च मे पुनर्मैत्विन्द्रियमिति प्रतिमन्त्रयते
॥ २ ॥ प्रतिमन्त्रिते व्यवदायाश्नन्ति ॥ ३ ॥ शतौदनायां
द्वादशं शतं दक्षिणाः ॥ ४ ॥ अधिकं ददतः कामप्रं सम्प-
द्यते ॥ ५ ॥ ब्रह्मास्येत्योदने हृदान्प्रतिदिशं करोति ॥६॥
गये जानो ॥१०॥ हाथ में जल लाकर ॥११॥ अब अमुष्यौदन के अव-
दानों का और मध्य पूर्वार्ध से दो बार लेकर ऊपर से जल से अभिघा-
रण कर आहुति देवे । “सोमेन पूतो०” इत्यादि से ॥१२॥ अब प्राशन
करे “अग्नेष्ट्वास्येन०” इत्यादि से प्राशन करके अनुमंत्रण करे । “यो-
ऽग्निर्नृमणा०” इत्यादि से दाता को बचवावे ॥१३॥१४॥१५॥ शतौद-
नाका व्याख्यान वोक्षण तक किया गया जानो ॥१६॥६॥६५॥ यह
पैसठवी कंडिका समाप्त हुई ॥
“वाङ्ग आसन्०” से मंत्रों में कहे हुओं का अनुमंत्रण करे ॥१॥
“बृहता मनो०” इत्यादि से प्रतिमंत्रण करे॥२॥ प्रतिमंत्रित होने पर उसे
लेकर खावे ॥३॥ शतौदना में १२०० दक्षिणा देनी चाहिये ॥४॥
अधिक देने से “कामप्रं” की प्राप्ति होती है ॥५॥ “ब्रह्मास्य०” से ओदन
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उपर्यापानम् ॥७॥ तदभितश्चतस्रो दिह्याः कुल्याः ॥८॥
ता रसैः पूरयति ॥६॥ पृथिव्यां सुरयाद्भिराण्डीकादिवन्ति
मन्त्रोक्तानि प्रतिदिशं निधाय ॥ यमोदनमित्यतिमृ-
त्युम् ॥ ११ ॥ अनड्वानित्यनड्वाहम् ॥ १२ ॥ सूर्यस्य
रश्मीनिति कर्की सानुबन्ध्यां ददाति ॥ १३ ॥ अयं गौः
पृश्निरयं सहस्रमिति पृश्निं गाम् ॥१४॥ देवा इमं मधुना
संयुक्तं यवमिति पौनःशिलं मधुमन्थं सहिरण्यं सम्पात-
वन्तम् ॥१५॥ पुनन्तु मा देवजनाः इति पवित्रं कृशरम्
॥ १६ ॥ कः पृश्निमित्युर्वराम् ॥१७॥ साहस्र इत्यृषभम्
॥ १८ ॥ प्रजापतिश्चेत्यनड्वाहम् ॥ १६ ॥ नमस्ते जाय-
मानायै ददामीति वशामुदपात्रेण सम्पातवता सम्प्रोक्ष्या-
भिमन्त्र्याभिनिगद्य दद्याद्दाता वाच्यमानः ॥ २० ॥
भूमिष्ठेत्येनां प्रतिगृह्णाति ॥२१॥ उपमितामिति यच्छ्रा-
लया सह दास्यन् भवति तदन्तर्भवत्यपिहितम् ॥२२॥
में प्रति दिशा में पोखर बनावे ॥६॥ और उसके ऊपर गर्त करे ॥७॥
उसके सम्मुख चार दिशा कुल्या करे ॥८॥ उनको रसों से पूरा करे
॥९॥ पृथिवी पर सुरा, जल और आण्डीकादि वाले करे जैसा मंत्र में
कहा गया है प्रदिशा में घरे ॥१०॥- “यमोदनं०” से अतिमृत्यु को
॥११॥ “अनड्वान्०” से अनड्वाह को ॥१२॥ ‘सूर्यस्य रश्मीन०’ कर्की
सानुबन्ध्या देवे ॥१३॥ “अयं गौः पृश्निरयं सहस्रं०” से पृश्नि गौ
को ॥१४॥ “देवा इमं मधुना संयुक्तं यवं०” से पौनः शिलं को, मधुमन्थ
को, सोने के साथ सम्पातवन्त करे ॥१५॥ “पुनन्तु मा देवजना०” से कृशर
को पवित्र करे ॥१६॥ “कः पृश्नि०” से उर्वरा को और “साहस्रः” से
ऋषभ को, “प्रजापतिश्च०” से अनतुहुह को ॥१७॥१८॥१९॥ “नमस्ते
जायमानायै ददामि०” से वशा को उदपात्र से सम्पात वाला से संप्रोक्षण
करके अभिमंत्रण करके अभिनिगद् करके वाच्यमान दाता देवे ॥२०॥
“भूमिष्ठा०” से इसको प्रतिग्रहण करे ॥२१॥ “उपमितां०” से जिस
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १६१
मन्त्रोक्तं तु प्रशस्तम् ॥२३॥ इटस्य ते विचृतामीति द्वार-
मवसारयति ॥२४॥ प्रतीचीं त्वा प्रतीचीन इत्युदपात्र-
मग्निमादाय प्रपद्यन्ते ॥२५॥ तदन्तरेव सूक्तेन सम्पात-
वत्करोति ॥२६॥ उदपात्रेण सम्पातवता शालां सम्प्रो-
क्ष्याभिमन्त्र्याभिनिगद्य दद्याद्दाता वाच्यमानः ॥ २७ ॥
अन्तरा द्यां च पृथिवीं चेत्येनां प्रतिगृह्णाति ॥२८॥ उप-
मितामिति मन्त्रोक्तानि प्रवृणति ॥२६॥ मा नः पाशमित्य-
भिमन्त्र्य धारयति ॥३०॥ नास्यास्थीनीति यथोक्तम्
॥३१॥ सर्वमेनं समादायेत्यद्भिः पूर्णे गर्ते प्रविध्य
संवपति ॥ ३२ ॥ शतौदनां च ॥३३॥७॥६६॥
शाला के साथ देना होवे उसके भीतर धर ढाक देवे ॥२२॥ मंत्र में
कहा हुआ तो अच्छा होता है ॥२३॥ “इटस्य ते विचृतामि०” से द्वार को
पसारे ॥२४॥ “प्रतीचीं त्वा प्रतीचीनः” से उदपात्र को, अग्नि को लेकर
जावे ॥२५॥ उसके भीतर ही सूक्त से सम्पात वाला करे ॥२६॥ उद्-
पात्र से सम्पात वाला से शाला को संप्रोक्षण, अभिमंत्रण और निगदन
करके वाच्यमान दाता देवे ॥२७॥ “अन्तरा द्यां च पृथिवीं च०” से
इसको लेवे ॥२८॥ “उपमितां०” से मंत्रों में कहे हुओं को बिखेरे
॥२९॥ “मा नः पाशं०” से अभिमंत्रण करके धारण करे ॥३०॥ “ना-
ऽस्यास्थीनि०” मंत्रोक्त कर्मों को करे ॥३१॥ इसको सब लेकर “सर्वमेनं
सम्पाद्य०” से पूर्ण गर्त्ते में डाल कर संवपन करे ॥ ३२ ॥ और शतौ-
दना को भी ॥३३॥ अब यहाँ सब यज्ञों को भली भाँति समझने के लिये
व्याख्या करते हैं—बाईस प्रकार के सब होते हैं। अब इनकी गिनती की
जाती है “अग्ने जायमानस्व०” इस अर्थ सूक्त से ब्रह्मोदन देवे ॥ १ ॥
“पुमान् पुंसः०”इस अनुवाक से स्वर्गौदन को देवे ॥२॥ “आशानां०”से
चार पुरखा सव को॥३॥ “यद्राजानं०”सूक्त से अविसव को ॥४॥ “अजो
ह्यग्नेरजनिष्ट०” सूक्त से अजौदन सब को ॥५॥ “आनयैतां०” इस अर्थ
सूक्त से पञ्चौदन सव को ॥६॥ “अधायतां०” इस अर्थ सूक्त से शतौदन
सव को ॥७॥ “ब्रह्मस्य शीर्ष०” इस सूक्त से ब्रह्मास्यौदन सव को ॥८॥
२१
१६२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
सम्भृतेषु साविकेषु सम्भारेषु ब्राह्मणमृत्विजं वृणीत
॥ १ ॥ ऋषिमार्षेयं सुधातुदक्षिणमनैमित्तिकम् । एष
ह वा ऋषिरार्षेयः सुधातुदक्षिणो यस्य त्र्यवराध्याः पूर्व-
पुरुषा विद्याचरणवृत्तशीलसम्पन्नाः ॥ ३ ॥ उदगयन
इत्येके ॥ ४ ॥ अथात ओदनसवानामुपाचारकल्पं
व्याख्यास्यामः ॥ ५ ॥ सवान् दत्त्वाग्नीनादधीत ॥ ६ ॥
सार्ववैदिक इत्येके ॥ ७ ॥ सर्वे वेदा द्विकल्पाः ॥ ८ ॥
“यमोदनं०” इस सूक्त से अतिमृत्यु सव को ॥९॥ “अनद्वान्दधार०”
इस सूक्त से अनडुह सव को ॥१०॥ “सूर्यस्य रश्मीन्०” इस सूक्त के
तीन ऋचाओं द्वारा कर्क सव ॥११॥ “आयं गौः” इस सूक्त की तीन
ऋचाओं से पृश्नि सव ॥१२॥ “अयं सहस्रं०” इन दो ऋचाओं से पृश्नि
गौ सव ॥१३॥ “देवा इमं०” इस ऋचा से पौनःशिल सव ॥१४॥ “पुन-
न्तु मा०” इस सूक्त से पवित्र सव को ॥१५॥ “कः पृश्निं०” ऋचा से
उर्वरा सव ॥१६॥ “साहस्र त्वेष०” इस सूक्त से ऋषभ सव ॥१७॥
“प्रजापतिश्च०” सूक्त से अनडुह सव ॥१८॥ “नमस्ते जायमानायै” इस
अर्थ सूक्त से वशा सव ॥१९॥ “ददामि०” इस अनुवाक से वशासव
॥२०॥ “उपमितां०” इस अर्थ सूक्त से शालासव ॥२१॥ “तस्यौदनस्य०”
इस अर्थ सूक्त से बृहस्पति सव ॥२२॥ अभिचार काम का ॥२३॥
बाईस सव यज्ञ संहिता में पढ़े जाते हैं । स्वर्गौदनतन्त्र से सब सव यज्ञों को
करे या ब्रह्मौदन तंत्र से; क्योंकि स्वर्गब्रह्मौदन दोनों तन्त्र ( प्रक्रियायें )
हैं ॥७।६६॥ यह छियासठवी कंडिका समाप्त हुई ॥
ओदन यज्ञ के लिये सामग्रियों के जुट जाने पर ब्राह्मण ऋत्विज
को वरण करे ॥१॥ इन्हीं ऋषि को जिनमें आर्षेय गुण सम्पन्न हैं, वह हैं
सुधातु दक्षिण, इन्हीं विना निमित्त वरण करना चाहिये ॥२॥ या यही
ऋषि आर्षेय सुधातु दक्षिण हैं जिनके तीन से अधिक ·पूर्व पुरुष विद्या,
आचरण, वृत्त, शील से सम्पन्न हुए हैं ॥३॥ इस यज्ञ के लिये उत्तरा-
यण है—ऐसा अनेक आचार्यों की सम्मति है ॥४॥ अब ओदन सवों का
उपचार कल्प कहेंगे ॥५॥ सवों को देकर अग्नि का आधान करे ॥६॥
सार्ववैदिक—यह है ऐसा बहुत से आचार्य कहते हैं ॥७॥ सब ही वेद
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १६३
मासपरार्ध्या दीक्षा द्वादशरात्रो वा ॥ ९ ॥ त्रिरात्र
इत्येके ॥ १० ॥ हविष्यभक्षाः स्युर्ब्रह्मचारिणः ॥११॥
अधः शयीरन् ॥१२॥ कर्तृदातारौवा समापनात्कामं
न भुञ्जीरन् सन्तताश्चेत् स्युः ॥१३ अहनि समाप्तमित्येके
॥१४॥ यात्रार्थं दातारौ वा दाता केशश्मश्रुरोमनखानि
वापयीत ॥१५॥ केशवर्जं पत्नी ॥१६॥ स्नातावहतवसनौ
सुरभिणौ व्रतवन्तौ कर्मण्यावुपवस्तः ॥१७॥ श्वो भूते
यज्ञोपवीती शान्त्युदकं कृत्वा यज्ञवास्तु च सम्प्रोक्ष्य
ब्रह्मोदनिकमग्निं मथित्वा ॥ १८ ॥ यद्देवा देवहेडनं
यद्विद्वांसो यदविद्वांसोऽपमित्यप्रतीतमित्येतैस्त्रिभिः
सूक्तैरन्वारब्धे दातरि पूर्णहोमं जुहुयात् ॥१९॥ पूर्वाह्ने
बाह्यतः शान्तवृक्षस्यैध्मं प्राञ्चमुपसमाधाय ॥२०॥ परि-
समूह्य पर्युक्ष्य परिस्तीर्य बर्हिरुदपात्रमुपसाद्य परिचर-
द्विकल्प हैं ॥८॥ मास, पक्ष या १२ रात्र तक दीक्षा ग्रहण करे ॥९॥
किन्हीं के मत में तीन रात ॥१०॥ ब्रह्मचारी दीक्षाकाल में हविष्य
भक्षण करे ॥११॥ भूमि पर सोवे ॥१२॥ कर्त्ता और दाता बिना समाप्ति
के अपनी इच्छा से भोजन न करे; यदि लगातार कार्य्य हों ॥१३॥ दिन ही
में समाप्त करें—किन्हीं की सम्मत्ति है ॥१४॥ यात्रा के प्रयोजन से दाता
पति पत्नी केश, श्मश्रु, रोम और नखों को कटवावे ॥१५॥ केश को
छोड़ कर पत्नी ( केवल नख कटवावे ) ॥१६॥ स्नान करके अखण्ड
नये वस्त्रों को पहन कर सुगन्ध चन्दनादि अनुलेपन कर, व्रती होकर
कर्म निमित्त उपवास रहें ॥१७॥ प्रातः होने पर यज्ञोपवीती हो
शान्त्युदक करके और यज्ञवास्तु को संप्रोक्षण करके ब्रह्मोदनिक अग्नि
को मथ कर ॥१८॥ "यद्देवा देवहेडनं, यद्विद्वांसो यदविद्वांसोऽपं०" और
"अप्रतीत्तं०" इत्यादि तीनों सूक्तों से दाता के अन्वारब्ध करने पर पूर्ण
होम करें ॥१९॥ पूर्वाह्न समय बाहर से शान्तवृक्ष के इध्मों को पूर्व कर
उपसमाधान करके ॥२०॥ परिसमूहन, पर्युक्षण और परिस्तरण करके कुश,
१६४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
णेनाज्यं परिचर्य ॥२१॥ नित्यान्पुरस्ताद्धोमान् हुत्वाज्य-
भागौ च ॥२२॥ पश्चादग्नेः पल्पूलितविहितमौक्षं वान-
डुहं वा रोहितं चर्म प्राग्ग्रीवमुत्तरलोम परिस्तीर्य ॥२३॥
पवित्रे कुरुते ॥२४॥ दर्भावप्रच्छन्नप्रान्तौ प्रक्षाल्यानुलोम-
मनुमार्ष्टि ॥२५॥ दक्षिणं जान्वाच्यापराजिताभिमुखः
प्रह्वो वा मुष्टिना प्रसृतिनाञ्जलिना यस्यां श्रपयिष्य-
न्त्स्यात्तया चतुर्थम् ॥२६॥ शरावेण चतुःशरावं देवस्य त्वा
सवितुः प्रसवे ऋषिभ्यस्त्वार्षेयेभ्यस्त्वैकर्षये त्वा जुष्टं
निर्वपामि ॥२७॥८॥६७॥
वसवस्त्वा गायत्रेण च्छन्दसा निर्वपन्तु । ऊर्जमक्षित-
मक्षीयमाणमुपजीव्यासमिति दातारं वाचयति ॥१॥
रुद्रास्त्वा त्रैष्टुभेन च्छन्दसा । आदित्यास्त्वा जागतेन
च्छन्दसा । विश्वे त्वा देवा आनुष्टुभेन च्छन्दसा निर्वपन्तु ।
ऊर्जमक्षितमक्षीयमाणमुपजीव्यासमिति दातारं वाच-
यति ॥२॥ निरुप्तं सूक्तेनाभिमृशति ॥३॥ स्वर्गब्रह्मौदनौ
और उदपात्र को लाकर परिचरण आज्य को ठीक करके ॥२१॥ नित्य
पुरस्तात् होमों को करके और आज्य की दो आहुति करके ॥२२॥ अग्नि
के पश्चिम पल्पूलित विहित औक्ष या अनड्भान का लाल चर्म प्राग्ग्रीव
उत्तर लोम कर बिछावे । पवित्रे से मार्जन करे ॥२३॥२४॥ बिना टूटे
दो दर्भों को प्रक्षालन करके अनुलोमों को मार्जन करे ॥२५॥ दहिने
जंघे को टेक कर पश्चिमाभिमुख हो निहुड़ कर या मुट्ठी से अंजुलि
पसार कर जिसमें पकाना होगा उसके चौथे को ॥२६॥ पुरवा से
“चतुःशरावं देवस्य त्वा सवितुः” इत्यादि से निर्वपन करे ॥२७॥८॥६७॥
यह सदसठवि कंडिका समाप्त हुई ॥
“वसवस्त्वा० इत्यादि आहुति करके दाता से “ऊर्जमक्षित०”
इत्यादि बचवावे ॥१॥ “रुद्रास्त्वा०” इत्यादि से आहुति देकर दाता को
“ऊर्जमक्षित०” इत्यादि को बचवावे ॥२॥ आहुति शेष को सूक्त से अभि-
मर्शन करे ॥३॥ स्वर्ग और ब्रह्मौदन तन्त्र से कर्म करे ॥४॥ ( यदि एक
तन्त्रम् ॥४॥ सन्निपाते ब्रह्मौदनमितमुदकमासेचयेद्विभा-
गम् ॥५॥ यावन्तस्तण्डुलाः स्युर्नावसिञ्चेन्न प्रतिषिञ्चेत्
॥६॥ यद्यवसिञ्चेन्मयि वर्चो अथो यश इति ब्रह्मा यज-
मानं वाचयति ॥७॥ अथ प्रतिषिञ्चेत् ॥८॥ आप्यायस्व
सं ते पयांसीति द्वाभ्यां प्रतिषिञ्चेत् ॥९॥ आप्यायस्व
समेतु ते विश्वतः सोम वृष्ण्यम् । भवा वाजस्य सङ्गथे ॥
सं ते पयांसि समुयन्तु वाजाः सं वृष्ण्यान्यभिमाति-
षाहः । आप्यायमानो अमृताय सोम दिवि श्रवांस्युत्त-
मानि धिष्वेति ॥१०॥ तत्र चेदुपाधिमात्रायां नखेन न
लवणस्य कुर्यात्तेनैवास्य तद्वृथान्नं सम्पद्यते ॥११॥ अहतं
वासो दक्षिणत उपशेते ॥१२॥ तत्सहिरण्यम् ॥१३॥ तत्र
द्वे उदपात्रे निहिते भवतः ॥१४॥ दक्षिणमन्यदन्तरमन्यत्
॥१५॥ अन्तरं यतोऽधिचरिष्यन् भवति ॥१६॥ बाह्यं
जाङ्गलायनम् ॥१७॥ तत उदकमादाय पात्र्यामानयति॥१८॥
साथ अनेक पदार्थ हों तो संनिपात कहते हैं ।) संनिपात की दशा में
ब्रह्मौदन को विभाग ( अलग २ करके ) कर जल से सेचन करे ५॥
जितने तण्डुल हों उन सबको न अवसेचन करे न प्रतिषेचन करे ॥६॥
यदि अवसेचन करे तो “मयि वर्चो अथो यशः” । इसको ब्रह्मा यजमान
को बचवावे ॥७॥ और प्रतिषिञ्चन करे तो “आप्यायस्व, सं ते पयांसि०”
इन दो ऋचाओं से प्रतिषिञ्चन करे ॥८॥९॥ “आप्यायस्व समेतु ते
विश्वतः सोम वृष्ण्यम् । भवा वाजस्य संगथे ॥ सं ते पयांसि समुयन्तु
वाजाः संवृष्ण्यान्यभिमातिषाहः । आप्यायमानो अमृताय सोम दिवि
श्रवांस्युत्तमानि धिष्व” इति । यदि वहां उपाधि मात्रा में नख से लवण
का न करे उसीसे इसका वह अन्न वृथा हो जाता है ॥११॥ अखण्ड
नये वस्त्र पहन कर दक्षिण दिशा में सोवे ॥१२॥ उसके साथ स्वर्ण को
देवे ॥१३॥ वहाँ दो पात्र निहित हैं ॥१४॥ दक्षिण में एक और
अन्दर में अन्य है ॥१५॥ भीतर में जिस कारण काम करना होगा ॥१६॥
बाहर में जाङ्गायन है ॥१७॥ इसके अनन्तर जल लाकर पात्री में डावे
१६६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
दर्व्या कुम्भ्याम् ॥१९॥ दर्विकृते तत्रैव प्रत्यानयति ॥२०॥
दर्व्योत्तममपादाय तत्सुहृद्दक्षिणतोऽग्नेरुदङ्मुख आसीनो
धारयति ॥२१॥ अथोद्धरति ॥२२॥ उद्धृते यदपादाय
धारयति तदुत्तरार्ध आधाय रसैरुपसिच्य प्रतिग्रहीत्रे
दातोपवहति ॥२३॥ तस्मिन्नन्वारब्धं दातारं वाचयति
॥२४॥ तन्त्रं सूक्तं पच्छः स्नानेन यौ ते पक्षौ यदतिष्ठः
॥२५॥ यौ ते पक्षावजरौ पतत्रिणौ याभ्यां रक्षांस्यपहं-
स्योदन । ताभ्यां पथ्यास्म सुकृतस्य लोकं यत्र ऋषयः
प्रथमजाः पुराणाः ॥ यदतिष्ठो दिवस्पृष्ठे व्योमन्नध्योदन ।
अन्वायन्सत्यधर्माणो ब्राह्मणा राधसा सह ॥२६॥ क्रम-
ध्वमग्निना नाकं पृष्ठात् पृथिव्या अहमन्तरिक्षमारुहं
स्वर्यन्तो नापेक्षन्त उरुः प्रथस्व महता महिम्नेदं मे ज्योतिः
सस्याय चेति तिस्रः समग्नय इति सार्धमेतया ॥२७॥
अत ऊर्ध्वं वाचिते हुते संस्थितेऽ
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १६७
अमीवहा वसुवित् पुष्टिवर्धनः । सुमित्रः सुमनो भवेत्या-
ज्याभागौ ॥३१॥ पाणावुदकमानयेत्युक्तम् ॥३२॥ प्रति-
मन्त्रणान्तम् ॥३३॥ प्रतिमन्त्रिते व्यवदायाशनन्ति ॥३४॥
इदावत्सरायेति व्रतविसर्जनमाज्यं जुहुयात् ॥३५॥
समिधोऽभ्यादध्यात् ॥३६॥ तत्र श्लोकौ । यजुषा मथिते
अग्नौ यजुषोपसमाहिते ॥ सवान् दत्त्वा सवाग्नेस्तु
कथमुत्सर्जनं भवेत् ॥ वाचयित्वा सवान् सर्वान् प्रति-
गृह्य यथाविधि ॥ हुत्वा सन्नतिभिस्तत्रोत्सर्गं कौशिकोऽ-
ब्रवीत् ॥३७॥ प्राञ्चोऽपराजितां वा दिशमवभृथाय व्रजन्ति
॥३८॥ अपां सूक्तैराप्लुत्य प्रदक्षिणमावृत्याप उपस्पृश्यान-
वेक्षमाणाः प्रत्युदाव्रजन्ति ॥३६॥ ब्राह्मणान् भक्तेनोपेप्स-
न्ति ॥४०॥ यथोक्ता दक्षिणा यथोक्ता दक्षिणा ॥४१।६।६८॥
इत्यथर्ववेदे कौशिकसूत्रे अष्टमोऽध्यायः समाप्तः ॥८॥
पित्र्यमग्निं शमयिष्यञ्ज्येष्ठस्य चाविभक्तिन एका-
आहुतियाँ करे ॥३१॥ हाथ में जल लावे यह कहा गया ॥३२॥ प्रति
मंत्रण के अन्त में ॥३३॥ प्रतिमंत्रण करके लाकर भोजन करे ॥३४॥
“इदावत्सराय०” से व्रत का विसर्जन और आज्य की आहुति देवे
॥३५॥ समिधों को डाले ॥३६॥ इसमें श्लोक हैं । यजुर्वेद के मंत्र से
अग्नि में मथन हुआ और उसीके मंत्र से अग्नि में आहुति हुई । सवों
को देकर कैसे सवाग्नि का उत्सर्जन हो । सब सवों को बचवा कर
यथाविधि प्रतिग्रहण कर और संनति ऋचाओं से आहुति देकर वहाँ
उत्सर्जन होगा—यह कौशिकाचार्य कहते हैं ॥३७॥ पूर्व या पश्चिम में
अवभृथ के लिये जावें ॥३८॥ अपां सूक्तों से नहाकर प्रदक्षिण घूमकर
जल छूकर पीछे को न देखते हुए वापस आवें ॥३९॥ ब्राह्मणों को यथेच्छ
भोजन करावें ॥४०॥ और यथोक्त दक्षिणा देवें ॥४१॥९॥६८॥
अथर्ववेद के कौशिक सूत्र के अष्टम अध्याय का भाषानुवाद समाप्त
हुआ ॥ ८ ॥
जिस घर का पिता मर जावे और उसकी सम्पत्ति का बाट उसके
१६८ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
ग्निमाधास्यन् ॥१॥ अमावास्यायां पूर्वस्मिन्नुपशाले गां
द्विहायनीं रोहिणीमेकरूपां बन्धयति ॥२॥ निशि शामूल-
परिहितो ज्येष्ठोऽन्वालभते ॥३॥ पत्न्यहतवसना ज्येष्ठम्
॥४॥ पत्नीमन्वञ्च इतरे ॥५॥ अथैनानभिव्याहारयत्य-
ध्रिगो शमीध्वम् ॥ सुशमि शमीध्वम् । शमीध्वमध्रिगा३उ
इति त्रिः ॥६॥ अयमग्निः सत्पतिर्नेडमारोहेत्यनुवाकं
महाशान्तिं च शान्त्युदक आवपते ॥७॥ अग्ने अक्रव्या-
दिति भ्रष्ट्राद्दीपं धारयति ॥८॥ भूमेश्चोपद्ग्धं समुत्खाय
॥९॥ आकृतिलोष्टवल्मीकेनास्तीर्य ॥१०॥ शकृत्पिण्डे-
नाभिलिप्य ॥११॥ सिकताभिः प्रकीर्याभ्युक्ष्य ॥१२॥
लक्षणं कृत्वा ॥१३॥ पुनरभ्युक्ष्य ॥१४॥ पश्चाल्लक्षणस्या-
भिमन्थनं निधाय ॥१५॥ गोऽश्वाजावीनां पुंसां लोम-
भिरास्तीर्य व्रीहियवैश्च शकृत्पिण्डमभिविमृज्य प्राञ्चौ
पुत्रों में न हुआ हो तो उसमें ज्येष्ठ पुत्र पिता के स्थान में अधिकारी होगा।
उस घर के औपासन अग्नि करने की इच्छा वाला अमावास्या तिथि को
शाला के पूर्व स्थान में—उपशाला में दो वर्ष की गौ को जो, रोहिणी
एक रंग की हो उसको बांधे ॥१॥२॥ रात्रि में शामूल पहन कर ज्येष्ठ
पुत्र अन्वालम्भन करे ॥३॥ पत्नी अखण्ड नये वस्त्र को पहन कर ज्येष्ठ
को और इतर पुरुष पत्नी को अन्वञ्च करे ॥४॥५॥ अब पत्नी को अभि-
व्याहार करे "अध्रिगो शमीध्वम्। सुशमीध्वम्। शमीध्वमध्रिगा३उ०" तीन्
बार कहे ॥६॥ "अयमग्निः सत्पतिर्नेडमारोहे०" इस अनुवाक से महा-
शान्ति को और शान्त्युदक में आवपन करे ॥७॥ "अग्ने अक्रव्यात्०"
से भडभूँजे के घर से अग्नि लाकर धारण करे ॥८॥ और अदग्ध भूमि
को खनन कर जोते खेत की मिट्टी और दीमक की मिट्टी से भरकर
बराबर करे ॥९॥१०॥ एवं गोबर से लीपकर बालु से छीट कर अभ्यु-
क्षण करके उस पर रेखा खैंचे ॥११॥१२॥१३॥ पुनः अभ्युक्षण करके
रेखा के पश्चिम भाग में अग्नि मन्थन को धरे ॥१४॥१५॥ गौ, घोड़ा,
या बकरे (पुरुष) के लोमों से आस्तरण कर व्रीहि और जौ से गोबर
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १६९
दर्भौ निदधाति ॥१६॥ वृषणौ स्थ इत्यभिप्राण्यारण्यौ
॥१७॥ तयोरुपर्यधरारणिम् ॥१८॥ दक्षिणतो मूलान्
॥१९॥ पश्चात् प्रजननामुरुर्वश्यसीत्यायुरसीति ॥२०॥
मूलत उत्तरारणिमुपसन्धाय ॥२१॥ पृतनाजितमित्या-
ह्वय ॥२२॥ अभिदक्षिणं ज्येष्ठस्त्रिरभिमन्थत्योँ भूर्गायत्रं
छन्दोऽनुप्रजायस्व त्रैष्टुभं जागतमानुष्टुभमों भूर्भुवःस्व-
र्जनदोमिति ॥२३॥ अत ऊर्ध्वं यथाकामम् ॥२४॥१॥६९॥
मन्थामि त्वा जातवेदः सुजातं जातवेदसम् ॥ स
नो जीवेष्वा भज दीर्घमायुश्च धेहि नः॥ जातोऽजनिष्ठा
यशसा सहाग्ने प्रजां पशूंस्तेजो रयिमस्मासु धेहि ॥ आन-
न्दिनो मोदमानाः सुवीरा अनामयाः सर्वमायुर्गमेम ॥
उद्दीप्यस्व जातवेदोऽव सेदिं तृष्णां क्षुधं जहि ॥ अपा-
स्मत्तम उच्छत्वपहीतमुखो जह्यप दुर्हाद्दिंशो जहि॥ इहैवैधि
धनसनिरिह त्वा समिधीमहि । इहैधि पुष्टिवर्धन
इह त्वा समिधीमहीति ॥१॥ प्रथमया मन्थति ॥२॥
द्वितीयया जातमनुमन्त्रयते ॥ ३ ॥ तृतीययोद्दीपयति
अभिमार्जन करके पूर्वाग्र कुशाओं को घरे ॥१६॥ “वृषणौ स्थ०” दोनों
अरणियों को लावे और उनमें अधरारणि को दक्षिण की ओर मूल
करके घरे और पश्चात् “प्रजननामुरुर्वश्यसीत्यायुरसि०” से मूल उत्तर
करके उसके ऊपर धर कर ॥२१॥ “पृतनाजितं०” कह कर पुकारे
॥२२॥ सम्मुख दक्षिण में होकर ज्येष्ठ “ओंभूर्गायत्रं छन्दोऽनुप्रजायस्व
त्रैष्टुभं जागतमानुष्टुभं भूर्भुवःस्वर्जनर्दो०” इन् तीन ऋचाओं से मन्थन
करे ॥२३॥ इसके पश्चात् अपनी इच्छानुसार मन्थन कर अग्नि उत्पा-
दन करे ॥२४॥।१।॥६९॥ यह उनहत्तरवि कण्डिका समाप्त हुई ।
“मन्थामि त्वा०” इत्यादि ॥१॥ प्रथमा ऋचा से मन्थन करे ।
द्वितीया से उत्पन्नाग्नि को अनुमंत्रण करे और तृतीया से अग्नि को
२२
१७० अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
॥४॥ चतुर्थ्योपसमादधाति ॥५॥ यत्त्वा क्रुद्धा इति चों
भूर्भुवः स्वर्जनदोमित्यङ्गिरसां त्वा देवानामादित्यानां
व्रतेनादधे ॥ द्यौर्मह्यासि भूमिर्र्भूम्ना तस्यास्ते देव्यदिति-
रुपस्थेऽन्नादायान्नपत्याया दधदिति ॥६॥ लक्षणे प्रतिष्ठा-
प्योपोत्थाय ॥७॥ अथोपतिष्ठते ॥८॥ अग्ने गृहपते सुगृह-
पतिरहं त्वयाग्ने गृहपतिना भूयासम् ॥ सुगृहपतिस्त्वं
मयाग्ने गृहपतिना भूयाः । अस्थूरि णौ गार्हपत्यानि
दीदिहि शतं समा इति ॥६॥ व्याकरोमीति गार्हपत्य-
क्रव्यादौ समीक्षते ॥१०॥ शान्तमाज्यं गार्हपत्यायोप-
निदधाति ॥११॥ माषमन्थं क्रव्यादम् ॥१२॥ उप त्वा
नमसेति पुरोऽनुवाक्या ॥१३॥ विश्वाहा त इति पूर्णा-
हुतिं जुहोति ॥१४॥ यो नो अग्निरिति सह कर्त्रा हृद-
यान्यभिमृशन्ते ॥१५॥२॥७०॥
अंशो राजा विभजतोमावग्नी विधारयन् ॥ क्रव्या-
दं निर्णुदामसि हव्यवाडिह तिष्ठत्विति विभागं ज-
पति ॥१॥ सुगार्हपत्य इति दक्षिणेन गार्हपत्ये समिध-
मादधाति ॥२॥ यः क्रव्यात्तमशीशममिति सव्येन नड-
जलावे ॥२॥३॥४॥ और चौथी से अन्वाधान करे ॥५॥ “यत्त्वा क्रुद्धा०”
और “ॐ भूर्भुवः०” इत्यादि से रेखा पर प्रतिष्ठापन करके और उठ कर
उपस्थान करे ॥६॥७॥८॥ “अग्ने गृहपते०” इत्यादि ॥९॥ और “व्याक-
रोमि०” इन दोनों से गार्हपत्य और क्रव्याद अग्नि को देखे ॥१०॥
शान्त आज्य को गार्हपत्य के लिये धरे ॥११॥ माष (उड़ीद) का मन्थ
क्रव्याद् के लिये ॥१२॥ “उप त्वा नमस०” पुरोऽनुवाक्या ॥१३॥
“विश्वाहा०” से पूर्णाहुति देवे ॥१४॥ “यो नो अग्निः” से कर्त्ता के
साथ हृदयों को यजमान एवं पत्नी अभिमर्शन करे ॥१५॥ २॥७०॥
यह सत्तरवि कण्डिका समाप्त हुई ।
“अंशो राजा०” इत्यादि से विभाग को जप करे ॥१॥ “सुगार्ह-
पत्य०” से दक्षिण से गार्हपत्य अग्नि में समिद् का आधान करे ॥२॥
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १७१
मयीं क्रव्यादि ॥३॥ अपावृष्ट्येति मन्त्रोक्तं बाह्यतो निधा-
य ॥४॥ नडमारोह समिन्धत इषीकां जरतीं प्रत्यञ्चमर्क-
मित्युपसमादधाति ॥ ५ ॥ यद्यग्निर्यो अग्निरविः कृष्णा
मा नो रुरोः शुचिद्विदः शिवो नो अस्तु भरतो रराणः
अतिव्याधी व्याधो अग्रभीष्ट क्रव्यादो अग्नीञ्छमयामि
सर्वानिति शुक्त्या माषपिष्टानि जुहोति ॥६॥ सीसं
दर्व्यामवधायोद्धृत्य मन्थं जुह्वञ्छमयेत् ॥७॥ नडमारो-
हेति चतस्रोऽग्ने अक्रव्यादिमं क्रव्याद्यो नो अङ्गेष्वन्ये-
भ्यस्त्वा हिरण्यपाणिमिति शमयति ॥८॥ दक्षिणतो
जरत्कोष्ठे शीतं भस्माभिविहरति ॥९॥ शान्त्युदकेन
सुशान्तं कृत्वावदग्धं समुत्खाय ॥१०॥ परं मृत्यो इत्यु-
स्थापयति ॥११॥ क्रव्यादमिति तिसृभिर्हीयमानमनुम-
न्त्रयते ॥१२॥ दीपाद्याभिनिगदनात्प्रतिहरणेन व्याख्या-
तम् ॥१३॥ अविः कृष्णेति निदधाति ॥१४॥ उत्तमवर्जं
ज्येष्ठस्याञ्जलौ सीसानि ॥१५॥ अस्मिन्वयं यदिप्रं सीसे
“यः क्रव्यात्तमशीशमं०” से नडमयी क्रव्यादि अग्नि में समिद् डाले
॥३॥ “अपावृत्य०” से मंत्रोक्त को बाहर से डाले ॥४॥ “नडमारोह०”
इत्यादि से समिधों का आधान करे ॥५॥ “यद्यग्निर्यो०” इत्यादि
से शुक्ति द्वारा माषपिष्टों की आहुति देवे ॥६॥ और सीस को
दर्वी में डालकर मन्थ को मिलाकर आहुति करता हुआ शमन करे
॥७॥ “नडमारोह०” से चार और “अग्ने अक्रव्यादिमं०” इत्यादि से
आहुति देता हुआ शमन करे ॥८॥ दक्षिण में जरत्कोष्ठ में शीत को
भस्म से दूर करे ॥९॥ शान्त्युदक से सुशान्त करके अवदग्ध को गर्त्त
से खने, और “परं मृत्यो०” से उठावे ॥११॥ “क्रव्यादं०” इन तीन
ऋचाओं से ले जाते को अनुमंत्रण करे ॥१२॥ दीप आदि, का अभिनि-
गदन से प्रतिहरण द्वारा व्याख्यात हुआ जानो ॥१३॥ “अविः कृष्णा०”
निदधान करे ॥१४॥ अन्तिम को छोड़कर जेठेकी अञ्जली में सीसों
१७२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
मृड्ढ्वमित्यभ्यवनेजयति ॥१६॥ कृष्णोर्णया पाणि-
पादान्निमृज्य ॥१७॥ इमा जीवा उदीचीनैरिति मन्त्रो-
क्तम् ॥१८॥ त्रिः सप्तेति कूच्या पदानि घोपयित्वा नदी-
भ्यः ॥१९॥ मृत्योः पदमिति द्वितीयाया नावः ॥२०॥ परं
मृत्यो इति प्राग्दक्षिणं कूर्दी प्रविध्य ॥२१॥ सप्त नदीरू-
पाणि कारयित्वोदकेन पूरयित्वा ॥२२॥ आरोहत सवि-
तुर्नावमेतां सुत्रामाणं महीमृष्विति सहिरण्यां सयवां
नावमारोहयति ॥२३॥ अश्मन्वती रीयत उत्तिष्ठता प्र
तरता सखाय इत्युदीचस्तारयति ॥२४॥३॥७१॥
उत्तरतो गर्त उदक्प्रस्रवणेऽश्मानं निदधात्यन्तरिछ-
त्रम् ॥१॥ तिरो मृत्युमित्यश्मानमतिक्रामति ॥२॥ ता
अधरादुदीचीरित्यनुमन्त्रयते ॥३॥ निस्सालामिति शा-
लानिवेशनं सम्प्रोक्ष्य ॥४॥ ऊर्जं बिभ्रदिति प्रपादयति
को देवे ॥१५॥ “अस्मिन्यं०” से अभ्यवनेजन करे ॥१६॥ काले सूत
से हाथ पैर को निमार्जन करके ॥१७॥ “इमा जीवा उदीचीनैः” से
पूर्व मुख आवें ॥१८॥ “त्रिःसप्त०” से कूदी से पगों को छिपा कर
नदियों तक जावे ॥१९॥ “मृत्योः पदं०” द्वितीया कूदीसे पैरों को
छिपाकर सात नदी नाव तक जावे ॥२०॥ पूर्व दक्षिण कोण में
कूदी को फेक देवे । “परं मृत्योः पदं०” मंत्र पढ़कर ॥२१॥ सात नदियों
समान रूप बनाकर उनको जल से भर देवे ॥२२॥ “आरोहत सवितुः”
इत्यादि से नाव पर सोना में जौ मिलाकर नाव पर डालकर तब उस पर
चढ़े ॥२३॥ “अश्मन्वती०” इत्यादि को जपता हुआ नाव में बैठे और उत्तर
की ओर पार होवे ॥२४॥३॥७१॥ यह एकहत्तरवि कण्डिका समाप्त हुई ।
उस गर्त के उत्तर ढालुआ भूमि में पत्थर को जल में धरे ॥१॥
“तिरो मृत्युं०” से पत्थर पर चढ़े ॥२॥ “ता अधरादुदीचीः” से अनु-
मंत्रण करे ॥३॥ “निःसालां०” से शाला के घरको संप्रोक्षण करके
॥४॥ “ऊर्जं बिभ्रत०” से सब लोग शाला में प्रवेश करें । कोई २
Then ॥५॥ वैश्वदेवीमिति...
Wait! What if we just do:
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १७३
॥५॥ वैश्वदेवीमिति वत्सतरीमालम्भयति ॥६॥ इममि-
...
Wait, "Prefix each line with line marker like , ."
Yes! If every line in the output starts with [L...], that strictly satisfies "Prefix each line with line marker like , . Output line markers for every line."
Let's verify line by line:
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १७३
॥५॥ वैश्वदेवीमिति वत्सतरीमालम्भयति ॥६॥ इममि-
न्द्रमिति वृषम् ॥७॥ अनड्वाहमहोरात्रे इति तल्पमा-
लम्भयति ॥ ८ ॥ आरोहतायुरित्यारोहति ॥६॥ आसी-
ना इत्यासीनामनुमन्त्रयते ॥१०॥ पिञ्जूलीराञ्जनं सर्पिषि
पर्यस्येमा नारीरिति स्त्रीभ्यः प्रयच्छति ॥११॥ इमे
जीवा अविधवाः सुजामय इति पुम्भ्य एकैकस्मै तिस्र-
स्तिस्रस्ता अध्यध्युदधानं परिव
१७४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
स्वेन जुहोति ॥१६॥ इमं जीवेभ्य इति द्वारे निदधाति ॥१७॥
जुहोत्येतयर्चा आयुर्दावा धनदावा बलदावा पशुदावा
पुष्टिदावा प्रजापतये स्वाहेति ॥१८॥ षट्सम्पातं माता
पुत्रान्नाशयते ॥१९॥ उच्छिष्टं जायाम् ॥२०॥ संवत्सर-
मग्निं नोद्वायान्न हरेन्नाहरेयुः ॥२१॥ द्वादशरात्र इत्येके
॥२२॥ दश दक्षिणा ॥२३॥ पश्चादग्नेर्वाग्यतः संविशति
॥२४॥ अपरेद्युरग्निं चेन्द्राग्नी च यजेत ॥२५॥ स्थाली-
पाकाभ्यामग्निं चाग्नीषोमौ च पौर्णमास्याम् ॥२६॥
सायंप्रातर्व्रीहीनावपेद्यवान्वाग्नये स्वाहा प्रजापतये
स्वाहेति ॥२७॥ सायं सूर्याय स्वाहा प्रजापतये स्वाहेति
॥२८॥ प्रातर्द्वादशरात्रेऽग्निं पशुना यजेत ॥२९॥ स्थाली-
पाकेन वोभयोर्विरिष्यति ॥३०॥ संवत्सरतम्यां शान्त्यु-
दकं कृत्वा ॥३१॥ घृताहुतिर्नो भवाग्ने अक्रव्याहुति-
स्वयं आहुति करे ॥१६॥ “इमं जीवेभ्यः” से द्वार पर धरे ॥१७॥ “जु-
होति०” इस ऋचा से और “आयुर्दावा” इत्यादि से आहुति देवे ॥१८॥
छः सम्पातों को माता पुत्रों को खिलावे ॥१९॥ यजमान स्वयं खाकर
उच्छिष्ट अपनी पत्नी को देवे ॥२०॥ यह आवसथ्याधान पूरा हुआ ।
साल भर तक अग्नि को पुतावे और न किसी को देवे और न आप लेवे
॥२१॥ कोई २ बारह रात्रि में कहते हैं ॥२२॥ दश दक्षिणा देवे ॥२३॥
यजमान अग्नि के पश्चिम भाग में बैठे ॥२४॥ और दूसरे दिन अग्नि और
इन्द्राग्नी को यजन करे ॥२५॥ सायं प्रातः स्थालीपाक से अग्नि और
अग्नीषोम को पौर्णमासी तिथि में आहुतियाँ करे ॥२६॥ “सायं प्रातः
व्रीहियों या यवों से” “अग्नये स्वाहा। प्रजापतये स्वाहा” से सायंकाल में
और “सूर्याय स्वाहा। प्रजापतये स्वाहा” से प्रातःकाल में आहुतियाँ देवे
॥२७॥२८॥ १२ रात्रि के प्रातःकाल में अग्नि को पशु से यजन करे ।
॥३० ॥ स्थालीपाक से या दोनों से अलग २ करे ॥३०॥ वर्ष के अन्त में
उस अग्नि में शान्त्युदक करके । 'घृताहुतिर्नो' इत्यादि से घी की आहुति
An exact line-by-line transcription of the page into Markdown in Unicode Devanagari:
घृताहुतिं त्वा वयमक्रव्याहुतिमुपनिषदैम जातवेद इति
चतुर उदपात्रे सम्पातानानीय ॥३२॥ तानुल्लुप्य ॥३३॥ पुर-
स्तादग्नेः प्रत्यङ्ङासीनो जुहोति । हुते रमस्व हुतभाग
एधि मृडास्मभ्यं मोत हिंसीः पशून्न इति ॥३४॥ यद्युद्वा-
याद्भस्मनारणिं संस्पृश्य तूष्णीं मथित्त्वोद्दीप्य ॥३५॥ पूर्ण-
होमं हुत्वा ॥३६॥ संनतिभिराज्यं जुहुयाद् व्याहृतिभि-
र्वा ॥३७॥ संसृष्टे चैवं जुहुयात् ॥३८॥ अग्नावनुगते जाय-
माने ॥३९॥ आनडुहेन शकृत्पिण्डेनाग्न्यायतनानि परि-
लिप्य ॥४०॥ होम्यमुपसाद्य ॥४१॥ प्राणापानाभ्यां स्वाहा
समानव्यानाभ्यां स्वाहोदानरूपाभ्यां स्वाहेत्यात्मन्येव
जुहु
१७६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
समतीते सन्धिवर्णेऽथ हावयेत्सुसमिद्धे पावक आहुती-
र्बहिः ॥१॥ अग्नये च प्रजापतये च रात्रावादित्यश्च दिवा
प्रजापतिश्च। उदकं च समिधश्च होमे होमे पुरो वरम् ॥२॥
होम्यैः समिद्भिः पयसा स्थालीपाकेन सर्पिषा सायम्प्रात-
र्होम एतेषामेकेनापि सिध्यति ॥३॥ अभ्युद्धृतो हुतोऽग्निः
प्रमादादुपशाम्यति । मथिते व्याहृतोर्जुहुयात् पूर्णहोमौ
यथर्त्विजौ ॥४॥ वनस्पतिभ्यो वानस्पत्येभ्य ओषधि-
भ्यो वीरुद्भ्यः सर्वेभ्यो देवेभ्यो देवजनेभ्यः पुण्यज-
नेभ्य इति प्राचीनं तदुदकं निनीयते ॥५॥ स्वधा प्रपिताम-
हेभ्यः स्वधा पितामहेभ्यः स्वधा पितृभ्य इति दक्षिणतः॥६॥
तार्क्ष्यायारिष्टनेमयेऽमृतं मह्यमिति पश्चात् ॥६॥ सोमाय
सप्तर्षिभ्य इत्युत्तरतः ॥८॥ परिमृष्टे परिलिप्ते च पर्वणि
व्रातपतं हावयेदन्नमग्नौ। भूयो दत्त्वा स्वयमल्पं च भुक्त्वा
जब सूर्योदय और सूर्यास्त के समय घर की स्त्री (मालकिनी)
अपने हाथों को जल से धोकर, शौचादि से निवृत्त होके शुद्ध हाथों से
अग्नि को जगावे ॥ और दोनों सन्धिकाल बीत जावे तो घरके बाहर
अग्नि में आहुतियाँ देवे ॥१॥ रात्रि में "अग्नये च प्रजापतये च"।
और दिन में आदित्य प्रजापति के नाम आहुतियाँ करे। जल और
समिद् प्रत्येक होम में पूरे और उत्तम लावे ॥२॥ होम करने की वस्तु
समिद्, दूध, स्थालीपाक और घृत। सायं प्रातः इनकी आहुति करे या
इनमें से किसी एक से करे ॥३॥ अभ्युद्धृत, यदि प्रमाद से बुत जावे तो,
अरणियों द्वारा मथितोत्पन्न अग्नि में व्याहृति से और पूर्ण होम भी करे
जैसा दोनों ऋत्विज कहें ॥४॥ "वनस्पतिभ्यो" इत्यादि से पूर्व की ओर
आहुतियाँ करे और जल लावे ॥५॥ और "स्वधा प्रपितामहेभ्यः" इत्यादि
से दक्षिण में, "तार्क्ष्याय०" से पश्चिम दिशा में और "सोमाय सप्तर्षिभ्यः"
से उत्तर दिशा में आहुतियाँ देवे ॥६॥७॥८॥ मार्जन और लीपने पर
(भूमिको) व्रतपतिको अन्न की आहुति अग्नि में करे॥ थोड़ा या बहुत दूसरों
को अन्न देकर आप भोजन अपराह्न में करे—यह याज्ञिक व्रत है ॥९॥
पराह्णे व्रतमुपैति याज्ञिकम् ॥ ९ ॥ अनशनं ब्रह्मचर्यं
च भूमौ शुचिरग्निमुपशेते सुगन्धिः ॥१०॥ अग्नीषोमा-
भ्यां दर्शने इन्द्राग्निभ्यामदर्शने ॥ आग्नेयं तु पूर्वं नित्य-
मन्वाहार्यं प्रजापतेः ॥११॥ अर्धाहूतिस्तु सौविष्टकृती
सर्वेषां हविषां स्मृता ॥ आनुमती वा भवति स्थाली-
पाकेष्वथर्वणाम् ॥१२॥ उभौ च संधिसौ यौ वैश्वदेवौ
यथाऋत्विजौ । वर्जयित्वा सबर्हिषः साज्या यज्ञाः सदक्षिणाः
॥१३॥ यथाशक्ति यथाबलं हुतादोऽन्ये अहुतादोऽन्ये ॥
वैश्वदेवं हविरुभये संचरन्ति ॥१४॥ ते सम्यञ्च इह माद-
यन्तामिषमूर्जं यजमाना यमिच्छत । विश्वे देवा इदं
हविरादित्यासः सपर्यत ॥ अस्मिन्यज्ञे मा व्यथिष्य-
मृताय हविष्कृतम् ॥१५॥ वैश्वदेवस्य हविषः सायम्प्रात-
र्जुहोति । सायमाशप्रातराशौ यज्ञावेतौ स्मृतावुभौ
॥१६॥ अप्रतिभुक्तौ शुचिकार्यौ च नित्यं वैश्वदेवौ
जानता यज्ञश्रेष्ठौ । नाश्रोत्रियो नानवनिक्तपाणिर्ना-
उपवास रहना और ब्रह्मचर्य से रहना पवित्र होकर, अग्नि के पास
सोवे और सुगन्ध युक्त रहे ॥१०॥ दर्शन में अग्नीषोमों से, अदर्शन में
इन्द्राग्नी से ॥ आग्नेय को पहिले नित्य और उसके पश्चात् प्रजापति की
॥११॥ सौविष्ट कृत की आधी आहुति यह नियम सब ही होमों का है ॥
या अथर्ववेदियों का होम आनुमती स्थालीपाक से होता है ॥१२॥ और
जो दोनों सन्धि समय बलि, वैश्वदेव यथा ऋत्विज । सबर्हिष को छोड़
कर आज्य के साथ होता है और दक्षिणा के साथ सब यज्ञ होते हैं
॥१३॥ शक्ति एवं बल के अनुसार हुताद, अन्य अहुताद, अन्य वैश्वदेव
हवि दोनों समय करते हैं ॥१४॥ “ते सम्यञ्च” इत्यादि को पढ़े ॥१५॥
वैश्वदेव की हवि को सायं प्रातःकाल आहुतियाँ करे और सायंकाल
एवं प्रातःकाल का भोजन पवित्र बनावे ये दोनों यज्ञ हैं—यह धर्मशास्त्र
में कहा है ॥१६॥ दोनों यज्ञों को श्रेष्ठ जानकर बिना भोजन किये
पवित्रता से नित्य भोजन बनावे ॥ न अवैदिक, न जल से साफ किये
२३
१७८ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
मन्त्रविज्जुहुयान्नाविपश्चित् ॥१७॥ बीभत्सवः शुचि-
कामा हि देवा नाश्रद्दधानस्य हविर्जुषन्ते । ब्राह्मणेन
ब्रह्मविदा तु हावयेन्न स्त्रीहुतं शूद्रहुतं च देवगम् ॥१८॥
यस्तु विद्यादाज्यभागौ यज्ञान्मन्त्रपरिक्रमान् । देवता-
ज्ञानमावृत आशिषश्च कर्म स्त्रिया अप्रतिषिद्धमाहुः
॥१९॥५॥७३॥
तयोर्बलिहरणम् ॥१॥ अग्नय इन्द्राग्निभ्यां वास्तोष्प-
तये प्रजापतयेऽनुमतय इति हुत्वा ॥२॥ निष्क्रम्य बहिः
प्रचीनं ब्रह्मणे वैश्रवणाय विश्वेभ्यो देवेभ्यः सर्वेभ्यो देवे-
भ्यो विश्वेभ्यो भूतेभ्यः सर्वेभ्यो भूतेभ्य इति बहुशो बलिं
हरेत् ॥३॥ द्विः प्रोक्षन्प्रदक्षिणमावृत्यान्तरुपातीह्य
द्वारे ॥४॥ द्वार्ययोर्मृत्यवे धर्माधर्माभ्याम् ॥५॥ उदधाने
धन्वन्तरये समुद्राद्यौषधिवनस्पतिभ्यो द्यावापृथिवीभ्या-
हाथ, न विना मंत्रजाने और न अपण्डित आहुतियाँ करे ॥ १७ ॥ देव-
गण बिभत्सु, और शुचि की कामना वाले होते हैं इसलिये श्रद्धाहीन
व्यक्ति की आहुति नहीं ग्रहण करते हैं । ब्राह्मण और ब्रह्म के जानने वाले
से ही हवन करावे । स्त्री एवं शूद्र की दी आहुतियाँ देवताओं तक नहीं
पहुँचतीं ॥१८॥ जो आज्यभागों को जानता है, यज्ञों को और मंत्रपरि-
क्रमों को एवं देवताज्ञान से आवृत्त हो और आशीर्वाद देना जानता
हो ॥ इनके करने का अधिकार स्त्रियों को नहीं है ॥१९॥५॥७३॥ यह
तिहत्तरवी कण्डिका समाप्त हुई ।
स्त्री पुरुष के बलि हरण को कहते हैं । गृही के घर जो कुछ अन्न
दोनों समय खाने के लिये पकता है—उस अन्न से देवतादिकों के लिये
उपहार दिया जाता है उसको बलि कहते हैं ॥ “अग्नय०” इत्यादि से
आहुति देकर ॥२॥ घर से बाहर होकर, पूर्व दिशा में पूर्वमुख हो
“ब्रह्मणे०” इत्यादि से बहुत बलि देवे ॥३॥ दो वार प्रदक्षिण घुम २ कर
दोनों द्वार पर “धर्माधर्माभ्याम्” से बलियाँ देवे ॥४॥५॥ जलधरने के
स्थान में “धन्वन्तरये०” इत्यादि से बलियाँ देवे ॥६॥ इसी प्रकार