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सर्वकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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पृष्ठ 263

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २३१
हेति हुत्वा ॥३॥ समास्त्वाग्न इत्येतेन सूक्तेन जुहुयात्
॥४॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥५॥१०॥१०२॥
अथ यत्रैतदुपतारकाः शङ्कन्ते तत्र जुहुयात् ॥ १ ॥
रेवतीः शुभ्रा इषिरा मदन्तीस्त्वचो धूममनु ताः संवि-
शन्तु । परेणापः पृथिवीं सं विशन्त्वाप इमां लोकाननु
संचरन्तु ॥ अद्भ्यः स्वाहेति हुत्वा ॥ २ ॥ समुत्पतन्तु
प्रनभस्वेति वर्षोर्जुहुयात् ॥ ३ ॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः
॥४॥११॥१०३॥
अथ यत्रैतद्ब्राह्मणा आयुधिनो भवन्ति तत्र जुहु-
यात् ॥१॥ य आसुरा मनुष्या आत्तधन्वः पुरुषमुखाश्च-
रानिह । देवा वयं मनुष्यास्ते देवाः प्रविशामसि ।
इन्द्रो नो अस्तु पुरोगवः स नो रक्षतु सर्वतः । इन्द्राय
स्वाहेति हुत्वा ॥२॥ मा नो विदन्नमो देववधेभ्य इत्येता-
भ्यां सूक्ताभ्यां जुहुयात् ॥ ३ ॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः
॥४॥१२॥१०४॥
देकर ॥ २ ॥ ३ ॥ “समास्त्वाग्न०” इस सूक्त से आहुति देवे ॥ ४ ॥
यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥ ५ ॥ १० ॥ १०२ ॥ यह एक सौ दूसरी
कण्डिका समाप्त हुई ।
अब जहां यह उपतारकाओं की शङ्का होती है, तहां आहुति देवे ॥
॥ १ ॥ “रेवतीः शुभ्रा इषिरा०” इत्यादि से आहुति देवे ॥ ३ ॥ यह
उसकी प्रायश्चित्ति है ॥ ४ ॥ ११ ॥ १०३॥ यह एक सौ तीसरी कण्डिका
खतम हुई ।
अब जहां ब्राह्मणलोग अस्त्रधारी होते हैं, तहां आहुति देवे ॥ १ ॥
“य आसुरा मनुष्या०” इत्यादि से आहुति देकर ॥ २ ॥ “मा नो
विदन्नमो०” इत्यादि दो सूक्तों से आहुति देवे ॥ ३ ॥ यह उसकी
प्रायश्चित्ति है ॥ ४ ॥ १२ ॥ १०४॥ यह एक सौ चारवी कण्डिका
खतम हुई ।