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सर्वकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

पृष्ठ 249, कुल 361 में से

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पृष्ठ 249

ह्वेतदाहिताग्नेः ॥१५॥ गृहेष्वनाहिताग्नेः ॥१६॥ इदं
चिन्मे कृतमस्तीदं चिच्छक्रवानि । पितरश्चिन्मा वेद-
न्निति ॥१७॥ यो ह यजते तं देवा विदुर्यो ददाति तं मनु-
ष्यायः श्राद्धानि कुरुते तं पितरस्तं पितरः ॥१८॥१०॥८६॥
इत्यथर्ववेदे कौशिकसूत्रे एकादशोऽध्यायः समाप्तः ॥११॥
मधुपर्कमाहारयिष्यन् दर्भानाहारयति ॥१॥ अथ
विष्टरान् कारयति ॥२॥ स खल्वेकशाखमेव प्रथमं पाद्यं
द्विशाखमासनं त्रिशाखं मधुपर्काय ॥३॥ स यावतो
मन्येत तावत उपादाय विविच्य संपर्याप्य मूलानि च
प्रान्तानि च यथाविस्तीर्ण इव स्यादित्युपोत्कृष्य मध्य-
देशेऽभिसंनह्यति ॥४॥ ऋतेन त्वा सत्येन त्वा तपसा
त्वा कर्मणा त्वेति संनह्यति ॥५॥ अथ ह सृजत्यतिसृष्टो

प्रणीत हों तो दक्षिणाग्नि में यह होम कर्म आहिताग्नि का होगा ॥१५॥
और अनाहिताग्नि का अग्नि में होम घर ही में होगा ॥१६॥ “इदं चिन्मे
कृतमस्ति०” मंत्र से अग्नि का उपस्थान करे ॥१७॥ जो कोई देवयज्ञ
करता है उस को देवता जान लेते हैं, जो दान देता है उसको मनुष्य
लोग जान लेते हैं, और जो श्राद्ध करता है उस को पितर लोग जानते हैं
॥१८॥१०॥८९॥ यह नवासिवी कण्डिका खतम हुई ॥
यह अथर्ववेद के कौशिकसूत्र का ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥११॥
मधुपर्क कर्म को कहते हैं । जब आचार्य्य यजमान के घर आते
हैं तो यह कर्म होता है । मधुपर्क सामग्री लाते समय दर्भों को भी लावे
॥१॥ अब विष्टरों को बनवावे ॥२॥ यह पहिला काम है । पाद्य
( पैर धोने को जल ) दूसरा है, आसन और तीसरा है मधुपर्क ॥ सो
जितना चाहे उतना लाकर अलग २ घरे और कुशों के जड़ एवं प्रान्त
भाग बिछाने की भाँति घरे तो वहाँ से लेकर मध्य देश में कुशों को
यथाविधि बान्धे ॥ “ऋतेन त्वा सत्येन त्वा०” इत्यादि से कुशों
को इस भाँति बान्धे जिसमें बिछाने के काम में आवे ॥५॥ अब
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