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सर्वकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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पृष्ठ 264

२३२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
अथ यत्रैतद्दैवतानि नृत्यन्ति च्योतन्ति हसन्ति
गायन्ति वान्त्यानि वा रूपाणि कुर्वन्ति य आसुरा मनु-
ष्या मा नो विदन्नमो देववधेभ्य इत्यभयैर्जुहुयात् ॥ १ ॥
सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥२॥१३॥१०५॥
अथ यत्रैतल्लाङ्गले संसृजतः पुरोडाशं श्रपयित्वा
॥१॥ अरण्यस्यार्धमभिव्रज्य ॥२॥ प्राचीं सीतां स्थाप-
यित्वा ॥ ३ ॥ सीताया मध्ये प्राञ्चमिध्ममुपसमाधाय
॥४॥ परिसमुह्य पर्युक्ष्य परिस्तीर्य बर्हिः शम्याः परि-
धीन्कृत्वा ॥५॥ अथ जुहोति । वित्तिरसि पुष्टिरसि श्री-
रसि प्राजापत्यानां तां त्वाहं मयि पुष्टिकामो जुहोमि
स्वाहा ॥६॥ कुमुद्वती पुष्करिणी सीता सर्वाङ्गशोभ-
नी । कृषिः सहस्रप्रकारा प्रत्यष्ठा श्रीरिदं मयि ॥ उर्वी
त्वाहुर्र्मनुष्याः श्रियं त्वा मनसो विदुः । आशायेऽन्नस्य
नो धेह्यनमीवस्य शुष्मिणः ॥ पर्जन्यपत्नि हरिण्यभिजि-
तास्यभि नो वद ॥ कालनेत्रे हविषो नो जुषस्व तृप्तिं
नो धेहि द्विपदे चतुष्पदे ॥ याभिर्देवा असुरानकल्पयन्
यातून्मनून् गन्धर्वान् राक्षसांश्च । ताभिर्नो अद्य सुमना


अब जहां देवता (या मूर्तियां) नाचतीं, इधर उधर चलती, हँसती,
गाती हैं या अन्यान्य रूपों को धारण करती हैं-वहां “य आसुरा०”
इत्यादि से आहुति देवे ॥ १ ॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥ २ ॥ १३ ॥
॥ १०५ ॥ यह एक सौ पांचवीं कण्डिका खतम हुई ॥
अब जहां लाङ्गल में बैल के पुच्छ का संसर्ग हो जावे या हल से
हल का। वहां पुरोडाशको पकाकर ॥१॥ अरण्य के आधे भाग में जाकर
॥ २ ॥ पूर्व मुख सीता को स्थापन करके ॥ ३ ॥ सीता के मध्य भाग में
पूर्वाभिमुख इध्मों का उपसमाधान करके ॥ ४ ॥ परिसमूहन, पर्युक्षण,
परिस्तरण करके बर्हि, शम्या, परिधियों को करके ॥ ५ ॥ आहुति देवे ।
“वित्तिरसि पुष्टिरसि०” इत्यादि आहुतियां देवे ॥ ६ ॥ “कुमुद्वती पुष्क-