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सर्वकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

पृष्ठ 252, कुल 361 में से

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पृष्ठ 252

२२० अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
ष्ठाप्य॥४॥ द्वाभ्यामङ्गुलीभ्यां प्रदक्षिणमाचाल्यानामिकया-
ङ्गुष्ठ्याङ्गुष्ठेन च संगृह्य प्राश्नाति ॥५॥ ओं भूस्तत्सवितु-
र्वरेण्यं भूः स्वाहेति प्रथमम् ॥६॥ भर्गो देवस्य धीमहि
भुवः स्वाहेति द्वितीयम् ॥७॥ धियो यो नः प्रचोदयात्स्वः
स्वाहेति तृतीयम् ॥८॥ वयं देवस्य धीमहि जनत्स्वाहेति
चतुर्थम् ॥९॥ तुरं देवस्य भोजनं वृधत्स्वाहेति पञ्चमम्
॥१०॥ करत्स्वाहेति षष्ठम् ॥११॥ रुहत्स्वाहेति सप्तमम्
॥१२॥ महत्स्वाहेत्यष्टमम् ॥१३॥ तत्स्वाहेति नवमम्॥१४॥
शं स्वाहेति दशमम्॥१५॥ ओमित्येकादशम्॥१६॥ तूष्णीं
द्वादशम् ॥१७॥ तस्य भूयोमात्रमिव भुक्त्वा ब्राह्मणाय
श्रोत्रियाय प्रयच्छेत् ॥१८॥ श्रोत्रियालाभे वृषलाय प्रय-
च्छेत् ॥१९॥ अथाप्यर्थं निगमो भवति। सोममेतत्पिबत
यत्किं चाश्नीत ब्राह्मणाः। माब्राह्मणायोच्छिष्टं दात मा
सोमं पाध्वसोमप इति ॥२०॥२॥६१॥
से उसको भूमि पर धर कर दोनो अङ्गुलियो से प्रदक्षिण कटोरे में के
मधुपर्क को चलाकर अनामिका अङ्गुली और अंगूठे से लेकर चाटे ॥५॥
“ओं भूस्तत्सवितुर्वरेण्यं भूः स्वाहा” से पहिली बार । “भर्गो देवस्य
धीमहि भुवः स्वाहा” से दूसरी बार । “धियो यो नः प्रचोदयात् स्वः
स्वाहा” से तीसरी बार ॥८॥ “वयं देवस्य०” से चौथी वार ॥९॥ “तुरं
देवस्य भोजनं०” से पञ्चम बार ॥१०॥ “करत्स्वाहा” से छठी बार
॥११॥ “रुहत्स्वाहा” से सप्तम बार ॥१२॥ “महत्स्वाहा” से अष्टम बार
॥१३॥ “तत्स्वाहा” से नवम बार ॥१४॥ “शं स्वाहा” से दशम बार ॥१५॥
“ओं” से ग्यारहवीं बार ॥१६॥ तूष्णीं बारहवी बार ।१७॥ उसको
बड़ी मात्रा से खाकर श्रोत्रिय ब्राह्मण के लिये दे देवे ॥१८॥ यदि श्रोत्रिय
न मिलें तो वृषल को देवे ॥१९॥ यहां पर निगम का प्रमाण भी है।
यह जो ब्राह्मण पीता है, वह सोम पीता है। ब्राह्मण को उच्छिष्ट न देवे
और न असोमप को सोम पीने को देवे ॥२०॥२॥९१॥ यह एक्यानबेवी
कण्डिका खतम हुई ।