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सर्वकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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पृष्ठ 266

२३४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
॥३॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥४॥१५॥१०७॥
अथ यत्रैतदग्निनाग्निः संसृज्यते भवतं नः समन-
सौ समोकसावित्येतेन सूक्तेन जुहुयात् ॥ १ ॥ भवतं
नः समनसौ समोकसावरेपसौ । मा हिंसिष्टं यज्ञपतिं
मा यज्ञं जातवेदसौ शिवौ भवतमद्य नः ॥ अग्निनाग्निः
संसृज्यते कविर्गृहपतिर्युवा । हव्यवाड् जुह्वास्यः ॥
त्वं ह्यग्ने अग्निना विप्रो विप्रेण सन्सता । सखा सख्या
समिध्यसे ॥ पाहि नो अग्न एकया पाहि न उत द्वितीयया ।
पाहि गीर्भिस्तिसृभिरूर्जांपते पाहि चतसृभिर्वसो ॥
समीची माहनी पातामायुष्मत्या ऋचो मा सन्ति ।
तनूपाःसाम्नो वसुविदं लोकमनुसंचराणि ॥२॥ रुक्मं कर्त्रे
दद्यात् ॥३॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥४॥१६॥१०८॥
अथ यत्रैतद्यमसूर्यमौ जनयति तां शान्त्युदकेना
भ्युक्ष्य दोहयित्वा ॥ १ ॥ तस्या एव गोर्दुग्धे स्थालीपाकं
श्रपयित्वा ॥२॥ प्राञ्चमिध्ममुपसमाधाय ॥३॥ परिसमुह्य
पर्युक्ष्य परिस्तीर्य बर्हिरुदपात्रमुपसाद्य ॥ ४ ॥ एकैक-
उसकी प्रायश्चित्ति है ॥४॥ १५ ॥ १०७ ॥ यह एक सौ सातवी
कण्डिका समाप्त हुई ॥
अब जहां जहां अग्नि से अग्नि का संघर्ष हो जावे वहां "भवतं नः
समनसौ समोकसौ" इस सूक्त से आहुति देवे ॥ १ ॥ "भवतं नः सम-
नसौ०" इत्यादि से आहुति देवे ॥ २ ॥ कर्त्ता को दक्षिणा में सोना देवे
॥ ३ ॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥४॥१६॥१०८॥ यह एकसौ आठहवी
कण्डिका खतम हुई ॥
अब जहाँ एक साथ अनेक बच्चे गौ को पैदा हों उसको शान्ति जल
से अभ्युक्षण कर गौ को दुह करके ॥१॥ उसी गौ के दूध में स्थाली-
पाक पका कर ॥२॥ पूर्वाभिमुख इध्माधान करके ॥३॥ परिसमूहन,
पर्युक्षण, परिस्तरण करके, बर्हिकुश एवं जलपात्र लाकर के ॥४॥ 'एकैकयै-