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सर्वकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २२९
स्वाभिवस्ते । यथाग्निः पृथिवीमा विवेशैवायं ध्रुवो
अच्युतो अस्तु जिष्णुः। यथा देवो दिवि स्तनयन्वि राजति
यथा वर्षं वर्षकामाय वर्षति । यथापः पृथिवीमा विवि-
शुरेवायं ध्रुवो अच्युतो अस्तु जिष्णुः॥ यथा पुरीषं नद्याः
समुद्रमहोरात्रे अप्रमादं क्षरन्ति ॥ एवा विशः संमनसो
हवं मेऽप्रमादमिहोपा यन्तु सर्वाः ॥ दृहंतां देवी सह
देवताभिर्ध्रुवा दृढाच्युता मे अस्तु भूमिः। सर्वंपाप्मानम-
पनुद्यास्मदमित्रान्मे द्विषतोऽनुविध्यतु ॥ पृथिव्यै स्वाहेति
हुत्वा ॥२॥ आ त्वाहार्षं ध्रुवा द्यौः सत्यं बृहदित्येतेनानु-
वाकेन जुहुयात् ॥३॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥४॥६॥९८॥
अथ यत्रैतदादित्यं तमो गृह्णाति तत्र जुहुयात्
॥१॥ दिव्यं चित्रमृत्वया कल्पयन्तमृतूनामुग्रं भ्रमयन्नु-
देति । तदादित्यः प्रतरन्नेतु सर्वत आप इमां लोकाननु-
संचरन्ति ॥ ओषधीभिः संविदानाविन्द्राग्नी त्वाभि-
रक्षताम् ॥ ऋतेन सत्यवाकेन तेन सर्वं तमो जहि ॥
आदित्याय स्वाहेति हुत्वा ॥२॥ विपासहिं सहमानमि-
त्येतेन सूक्तेन जुहुयात् ॥३॥ रोहितैरुपतिष्ठते ॥४॥ सा
तत्र प्रायश्चित्तिः ॥५॥७॥६६॥
इत्यादि से आहुति देकर ॥ २ ॥ “आ त्वाहार्षं ध्रुवा द्यौः०” इत्यादि
अनुवाकसे आहुति देवे ॥ ३ ॥ यही उसकी प्रायश्चित्ति है ॥ ४ ॥ ६ ॥
॥ ९८ ॥ यह अट्ठानवेवी कण्डिका खतम हुई ॥
जहां सूर्य ग्रहण होता है, वहां आहुति देवे ॥ १ ॥ “दिव्यं चित्र-
मृतूया०” इत्यादिसे आहुति देकर ॥ २ ॥ “विषासहिं०” इत्यादि
सूक्त से आहुति देवे ॥ ३ ॥ “रोहितैः” से उपस्थान करे ॥ ४ ॥ यह
उसकी प्रायश्चित्ति है ॥ ५ ॥ ७ ॥ ६६ ॥ यह निन्यानवेवी कण्डिका
खतम हुई ॥