कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
शब्दावली
(५११)
अर्ध छोड़ि ऊर्ध मन लावै । आपा मेटिके प्रेम बढ़ावै ॥१९॥
नना-नन्ना वो चौथे मह जाई । रामके गढ़हा हो खर खाई ॥ नाह
छोड़ किय नर्क बसेरा । नीच अजौ चित चेतु सवेरा ॥ २० ॥
पप्पा-पप्पा पाप करै सब कोई । पापके करे धर्म नहिं होई ॥
पप्पा कहै सुनहु रे भाई । हमरेसे ये कछू न पाई ॥२१॥
फफा-फफफा फल लागो बड दूरी । चाखै सतगुरु देई न तूरी ॥
फफफा कहै सुनहु रे भाई । स्वर्ग पतालकी खबरि न पाई ॥२२॥
बबा-बब्बा बर बर कर सब कोई । बर बर किये काज नहिं होई ॥
बब्बा-बात करै अरथाई । फलके मरम न जानेहु भाई ॥२३॥
भभा-भभभा भर्म रहा भरि पूरी । भभरे ते है नियरे दूरी । भभभा
कहै सुनौ रे भाई । भभरे आवे भभरे जाई ॥ २४ ॥
ममा-मम्मा सेये मर्म न पाई । हमरे ते इन्ह मूल गंवाई ॥ मम्मा
मूल गहल मन माना । मर्मी होय सो मर्महि जाना ॥ २५ ॥
यया-जगत रहा भर पूरी । जगतहुते जब्बा है दूरी ॥ जब्बा कहै
सुनौ रे भाई । हमरेसे ये जय जय पाई ॥ २६ ॥
ररा-ररां रागि रहा अरुझाई । राम कहै दुख दारिद जाई ॥ ररां
कहै सुनौ रे भाई । सतगुरु पूछिकै सेवहु जाई ॥ २७ ॥
लला-लब्बा लुतरे बात जनाई । लुतरे पावै परचे पाई ॥ अपना
लुतुर औरको कहई । एकै खेत दुनौ निर्बहई ॥ २८ ॥
ववा-वब्बा वह वह कह सब कोई । वह वह कहे काज नहिं होई ॥
वह तो कहै सुनै नहिं कोई । सरग पताल न देखै कोई ॥२९॥
शशा-सरसा सर नहिं देखै कोई । सर सीतलता एकै होई ॥ सरसा
कहै सुनौरे भाई । शून्य समान चला जग जाई ॥ ३० ॥
षष्ठा-षष्ठा षरा कहे सब कोई । षर षर कहै काज नहिं होई ॥
षष्ठा कहै सुनहुरे भाई । राम नाम लै जाहु पराई ॥३१॥
(५१२)
कवीरपंथी-
ससा-सस्सा सरा रच्यो वरियाई । सर बेघे सब लोग तवाई ॥
सस्साके घर सुन गुन होई । इतनी बात न जाने कोई ॥३२॥
हहा-हहहा हाय हायमें सब जग जाई । हरष सोक सब मांहि
समाई ॥ हकरि हकरि सब बड बड गयऊ ॥ हहहा मर्म न
काहू पयऊ ॥ ३३ ॥
क्षक्षा-छछछा छण प्रलय मिटि जाई । छेव परे तब को समुझाई ॥
छेव परे कोउ अन्त न पाया । कह कवीर अगमन गोह-
राया ॥ ३४ ॥
इति चौतीसा बीजकका सम्पूर्ण ॥
अथ विप्रमतीसी प्रारम्भः ॥
सुनहु सबन मिलि विप्र मतीसी । हरि विनु बूड़ी नाव भरीसी ॥
॥१॥ ब्राह्मण होयके ब्रह्म न जाने । घरमें जग्य प्रतिग्रह आने
॥२॥ जो सिरजा तेहि नहिं पहिचानै । करम भरम लै बैठि बखानै
॥ ३ ॥ ग्रहण अमावस सायर पूजा । स्वातिके पात परहिं जनि
दूजा ॥४॥ प्रेत कर्म मुख अंतर बासा । आहुति सहित होमकी
आसा ॥५॥ कुल उत्तम कुल माहि कहावे । फिरि फिरि मध्यम
कर्म करावे ॥ ६ ॥ करम असुचि उछिछे खाहीं । मति भरिष्ट
जमलोकहिं जाहीं ॥ ७ ॥ सुत दारा मिलि जूठा खाहीं । हरि
भगतनकी छूत कराहीं ॥ ८ ॥ नहाय खोरि उत्तम है आवे ।
विष्णुभक्त देखे दुख पावे ॥ ९ ॥ स्वारथ लागि रहे वे आढा ।
नाम लेत जस पावक डाढा ॥१०॥ राम किन्नकी छोडिन आसा ।
पठि गुनिभै किरतिमके दासा ॥ ११ ॥ करम करहि करमहिको
धावे । जो पूछे तेहि करम हढावै ॥ १२ ॥ निःकरमीकी निंदा
करई । कर्म करे ताही चित धरई ॥ १३ ॥ अस हिय भगति
शब्दावली
(५१३)
भगवतको लावे। हिरणाकुसको पंथ चलावे ॥१४॥ देखहु कुमति
नरक प्रकासा। विनु लखि अंतर कृत्रिमदासा ॥ १५ ॥ जाके
पूजे पाप न ऊड़े। नाम सुमिरते भवमें बूड़े ॥१६॥ पाप पुण्यके
हाथहि पासा। मारि जगत जग कीन विनासा ॥१७॥ वै बहनी
दोउ बहनी न छाड़े। वह गृह जारे वह गृह माड़े ॥१८॥ बैठे ते
घर साहु कहावे। भितर भेद मन सुसहि लगावे ॥ १९ ॥ ऐसी
विधि सुर विप्र भनीजे। नाम लेत पंचासन दीजे ॥ २० ॥ बूडि
गये नहिं आपु सवौंरा। ऊँच नीच कहु काहि जोहारा ॥२१॥
ऊँच नीच है मध्यम बानी। एकै सबन एक है पानी ॥२२॥ एकै
मटिया एक कुम्हारा। एकै पवनको सिरजन हारा ॥२३॥ एकै
चाक बहु चित्र बनाया। नाद विहुके बीच समाया ॥ २४ ॥
व्यापी एक सकलमें जोती। नाम धरेका कहिये मोती ॥ २५ ॥
राच्छस करनी देव कहावे। वाद करे भव पार न पावे ॥२६॥
हंस देह तजि न्यारा होई। ताकी जात कहै धौं कोई ॥ २७ ॥
स्वेद सपेद कि राता पियरा। अवरन बरन कि ताता सियरा
॥ २८ ॥ हिंदू तुरुक कि बूढा वारा। नारि पुरुष मिलि करहु
विचारा ॥ २९ ॥ कहिय काहि कहा नहिं माना। दास कवीर
सोई पहिचाना ॥ ३० ॥
सा०-बहिया है बहिजात है, कर गहि ऐंचहु ओर।
समझाये समझे नहीं, दे धका दुई ओर ॥१॥
इति विप्रमतसौ बौजकौ।
कहरा. १
सहज ध्यान रहु सहज ध्यान रहु, गुरुके वचन समाई हो ॥
मेली मृष्टि चरा चित राखहु, रहौ दृष्टि लौलाई हो ॥ जस दुख
कवीरपंथी शब्दावली १७
(५१४)
कबीरपंथी-
देखि रहहु यहि औसर, अस सुख होई हैं पाई हो ॥ जो खुट-
कार बेगि नहिं लागे, हृदय निवारहु कोऊ हो ॥ भुगतिकी डोरी
गाठि जनि खैचहु, तब बझिहैं बड रोहू हो ॥ मनु वहि कहहु
रहहु मन मारे, खिजुवा खीजि न बोले हो ॥ मानु भीत मितार्ई न
छोडे, कबहुँ गांठि न खोले हो । भोगउ भोग मुक्ति जनि भूलहु,
जोग जुगति तन साधहु हो ॥ जो यह भांति करहु मतबलिया
ता मतके चित बांधहु हो ॥ नहिं तो ठाकुर है अति दारुन करिहैं
चाल कुचाली हो ॥ बांधि मारि डंड सब लेहीं, छूटहिं तब मत-
वाली हो ॥ जबही सावंत आनि पहुँचे, पीठ सांठि भल दुटिहैं
हो ॥ ठाठे लोग कुटुम सब देखे कहे काहुके न छुटिहैं हो ॥ एक
तो निहुरि पांव परि विनवे, विनति किये नहिं माने हो ॥ अन-
चीन्हे रहेहु न कियेहु चिन्हारी, सो कैसे पहिचनबेउ हो ॥ लीन्ह
बुलाय बात नहिं पूछी, केवट गरब तन बोले हो ॥ जाकर गांठि
समर कछु नाहीं, सो निर्थनिया है डोले हो ॥ जिन्ह सम युक्ति
अगमनकै राखिन, धरिन मच्छ भरि डेहरि हो ॥ जेकर हाथ पांव
कछु नाहीं, धरन लाग तेहि सो हरि हो ॥ पेलना अच्छत पेलि
चलु वौरे, तीर तीरका टोवहु हो ॥ उथले रहहु परहु जनि गहिरे,
मति हाथहुकी खोवहु हो ॥ तरके घाम उपरके भूँभुरि, छाहैं
कतहुँ नहिं पायहु हो ॥ ऐसनि जानि पसीझेहु सीझेहु, कस न
छतुरिया छायहु हो ॥ जो कछु खेल कियहु सो कीयेहु, बहुरि
खेल कस होई हो ॥ सासु ननद दोऊ देत उलाटन, रहहु लाज
मुख गोई हो ॥ गुरु भौ ठील गोन भई लचपच, कहा न मानेहु
मोरा हो ॥ ताजी तुकी कबहुँ न साधेहु, चढेहु काठको घोरा हो ॥
ताल झांझ भल बाजत आवे, कहरा सब कोइ नाचे हो ॥ जेहि
रंग दुलहा ब्याहन आये, दुलहिनि तेहि रंग राचे हो ॥ नौका
शब्दावली
(५१५)
अछत खेवे नहिं जाने, कैसेक लगवेहु तीरा हो ॥ कहहिं कवीर
राम रस माते, जोलहा दास कवीरा हो ॥ १ ॥
कहरा २.
मत सुनु मानिक मत सुनु मानिक, हृदय बंद निवारहु हो ।
अटपट कुम्हरा करे कुम्हरैया, चमरा गांव न बांचे हो ॥ नित
उठि कोरिया पेट भरतु है, छिपिया आंगन नाचे हो ॥ नित
उठि नौवा नाव चढतु है, बेरहि बेरा बोरे हो ॥ राउरकी कछु
खबरि न जानहु, कैसेकै झगरा निबेरहु हो ॥ एक गांवमें पाँच
तरुनि बसे, जेहि मा जेठ जेठानी हो ॥ आपन आपन झगरा
प्रकासनि, पियासों प्रीति नसाइनि हो ॥ भैंसिन माहिं रहत
नित बकुला, तिकुला ताकि न लीन्हा हो ॥ गाइन माहिं बसेउ
नहिं कबहुँ, कैसे पद पहिचनबेउ हो ॥ पंथी पंथ बूझ नहिं लीन्हा,
मूढहिं मूढ गंवारा हो ॥ घाट छोड़ि कस औघट रेंगहु, कैसेके
लगबेहु तीरा हो ॥ जतइनके धन हेरिन ललचिन, कोदइतके मन
दौरा हो ॥ दुइ चकरी जनि दरर पसारहु, तब पैहौ ठीक ठौरा
हो ॥ प्रेम बाण एक सतगुरु दीन्हो, गाढों तीर कमाना हो ॥
दास कबीर कीन्ह यह कहरा, महरा माहिं समाना हो ॥ २ ॥
कहरा ३.
रामनामको सेवहु बीरा, दूरि नहिं दुरि आसा हो ॥ और
देवका सेवहु बौरै, ई सब झूठी आसा हो ॥ ऊपर ऊजरका भौ
बौरै, भीतर अजहुं कारो हो ॥ तनके बूद्ध का भौ बौरै, मनुवा
अजहुं बारो हो ॥ मुखते दांत गये का बौरै, भीतर दांत लोहेके
हो ॥ फिर फिर चना चबाव विषयके, काम कोध मद लोभैके
हो ॥ तनकी सकल वासना घटि गयऊ, मनहिं दिलासा दूना हो ॥
कहहिं कवीर सुनो हो संतो, सकल सयानपऊना हो ॥ ३ ॥
(५१६)
कबीरपंथी-
कहरा ४.
ओढन मोर राम नाम, मैं रामहिका बनजारा हो ॥ रामं नामका करहुँ बनिजिया, हरि मोर हटवारा हो ॥ सहस नामका करो पसारा, दिन दिन होत सवाई हो ॥ जाके देव वेद पछ राखा, ताके होत हटवाई हो ॥ कानि तराजू सेर तिन पउवा, तुकिन ढोल बजाई हो ॥ सेर पसेरी पूरा कैले, पासंग कतहुँ न जाई हो ॥ कहहिं कवीर सुनो हो संतो, जोर चला जहंढाई हो ॥ ४ ॥
कहरा ५.
राम नाम भजु राम नाम भजु, चेति देखु मनमांहीं हो ॥ लच्छ करोरि जोरि धन गाडे, चलत डोलावत बांही हो दादा बाबा और प्रपाजा, जिनके यह भुईं भाँडे हो ॥ औंघर भये हियहुकी फूटी, तिन्ह काहे सब छाँडे हो ॥ ई संसार असारको घंथा, अन्तकाल कोइ नाही हो ॥ उपजत बिनसत बार न लागे, ज्यों बादरकी छाई हो ॥ नात गोट कुल कुटुंब सब, इन्हकर कौन बडाई हो ॥ कहहिं कवीर एक राम भजे बिनु, बूड़ी सब चतुराई हो ॥ ५ ॥
कहरा ६.
राम नाम बिनु राम नाम बिनु, मिथ्या जन्म गंवाई हो ॥ सेमर सेइ सुवा ज्यों जहँडे, ऊन परे पछिताई हो ॥ जैसे मदपी गांठी अर्थ दे, घरहुकी अकिल गमाई हो ॥ स्वादे उदर भरे धौं कैसे, औसै प्यास न जाई हो ॥ दबँहीन जैसे पुरुषारथ, मनही मांहि तवाई हो ॥ गांठि रतन मरम नहिं जाने, पारख लीन्हा छोरी हो ॥ कहहिं कवीर यह औसर बीते, रतन न मिले बहोरी हो ॥ ६ ॥
शब्दावली
(५२७)
कहरा ७.
रहहु संभारे राम विचारे, कहता हौं जे पुकारे हो ॥ मूंड
मुंडाय फूलिके बैठे, सुद्रा पहिर मंजूसा हो ॥ तेहि ऊपर कछु
छार लपेटे, भितर भितर घर मूसा हो ॥ गांव बसतु है गरब
भारती, बाम काम हंकारा हो ॥ मोहन जहां तहां ले जहैं, नहिं
पत रहल तुम्हारा हो ॥ मांझ मंझरिया बसे सो जाने, जन होइ
है सो थोरा हो ॥ निर्भय भये तहां गुरुकी नगरिया, सुख सोवैं
दास कवीरा हो ॥ ७ ॥
कहरा ८.
क्षेम कुसल औ सही सलामत, कहहु कौनको दीन्हा हो ॥
आवत जात दोऊ विधि लूटे, सर्वस हरि लीन्हा हो ॥ सुर
नर सुनि जति पीर औलिया, मीरा पैदा कीन्हा हो ॥ कहाँ लों
गनो अनंत कोटि लों, सकल पयाना कीन्हा हो ॥ पानी पवन
अकाश जायँगे, चंद्र जायँगे सूरा हो ॥ ये भी जायँगे वो भी
जायँगे, परत न काहुके पूरा हो ॥ कुशल कहत कहत जग बिनसे,
कुशल कालकी फांसी हो ॥ कहैं कवीर सारि दुनिया बिनसे,
रहै राम अविनासी हो ॥ ८ ॥
कहरा ९ .
ऐसनि देह निरालप बौरै, सुवले छुवे नहिं कोई हो ॥ डंड-
वाकी डोरिया तोरिया तोरि लराइनि, जो कोटिन धन होई हो ॥
ऊर्ध निस्वासा उपजि तरासा, कहराइनि परिवारा हो ॥ जो
कोई आवे बेगि चलावे, पल एक रहन न पाई हो ॥ चन्दन
चीर चतुर सब लेपै, गरे गजमुकताकी हारा हो ॥ चौंसठ गीध
मुये तन लूटै, जंबुकन उदर बिदारा हो ॥ कहहिं कवीर सुनो
हो संतो, ज्ञानहीन मतिहीना हो ॥ इक इक दिना याहि गति
सबकी, कहा राव कह दीना हो ॥ ९ ॥
(५१८)
कवीरपंथी—
कहरा १०.
हौं सबहिनमें हौना हो, मोहि बिलग बिलग बिलगाई हो ॥
ओढन मोरा एक पिछौरा, लोग बोलै एकताई हो ॥ एक निरं-
तर अन्तर नाही, ज्यों ससि घटजल झाई हो ॥ एक समान
कोई समुन्नत नाही, जाते जरा मरण भ्रम जाई हो ॥ रैन दिवस
ये तहवाँ नाही, नारि पुरुष समताई हो ॥ हौं मैं बालक बूढो
नाहीं, न मोरे चिलकाई हो ॥ त्रिविध रहौं संभनिमा बरतौं,
नाम मोर रसुराई हो ॥ पठये न जाऊँ आने नहिं आवौं, सहज
रहौं बुनियाई हो ॥ जोलहा तान बान नहिं जाने, फाटि बिने
दश ठाई हो ॥ गुरु परताप जिन्हें जस भाख्यो, जन बिरलै सों
पाई हो ॥ अनंत कोटि मन हीरा बेधा, फिटको मोल न पाई हो ॥
सुर नर मुनि जाके खोज परे हैं, कछु कछु कविरन पाई हो ॥ १० ॥
कहरा ११.
ननदीगेतैं विषम सोहागिनि, तैं निदले संसारा गे ॥ आवत
देखी एक संग सूती, तैं औ खसम हमारा गे ॥ मोरे बापके दुइ
मेहररूवा, मैं अरु मोर जेठानी गे ॥ जब हम रहलि रसिकके
जगमें, तबहि बात जग जानी गे ॥ माइ मोरि सुवलि पिताके
संगे, सरा रचि सुवल संघाती गे ॥ आपुहि सुवलि और ले
सुवली, लोग कुटुब संग साथी गे ॥ जौं लौं स्वास रहे घट भीतर,
तौं लौं कुशल परिहै गे ॥ कहहिं कवीर जब थास निकरि गौं,
मंदिर अनल जरिहै गे ॥ ११ ॥
कहरा १२.
ई माया रघुनाथकी बौरी, खेलन चली अहेरा हो ॥ चतुर
चिकनिया चुनि चुनि मारे, कोई न राखेउ न्यारा हो ॥ मौनी बीर
दिगंबर मारे, ध्यान धरंते जोगी हो ॥ जंगलमेके जंगम मारे,
माया किनहुं न भोगी हो ॥ वेद पढंते वेदुवा मारे, पूजा करंते
शब्दावली
(५१९)
स्वामी हो ॥ अर्थ विचारत पंडित मारे, बांधेउ सकल लगामी हो ॥ सिंगीत्रुडपि वन भीतर मारे, शिर ब्रह्माका, फोरी हो ॥ नाथ मछंदर चले पीठिदे, सिंचलहुमैं, बोरी हो ॥ साकटक घर कर्ता धरता, हरिभक्ताते चेरी हो ॥ कहहिं कवीर सुनो हो संतो, ज्यों आवे त्यों फेरी हो ॥ १२ ॥
इति कहरा बीजकका सम्पूर्ण ।
अथ चाचरि प्रारंभः
चाचरि पहिला १ ॥
खेलति माया मोहनी, जेर कियो संसार । कटि केहरि गज गामिनी, संशय कियो सिंगार ॥१॥ रचे रंगकी चूनरी, सुन्दरि पहिरे आय । शोभा अद्भुत रूपकी, महिमा बरनि न जाय ॥२॥ चन्द्र बदनी मृगलोचनी, बिडुक दियो उघालि । यती सती सब मोहिया, गज गति वाकी चालि ॥ ३ ॥ नारदके सुख मोडिके, लीन्हों बदन छिपाय । गरब गहेली गरबते, उलटि चली सुसकाय ॥४॥ शिव अरु ब्रह्मा दौरिके, दोनों पकड़े धाय । फगुआ लीन छिनायके, बहुरि दियो छिटकाय ॥ ५ ॥ अनहद धुनि बाजा बजे, सरवन सुनत भो चाव । खेलनिहारी खेलि है, जैसी वाकी दाव ॥ ६ ॥ ज्ञानढाल आगे दियो, टारे टरत न पांव । खेलनिहारी खेलि है, बहुरि न ऐसो दाव ॥ ७ ॥ सुर नर मुनि भू देवता, गोरख दत्ता व्यास । सनक सनन्दन हारिया, औरक केतिक आस ॥८॥ छिलकत थोथे प्रेम सो, धरि पिचकारी गात । करि लीनो बस आपने, फिरि फिरि चितवत जात ॥ ९ ॥ ज्ञान गाडिले रोपिया, तिरगुन लिये है हाथ । शिवसन ब्रह्मा लीनिया, और लिये सब साथ ॥ १० ॥ एक ओर सुर नर मुनि खड़े, एक अकेली आप । दृष्टि परे छोड़ै नहीं, करि लिय
(५२०)
कवीरपंथी—
एकै छाप ॥ ११ ॥ जेते थे तेते लियो, घुंघट माँहिं समाय ।
कज्जल वाके रेख है, अदृग्ग न कोई जाय ॥ १२ ॥ इन्द्र कृष्ण
द्वारे खडे, लोचन निज ललचाय । कहै कवीर ते ऊबरे, जाहि
न मोह समाय ॥ १३ ॥
चाचरि दूसरी २ ॥
जारो जगको नेहरा, मन बौरा हो । जाँमे सोग संताप समुझ
मन बौरा हो ॥ १ ॥ तन धनसों क्या गरब, समुझ मन बौरा-
हो ॥ भसम किरमीको साज, मन बौरा हो ॥ २ ॥ विना नेव-
का देवघरा, मन बौरा हो ॥ विन कहगिलकै ईट, समुझ मन
बौराहो ॥ ३ ॥ काल बूतकी हस्तिनी, मन बौरा हो ॥ चित्र
रच्यो जगदीस, समुझ मन बौरा हो ॥ ४ ॥ काम अंध गज बस
परै, मन बौरा हो ॥ अंकुस सहिया सीस, समुझ मन बौरा हो
॥५॥ मर्कट मूठी स्वादकी, मन बौरा हो । लीन्हो भुजा पसारि
समुझ मन बौरा हो ॥६॥ छूटनकी संशय परी, मन बौरा हो ॥
घर घर खायो डांग, समुझ मन बौरा हो ॥ ७ ॥ ऊंच नीच
जानै नहीं, मन बौरा हो ॥ घर घर नाचेउ द्वार, समुझ मन
बौरा हो ॥ ८ ॥ ज्यों सुवना नलनी गह्यो, मन बौरा हो । ऐसो
भरम विचार, समुझ मन बौरा हो ॥ ९ ॥ पढे गुनेका कीजिय,
मन बौरा हो । अन्त बिलैया खाय, समुझ मन बौरा हो ॥१०॥
सूने घरका पाहुना, मन बौरा हो । ज्यों आवै त्यों जाय, समुझ
मन बौरा हो ॥ ११ ॥ नहानेको तीरथ घना, मन बौरा हो ।
पूजनको बहु देव, समुझ मन बौरा हो ॥ १२ ॥ बिनु पानी नल
बूडिया, मन बौरा हो । टेकेउ राम जहाज, समुझ मन बौरा हो
॥१३॥ कहहि कवीर जग भरमिया, मन बौरा हो । छोड़ हरिको
सेव, समुझ मन बौरा हो ॥ १४ ॥
इति चाचरि समाप्तम् ।
शब्दावली
(५२१)
अथ वेलि प्रारंभः ।
प्रथम वेलि ।
हंसा सरवर शरिर हो रमैया राम । जागत चोर घर मूसल
हो रमैया राम ॥ १ ॥ जो जागे सो भागे हो रमैया राम ।
सोवत गैल वियोग हो रमैया राम ॥ २ ॥ आज बसेरा नियरे
हो रमैया राम । काल्ह बसेरा हरि हो रमैया राम ॥ ३ ॥ परेहु
बिराने देश हो रमैया राम । नैन मरेंगे हूँठ हो रमैया राम ॥ ४ ॥
त्रास मथन दधि मथन कियो हो रमैया राम । भवन मध्यो भर
पूरि हो रमैया राम ॥ ५ ॥ हंसा पाहन मैल हो रमैया राम ।
बेधिन पद निर्वाण हो रमैया राम ॥ ६ ॥ तुम हंसा मत माणिक
हो रमैया राम । हटल न मानेहु मोर हो रमैया राम ॥ ७ ॥
जसरे कियो तस पायो हो रमैया राम । हमर दोष जनि देहु हो
रमैया राम ॥ ८ ॥ अगम काटि गम कीन्हो हो रमैया राम ।
सहज कियो व्योपार हो रमैया राम ॥ ९ ॥ राम नाम धन बानि-
जहु हो रमैया राम । लादहु वस्तु अमोल हो रमैया राम ॥ १० ॥
पांच लदनवा लादि चले हो रमैया राम । नौ बहिया दश गौन
हो रमैया राम ॥ ११ ॥ पांच लदनुआ खांगि परे हो रमैया
राम । खाखरि डारिन खोर हो रमैया राम ॥ १२ ॥ शिर धुनि
हंसा उड़ि चले हो रमैया राम । सरवर मीत जोहरि हो रमैया
राम ॥ १३ ॥ आगि लगी सरवरमें हो रमैया राम । सरवर
जरि भौ छार हो रमैया राम ॥ १४ ॥ कहैं कवीर सुनु संत हो
रमैया राम । परखि लेहु खर खोट हो रमैया राम ॥ १५ ॥
वेलि दूसरी २ ॥
भल सुस्मृति जहँडायहु हो रमैया राम । धोखा कियो विस-
वास हो रमैया राम ॥ ११ ॥ सोतो है बंसी कसि हो रमैया राम ।
(५२२)
कवीरपंथी—
सिरके लियो विसवास हो रमैया राम ॥२॥ ई तो है वेद साक्ष
हो रमैया राम । गुरु दीन्हो मोहिं थापि हो रमैया राम ॥ ३ ॥
गोबर कोट उठायहु हो रमैया राम । परि हरि जैहो खेत हो
रमैया राम ॥ ४ ॥ बुद्धिवल तहाँ न पड़ुंचै हो रमैया राम ।
खोज कहांति होय हो रमैया राम ॥५॥ सुनिमन धीरज भैल हो
रमैया राम । मन बढि रहल लजाय हो रमैया राम ॥६॥ फिरि
पाछे जनि हेरो हो रमैया राम । काल बूत सब आय हो रमैया
राम ॥ ७ ॥ कह कवीर सुनु संत हो रमैया राम । मति दिगहि
फैलाहु हो रमैया राम ॥ ८ ॥
अथ विरहुली प्रारम्भः ।
आदि अन्त नहिं होत विरहुली । नहिं जड़ पल्लव पेड़ विर-
हुली ॥ १ ॥ निसि बासर नहिं होत विरहुली । पानी पवन न
होत विरहुली ॥ २ ॥ ब्रह्माहि सनकादि विरहुली । कथि गये
जोग अपार विरहुली ॥ ३ ॥ मास अषाढहि शीत विरहुली ।
बोइन सातौ बीज विरहुली ॥४॥ नित गाड़ै नित सिंचै विरहुली ।
नित नव पल्लव पेड़ विरहुली ॥ ५ ॥ छिछिल विरहुली छिछिल
विरहुली । छिछिल रहल तिहुँलोक विरहुली ॥ ६ ॥ फुल एक
भल फुलल विरहुली । फूलि रहल संसार विरहुली ॥ ७ ॥ ते
फुल बन्दै भगत विरहुली । बांधिके राउर जाय विरहुली ॥८॥
सो फुल लोढहि संत विरहुली । डसि गौ बैतल सांप विरहुली
॥ ९ ॥ विषहर मंत्र न मान विरहुली । गाडुर बोले और विर-
हुली ॥ १० ॥ विषकी कयारी बोयो विरहुली । अब लोरत का
पछिताय विरहुली ॥ ११ ॥ जनम जनम अवतरेउ विरहुली ।
फल यक कनइल डार विरहुली ॥ १२ ॥ कह कवीर सचु पाय
विरहुली । जो फल चाखहु मोर विरहुली ॥ १३ ॥
शब्दावली
(५२३)
अथ हिंडोला प्रारंभः ।
हिंडोला पहिला १ ॥
भर्म हिंडोला झूले सब जग आय ॥ टेक ॥
जहँ पाप पुण्यके खम्भ दोऊ, मेरू माया नाय । तहँ कर्म
पटुकी बैठिकै, को को न झूले आय ॥ १ ॥ लोभ मरूआ विषय
भवरा, काम कीला ठानि । शुभ अशुभ बनाय डांडी, गह्यो दूनौ
पानि ॥ २ ॥ झूले सो गन गन्धर्व सुनि नर, झूले सुरगन इन्द्र ।
झूलत सो नारद सारदा, झूलत व्यास फनीन्द्र ॥ ३ ॥ झूलत
विरंचि महेस-सुनिहो झूलत सूरज इन्द्र । आप निर्गुन सगुन होयके,
झूलिया गोविन्द ॥ ४ ॥ छौ चार चौदह सात इकइस, तीन लोक
बनाय चौखानि बानी खोजि देखौ, थिर न कोइ रहाय ॥ ५ ॥
खण्डो ब्रह्मखण्ड खोजि षट् दर्शन, ये छूटे नाहिं । साधु संग
बिचारि देखौ, जीव निसतरि जाहिं ॥ ६ ॥ ससि सूर निस दिन
संधि, औ तहँ तत्त्व पांचौ नाहिं । काल अकालौ परलय नहीं,
तहँ संत बिरले जाहिं ॥ ७ ॥ तहँके विछुरे बहु कल्प बीते, परे
भूमि भुलाय । साधु संगति खोजि देखौ, बहुरि उलटि समाय
॥ ८ ॥ तेहि झूलवेको भय नहीं, जो होय संत सुजान । कहहिं
कवीर सत सुकृत मिलै तो, फिरि न झूले आन ॥ ९ ॥
हिंडोला दूसरा २ ॥
बहु विधि चित्र बनाइके, हरि रच्यो है क्रीडा रास । जाहि न
इच्छा झूलवेको, अस बुद्धि केहि पास ॥ १ ॥ झूलत २ बहु
कल्प बीते, मन न छोड़ै आस । रच्यो रहस हिंडोलना, निसि
चारिउ जुग चौमास ॥ २ ॥ कबहुक ऊंचे नीचे कबहुंक, सरग
भूलौ जाय । अति भरमित भरम हिंडोलना, नेकु नहीं ठहराय
॥ ३ ॥ डरपत हो यहि झूलवेको, राखु जादव राय । कहै कवीर
गोपाल विनती, शरन हो तुम पाय ॥ ४ ॥
(५२४)
कवीरपंथी-
हिंडोला तीसरा ३ ॥
लोभ मोहके खम्भ दोऊ, मन रच्यो है हिंडोर । झूलहीं जीव
जहान जहँ लगि, कतहुँ नहीं थित ठौर ॥१॥ चतुरा झूले चतु-
राइया, झूले राजा सेव । चन्द्र सूर्य दोऊ झूलहीं, नाहि न पायो
भेव ॥ २ ॥ चौरासी लच्छ जीव झूले; रवि सुत धरिया धाय ।
कोटिन कल्प जुग बीतियां, अजहुँ न मानै हाय ॥ ३ ॥ धरनि
अकास दोउ झूले, झूले पवनहु नीर । धरी देह हरि आपुहु
झूलहीं; लखहिं, हंस कवीर ॥ ४ ॥
इति हिंडोला बीजक ॥
सत्यनाम ।
गुरु महिमा ।
सा०-सतकवीरके चरण रज, धर्मदास शिरनाय ॥
बार बार विनवन लगे, सतगुरु होहु सहाय ॥
रमैनी १-धर्मदास बिनवै कर जोरी । हे साहब इक विन्ती
मोरी ॥ बारम्बार आप अस भाषो । गुरु गुरु कहि बहुत अभि-
लाषो ॥ १ ॥ मुझ किंकर पर दया सुकीजे । दास जानि यही
वर दीजे ॥ निसिदिन रहौं चरन लौलीना । पल इक चित्त न
होवे भीना ॥ २ ॥ महिमा गुरु कहो समझाई । सुनत जीव
भगती दिठ पाई ॥ विना ज्ञान नर होय अजाना । संग्रह त्याग
न विनु पहिचाना ॥ ३ ॥ जब जाने सरधा दिठ होई । विन जाने
सरधा नहिं कोई ॥ विन सरधा अनुराग न जामें । विनु अनु-
राग भगति नहिं तामें ॥ ४ ॥ विना भगति जिव छुटै न फेरा ।
विना भगति जिव होय अनेरा ॥ याते सतगुरु देहु बतायी ।
गुरु महिमा कहिये अरथायी ॥ ५ ॥
सा०-धर्मदासके वचन सुन, हरषे श्री गुरुदेव ।
सुनु धर्मनि अब कहत हौं, गुरु महिमाको भेव ॥
शब्दावली
(५२५)
रमैनी २-गुरुने अधिक और कोउ नहीं। धरमदास परखहु हिय माहीं ॥ गुरु दयाल अस हैं सुखदाई। देहिं सुकतिको पंथ लखाई ॥ १ ॥ गुरुते अधिक कोइ नहिं दूजा। भरम तजि कर सतगुरु पूजा ॥ तीरथ धाम देवल अरु देवा। सीस अरपि जो लावैं सेवा ॥ २ ॥ तौ नहिं वचन कहे हितकारी। भूले भरमे यह संसारी ॥ भवसागर है अगम अपारा। तामें बूझि गयो संसारा ॥ ३ ॥ पार लगनको सब कोइ धावे। विना गुरु कोइ पार न पावे ॥ यह जग जीव थाह नहिं पावे। विना गुरु सब गोता खावे ॥ ४ ॥ जग जीवोंसे कहु गोहराई। सत गुरु खेवट पार लगाई ॥ यह जग बूझि जाय मंझधारा। सतगुरु भक्ति भये भव पारा ॥ ५ ॥
सा०-सतगुरु भक्ति न जानई, कहैं कवीर बखान।
यह जग भूले बापुरे, गहे न सतगुरु ज्ञान ॥
रमैनी ३-जग कर आयु अल्प है भाई। अन्त सभै कोइ नाहि सहाई ॥ बहुत पियारि नारि जग माहीं। मातु पिताहु जेहि सर नाही ॥ १ ॥ जेहि कारण नर सीस जु देहीं। अंत समय सो नाहिं सनेही ॥ निज स्वारथ कहैं रोदन करई। तुरतहि नैहरको चित धरई ॥ २ ॥ सुत परिजन धन सुपन सनेहीं। भीर परे कोइ काम न देहीं ॥ निज तनु सम और न आना। सो तन संग न चलत निदाना ॥ ३ ॥ ऐसो को जग दीखे भाई। अंत समयमें लेइ छुड़ाई ॥ अहे एक सो कहौं बखानी। जेहि अनुराग होय सो मानी ॥ ४ ॥ केवल गुरु छुडावन हारा। निश्चय जानो कहा हमारा ॥ कालहि जीत हंस लैजाहीं। अविचल देस पुरुष जहं आहीं ॥ ५ ॥
(५२६)
कवीरपंथी—
सा०—बिना गुरु उतरे नहीं, भवसागरके पार ।
कहैं कवीर सब जीवसे, गहिलो गुरु अपार ॥
रमैनी ४—सरगुन निरगुन माहिं पिछानो । निगुराको नहिं
ठौर ठिकानो ॥ विन गुरु कोई पार न पावे । लोक परलोक महं
परगट दिखावे ॥ १ ॥ सुकदेव भये गरभ जोगेसर । उन समान
नहिं थाप्यो दोसर ॥ तपके तेज गये हरिधामा । गुरु विनु नाहिं
लहे विसरामा ॥ २ ॥ रोक पारषद जान न पाये । कह सुकदेव
करहु कस भाये ॥ कह पारषद सुनो सुनि राऊ । विनु हरि
आज्ञा जान न पाऊ ॥ ३ ॥ करहु विनती हरिपै जाई । ठाठ
द्वार सुकदेव रहाई ॥ जबै पारषद हरिपै गयऊ । जस सुनि कहा
तस पुनि कहेऊ ॥ ४ ॥ सुनत विष्णु तब बाहर आये । देखतहीं
शुक अति हरषाये ॥ विस्तु कहे रिषि कहवां आये । गुरु विहीन
तप तेज झुलाये ॥ ५ ॥
सा०—गुरु बिना जो तप करे, गुरु विन देवे दान ।
गुरु विनु माला फेरते, सबही निसफल जान ॥
रमैनी ५—गुरु विहीन नर मोहि न भावे । सो कस हरिधाम
सिधावे ॥ कह सुकदेव सुनो हरि राऊ । कहि सुपन्थ मोहि राह
बताऊ ॥ १ ॥ जाहु पलटि करहु गुरु स्याना । तब पैहो इहवाँ
अस्थाना ॥ सुनि सुनि सुकदेव वेगि सिधाये । गुरु विहीन तहँ
रहन न पाये ॥ २ ॥ दृढन गुरु चले सुनि राई । व्यास सुनी
तब कह्यो बुझाई ॥ मिथला आहि जनक पुर धामा । विदेह
जनक तहँ रहत ललामा ॥ ३ ॥ उन सम ज्ञानि न दूसर कोऊ ।
जाकर शरण गहो तुम सोऊ ॥ चले सुनत सुक सुनि तहवाँ ।
राजा जनक रहत है जहवाँ ॥ ४ ॥ सिष भावले पहुंचे जबहीं ।
मिलत जनक हरष भय तबहीं ॥ जनक विदेह कीन्ह गुरु जानी ।
हरषि मिले तब सारंग पानी ॥ ५ ॥
शब्दावली
(५२७)
सा०-गर्भ जोगेसर गुरु बिना, लागे हरिकी सेव ।
कह कवीर वैकुंठसे, फेर दियो सुकदेव ॥
जनक विदेही गुरु किया, लागा हरिकी सेव ।
कह कवीर वैकुंठमें, उलट मिला सुकदेव ॥
रमैनी ६-ब्रह्मा सुत नारद बड ज्ञानी । जिनकर कथा जगत सब जानी ॥ हरि करते चौरासी परिया । गुरु किरपाते तुरत उबरिया ॥१॥ और देव गिषि मुनिवर जेते । जिन गुरु कीन्ह उत्तर सो तेते ॥ बिना गुरु भवसागर डूबे । उब डुब होय पार नहीं ऊबे ॥ २ ॥ जो गुरु मिले तौ पंथ बतावे । सार असार परख दिखलावे ॥ गुरु सोई जो सत्य बतावे । और गुरु कोइ काम न आवे ॥३॥ सत्त पुरुषका कहे संदेशा । जनम जनमका भिटै अंदेशा ॥ पाप पुत्रकी आसा नाही । बैठे अछय वृक्षकी छाँही ॥४॥ भ्रिगी मत होवे जिहि पास । सोई गुरु सत्त सुनौ धर्मदासा ॥ गुरुते अधिक और कोइ नाही । धर्मदास परखहु हिय माहीं ॥५॥
सा०-ऐसे गुरुके मिलनसे, आवा गमन नसाय ।
विन गुरु ज्ञाने दुन्द हो, काल फाँसमें जाय ॥
रमैनी ७-जीवन मुक्ति चाहु जो भाई । सतगुरु शब्द गहे सो आई ॥ जमसे यही छुडावन हारे । निश्चय मानो कहा हमारे ॥१॥ बहुरि न जोनी संकट आवे । जो जिव नाम शरण गति पावे ॥ तजि संसार लोक कई जाई । नाम पान गुरु होय सहाई ॥२॥ गुरुके बचन हिया सुध होई । दीपक ज्ञान परगटे तहँ सोई ॥ धर्मनि यह गुरु पद परतापा । गुरु पद गहे भरम तजि आपा ॥३॥ सिन्धु बुन्द समावे जाई । कहे कवीर मिटी दुचिताई ॥ सरन गहे सब दुख नसाई । विन गुरु शिष्य निरासे जाई ॥४॥ गुरु सम दानी और न भाई । आवत सरन सकलो निधि पाई ॥
(५२८)
कबीरपंथी-
सतगुरु कहैं गुरु व्रतधारी । अगुन सगुन बिच गुरु अधारी ॥५॥
सा०-यह भव अगम अथाह है, काल जाल वह धार ।
पार होनको द्वार इक, गुरु गिरा कडिहार ॥
रमैनी ८-गुरु विना नहि होय अचारा । गुरु विना नहि होय
भवपारा ॥ शिष्य सीप गुरु स्वाती जानो । गुरु पारस शिष
लोह समानो ॥१॥ गुरु मल्यागिर शिष्य भुजंगा । गुरु परसि
शीतल होय अंगा ॥ गुरु समुद्र है शिष्य तरगा । गुरु दीपक है
शिष्य पतंगा ॥२॥ शिष चकोर गुरुको शसि जानो । रवि गुरु
कमल शिष्य विकसानो ॥ यहि स्नेह सिष निश्चय लहई । गुरु
पद परसि दरस हिये गहई ॥३॥ गुरु गुरुमें भेद विचारा । गुरु
गुरु कहे सकल संसारा ॥ गुरु सोईं जिन शब्द लखाया । आवा-
गमन रहित पद पाया ॥४॥ गुरु सजीवन शब्द लखावे । जाके
बल हंसा घर जावे ॥ वा गुरुसो कछु अन्तर नाही । गुरु अरु
शिष्य मता इक आही ॥ ५ ॥
सा०-गुरु गुरुमें भेद है, गुरु गुरुमें भाव ।
गुरु सदा सो वन्दिये, सबद बतावे दाव ॥
रमैनी ९-सतगुरुकी बलिहारी जावे । अजर दशा जो आन
बतावे ॥ अमि अजरावलि अजरा धामा । सत्य नाम सत्य
पुरुष निजनामा ॥१॥ गुरु किरपा करि सो पद पावे । जीवन
मुक्त अटल घर जावे ॥ निसिदिन सुरत गुरु सो लावे । साधु
सन्तके मनहि समावे ॥२॥ जिनपर दया गुरुकी होई । तिनका
फांस करम सब खोई ॥ करनी करके सुरत लगावे । सतगुरु लोक
ताहि पहुँचावे ॥३॥ सेवा करि मन रखै न आसा । ताका सत-
गुरु काटै फाँसा ॥ गुरु चरणन जो राखे ध्याना । अमर लोक
सो करत पयाना ॥४॥ जोगी जोग साधना करई । विना गुरु
शब्दावली
(५२९)
सो भव नहीं तरई ॥ जो शिष्य गुरु आज्ञा धारी । गुरुकी कृपा होय भवपारी ॥ ५ ॥
सा०-गुरु मुख गुरु चितवत रहै, जैसे मनी भुवंग ।
कहै कवीर विसरे नहीं, यह गुरु मुखको अंग ॥
रमैनी १०-गुरु भगता जो जिव आही । साधु गुरु नहीं अन्तर ताही ॥ साँचा शिष्य ताहिको माने । साधु गुरु नहीं अन्तर आने ॥ १ ॥ जो स्वार्थ पागे संसारी । नहीं गुरु सिकख न साधु अचारी ॥ तिनको काल फन्द तुम जानो । दूत अंश काल कर मानो ॥ २ ॥ साधु गुरुको रूप बनायी । बहुते फन्द जीव पर लायी ॥ जिनते होय जीवकर हानी । यह तो अहै काल सहदानी ॥ ३ ॥ सोह गुरु जो प्रेम गति जाने । सत्य शब्दको राह पिछाने ॥ परम पुरुषकी भगति दिढावे । सुरति निरति कर तहैं पहुँचावे ॥ ४ ॥ तासो प्रीति करै मनलाई । छाड़ै डुरमति औ चतुराई ॥ तबहीं निह संशय घर पावे । भव तरिके जग बहुरि न आवे ॥ ५ ॥
सा०-करम भरम जंजाल तजि, गुरु पद कीजे नेह ।
गुरु मुख शब्द प्रतीति करि, निज तन जाने खेह ॥
रमैनी ११-गुरु चरननमें रह लपटाई । तजि भरम औ कपट चतुराई ॥ गुरु आज्ञा जो निरखत रहई । ताकर खूंट काल नहीं गहई ॥ १ ॥ गुरु परतीत दिढकै चित राषै । मोहि समान गुरु कहैं भाषै ॥ गुरु सेवामें सब फल आवै । गुरु विमुख नर पार न पावै ॥ २ ॥ जैसे चन्द्र कुमोदिनि रीती । गहे शिष्य अस गुरु परतीती ॥ गुरुमुख निरखत शिष्य हिय हरषे । शब्द अभी जिमि बादल वरषे ॥ ३ ॥ नृतक होयके खोजहि सन्ता । शब्द विचार गहे मगु अन्ता ॥ धर्मदास जिमि कीटहि भेवा । यहि विधि शिष्य गहै गुरुदेवा ॥ ४ ॥ मिलै कीट भुंगके पास । भ्रिगी गही गुरुगम
(५३०)
कबीरपंथी-
परगासा ॥ भिंगी शब्द कीट जो माने । आपा मेटि गुरु सुरत समाने ॥ ५ ॥
सा०-भिंगी मति गहि कीट जस, भिंगी ही होइ जाय ।
गुरु शब्द गहि शिष्य तस, गुरुही माहिं समाय ॥
रमैनी १२-जबहीं कीट सौप तन देवे । भिंगी गहि आपन करि लेवे ॥ शब्द घात करि महि तिहिं डारे । आपन मंत्र निज तहां विचारे ॥ १ ॥ भिंगी शब्द कीट जो गहई । आपा मेटि भिंगी होय रहई ॥ जाति वरण सब पलटे आई । भिंगी रूप तबै परगटाई ॥ २ ॥ कीट पलटि भिंगी जब होई । ताको कीट कहै नहिं कोई ॥ भिंगी शब्द कीट नहिं गहई । तो पुनि कीट असारे रहई ॥ ३ ॥ धरमदास यह कीटक भेवा । यहि मति शिष्य गहे गुरु देवा ॥ गुरुके वचन सांच कर माने । आपा ओट न बाद बखाने ॥ ४ ॥ तन मन धन अरपे सब ओई । आपा लेश रहै नहिं कोई ॥ मिटै भरम सब दुविधा नासे । गुरु अरु शिष्य एक घर भासे ॥ ५ ॥
छन्द-भिंगी मत दिठके गहे, करौं निज समय ओहिहो । दुतिया भाव न चित व्यापै, सो लहै जिव मोहिहो ॥ गुरु सबद निसचय सत्य माने, भिंग मत तब पावई । तजि सकल आसा सबद वासा, काग हंस कहावई ॥
सोरठा-तजै कागकी चाल, सत्य सबद गहि हंस हो ।
मुकता चुगे रसाल, पुरुष पच्छ गुरु गम गमन ॥
रमैनी १३-गुरु कृपा ते साधु कहावे । गुरुकृपा साधक है आवे ॥ गुरु कृपाते ज्ञान विचारा । गुरुकृपाते भक्ति अनुसारा ॥ १ ॥ गुरु कृपाते सुकर्म कमावे । गुरु कृपा सुकृत कई धावे ॥ गुरु कृपाते पुण्य बटोरे । गुरु न मिले तो पाप बहोरे ॥ २ ॥ गुरु