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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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पृष्ठ 534

(५२०)

कवीरपंथी—

एकै छाप ॥ ११ ॥ जेते थे तेते लियो, घुंघट माँहिं समाय ।
कज्जल वाके रेख है, अदृग्ग न कोई जाय ॥ १२ ॥ इन्द्र कृष्ण
द्वारे खडे, लोचन निज ललचाय । कहै कवीर ते ऊबरे, जाहि
न मोह समाय ॥ १३ ॥

चाचरि दूसरी २ ॥

जारो जगको नेहरा, मन बौरा हो । जाँमे सोग संताप समुझ
मन बौरा हो ॥ १ ॥ तन धनसों क्या गरब, समुझ मन बौरा-
हो ॥ भसम किरमीको साज, मन बौरा हो ॥ २ ॥ विना नेव-
का देवघरा, मन बौरा हो ॥ विन कहगिलकै ईट, समुझ मन
बौराहो ॥ ३ ॥ काल बूतकी हस्तिनी, मन बौरा हो ॥ चित्र
रच्यो जगदीस, समुझ मन बौरा हो ॥ ४ ॥ काम अंध गज बस
परै, मन बौरा हो ॥ अंकुस सहिया सीस, समुझ मन बौरा हो
॥५॥ मर्कट मूठी स्वादकी, मन बौरा हो । लीन्हो भुजा पसारि
समुझ मन बौरा हो ॥६॥ छूटनकी संशय परी, मन बौरा हो ॥
घर घर खायो डांग, समुझ मन बौरा हो ॥ ७ ॥ ऊंच नीच
जानै नहीं, मन बौरा हो ॥ घर घर नाचेउ द्वार, समुझ मन
बौरा हो ॥ ८ ॥ ज्यों सुवना नलनी गह्यो, मन बौरा हो । ऐसो
भरम विचार, समुझ मन बौरा हो ॥ ९ ॥ पढे गुनेका कीजिय,
मन बौरा हो । अन्त बिलैया खाय, समुझ मन बौरा हो ॥१०॥
सूने घरका पाहुना, मन बौरा हो । ज्यों आवै त्यों जाय, समुझ
मन बौरा हो ॥ ११ ॥ नहानेको तीरथ घना, मन बौरा हो ।
पूजनको बहु देव, समुझ मन बौरा हो ॥ १२ ॥ बिनु पानी नल
बूडिया, मन बौरा हो । टेकेउ राम जहाज, समुझ मन बौरा हो
॥१३॥ कहहि कवीर जग भरमिया, मन बौरा हो । छोड़ हरिको
सेव, समुझ मन बौरा हो ॥ १४ ॥

इति चाचरि समाप्तम् ।