कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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अर्ध छोड़ि ऊर्ध मन लावै । आपा मेटिके प्रेम बढ़ावै ॥१९॥
नना-नन्ना वो चौथे मह जाई । रामके गढ़हा हो खर खाई ॥ नाह
छोड़ किय नर्क बसेरा । नीच अजौ चित चेतु सवेरा ॥ २० ॥
पप्पा-पप्पा पाप करै सब कोई । पापके करे धर्म नहिं होई ॥
पप्पा कहै सुनहु रे भाई । हमरेसे ये कछू न पाई ॥२१॥
फफा-फफफा फल लागो बड दूरी । चाखै सतगुरु देई न तूरी ॥
फफफा कहै सुनहु रे भाई । स्वर्ग पतालकी खबरि न पाई ॥२२॥
बबा-बब्बा बर बर कर सब कोई । बर बर किये काज नहिं होई ॥
बब्बा-बात करै अरथाई । फलके मरम न जानेहु भाई ॥२३॥
भभा-भभभा भर्म रहा भरि पूरी । भभरे ते है नियरे दूरी । भभभा
कहै सुनौ रे भाई । भभरे आवे भभरे जाई ॥ २४ ॥
ममा-मम्मा सेये मर्म न पाई । हमरे ते इन्ह मूल गंवाई ॥ मम्मा
मूल गहल मन माना । मर्मी होय सो मर्महि जाना ॥ २५ ॥
यया-जगत रहा भर पूरी । जगतहुते जब्बा है दूरी ॥ जब्बा कहै
सुनौ रे भाई । हमरेसे ये जय जय पाई ॥ २६ ॥
ररा-ररां रागि रहा अरुझाई । राम कहै दुख दारिद जाई ॥ ररां
कहै सुनौ रे भाई । सतगुरु पूछिकै सेवहु जाई ॥ २७ ॥
लला-लब्बा लुतरे बात जनाई । लुतरे पावै परचे पाई ॥ अपना
लुतुर औरको कहई । एकै खेत दुनौ निर्बहई ॥ २८ ॥
ववा-वब्बा वह वह कह सब कोई । वह वह कहे काज नहिं होई ॥
वह तो कहै सुनै नहिं कोई । सरग पताल न देखै कोई ॥२९॥
शशा-सरसा सर नहिं देखै कोई । सर सीतलता एकै होई ॥ सरसा
कहै सुनौरे भाई । शून्य समान चला जग जाई ॥ ३० ॥
षष्ठा-षष्ठा षरा कहे सब कोई । षर षर कहै काज नहिं होई ॥
षष्ठा कहै सुनहुरे भाई । राम नाम लै जाहु पराई ॥३१॥