कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कहरा ७.
रहहु संभारे राम विचारे, कहता हौं जे पुकारे हो ॥ मूंड
मुंडाय फूलिके बैठे, सुद्रा पहिर मंजूसा हो ॥ तेहि ऊपर कछु
छार लपेटे, भितर भितर घर मूसा हो ॥ गांव बसतु है गरब
भारती, बाम काम हंकारा हो ॥ मोहन जहां तहां ले जहैं, नहिं
पत रहल तुम्हारा हो ॥ मांझ मंझरिया बसे सो जाने, जन होइ
है सो थोरा हो ॥ निर्भय भये तहां गुरुकी नगरिया, सुख सोवैं
दास कवीरा हो ॥ ७ ॥
कहरा ८.
क्षेम कुसल औ सही सलामत, कहहु कौनको दीन्हा हो ॥
आवत जात दोऊ विधि लूटे, सर्वस हरि लीन्हा हो ॥ सुर
नर सुनि जति पीर औलिया, मीरा पैदा कीन्हा हो ॥ कहाँ लों
गनो अनंत कोटि लों, सकल पयाना कीन्हा हो ॥ पानी पवन
अकाश जायँगे, चंद्र जायँगे सूरा हो ॥ ये भी जायँगे वो भी
जायँगे, परत न काहुके पूरा हो ॥ कुशल कहत कहत जग बिनसे,
कुशल कालकी फांसी हो ॥ कहैं कवीर सारि दुनिया बिनसे,
रहै राम अविनासी हो ॥ ८ ॥
कहरा ९ .
ऐसनि देह निरालप बौरै, सुवले छुवे नहिं कोई हो ॥ डंड-
वाकी डोरिया तोरिया तोरि लराइनि, जो कोटिन धन होई हो ॥
ऊर्ध निस्वासा उपजि तरासा, कहराइनि परिवारा हो ॥ जो
कोई आवे बेगि चलावे, पल एक रहन न पाई हो ॥ चन्दन
चीर चतुर सब लेपै, गरे गजमुकताकी हारा हो ॥ चौंसठ गीध
मुये तन लूटै, जंबुकन उदर बिदारा हो ॥ कहहिं कवीर सुनो
हो संतो, ज्ञानहीन मतिहीना हो ॥ इक इक दिना याहि गति
सबकी, कहा राव कह दीना हो ॥ ९ ॥