कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
सा०—बिना गुरु उतरे नहीं, भवसागरके पार ।
कहैं कवीर सब जीवसे, गहिलो गुरु अपार ॥
रमैनी ४—सरगुन निरगुन माहिं पिछानो । निगुराको नहिं
ठौर ठिकानो ॥ विन गुरु कोई पार न पावे । लोक परलोक महं
परगट दिखावे ॥ १ ॥ सुकदेव भये गरभ जोगेसर । उन समान
नहिं थाप्यो दोसर ॥ तपके तेज गये हरिधामा । गुरु विनु नाहिं
लहे विसरामा ॥ २ ॥ रोक पारषद जान न पाये । कह सुकदेव
करहु कस भाये ॥ कह पारषद सुनो सुनि राऊ । विनु हरि
आज्ञा जान न पाऊ ॥ ३ ॥ करहु विनती हरिपै जाई । ठाठ
द्वार सुकदेव रहाई ॥ जबै पारषद हरिपै गयऊ । जस सुनि कहा
तस पुनि कहेऊ ॥ ४ ॥ सुनत विष्णु तब बाहर आये । देखतहीं
शुक अति हरषाये ॥ विस्तु कहे रिषि कहवां आये । गुरु विहीन
तप तेज झुलाये ॥ ५ ॥
सा०—गुरु बिना जो तप करे, गुरु विन देवे दान ।
गुरु विनु माला फेरते, सबही निसफल जान ॥
रमैनी ५—गुरु विहीन नर मोहि न भावे । सो कस हरिधाम
सिधावे ॥ कह सुकदेव सुनो हरि राऊ । कहि सुपन्थ मोहि राह
बताऊ ॥ १ ॥ जाहु पलटि करहु गुरु स्याना । तब पैहो इहवाँ
अस्थाना ॥ सुनि सुनि सुकदेव वेगि सिधाये । गुरु विहीन तहँ
रहन न पाये ॥ २ ॥ दृढन गुरु चले सुनि राई । व्यास सुनी
तब कह्यो बुझाई ॥ मिथला आहि जनक पुर धामा । विदेह
जनक तहँ रहत ललामा ॥ ३ ॥ उन सम ज्ञानि न दूसर कोऊ ।
जाकर शरण गहो तुम सोऊ ॥ चले सुनत सुक सुनि तहवाँ ।
राजा जनक रहत है जहवाँ ॥ ४ ॥ सिष भावले पहुंचे जबहीं ।
मिलत जनक हरष भय तबहीं ॥ जनक विदेह कीन्ह गुरु जानी ।
हरषि मिले तब सारंग पानी ॥ ५ ॥