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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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पृष्ठ 538

(५२४)

कवीरपंथी-

हिंडोला तीसरा ३ ॥

लोभ मोहके खम्भ दोऊ, मन रच्यो है हिंडोर । झूलहीं जीव
जहान जहँ लगि, कतहुँ नहीं थित ठौर ॥१॥ चतुरा झूले चतु-
राइया, झूले राजा सेव । चन्द्र सूर्य दोऊ झूलहीं, नाहि न पायो
भेव ॥ २ ॥ चौरासी लच्छ जीव झूले; रवि सुत धरिया धाय ।
कोटिन कल्प जुग बीतियां, अजहुँ न मानै हाय ॥ ३ ॥ धरनि
अकास दोउ झूले, झूले पवनहु नीर । धरी देह हरि आपुहु
झूलहीं; लखहिं, हंस कवीर ॥ ४ ॥

इति हिंडोला बीजक ॥

सत्यनाम ।

गुरु महिमा ।

सा०-सतकवीरके चरण रज, धर्मदास शिरनाय ॥

बार बार विनवन लगे, सतगुरु होहु सहाय ॥

रमैनी १-धर्मदास बिनवै कर जोरी । हे साहब इक विन्ती
मोरी ॥ बारम्बार आप अस भाषो । गुरु गुरु कहि बहुत अभि-
लाषो ॥ १ ॥ मुझ किंकर पर दया सुकीजे । दास जानि यही
वर दीजे ॥ निसिदिन रहौं चरन लौलीना । पल इक चित्त न
होवे भीना ॥ २ ॥ महिमा गुरु कहो समझाई । सुनत जीव
भगती दिठ पाई ॥ विना ज्ञान नर होय अजाना । संग्रह त्याग
न विनु पहिचाना ॥ ३ ॥ जब जाने सरधा दिठ होई । विन जाने
सरधा नहिं कोई ॥ विन सरधा अनुराग न जामें । विनु अनु-
राग भगति नहिं तामें ॥ ४ ॥ विना भगति जिव छुटै न फेरा ।
विना भगति जिव होय अनेरा ॥ याते सतगुरु देहु बतायी ।
गुरु महिमा कहिये अरथायी ॥ ५ ॥

सा०-धर्मदासके वचन सुन, हरषे श्री गुरुदेव ।

सुनु धर्मनि अब कहत हौं, गुरु महिमाको भेव ॥