कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
कहरा १०.
हौं सबहिनमें हौना हो, मोहि बिलग बिलग बिलगाई हो ॥
ओढन मोरा एक पिछौरा, लोग बोलै एकताई हो ॥ एक निरं-
तर अन्तर नाही, ज्यों ससि घटजल झाई हो ॥ एक समान
कोई समुन्नत नाही, जाते जरा मरण भ्रम जाई हो ॥ रैन दिवस
ये तहवाँ नाही, नारि पुरुष समताई हो ॥ हौं मैं बालक बूढो
नाहीं, न मोरे चिलकाई हो ॥ त्रिविध रहौं संभनिमा बरतौं,
नाम मोर रसुराई हो ॥ पठये न जाऊँ आने नहिं आवौं, सहज
रहौं बुनियाई हो ॥ जोलहा तान बान नहिं जाने, फाटि बिने
दश ठाई हो ॥ गुरु परताप जिन्हें जस भाख्यो, जन बिरलै सों
पाई हो ॥ अनंत कोटि मन हीरा बेधा, फिटको मोल न पाई हो ॥
सुर नर मुनि जाके खोज परे हैं, कछु कछु कविरन पाई हो ॥ १० ॥
कहरा ११.
ननदीगेतैं विषम सोहागिनि, तैं निदले संसारा गे ॥ आवत
देखी एक संग सूती, तैं औ खसम हमारा गे ॥ मोरे बापके दुइ
मेहररूवा, मैं अरु मोर जेठानी गे ॥ जब हम रहलि रसिकके
जगमें, तबहि बात जग जानी गे ॥ माइ मोरि सुवलि पिताके
संगे, सरा रचि सुवल संघाती गे ॥ आपुहि सुवलि और ले
सुवली, लोग कुटुब संग साथी गे ॥ जौं लौं स्वास रहे घट भीतर,
तौं लौं कुशल परिहै गे ॥ कहहिं कवीर जब थास निकरि गौं,
मंदिर अनल जरिहै गे ॥ ११ ॥
कहरा १२.
ई माया रघुनाथकी बौरी, खेलन चली अहेरा हो ॥ चतुर
चिकनिया चुनि चुनि मारे, कोई न राखेउ न्यारा हो ॥ मौनी बीर
दिगंबर मारे, ध्यान धरंते जोगी हो ॥ जंगलमेके जंगम मारे,
माया किनहुं न भोगी हो ॥ वेद पढंते वेदुवा मारे, पूजा करंते