कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कबीरपंथी-
देखि रहहु यहि औसर, अस सुख होई हैं पाई हो ॥ जो खुट-
कार बेगि नहिं लागे, हृदय निवारहु कोऊ हो ॥ भुगतिकी डोरी
गाठि जनि खैचहु, तब बझिहैं बड रोहू हो ॥ मनु वहि कहहु
रहहु मन मारे, खिजुवा खीजि न बोले हो ॥ मानु भीत मितार्ई न
छोडे, कबहुँ गांठि न खोले हो । भोगउ भोग मुक्ति जनि भूलहु,
जोग जुगति तन साधहु हो ॥ जो यह भांति करहु मतबलिया
ता मतके चित बांधहु हो ॥ नहिं तो ठाकुर है अति दारुन करिहैं
चाल कुचाली हो ॥ बांधि मारि डंड सब लेहीं, छूटहिं तब मत-
वाली हो ॥ जबही सावंत आनि पहुँचे, पीठ सांठि भल दुटिहैं
हो ॥ ठाठे लोग कुटुम सब देखे कहे काहुके न छुटिहैं हो ॥ एक
तो निहुरि पांव परि विनवे, विनति किये नहिं माने हो ॥ अन-
चीन्हे रहेहु न कियेहु चिन्हारी, सो कैसे पहिचनबेउ हो ॥ लीन्ह
बुलाय बात नहिं पूछी, केवट गरब तन बोले हो ॥ जाकर गांठि
समर कछु नाहीं, सो निर्थनिया है डोले हो ॥ जिन्ह सम युक्ति
अगमनकै राखिन, धरिन मच्छ भरि डेहरि हो ॥ जेकर हाथ पांव
कछु नाहीं, धरन लाग तेहि सो हरि हो ॥ पेलना अच्छत पेलि
चलु वौरे, तीर तीरका टोवहु हो ॥ उथले रहहु परहु जनि गहिरे,
मति हाथहुकी खोवहु हो ॥ तरके घाम उपरके भूँभुरि, छाहैं
कतहुँ नहिं पायहु हो ॥ ऐसनि जानि पसीझेहु सीझेहु, कस न
छतुरिया छायहु हो ॥ जो कछु खेल कियहु सो कीयेहु, बहुरि
खेल कस होई हो ॥ सासु ननद दोऊ देत उलाटन, रहहु लाज
मुख गोई हो ॥ गुरु भौ ठील गोन भई लचपच, कहा न मानेहु
मोरा हो ॥ ताजी तुकी कबहुँ न साधेहु, चढेहु काठको घोरा हो ॥
ताल झांझ भल बाजत आवे, कहरा सब कोइ नाचे हो ॥ जेहि
रंग दुलहा ब्याहन आये, दुलहिनि तेहि रंग राचे हो ॥ नौका