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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(५१२)

कवीरपंथी-

ससा-सस्सा सरा रच्यो वरियाई । सर बेघे सब लोग तवाई ॥
सस्साके घर सुन गुन होई । इतनी बात न जाने कोई ॥३२॥

हहा-हहहा हाय हायमें सब जग जाई । हरष सोक सब मांहि
समाई ॥ हकरि हकरि सब बड बड गयऊ ॥ हहहा मर्म न
काहू पयऊ ॥ ३३ ॥

क्षक्षा-छछछा छण प्रलय मिटि जाई । छेव परे तब को समुझाई ॥
छेव परे कोउ अन्त न पाया । कह कवीर अगमन गोह-
राया ॥ ३४ ॥

इति चौतीसा बीजकका सम्पूर्ण ॥

अथ विप्रमतीसी प्रारम्भः ॥

सुनहु सबन मिलि विप्र मतीसी । हरि विनु बूड़ी नाव भरीसी ॥
॥१॥ ब्राह्मण होयके ब्रह्म न जाने । घरमें जग्य प्रतिग्रह आने
॥२॥ जो सिरजा तेहि नहिं पहिचानै । करम भरम लै बैठि बखानै
॥ ३ ॥ ग्रहण अमावस सायर पूजा । स्वातिके पात परहिं जनि
दूजा ॥४॥ प्रेत कर्म मुख अंतर बासा । आहुति सहित होमकी
आसा ॥५॥ कुल उत्तम कुल माहि कहावे । फिरि फिरि मध्यम
कर्म करावे ॥ ६ ॥ करम असुचि उछिछे खाहीं । मति भरिष्ट
जमलोकहिं जाहीं ॥ ७ ॥ सुत दारा मिलि जूठा खाहीं । हरि
भगतनकी छूत कराहीं ॥ ८ ॥ नहाय खोरि उत्तम है आवे ।
विष्णुभक्त देखे दुख पावे ॥ ९ ॥ स्वारथ लागि रहे वे आढा ।
नाम लेत जस पावक डाढा ॥१०॥ राम किन्नकी छोडिन आसा ।
पठि गुनिभै किरतिमके दासा ॥ ११ ॥ करम करहि करमहिको
धावे । जो पूछे तेहि करम हढावै ॥ १२ ॥ निःकरमीकी निंदा
करई । कर्म करे ताही चित धरई ॥ १३ ॥ अस हिय भगति