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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(५२२)

कवीरपंथी—

सिरके लियो विसवास हो रमैया राम ॥२॥ ई तो है वेद साक्ष
हो रमैया राम । गुरु दीन्हो मोहिं थापि हो रमैया राम ॥ ३ ॥
गोबर कोट उठायहु हो रमैया राम । परि हरि जैहो खेत हो
रमैया राम ॥ ४ ॥ बुद्धिवल तहाँ न पड़ुंचै हो रमैया राम ।
खोज कहांति होय हो रमैया राम ॥५॥ सुनिमन धीरज भैल हो
रमैया राम । मन बढि रहल लजाय हो रमैया राम ॥६॥ फिरि
पाछे जनि हेरो हो रमैया राम । काल बूत सब आय हो रमैया
राम ॥ ७ ॥ कह कवीर सुनु संत हो रमैया राम । मति दिगहि
फैलाहु हो रमैया राम ॥ ८ ॥

अथ विरहुली प्रारम्भः ।

आदि अन्त नहिं होत विरहुली । नहिं जड़ पल्लव पेड़ विर-
हुली ॥ १ ॥ निसि बासर नहिं होत विरहुली । पानी पवन न
होत विरहुली ॥ २ ॥ ब्रह्माहि सनकादि विरहुली । कथि गये
जोग अपार विरहुली ॥ ३ ॥ मास अषाढहि शीत विरहुली ।
बोइन सातौ बीज विरहुली ॥४॥ नित गाड़ै नित सिंचै विरहुली ।
नित नव पल्लव पेड़ विरहुली ॥ ५ ॥ छिछिल विरहुली छिछिल
विरहुली । छिछिल रहल तिहुँलोक विरहुली ॥ ६ ॥ फुल एक
भल फुलल विरहुली । फूलि रहल संसार विरहुली ॥ ७ ॥ ते
फुल बन्दै भगत विरहुली । बांधिके राउर जाय विरहुली ॥८॥
सो फुल लोढहि संत विरहुली । डसि गौ बैतल सांप विरहुली
॥ ९ ॥ विषहर मंत्र न मान विरहुली । गाडुर बोले और विर-
हुली ॥ १० ॥ विषकी कयारी बोयो विरहुली । अब लोरत का
पछिताय विरहुली ॥ ११ ॥ जनम जनम अवतरेउ विरहुली ।
फल यक कनइल डार विरहुली ॥ १२ ॥ कह कवीर सचु पाय
विरहुली । जो फल चाखहु मोर विरहुली ॥ १३ ॥