कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
शब्दावली
(४७१)
सा०-जिन्ह यह चित्र बनाइया, साँचा सो सूत्रधार ।
कह कवीर ते जन भले, चित्रवंतहि लेहि विचार ॥ २६ ॥
रमनी सताईसवीं २७ ॥
ब्रह्माको दीन्हो ब्रह्मण्डा । सात द्वीप पुहुमी नौ खण्डा ॥ सत्य
सत्य कहि विष्णु दृढाई । तीन लोक मई राखिनि जाई ॥ लिंग
रूप तब शंकर कीन्हहा । धरती कील रसातल दीन्हहा ॥ तब अष्टंगी
रची कुमारी । तीन लोक मोहा सब झारी ॥ दुतिया नाम पार्वती
भयऊ । तप करता शंकरको दयऊ ॥ एकै पुरुष एक है नारी ।
ताते रचनि खानि भौ चारी ॥ शर्मन वर्मन देवो दासा ।
रज सत तम गुण धरणि अकाशा ॥ २७ ॥
सा०-एक अण्ड ओंकार ते, सब जग भयो पसार ।
कहहि कवीर सब नारिरामकी, अविचल पुरुष भतार ॥ २७ ॥
रमनी अठ्ठाईसवीं २८ ॥
अस जोलहाका मर्म न जाना । जिन जग आइ पसारल ताना ॥
धरति अकाश दोऊ गाड बनाई । चंद्र सूर दुइ नरा भराई ॥
सहस तार लै पूरिन पूरी । अजहू विनय कठिन है दूरी ॥ कहहि
कवीर करम सों जोरी । सूत कुसूत बिने भल कोरी ॥ २८ ॥
रमनी उन्तौसवीं २९ ॥
वज्रहुते त्रिन छनमें होई । त्रिने वज्र करै पुनि सोई ॥ निझरू
नरू जानि परिहरई । कर्मक बांधा लालच करई ॥ कर्म धर्म बुद्धि
मति परिहरिया । झूठा नाम साँचलै धरिया ॥ रजगति त्रिविधि
कीन्ह परगासा । कर्म धर्म बुधिकेर विनाशा ॥ रविके उदय तारा
भौ छीना । चर बेहर दोनोमें लीना ॥ विषके खाये विष नहिं
जावै । गारुड सो जो मरत जिआवै ॥
सा०-अलख जो लागी पलकमें, पलकहिमें ढसि जाय ।
विषहर मंत्र न मानई, गारुड काह कराय ॥ २९ ॥
(४७२)
कवीरपंथी—
रमैनी तीसवीं ॥ ३० ॥
औ भूले षष्ठ दरशन भाई । पाखण्ड भेष रहा लपटाई ॥
जीव शीवका आयन सोना । चांरिउ वेद चतुर्गुण मौना ॥
जैनी धर्मक मर्म न जाना । पाती तोरि देव घर आना ॥
दवना मरूआ चम्पा फूला । मानो जीव कोटि समतूला ॥
औ पृथ्वीको रोम उचारे । देखत जन्म आपनो हारे ॥
मनमथ बिंदु करे असरारा । कलपे बिन्दु खसैं नहिं द्वारा ॥
ताका हाल होय अघकूचा । छौ दरसनमें जैन विगूचा ॥
सा०—ज्ञान अमर पद बाहिरे, नियरे ते है दूरि ।
जो जाने तेहि निकट है, रह्यो सकल घट पूरि ॥३०॥
रमैनी इकतीसवीं ३१ ॥
सुम्रिति आहि गुणनको चीन्हा । पाप पुण्यको मारग लीन्हा ॥
सुम्रिति वेद पढै असरारा । पाखण्ड रूप करै हंकारा ॥
पढै वेद ओ करै बड़ाई । संशय गांठि अजहुं नहिं जाई ॥
पढिकै शास्त्र जीव बध करई । मूढ़ि काटि अगमनकै धरई ॥
सा०—कहहि कवीर पाखण्डते, बहुतक जीव सताय ।
अनुभव भाव न दर्शई, जियत न आपु लखाय ॥३१॥
रमैनी बत्तीसवीं ॥ ३२ ॥
अंध सो दर्पण वेद पुराना । दरबी कहा महारस जाना ॥
जस खर चंदन लादे भारा । परिमल बास न जानु गँवारा ॥
कहहि कवीर खोजै अस्माना । सो न मिला जो जाय अभिमाना ॥३२॥
रमैनी तैतीसवीं ॥ ३३ ॥
वेदकी पुत्री स्मृति भाई । सो जेवरि करि लेतै आई ॥
आपुहि बरी आपु गर बन्धा । झूठी मोह कालको धंधा ॥
बंधवत बंधा छोरि नहिं जाई । विषय स्वरूप भूलि दुनियाई ॥
हमरे लखत
१ चारोबद्ध चतुर्गुण मौना ।
शब्दावली
(४७३)
सकल जग लूटा । दास कवीर राम कहि छूटा ॥
सा०-रामहि राम पुकारते, जिभ्या परिगौ रौम ।
मुधाजल पीवे नहीं, खोद पियनकी होस ॥ ३३ ॥
रमैनी चौतीसवीं ३४ ॥
पढि पढि पंडित करहु चतुराई । निज सुक्तिहि मोहि कहु
समुझाई ॥ कहां बसे पुरुष कवन सो गाऊँ । सो मोहि पण्डित
सुनावहु नाऊँ ॥ चारि वेद ब्रह्मे निज ठाना । सुक्तिक मर्म उन्हीं
नहि जाना ॥ दान पुत्र उन बहुत बखाना । अपने मरनकी
खबरि न जाना ॥ एक नाम है अगम गँभीरा । तहवाँ अस्थिर
दास कवीरा ॥
सा०-चिउटी जहां न चढि सके, राई नहि ठहराय ।
आवागमनकी गम नहीं, तहँ सकलो जग जाय ॥ ३४ ॥
रमैनी पैंतीसवीं ३५ ॥
पंडित भूले पढि गुणि वेदा । आपु अपनपौ जानु न भेदा ॥
संध्या तर्पण औ षट कर्मा । ई बहु रूप करहि अस धर्मा ॥
गायत्री युग चारि पढाई । पूछहु जाय सुक्ति किन पाई ॥ औरके
छुये लेतहौ सींचा । तुमते कहहु कौन है नीचा ॥ ई गुण गर्व करो
अधिकाई । अतिके गर्ब न होय भलाई ॥ जासु नाम है गर्व
प्रहारी । सो कस गर्वहि सके संहारी ॥
सा०-कुल मर्यादा खोइकै, खोजिनि पद निर्वान ।
अंकुर बीज नशाइकै, भये विदेही थान ॥ ३६ ॥
रमैनी छत्तीसवीं ३६ ॥
ज्ञानी चतुर विचच्छण लोई । एक स्यान स्यान न होई ॥
दूसर स्यानको मर्म न जाना । उत्पति परलय रैनि विहाना ॥
बानिज एक सबन मिलि ठाना । नेम धर्म संजम भगवाना ॥
हरि अस ठाकुर तज्यो न जाई । बालन भिस्ति गांव दुलहाई ॥
( ४७४ )
कवीरपंथी-
सा०-ते नर मरिके कहाँ गये, जिन दिन्हा गुर घोटि ।
राम नाम निज जानिकै, छाडहु बस्तू खोटि ॥३६॥
रमनी संतोषवी ३७ ॥
एक सयान सयान न होई । दूसर स्यान न जाने कोई ॥
तीसर सयान सयाने खाई । चौथ सयान तहाँ ले जाई ॥
पँचये सयान न जाने कोई । छठये महाँ सब गये विगोई ॥
सतये सयान जो जानहु भाई । लोक वेदमें देहु देखाई ॥
सा०-बीजक बतावै बितको, जो बित गुता होय ।
शब्द बतावै जीवको, बूझे विरला होय ॥३७॥
रमनी अदतीसवी ३८ ॥
यहि विधि कहाँ कहा नहि माना । मार्ग मांहि पसारिनि
ताना ॥ राति दिवस मिलि जोरिनि तागा । ओटत कातत भर्म
न भागा ॥ भर्म सब घट रह्यो समाई । भर्म छाडि कतहुँ नहिं
जाई ॥ परै न पूरि दिनौ दिन छीना । तहाँ जाय जहाँ अंग
विहीना ॥ जो मति आदि अन्त चलि आया । सो मति उन
सब प्रगट सुनाया ॥
सा०-वहै संदेश फुर मानिकै, लीन्हो सीस चढाय ।
संतो है संतोष सुख, रहहु हृदय जुडाय ॥३८॥
रमनी उत्तालीसवी ३९ ॥
जिन्ह कलमां कलि माह पढाया । कुदरत खोज तिन्हुँ नहिं
पाया ॥ करमत कर्म करै करतूती । वेद किताब भया सब रीती ॥
करमत सो जो गर्भ औतरिया । करंमत सो निमाज गुजरिया ॥
करमत सुन्नति और जनेऊ । हिन्दू तुरुक न जाने भेऊ ॥
सा०-पानी पवन संजोयकै, राचयाई उत्पात ।
शून्यहि सुरति समानिया, कासों कहिये जात ॥३९॥
१ करमत सो जो नामहि धरिया ।
शब्दावली
(४७५)
रमैनी चालीसवीं ४० ॥
आदम आदि सुद्धि नहिं पाईं । मामा हउआ कहांते आईं ॥
तब नहिं होते तुरुक औ हिन्दू । मायाके रुधिर पिताके बिन्दू ॥
तब नहिं होते गाय कसाई । तब विस मिल्लाः किन फरमाईं ॥
तब नहिं रह्यो कुल औ जाती । दोजरव भिस्त कहां उतपाती ॥
मन मसलेकी खबरि न जाने । मति मुलान दोइ दीन बखाने ॥
सा०-संयोगेका गुण रवे, विन योगे गुण जाय ।
जिभ्या स्वादके कारणे, कीन्हे बहुत उपाय ॥ ४० ॥
रमैनी इकतालीसवीं ४१ ॥
अम्की रासि ससुद्रकी खाई । रवि मसि कोटि तैंतीसौ भाई ॥
भैवर जालमें आसन माडा । चाहत सुख दुख संग न छाडा ॥
दुखको मर्म काहु नहिं पाया । बहुत भांतिके जग भर्माया ॥
( बौराया ) ॥ आपुहि बाउर आपु सयाना । हृदय बसत राम
नहिं जाना ॥
सा०-तेई हरि तेइ ठाकुरा, तेई हरिके दास ।
न जम भया न जामनी, भामिनी चली निरास ॥ ४१ ॥
रमैनी बयालीसवीं ४२ ॥
जब हम रहल रहा नहिं कोई । हमरे माँहिं रहल सब कोई ॥
कहहु हो राम कौन तोरि सेवा । सो ससुझाय कहौ मोहि देवा ॥
फुर फुर कहउँ मारु सब कोई । झूठेहि झूठा संगति होई ॥
आंधर कहे सबै हम देखा । तहें दिठियार बैठि सुख पेखा ॥
यहि विधि कहौ मालु जो कोई । जस सुख तस जो हृदया होई ॥
कहहि कवीर हंस मुसकाई । हँमरे कहल दुष्ट बहु भाई ॥ ४२ ॥
रमैनी तैंतालसीवीं ॥ ४३ ॥
जिन्ह जिव कीन्ह आपु विश्वासा । नरक गये ते नरकहिं बासा ॥
आवत जात न लागहि बारा । काल अहेरी साँझ सकारा ॥
१ मुस्ताई । २ हमरे कहल छुठिही भाई ।
( ४७६ )
कवीरपंथी—
चौदह विद्या पढि समुझावै । अपने मरनकी खबर न पावै ॥ जाने
जिवको परा अंदेसा । झूठहि आनिकै कहा संदेसा ॥ संगति
छोडि करै अस रागा । उब है मोट नरक कर भारा ॥ ४३ ॥
सा०—गुरु द्रोही औ मन सुखी, नारि पुरुष विचार ।
ते नर चौरासी अप्रि है, जौलौ शशि दिनकार ॥ ४३ ॥
रमैनी चौवालीसवी ॥ ४४ ॥
कबहुँ न भये संग औ साथा । ऐसो जन्म गँवाये हाथा ॥
बहुरि न पैहौ ऐसो थाना । साधु संग तुम नहिं पहिचाना ॥ अब
तोर होइ नरकमें बासा । निस्त्र दिन बसे लबारके पास ॥ ४४ ॥
सा०—जात सबन कहैं देखिया, कहहिं कवीर पुकार ।
चेतवाहोहु तो चेतिले, दिवस परत है धार ॥ ४४ ॥
रमैनी पैतालीसवी ॥ ४५ ॥
हिरण्यकुश रावण गौ कंसा । कृष्ण गये सुर नर मुनि बंसा ॥
ब्रह्मा गये मरम नहिं जाना । बड सब गये जो रहे सयाना ॥
समुझि परी नहिं राम कहानी । निरबक दूध कि सरबक पानी ॥
रहिगौ पंथ थकित भौ पवना । दशो दिशा उजारि भौ गवना ॥
मीन जाल भौ इ संसारा । लोहकि नाव पषानको भारा ॥ खेवे
सबै मरम नहिं जाना । तहिबो कहै रहै उतराना ॥ ४५ ॥
सा०—मछरी मुख जस केंचुवा, मुखवन मुँह गिरदान ।
सर्पन मुँह गहेजुवा, जात सबनको जान ॥ ४५ ॥
रमैनी छयालीसवी ॥ ४६ ॥
विनसै नाग गरुड गलि जाई । विनसै कपटी औ सतभाई ॥
विनसे पाप पुण्य जिन्ह कीन्हा । विनसे गुन निर्गुन जिन चीन्हा ॥
विनसे अग्नि पवन औ पानी । विनसे सूछि कहाँ लौ गानी ॥ विष्णु
लोक विनसे छन माहीं । हौ देखा परलैकी छाँही ॥ ४६ ॥
सा०—मछ रूप माया भई, यमरा खेलै अहेर ।
इहिर ब्रह्म न उबरे, सर नर मुनि केहि केर ॥ ४६ ॥
शब्दावली
(४७७)
रमैनी संतालीसर्वो ॥ ४७ ॥
जरासिंधु शिशुपाल संहारा । सहस्राञ्जै छल सो मारा ॥
बड छल रावन सो गौ वीती । लंका रही कंचनकी भीती ॥ दुयोंधन
अभिमानहिं गयऊ । पांडव केर मरम नहिं पयऊ ॥ मायाके
दम्भ गैल सब राजा । उत्तम मध्यम बाजन बाजा ॥ छौ चकवे
सब धरनि समाना । एको जीव परतीति न माना ॥ कहाँ लौ
कहौ अचेते गयऊ । चेत अचेत झगर एक भयऊ ॥ ४७ ॥
सा०-ई माया जग मोहिनी, मोहिंसि सब जग धाय ।
हरिचंद्र सतके कारने, घर घर गये बिकाय ॥४७॥
रमैनी अडतालीसर्वो ॥ ४८ ॥
मानिक पुरहि कवीर बसेरी । महति सुनी शेख तक्रि केरी ॥
ऊजे सुनी जमन पुर धामा । झूसी सुनी पिरनको नामा ॥ इकइस
पीर लिखै तेहि ठामा । खतमा पढै पैगम्बर नामा ॥ सुनी बोल
मोहि रहा न जाई । देखि सुकरवा रहे भुलाई ॥ हवीव औ
नबीको कामा । जहांलों अमल सो सबै हरामा ॥ ४८ ॥
सा०-शेख अकरदी शेख सकरदी, मानो बचन हमार ।
आदि अन्त औ जुगहि जुग देखहु दृष्टि पसार ॥४८॥
रमैनी उन्चासर्वो ॥ ४९ ॥
दूरकी बात कहौ दवैसा । बादसाह है कौने भेसा ॥ कहाँ कूच
कहां करे सुकामा । कौन सुरतिको करो सलामा ॥ मैं तोहि पूछों
सुसलमाना । लाल जूद की नाना बाना ॥ काजी काज करो
तुम कैसा । घर घर जवह करावौ भैसा ॥ बकरी मुर्गी किन
फुरमाया । किसके कहे तुम छूरी चलाया ॥ दर्द न जानै पीर
कहावै । बैता पठि पठि जग भर्मावै ॥ कह कवीर यक सय्यद
कहावै । आप सरीखा जग कबुलावै ॥ ४९ ॥
सा०-दिनभर रोजा रहत है, रात हनत है गाय ।
यह खून वह बन्दगी, क्यों कर खुशी खोदाय ॥ ४९ ॥
(४७८)
कबीरपंथी—
रमैनी पद्मासवी ५० ॥
कह इत मोहिं भयल जुग चारी । समझत नाहीं मोहि सुत नारी ॥ बंस आग लगी बंसै जरिया । अम भुलाय नर धंघे परि्या ॥ हस्तीके फन्दे हस्ती रहई । मृगीके फन्दे मृगा परई ॥ लोहै लोह काटु जस आना । तियाके तत्व तिया पहिचाना ॥५०॥
सा०—नारि रचंते पुरुष है, पुरुष रचंते नारि ।
पुरुषहि पुरुषा जो रचे, ते बिरले संसार ॥ ५० ॥
रमैनी इत्यावनवी ॥ ५१ ॥
जाकर नाम अकहुआ भाई । ताकर कहा रमैनी गाई ॥ कहैको तातपर्य है ऐसा । जस पंथी वोहित चढि वैसा ॥ है कछु रहनि गहनिकी बाता । बैठा रहै चला पुनि जाता ॥ रहै बदन नहिं स्वांग सुभाऊ । मन अस्थिर नहिं बीलै काऊ ॥ ५१ ॥
सा०—तन रहते मन जात है, मन रहते तन जाय ।
तन मन एकै है रहै, हंस कवीर कहाय ॥ ५१ ॥
रमैनी वावनवी ५२ ॥
जेहि कारन शिव अजहुँ वियोगी । अंग बिभूति लायभै जोगी ॥ सेष सहस मुख पार न पावै । सो अब खसम सहित समुझावै ॥ ऐसी विधि जो मो कहँ धावै । छठयें मास दरस जो पावै ॥ कौनेहु भांति दिखाई देऊँ । गुप्तहि रहौं सुभाव सब लेऊँ ॥५२॥
सा०—कहहिं कवीर पुकारिके, सबका उहै हवाल ।
कहा हमार मानै नहीं, किमि छूटै भ्रमजाल ॥ ५२ ॥
रमैनी तिरपनवी ५३ ॥
महादेव मुनि अन्त न पाया । उमा सहित उन जन्म गंवाया ॥ उनहुते सिद्ध साधक होई । मन निश्चै कहु कैसे कोई ॥ जब लग तनयै आहै सोई । तब लग चेत न देखो कोई ॥ तब चेतिहो जब तजिहो प्राना । भया अन्त तब मन पछताना ॥ इतना सुनत निकट चलि आई । मनके विकार न छूटे भाई ॥
१ उनसे सिद्ध साधक नहिं कोई । मन निश्चय कहु कैसे होई ।
शब्दावली
(४७९)
सा०-तीनलोक मुआ कौआयके, छुटि न काहुकी आस ।
यक अंधरे जग खाइया, सब जग भया विनास ॥५३॥
रमनी चौवनवी ५४ ॥
मरिगो ब्रह्मा काशीके वासी । शिव सहित मुये अविनाशी ॥
मथुरा मरिगो कृष्ण गुवारा । मरि मरि गये दसो अवतारा ॥ मरि
मरि गये भगति जिन ठानी । सर्गुण मां जिन दुर्गुण आनी ॥
सा०-नाथ मछंदर बांचे नहीं, गोरखदत्त औ व्यास ।
कहहि कवीर पुकारिके, परे कालके फांस ॥५४॥
रमनी पचपनवी ५५ ॥
गये राम औ गये लछमना । संग न गई सीता असधना ॥
जात कौरवन लागु न वारा । गये भोज जिन्ह साजल धारा ॥
गये पांडव कुंतीसी रानी । गये सहदेव जिन्ह बुद्धि मति ठानी ॥
सर्व सोनकी लंक बनाई (उठाई) । चलत बार कछु संग न लाई ॥
कुरिया जासु अंतरिक्ष छाई । सो हरिश्चन्द्र देखि नहीं जाई ॥
मूरख मानुष अधिक सँजोवै । अपने सुवल और लगि रोवै ॥
ई न जाने अपनो मरि जैवे । टकादश विठै और ले खेवै ॥
सा०-अपनी अपनी करिगये, लगी न काहुकी साथ ।
अपनी करिगये रावणा, अपनी दशरथ नाथ ॥५५॥
रमनी छप्पनवी ५६ ॥
दिन दिन जै जरलके पाऊ । गाड़े जाइ न उमगे काऊ ॥
कंध न देई मसखरी करई । करहु धौँ कौनि भांति निस्तरई ॥
अकरम करै करमको धावै । पठि गुनि वेद जगत समुझावै ॥ छूछे
परे अकारथ जाई । कहैं कवीर चित चेतहु भाई ॥ ५६ ॥
रमनी सत्तावनवी ५७ ॥
कृतियासूत्र लोक यक अहई । लाख पचासकी आगे कहई ॥
१-तीन लोक मो आइके, छूटी न काहुकी आश ।
यक अंधार जग खाइया, सब जग भया निराश ॥
(४८०)
कबीरपंथी—
विद्या वेद पढे पुनि सोई । बचन कहत परतच्छे होई ॥ पहुँची
बात विद्याकी वेता । वाहुके भर्म भयो संकेता ॥
सा०—खग खोजनको तुम परे, पीछे अगम अपार ।
बिन परचे किमि जानिहौ, झूठा है हंकार ॥६७॥
रमैनी अदृष्टावनी ५८ ॥
तै सुत मानु हमारी सेवा । तो कहैं राज देऊँ हो देवा ॥ अगम
द्विगम गढ देहैं छुड़ाई । ओरो बात सुनहु कहु आई ॥ उत्पति
परलै देउँ दिखाई । करहु राज सुख बिलसहु जाई ॥ एको बार
होइहै बाँको । बहुरि जन्म न होइहै ताको ॥ जाय पाप हुइहैं
सुख घाना । निश्चय बचन कबीरको माना ॥
सा०—साधु संत तेइ जना जिन, माना बचन हमार ।
आदि अंत उत्पति प्रलय, देखहु दृष्टि पसार ॥६८॥
रमैनी उनसठवी ५९ ॥
चढ़त चढावत भंडहर फोरी । मन नहिं जनिको करि चोरी ॥
चोर एक मूसल संसारा । विरला जाने कोइ बूझन हारा ॥
स्वर्ग पताल भूमि लै बारी । एके राम सकल रखवारी ॥
सा०—पाहन है है सब गये, अन भितियनके चित्त ।
जासो किये भिताइया, सो धन भया न हित्त ॥६९॥
रमैनी साठवी ७० ॥
छाड़हु पति छाड़हु लबराई । मन अभिमान टूटि तब जाई ॥
जिनहले चोरि जो भिच्छा खाई । सो विरवा पलुहावन जाई ॥
पुनि संपति औ पतिको धावै । सो विरवा संसार लै आवै ॥
सा०—झूठ झूठ कै डारहु, मिथ्या यह संसार ।
तेहि कारण मैं कहत हौं, जाते होय उबार ॥ ६० ॥
१ पंटी बात विद्याकी पंदा ।
शब्दावली
(४८१)
रमनी यकसठबी ॥ ६१ ॥
धर्म कथा जो कहते रहई । लबरी नित उठि प्राते कहई ॥
लबरि विहाने लबरी संझा । एक लाबरि वस द्विदया मांझा ॥
रामहु केर मर्म नहि जाना । ले मति ठानी वेद पुराना ॥ वेदहु
केर कहा नहि करई । जरते रहे मुस्त नहि परई ॥
सा०-गुणातीतके गावते, आपुहि गये गमाय ।
माटी तन माटी मिलो, पवनहि पवन समाय ॥ ६१ ॥
रमनी वासठबी ॥ ६२ ॥
जो तोहि करता बरण विचारा । जनमत तीन दण्ड अनुसारा ॥
जनमत शूद्र सुये पुनि शूद्रा । कृत्रिम जनेउ घालि जग दुंद्रा ॥
जो तुम ब्राह्मण ब्राह्मणी जाये । और राह तुम काहे न आये ॥
जो तुम तुरुक तुरुकनी जाये । पेटै काहे न सुनति कराये ॥ कारी
पीरी दूहौ गई । ताकर दूध देहु बिलगाई ॥ छाडु कपट नर
अधिक सयानी । कहहि कवीर भजु शारंगपानी ॥ ६२ ॥
रमनी तिरसठबी ॥ ६३ ॥
नाना रूप बरण यक कीन्हा । चारि वरण वै काहु न चीन्हा ॥
नष्ट गये कर्ता नहि चीन्हा । नष्ट गये औरहि मन दीन्हा ॥ नष्ट
गये जिन वेद बखाना । वेद पठै पै भेद न जाना ॥ विमल्लख करै
नैन नहि सूझा । भौ अजान तब कछुव न बूझा ॥
सा०-नाना नाच नचाइके, नाचे नटके भेष ।
घटघटमें अविनाशी बसै, सुनहु तंकी तुम सेष ॥ ६३ ॥
रमनी चौसठबी ॥ ६४ ॥
काया कंचन जतन कराया । बहुत भांतिके मन पलटाया ॥
जो सौ बार कहौ समुझाई । तहिबो धरा छोडि नहि जाई ॥
जनके कहे जो जन रहि जाई । नव निधि सिधि तिन्ह पाई ॥
सदा धर्म तेहि द्विदया बसई । राम कसौटी कसते रहई ॥
जोरि कसावै अन्ते जाई । सो बाउर आपुहि बौराई ॥
कबीरपंथी शब्दावली १६
(४८२)
कवीरपंथी-
सा०-ताते परी कालकी फांसी, करहु आपनो सोच ।
जहां संत तहां संत सिधौवै, मिलिरहे पोचैपोच ॥६४॥
रमनी पैसठवीं ॥ ६५ ॥
अपने गुणके औगुण कहहू । इहै अभाग तुम न विचारहू ॥
तुम जियरा बहुते दुख पाया । जल बिनु मीन कवन सचुपाया ॥
चात्रिक जल हल भरे जो पासा । मेघ न बरसे चले उदासा ॥
स्वांग धरे भौसागर आसा । चात्रिक जल हल आसै पासा ॥
रामनाम अहै निज सारा । औरो झूठ सकल संसारा ॥ हरी उतंग
तुम जात पतंगा । जम घर किये जीवको संगा ॥ किंचित है
सपने निधि पाई । हिये न समाय कहैं धरे छिपाई ॥ हिय न
समाय छोड़ि नहिं पारा । झूठा लोभ वै कछु न विचारा ॥
सप्ति किन्ह आपु नहीं माना । तरिवर छर छागर है जाना ॥
जिय दुर्मति डोलै संसारा । तेहि नहिं सूझे वार न पारा ॥
सा०-अन्ध भया सब डोलई, कोइ न करै विचार ।
कहौ हमार माने नहीं, किमि छूटै भर्म जार ॥६६॥
रमनी छाछठवीं ॥ ६६ ॥
सोई हीतु बंधु मोहि भावै । जात कुमारग मारग लावै ॥
सो सयान मारग रहि जाई । करे खोज कबहुँ न भुलाई ॥ सो झूँठा
जो सुतके तजई । गुरुकी दया राम ( को ) भजई ॥ किंचित है
यह जगत भुलाना । धन सुत देखि भया अभिमाना ॥
सा०-जियँ जो नेक पयान किय, मन्दिर भया उजार ।
मरे जे जियते मरि गये, बांचे बाचन हार ॥६६॥
रमनी सद्दसठवीं ॥ ६७ ॥
देह हलाय भक्ति न होई । स्वांग धरे बहुतै नर जोई ॥ धोंगा
धींगी भलो न माना । जो काहू मोहि द्विदय न जाना ॥ सुख
१ हरिको भक्ति जाने बिना, भव बुदि मुग्धा संसार । २ किंचित है एक तेज भुलाना ।
३ दीन नख्ता किया पयाना, मंदिर भया उजार । मरि गया सो मरि गया, बांचे बाचन हार ॥
शब्दावली
(४८३)
किछु और हिदय कछु आना । सपनेहुँ कबहुँ मोहि न जाना ॥
ते दुख पावै यहि संसारा । जो चेतहु तो होय उबारा ॥ जो नर
गुरुकी निंदा करई । सूकर स्वान जन्म सो धरई ॥
सा०-लख चौरासी जिव जंतुमें, भटकि भटकि दुख पाव ।
कहहि कवीर जो रामहि जाने, सो मोहिनीके भाव ॥६७॥
रमैनी वडसठवीं ६८ ॥
तेहि वियोगते भयउ अनाथा । परि निकुंज बन पाव न
पाथा । वेदो नकल कहै जो जाने । जो सखुझै सो भलो न मानै ॥
नटैवत विद्या खेले जो जाने । तेहि गुणके ठाकुर भल मानै ॥
उहै जो खेले सब घट माहीं । दूसरको कछु लेखा नाही ॥ भलो
पोच जो अवसर आवै । कैसंहुके जन पूरा पावै ॥
सा०-जेकरे शर लागे हिय, सो जानेगा पीर ।
लागे तो भागे नहीं, सुखसिंधु निहारु कवीर ॥६८॥
रमैनी उनहतरवीं ६९ ॥
ऐसा योग न देखा भाई । भूला फिरे लिये गाफिलाई ॥
महादेवको पंथ चलावै । ऐसो बडो महंत कहावै ॥ हाट बजारै
लावै तारी । कबेसिधन माया प्यारी ॥ कब दत्ते मावासी तोरी ।
कब सुकदेव तोपची जोरी ॥ कब नारद बन्दूक चलाया । व्यास-
देव कब बंब बजाया ॥ करहिं लड़ाई मतिके मंदा । ये है अतिथि
कि तरकस बंदा ॥ भये बिरक्त लोभ मन ठाना । सोना पहिरि
लजावै बाना ॥ घोरा घोरी कीन्ह बटोरा । गाव पाय जस चले
करोरा ॥
१ लख चौरासी योनि जिव, भटकि २ दुख पावै ।
२ नटवर बन्द खेल जो जानै । ताकर गुण जो ठाकुर मानै ॥
३ कैसे कै जन पूरा पावै ।
(४८४)
कबीरपंथी—
सा०-तिय सुन्दरी न सोहई, सनकादिकके साथ ।
कबहुक दाग लगावई, कारी हांडी हाथ ॥ ६९ ॥
रमनी सत्तरवीं ७० ॥
बोलना कासो बोलिय रे भाई । बोलतही सब तत्व नशाई ॥
बोलत बोलत बाढु बिकारा । सो बोलिय जो परै विचारा ॥
मिलै जो संत वचन दुइ कहिये । मिलै असंत मौन है रहिये ॥
पंडित सो बोलिय हितकारी । मूरख सो रहिये झखमारी ॥
कहहि कबीर अथ घट डोलै । पूरा होय विचार लै बोले ॥७०॥
रमनी इकहत्तरवीं ७१ ॥
शोक बधावा सब करि माना । ताकी बात इन्द्र नहि जाना ॥
जटा तोरि पहिरावै सेली । योग युक्तिको गर्भ दुहेली ॥
उड़ाये कौन बड़ाई । जैसे काग चीन्ह मड़राई ॥
जैसे भिस्ति तैसी है नारी । राज पाट सब गने उजारी ॥
जस नर्क तस चंदन जाना । जस वाउर तस रहै स्याना ॥
लपसी लौंग गने यक सारा । खांडें छांडि मुख फांकै छारा ॥
सा०-यही विचार विचारते, गये बुद्धि बल चित ।
दुई मिलि एकै होय रहा, काहि लगाऊं हित ॥ ७१ ॥
रमनी बहत्तरवीं ७२ ॥
नारी एक संसारहि आई । माय न वाके बापहि जाई (बाप न जाई) ॥
गोड न मूंड़ न प्राण अधारा । जामै भरमि रहा संसारा ॥
दिना सात लो वाकी सही । बुध अथ बुध अचरज यक कही ॥
वाहिकि वंदन कर सब कोई । बुध अथबुध अचरज बड़ होई ॥
सा०-मूस बिलाई एक संग, कहु कैसे रहि जाय ।
अचरज एक देखो सन्तो, हस्ती सिंहहि खाय ॥७२॥
१ खांडोपरी हरि फांकै छारा ।
शब्दावली
(४८५)
रमनी तिहत्तरवीं ७३ ॥
चली जात देखी यक नारी । तर गागरि ऊपर पनिहारी ॥
चली जात वह बाटहिं बाटा । सोवन हारके ऊपर खाटा ॥
जाइन मरे सुपेदी सौरी । खसम न चीन्है धरनि भई बौरी ॥
सांझ सकारै दिया ले बारे । खसमहिं छाडि सुमिरे लगवारै ॥
वाहिके संग निशिदिन रांची । पियासो बात कहै नहिं सांची ॥
सोवत छांड़ि चली पिय अपना । ई दुख अवधौं कहीं केहि सना ॥
सा०-आपनी जांच उधारिके अपनी कही न जाय ।
कि जाने चित आपना, की मेरो जन गाय ॥ ७३ ॥
रमनी चौहत्तरवीं ७४ ॥
तहिया गुप्त थूल नहिं काया । ताके सोग न ताके माया ॥
कमल पत्र तरंग यक माहीं । संगहि रहै लिप्त पै नाही ॥ आशा
ओस अंडन महँ रहई । अगनित अंडन कोई कहई ॥ निराधार
आधार लै जानी । रामनाम लै उचरी बानी ॥ धर्म कहै सब
पानी अहई । जाती के मन बानी रहई ॥ ढोर पतंग सरे घरियारा ।
तेहि पानी सब करै अचारा ॥ फन्द छोडि जो बाहर होई ।
बहुरि पंथ नहिं जोहै सोई ॥
सा०-भर्मक बांधल ई जगत, कोई न करे विचार ।
हरिकी भगति जाने बिना, बूड़ि मुआ संसार ॥ ७४ ॥
रमनी पचहत्तरवीं ७५ ॥
तेहि साहबके लागहु साथ । दुइ दुख मेटिके होहु सनाथा ॥
दशरथ कुल अवतारि नहिं आया । नहिं लंकाके राव सताया ॥
नहिं देवकीके गर्भहिं आया । नहिं यशोदा गोद खेलाया ॥
पृथ्वी रमन दमन नहिं करिया । पैठि पताल नहिं बलि छलिया ॥
नहिं बलि राय सो माडी रारी । नहिं हिरण्यकुश बधल पछारी ॥
बाराह रूप धरणी नहिं धरिया । क्षत्री मारि निक्षत्र न करिया ॥
(४८६)
कवीरपंथी—
नहिं गोवर्धन कर गहि धरिया । नहिं ग्वाल संग वन २ फिरिया ॥
गंडकी सालिग्राम नहिं सीला । मत्स्य कच्छ होय नहिं जल हीला ॥
द्वारावती सरीर नहिं छाडा । लै जगन्नाथ पिंड नहिं गाडा ॥
सा०—कहहि कवीर पुकारिके, वा पन्यै मति भूल ।
जेहि राखे अनुमान करि, शूल नहीं अस्थूल ॥७५॥
रमैनी छिहत्तरवीं ७६ ॥
माया मोह कठिन संसारा । यहै विचार न काहु विचारा ॥
माया मोह कठिन है फन्दा । होय विवेकी सो जन बन्दा ॥ राम
नाम लै बेरा धारा । सो तो लै संसारहि पारा ॥
सा०—राम नाम अति दुर्लभै, औरै ते नहिं काम ।
आदि अंत और जुग जुगै, रामहिसे संग्राम ॥७६॥
रमैनी सतहत्तरवीं ७७ ॥
एकै काल सकल संसारा । एकै नाम है जगत् पियारा ॥
तिया पुरुष कछु कथो न जाई । सर्व रूप जग रहा समाई ॥
रूप अरूप जाय नहिं बोली । हलका गरुआ जाय न तोली ॥
भूख न त्रिषा धूप नहिं छाहीं । दुख सुख रहित रहै तेहि माहीं ॥
सा०—अपरम परम रूप मगुरंगी, रूप निहपन ताहि ।
बहुत ध्यानके खोजिया, नहिं तेहि संख्या आहि ॥७७॥
अपरम परम रूप मगु रंगी, नहिं तेहि संख्या आहि ।
कहहि कवीर पुकारि के, अदभुत कहिये ताहि ॥
रमैनी अठहत्तरवीं ७८ ॥
मानुष जन्म चूके अपराधी । यही तन केर बहुत है उपाधी ॥
तात जननि कहै हमरो बाला । स्वारथ जानि कीन्ह प्रतिपाला ॥
कामिनी कहै मोर पिय आही । बाचिनि रूप ग्रासे चाही ॥ पुत्र
कलत्र रहै लव लाई । जम्बुक नाई रहै सैह बाई ॥ काग गीध
दोउ मरन विचारै । सूकर स्वान दोउ पंथ निहारै ॥ अग्नि कहै मैं
शब्दावली
(४८७)
ई तन जारों ॥ सो न कहै जो जरत उबारौ । धरती कहै मोहिं मिलि जाई । पवन कहै मैं लेउं उड़ाई ॥ जेहि घरको घर कहैं गंवारे । सो वैरी है गले तुम्हारे ॥ सो तन तुम आपन के जानी । विषय स्वरूप भूले अज्ञानी ॥
सा०-इतने तनके साझिया, जन्मो भरि दुख पाय ।
चेतत नाहीं बावरे, मोर मोर गोहराय ॥ ७८ ॥
रसैनी उमासिनी ७९ ॥
बढवत बाढ़ि घटावत छोटी । परखत खरी परखावत खोटी ॥ केतिक कहौ कहाँ लों कही । औरो कहौं परे जो सही । कहे बिना मोहिं रहो न जाई । विरहिनि ले ले क्रूर खाई ॥ साखी-खाते खाते जुग गया, अजहूँ न चेतो आय ।
कहहि कवीर पुकारिकै, जीव अचेतै जाय ॥ ७९ ॥
रसैनी अस्तिनी ८० ॥
बहुतक साहस करि जिय अपना । सो साहेबसे भेट न सपना ॥ खरा खोट जिन नहिं परखाया । चाहत लाभ सो मूर गवांया ॥ समुझि न परै पातरी मोटी । आछी गाढी सब भौ खोटी ॥ कहहि कवीर केहि देहौ खोरी । जब चलिहौ झिन आशा तोरी ॥ ८० ॥
रसैनी इत्यासिनी ८१ ॥
देव चरित्र सुनौ रे भाई । सो तो ब्रह्मा धिया नसाई ॥ दूजे सुनी मंदोदरि तारा । जेहि घर जेठ सदा लगवारा ॥ सुरपति जाय अहिल्यहिं छलिया । सुर गुरु धरनि चन्द्रमा हरिया ॥ कहैं कवीर हरिके गुण गाया । कुंती कारण कुंवारिहि जाया ॥ ८१ ॥
रसैनी व्यासवी ८२ ॥
सुखके वृक्ष एक जगत उपाया । समुझि न परी विषय कछु माया ॥ छौ छत्री पत्री जुग चारी । फल द्वै पाप पुत्र अधिकारी ॥ स्वाद अनन्त कछु बरनि न जाई । करि चरित्र सो ताहि समाई ॥ नट वट साज साजिया साजी । सो खेलै सो देखै वाजी ॥ मोहा
(४८८)
कवीरपंथी—
वपुरा जुगति न देखा । शिव शक्ती विरंचि नहिं पेखा ॥
सा०-परदे परदे चलिया, समुझि परी नहिं बानि ।
जो जाने सो बांचिहै, होत सकलकी हानि ॥ ८२ ॥
रमैनी निरासीवी ८३ ॥
छत्री करै छत्रिया धर्मा । वाके बढै सवाई कर्मा ॥ जिन अवधू
गुरु ज्ञान लखाया । ताकर मन तहैंदैं लै धाया ॥ छत्री सो जो
कुटुम्ब सो जूझै । पांचो मेटि एक करि बूझै ॥ जीवहि मारि
जीव प्रतिपालै । देखत जन्म आपनो घालै ॥ हालै करै निशाने
धाऊ । जूझि परे तहां मनमत राऊ ॥
सा०-मनमत मरे न जीवई, जीवहि मरन न होय ।
शून्य सनेही राम बिन, चले अपन पौ खोय ॥ ८३ ॥
रमैनी चौरासिनी ८४ ॥
ऐ जिय आपन दुखहि संभार । जेहि दुख व्यापिरहो संसार ॥
माया मोह बंधा सब लोई । अल्पै लाभ मूल गो खोई ॥ मोर
तोर में सबै विगुता । जननि उदर गर्भ मई सूता ॥ ई बहु रूप
खेलै बहु बूता । जन भौरा अस गये बहुता ॥ उपजि विनसि
फिर जोनी आवै । सुखको लेश सपनेहुं नहिं पावै ॥ दुख संताप
कष्ट बहु पावै । सो न मिला जो जरत बुझावै ॥ मोर तोरमें जर
जग सारा । ध्रिंग स्वारथ झूठा हंकारा ॥ झूठो आश रहा जग
लागी । इन्हते भागि बहुरि पुनि आगी ॥ जे हितकै राखे सब
लोई । सो सयान वाचा नहिं कोई ॥
सा०-आपु आपु चेतै नहीं, कहो तो रूसावा होय ।
कहै कवीर जो आपु न जागे, निरास्ति अस्ति न कोय ॥ ८४ ॥
इति रमैनी मूल बीजकको संपूर्ण ॥
१ धृग जीवन झूठी संसारा ।
२ आपु आप चेतै नहीं कहो तो रिसहा होय ।
कहै कबीर सपने जगें निरास्ति अस्ति नहिं कोय ॥
शब्दावली
(४८९)
निरख परमोधकी ।
रमैनी १ ।
अमर लोकते हम चलि आवा । तीन लोक जम लूटत पावा ॥
जम लूटे जिवको नासे । दसौ दिसा सबहुनको फाँसे ॥ १ ॥ सुर-
नर असुर कोई नहिं बाँचे । बहु विधि भेष धरे धर नाचे ॥ जने
तीन परपंची देवा । उनहु न जान्यो जमको भेवा ॥ २ ॥ गरभ
वासमें रहे भुलाई । अगम पन्थ जानो नहिं जाई ॥ ब्रह्मा वेद
पढै अधिकाई । वरण चारि मिलि बांध दिढाई ॥ ३ ॥ विरन्त
आपन पंथ चलावा । अविगत मरम काहु नहिं पावा ॥ त्रिपु-
रारी आसन आरंभा । तीनों मिलकर आसन थंभा ॥ ४ ॥ सो
पारखंड षटदर्शन भूले । फिर फिर जोइनि संकट झूले ॥ करै डिंभ
जो मूल गमावे । धोखेई धोखे डहकावे ॥ ५ ॥ एक न पूजे
देई देवा । बोल झूठ बूढे यह खेवा ॥ एक न चण्डी मन चित
लावा । स्वारथ काजे जीव हतावा ॥ ६ ॥ एक न तीरथ वरत फल
ताका । कहैं विराने आगम भाखा ॥ एक बरतकी आशा लाई ।
औसर हमको होइ सहाई ॥ ७ ॥ एक दान पुन सर्वस देहीं । जीवन
जन्म सुफल करि लेहीं ॥ ऐसे करि करि सब जग बन्धा । जस
संपुटमें लै कुछ रन्धा ॥ ८ ॥ कहा हमार न कोई मानै । मनुष
एक हमहूँको जानै ॥ मनुष रूप होय हम दिखलावा । बहुत
भाँति कर नर समुझावा ॥ तऊं न अन्ध मोहि पतियावा । धाई
धाई जस उन विष खावा ॥ ९ ॥ खसम न चीन्हे मूढ गवाँरा ।
हारे ठोकै माथ लिलारा ॥ १० ॥ झूठ नात सबही मन माना ।
साँच बातकी निन्दा आना ॥ हंस होइ सो मुहि पतिआई । और
न मुहि पतिआवे भाई ॥ ११ ॥ तज कुल कानि करे उजियारा ।
यह तो मता कालको मारा ॥ जुग जुग आजं कह समझाऊं ।
(४९०)
कवीरपंथी-
जो मानै तिहिं लोक पठाऊं ॥१२॥ अजहुं कहुं जो कोई माने ।
अच्छर माहिं मोहि पहिचाने ॥ जिहि घट अच्छर होय हमारा ।
सो ठठ खोजै आप विचारा ॥१३॥ अच्छर यहैमें कहुं विचारा ।
जो कोई बूझे आन सवारा ॥ अच्छर की प्रतीत कराई । आन
उपाय छाडिदे भाई ॥१४॥ अच्छर मध्ये बास हमारा । जो कोई
बूझे आन सवारा ॥ आन उपाय विज्ञानी होई । अच्छर विना
न छूटे कोई ॥१५॥
सा०-कहैं कवीर सब हंस से, कुल टूटे ते हंस ।
तिनसे हमसे भेद नहीं, काटे जमके फंस ॥ १ ॥
रवैनी २ ।
मोर कहा कोई विरले माना । सत्य लोकको दीन पयाना ।
सत्यलोक सत्यहिते भयउ । जुरा मरण कागज गल गयउ ॥१६॥
जुरा मरण रहित घर पावा । जिन माना मोर ससुझावा ॥ और
न कोई समझावन हारा । और न कोई राखन हारा ॥१७॥ सो
का राखे आपुहि भूले । आपुहि बानी संकट झूले ॥ आपुहि झूले
और झुलावे । आपा माड़ सबन डहकावे ॥ १८ ॥ हमहुं से जो
आपा माड़े । उलट चोर कोतवाले ढाँड़े ॥ जस नट विद्या नटवे
चीन्हा । रात दिवस जिव पालन कीन्हा ॥ १९ ॥ बहुतक बृक्ष जो
लाय दिखाये । तिसके फल सब तोड चखाये ॥ काहूको सन्तोष
न भयउ । खाली दिखाय और कछु लयउ ॥२०॥ अस लालच
जुग जुग चलआवा । लालच आगे जीव गवाँया ॥ अम्सर घर
को कोई न धावे । करामतकी सेवा लावे ॥२१॥ एक कहे संपत
मैं पाई । मान बढ़ाई बहुत दिटाई । एक कहे फुर शब्द हमारा ।
जोरे कहैं सो होय सवारा ॥ २२ ॥ इन बातन बूझे बड़ ज्ञानी ।
एक कहे जो सिद्ध कहानी ॥ सिद्ध कहानी अंजुली पानी । घट