कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 500, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ें(४८६)
कवीरपंथी—
नहिं गोवर्धन कर गहि धरिया । नहिं ग्वाल संग वन २ फिरिया ॥
गंडकी सालिग्राम नहिं सीला । मत्स्य कच्छ होय नहिं जल हीला ॥
द्वारावती सरीर नहिं छाडा । लै जगन्नाथ पिंड नहिं गाडा ॥
सा०—कहहि कवीर पुकारिके, वा पन्यै मति भूल ।
जेहि राखे अनुमान करि, शूल नहीं अस्थूल ॥७५॥
रमैनी छिहत्तरवीं ७६ ॥
माया मोह कठिन संसारा । यहै विचार न काहु विचारा ॥
माया मोह कठिन है फन्दा । होय विवेकी सो जन बन्दा ॥ राम
नाम लै बेरा धारा । सो तो लै संसारहि पारा ॥
सा०—राम नाम अति दुर्लभै, औरै ते नहिं काम ।
आदि अंत और जुग जुगै, रामहिसे संग्राम ॥७६॥
रमैनी सतहत्तरवीं ७७ ॥
एकै काल सकल संसारा । एकै नाम है जगत् पियारा ॥
तिया पुरुष कछु कथो न जाई । सर्व रूप जग रहा समाई ॥
रूप अरूप जाय नहिं बोली । हलका गरुआ जाय न तोली ॥
भूख न त्रिषा धूप नहिं छाहीं । दुख सुख रहित रहै तेहि माहीं ॥
सा०—अपरम परम रूप मगुरंगी, रूप निहपन ताहि ।
बहुत ध्यानके खोजिया, नहिं तेहि संख्या आहि ॥७७॥
अपरम परम रूप मगु रंगी, नहिं तेहि संख्या आहि ।
कहहि कवीर पुकारि के, अदभुत कहिये ताहि ॥
रमैनी अठहत्तरवीं ७८ ॥
मानुष जन्म चूके अपराधी । यही तन केर बहुत है उपाधी ॥
तात जननि कहै हमरो बाला । स्वारथ जानि कीन्ह प्रतिपाला ॥
कामिनी कहै मोर पिय आही । बाचिनि रूप ग्रासे चाही ॥ पुत्र
कलत्र रहै लव लाई । जम्बुक नाई रहै सैह बाई ॥ काग गीध
दोउ मरन विचारै । सूकर स्वान दोउ पंथ निहारै ॥ अग्नि कहै मैं