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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(४८४)

कबीरपंथी—

सा०-तिय सुन्दरी न सोहई, सनकादिकके साथ ।
कबहुक दाग लगावई, कारी हांडी हाथ ॥ ६९ ॥

रमनी सत्तरवीं ७० ॥

बोलना कासो बोलिय रे भाई । बोलतही सब तत्व नशाई ॥
बोलत बोलत बाढु बिकारा । सो बोलिय जो परै विचारा ॥
मिलै जो संत वचन दुइ कहिये । मिलै असंत मौन है रहिये ॥
पंडित सो बोलिय हितकारी । मूरख सो रहिये झखमारी ॥
कहहि कबीर अथ घट डोलै । पूरा होय विचार लै बोले ॥७०॥

रमनी इकहत्तरवीं ७१ ॥

शोक बधावा सब करि माना । ताकी बात इन्द्र नहि जाना ॥
जटा तोरि पहिरावै सेली । योग युक्तिको गर्भ दुहेली ॥
उड़ाये कौन बड़ाई । जैसे काग चीन्ह मड़राई ॥
जैसे भिस्ति तैसी है नारी । राज पाट सब गने उजारी ॥
जस नर्क तस चंदन जाना । जस वाउर तस रहै स्याना ॥
लपसी लौंग गने यक सारा । खांडें छांडि मुख फांकै छारा ॥

सा०-यही विचार विचारते, गये बुद्धि बल चित ।

दुई मिलि एकै होय रहा, काहि लगाऊं हित ॥ ७१ ॥

रमनी बहत्तरवीं ७२ ॥

नारी एक संसारहि आई । माय न वाके बापहि जाई (बाप न जाई) ॥
गोड न मूंड़ न प्राण अधारा । जामै भरमि रहा संसारा ॥
दिना सात लो वाकी सही । बुध अथ बुध अचरज यक कही ॥
वाहिकि वंदन कर सब कोई । बुध अथबुध अचरज बड़ होई ॥

सा०-मूस बिलाई एक संग, कहु कैसे रहि जाय ।

अचरज एक देखो सन्तो, हस्ती सिंहहि खाय ॥७२॥

१ खांडोपरी हरि फांकै छारा ।