कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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किछु और हिदय कछु आना । सपनेहुँ कबहुँ मोहि न जाना ॥
ते दुख पावै यहि संसारा । जो चेतहु तो होय उबारा ॥ जो नर
गुरुकी निंदा करई । सूकर स्वान जन्म सो धरई ॥
सा०-लख चौरासी जिव जंतुमें, भटकि भटकि दुख पाव ।
कहहि कवीर जो रामहि जाने, सो मोहिनीके भाव ॥६७॥
रमैनी वडसठवीं ६८ ॥
तेहि वियोगते भयउ अनाथा । परि निकुंज बन पाव न
पाथा । वेदो नकल कहै जो जाने । जो सखुझै सो भलो न मानै ॥
नटैवत विद्या खेले जो जाने । तेहि गुणके ठाकुर भल मानै ॥
उहै जो खेले सब घट माहीं । दूसरको कछु लेखा नाही ॥ भलो
पोच जो अवसर आवै । कैसंहुके जन पूरा पावै ॥
सा०-जेकरे शर लागे हिय, सो जानेगा पीर ।
लागे तो भागे नहीं, सुखसिंधु निहारु कवीर ॥६८॥
रमैनी उनहतरवीं ६९ ॥
ऐसा योग न देखा भाई । भूला फिरे लिये गाफिलाई ॥
महादेवको पंथ चलावै । ऐसो बडो महंत कहावै ॥ हाट बजारै
लावै तारी । कबेसिधन माया प्यारी ॥ कब दत्ते मावासी तोरी ।
कब सुकदेव तोपची जोरी ॥ कब नारद बन्दूक चलाया । व्यास-
देव कब बंब बजाया ॥ करहिं लड़ाई मतिके मंदा । ये है अतिथि
कि तरकस बंदा ॥ भये बिरक्त लोभ मन ठाना । सोना पहिरि
लजावै बाना ॥ घोरा घोरी कीन्ह बटोरा । गाव पाय जस चले
करोरा ॥
१ लख चौरासी योनि जिव, भटकि २ दुख पावै ।
२ नटवर बन्द खेल जो जानै । ताकर गुण जो ठाकुर मानै ॥
३ कैसे कै जन पूरा पावै ।