कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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रमैनी संतालीसर्वो ॥ ४७ ॥
जरासिंधु शिशुपाल संहारा । सहस्राञ्जै छल सो मारा ॥
बड छल रावन सो गौ वीती । लंका रही कंचनकी भीती ॥ दुयोंधन
अभिमानहिं गयऊ । पांडव केर मरम नहिं पयऊ ॥ मायाके
दम्भ गैल सब राजा । उत्तम मध्यम बाजन बाजा ॥ छौ चकवे
सब धरनि समाना । एको जीव परतीति न माना ॥ कहाँ लौ
कहौ अचेते गयऊ । चेत अचेत झगर एक भयऊ ॥ ४७ ॥
सा०-ई माया जग मोहिनी, मोहिंसि सब जग धाय ।
हरिचंद्र सतके कारने, घर घर गये बिकाय ॥४७॥
रमैनी अडतालीसर्वो ॥ ४८ ॥
मानिक पुरहि कवीर बसेरी । महति सुनी शेख तक्रि केरी ॥
ऊजे सुनी जमन पुर धामा । झूसी सुनी पिरनको नामा ॥ इकइस
पीर लिखै तेहि ठामा । खतमा पढै पैगम्बर नामा ॥ सुनी बोल
मोहि रहा न जाई । देखि सुकरवा रहे भुलाई ॥ हवीव औ
नबीको कामा । जहांलों अमल सो सबै हरामा ॥ ४८ ॥
सा०-शेख अकरदी शेख सकरदी, मानो बचन हमार ।
आदि अन्त औ जुगहि जुग देखहु दृष्टि पसार ॥४८॥
रमैनी उन्चासर्वो ॥ ४९ ॥
दूरकी बात कहौ दवैसा । बादसाह है कौने भेसा ॥ कहाँ कूच
कहां करे सुकामा । कौन सुरतिको करो सलामा ॥ मैं तोहि पूछों
सुसलमाना । लाल जूद की नाना बाना ॥ काजी काज करो
तुम कैसा । घर घर जवह करावौ भैसा ॥ बकरी मुर्गी किन
फुरमाया । किसके कहे तुम छूरी चलाया ॥ दर्द न जानै पीर
कहावै । बैता पठि पठि जग भर्मावै ॥ कह कवीर यक सय्यद
कहावै । आप सरीखा जग कबुलावै ॥ ४९ ॥
सा०-दिनभर रोजा रहत है, रात हनत है गाय ।
यह खून वह बन्दगी, क्यों कर खुशी खोदाय ॥ ४९ ॥