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सर्वकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(४८९)

निरख परमोधकी ।

रमैनी १ ।

अमर लोकते हम चलि आवा । तीन लोक जम लूटत पावा ॥
जम लूटे जिवको नासे । दसौ दिसा सबहुनको फाँसे ॥ १ ॥ सुर-
नर असुर कोई नहिं बाँचे । बहु विधि भेष धरे धर नाचे ॥ जने
तीन परपंची देवा । उनहु न जान्यो जमको भेवा ॥ २ ॥ गरभ
वासमें रहे भुलाई । अगम पन्थ जानो नहिं जाई ॥ ब्रह्मा वेद
पढै अधिकाई । वरण चारि मिलि बांध दिढाई ॥ ३ ॥ विरन्त
आपन पंथ चलावा । अविगत मरम काहु नहिं पावा ॥ त्रिपु-
रारी आसन आरंभा । तीनों मिलकर आसन थंभा ॥ ४ ॥ सो
पारखंड षटदर्शन भूले । फिर फिर जोइनि संकट झूले ॥ करै डिंभ
जो मूल गमावे । धोखेई धोखे डहकावे ॥ ५ ॥ एक न पूजे
देई देवा । बोल झूठ बूढे यह खेवा ॥ एक न चण्डी मन चित
लावा । स्वारथ काजे जीव हतावा ॥ ६ ॥ एक न तीरथ वरत फल
ताका । कहैं विराने आगम भाखा ॥ एक बरतकी आशा लाई ।
औसर हमको होइ सहाई ॥ ७ ॥ एक दान पुन सर्वस देहीं । जीवन
जन्म सुफल करि लेहीं ॥ ऐसे करि करि सब जग बन्धा । जस
संपुटमें लै कुछ रन्धा ॥ ८ ॥ कहा हमार न कोई मानै । मनुष
एक हमहूँको जानै ॥ मनुष रूप होय हम दिखलावा । बहुत
भाँति कर नर समुझावा ॥ तऊं न अन्ध मोहि पतियावा । धाई
धाई जस उन विष खावा ॥ ९ ॥ खसम न चीन्हे मूढ गवाँरा ।
हारे ठोकै माथ लिलारा ॥ १० ॥ झूठ नात सबही मन माना ।
साँच बातकी निन्दा आना ॥ हंस होइ सो मुहि पतिआई । और
न मुहि पतिआवे भाई ॥ ११ ॥ तज कुल कानि करे उजियारा ।
यह तो मता कालको मारा ॥ जुग जुग आजं कह समझाऊं ।