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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(४८८)

कवीरपंथी—

वपुरा जुगति न देखा । शिव शक्ती विरंचि नहिं पेखा ॥
सा०-परदे परदे चलिया, समुझि परी नहिं बानि ।
जो जाने सो बांचिहै, होत सकलकी हानि ॥ ८२ ॥

रमैनी निरासीवी ८३ ॥

छत्री करै छत्रिया धर्मा । वाके बढै सवाई कर्मा ॥ जिन अवधू
गुरु ज्ञान लखाया । ताकर मन तहैंदैं लै धाया ॥ छत्री सो जो
कुटुम्ब सो जूझै । पांचो मेटि एक करि बूझै ॥ जीवहि मारि
जीव प्रतिपालै । देखत जन्म आपनो घालै ॥ हालै करै निशाने
धाऊ । जूझि परे तहां मनमत राऊ ॥

सा०-मनमत मरे न जीवई, जीवहि मरन न होय ।
शून्य सनेही राम बिन, चले अपन पौ खोय ॥ ८३ ॥

रमैनी चौरासिनी ८४ ॥

ऐ जिय आपन दुखहि संभार । जेहि दुख व्यापिरहो संसार ॥
माया मोह बंधा सब लोई । अल्पै लाभ मूल गो खोई ॥ मोर
तोर में सबै विगुता । जननि उदर गर्भ मई सूता ॥ ई बहु रूप
खेलै बहु बूता । जन भौरा अस गये बहुता ॥ उपजि विनसि
फिर जोनी आवै । सुखको लेश सपनेहुं नहिं पावै ॥ दुख संताप
कष्ट बहु पावै । सो न मिला जो जरत बुझावै ॥ मोर तोरमें जर
जग सारा । ध्रिंग स्वारथ झूठा हंकारा ॥ झूठो आश रहा जग
लागी । इन्हते भागि बहुरि पुनि आगी ॥ जे हितकै राखे सब
लोई । सो सयान वाचा नहिं कोई ॥

सा०-आपु आपु चेतै नहीं, कहो तो रूसावा होय ।

कहै कवीर जो आपु न जागे, निरास्ति अस्ति न कोय ॥ ८४ ॥

इति रमैनी मूल बीजकको संपूर्ण ॥

१ धृग जीवन झूठी संसारा ।

२ आपु आप चेतै नहीं कहो तो रिसहा होय ।

कहै कबीर सपने जगें निरास्ति अस्ति नहिं कोय ॥