कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 493, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्दावली
(४७९)
सा०-तीनलोक मुआ कौआयके, छुटि न काहुकी आस ।
यक अंधरे जग खाइया, सब जग भया विनास ॥५३॥
रमनी चौवनवी ५४ ॥
मरिगो ब्रह्मा काशीके वासी । शिव सहित मुये अविनाशी ॥
मथुरा मरिगो कृष्ण गुवारा । मरि मरि गये दसो अवतारा ॥ मरि
मरि गये भगति जिन ठानी । सर्गुण मां जिन दुर्गुण आनी ॥
सा०-नाथ मछंदर बांचे नहीं, गोरखदत्त औ व्यास ।
कहहि कवीर पुकारिके, परे कालके फांस ॥५४॥
रमनी पचपनवी ५५ ॥
गये राम औ गये लछमना । संग न गई सीता असधना ॥
जात कौरवन लागु न वारा । गये भोज जिन्ह साजल धारा ॥
गये पांडव कुंतीसी रानी । गये सहदेव जिन्ह बुद्धि मति ठानी ॥
सर्व सोनकी लंक बनाई (उठाई) । चलत बार कछु संग न लाई ॥
कुरिया जासु अंतरिक्ष छाई । सो हरिश्चन्द्र देखि नहीं जाई ॥
मूरख मानुष अधिक सँजोवै । अपने सुवल और लगि रोवै ॥
ई न जाने अपनो मरि जैवे । टकादश विठै और ले खेवै ॥
सा०-अपनी अपनी करिगये, लगी न काहुकी साथ ।
अपनी करिगये रावणा, अपनी दशरथ नाथ ॥५५॥
रमनी छप्पनवी ५६ ॥
दिन दिन जै जरलके पाऊ । गाड़े जाइ न उमगे काऊ ॥
कंध न देई मसखरी करई । करहु धौँ कौनि भांति निस्तरई ॥
अकरम करै करमको धावै । पठि गुनि वेद जगत समुझावै ॥ छूछे
परे अकारथ जाई । कहैं कवीर चित चेतहु भाई ॥ ५६ ॥
रमनी सत्तावनवी ५७ ॥
कृतियासूत्र लोक यक अहई । लाख पचासकी आगे कहई ॥
१-तीन लोक मो आइके, छूटी न काहुकी आश ।
यक अंधार जग खाइया, सब जग भया निराश ॥