सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 488, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 488

( ४७४ )

कवीरपंथी-

सा०-ते नर मरिके कहाँ गये, जिन दिन्हा गुर घोटि ।
राम नाम निज जानिकै, छाडहु बस्तू खोटि ॥३६॥

रमनी संतोषवी ३७ ॥

एक सयान सयान न होई । दूसर स्यान न जाने कोई ॥
तीसर सयान सयाने खाई । चौथ सयान तहाँ ले जाई ॥
पँचये सयान न जाने कोई । छठये महाँ सब गये विगोई ॥
सतये सयान जो जानहु भाई । लोक वेदमें देहु देखाई ॥

सा०-बीजक बतावै बितको, जो बित गुता होय ।
शब्द बतावै जीवको, बूझे विरला होय ॥३७॥

रमनी अदतीसवी ३८ ॥

यहि विधि कहाँ कहा नहि माना । मार्ग मांहि पसारिनि
ताना ॥ राति दिवस मिलि जोरिनि तागा । ओटत कातत भर्म
न भागा ॥ भर्म सब घट रह्यो समाई । भर्म छाडि कतहुँ नहिं
जाई ॥ परै न पूरि दिनौ दिन छीना । तहाँ जाय जहाँ अंग
विहीना ॥ जो मति आदि अन्त चलि आया । सो मति उन
सब प्रगट सुनाया ॥

सा०-वहै संदेश फुर मानिकै, लीन्हो सीस चढाय ।
संतो है संतोष सुख, रहहु हृदय जुडाय ॥३८॥

रमनी उत्तालीसवी ३९ ॥

जिन्ह कलमां कलि माह पढाया । कुदरत खोज तिन्हुँ नहिं
पाया ॥ करमत कर्म करै करतूती । वेद किताब भया सब रीती ॥
करमत सो जो गर्भ औतरिया । करंमत सो निमाज गुजरिया ॥
करमत सुन्नति और जनेऊ । हिन्दू तुरुक न जाने भेऊ ॥

सा०-पानी पवन संजोयकै, राचयाई उत्पात ।
शून्यहि सुरति समानिया, कासों कहिये जात ॥३९॥

१ करमत सो जो नामहि धरिया ।