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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(४८२)

कवीरपंथी-

सा०-ताते परी कालकी फांसी, करहु आपनो सोच ।
जहां संत तहां संत सिधौवै, मिलिरहे पोचैपोच ॥६४॥

रमनी पैसठवीं ॥ ६५ ॥

अपने गुणके औगुण कहहू । इहै अभाग तुम न विचारहू ॥
तुम जियरा बहुते दुख पाया । जल बिनु मीन कवन सचुपाया ॥
चात्रिक जल हल भरे जो पासा । मेघ न बरसे चले उदासा ॥
स्वांग धरे भौसागर आसा । चात्रिक जल हल आसै पासा ॥
रामनाम अहै निज सारा । औरो झूठ सकल संसारा ॥ हरी उतंग
तुम जात पतंगा । जम घर किये जीवको संगा ॥ किंचित है
सपने निधि पाई । हिये न समाय कहैं धरे छिपाई ॥ हिय न
समाय छोड़ि नहिं पारा । झूठा लोभ वै कछु न विचारा ॥
सप्ति किन्ह आपु नहीं माना । तरिवर छर छागर है जाना ॥
जिय दुर्मति डोलै संसारा । तेहि नहिं सूझे वार न पारा ॥

सा०-अन्ध भया सब डोलई, कोइ न करै विचार ।
कहौ हमार माने नहीं, किमि छूटै भर्म जार ॥६६॥

रमनी छाछठवीं ॥ ६६ ॥

सोई हीतु बंधु मोहि भावै । जात कुमारग मारग लावै ॥
सो सयान मारग रहि जाई । करे खोज कबहुँ न भुलाई ॥ सो झूँठा
जो सुतके तजई । गुरुकी दया राम ( को ) भजई ॥ किंचित है
यह जगत भुलाना । धन सुत देखि भया अभिमाना ॥

सा०-जियँ जो नेक पयान किय, मन्दिर भया उजार ।
मरे जे जियते मरि गये, बांचे बाचन हार ॥६६॥

रमनी सद्दसठवीं ॥ ६७ ॥

देह हलाय भक्ति न होई । स्वांग धरे बहुतै नर जोई ॥ धोंगा
धींगी भलो न माना । जो काहू मोहि द्विदय न जाना ॥ सुख

१ हरिको भक्ति जाने बिना, भव बुदि मुग्धा संसार । २ किंचित है एक तेज भुलाना ।

३ दीन नख्ता किया पयाना, मंदिर भया उजार । मरि गया सो मरि गया, बांचे बाचन हार ॥