कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 496, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ें(४८२)
कवीरपंथी-
सा०-ताते परी कालकी फांसी, करहु आपनो सोच ।
जहां संत तहां संत सिधौवै, मिलिरहे पोचैपोच ॥६४॥
रमनी पैसठवीं ॥ ६५ ॥
अपने गुणके औगुण कहहू । इहै अभाग तुम न विचारहू ॥
तुम जियरा बहुते दुख पाया । जल बिनु मीन कवन सचुपाया ॥
चात्रिक जल हल भरे जो पासा । मेघ न बरसे चले उदासा ॥
स्वांग धरे भौसागर आसा । चात्रिक जल हल आसै पासा ॥
रामनाम अहै निज सारा । औरो झूठ सकल संसारा ॥ हरी उतंग
तुम जात पतंगा । जम घर किये जीवको संगा ॥ किंचित है
सपने निधि पाई । हिये न समाय कहैं धरे छिपाई ॥ हिय न
समाय छोड़ि नहिं पारा । झूठा लोभ वै कछु न विचारा ॥
सप्ति किन्ह आपु नहीं माना । तरिवर छर छागर है जाना ॥
जिय दुर्मति डोलै संसारा । तेहि नहिं सूझे वार न पारा ॥
सा०-अन्ध भया सब डोलई, कोइ न करै विचार ।
कहौ हमार माने नहीं, किमि छूटै भर्म जार ॥६६॥
रमनी छाछठवीं ॥ ६६ ॥
सोई हीतु बंधु मोहि भावै । जात कुमारग मारग लावै ॥
सो सयान मारग रहि जाई । करे खोज कबहुँ न भुलाई ॥ सो झूँठा
जो सुतके तजई । गुरुकी दया राम ( को ) भजई ॥ किंचित है
यह जगत भुलाना । धन सुत देखि भया अभिमाना ॥
सा०-जियँ जो नेक पयान किय, मन्दिर भया उजार ।
मरे जे जियते मरि गये, बांचे बाचन हार ॥६६॥
रमनी सद्दसठवीं ॥ ६७ ॥
देह हलाय भक्ति न होई । स्वांग धरे बहुतै नर जोई ॥ धोंगा
धींगी भलो न माना । जो काहू मोहि द्विदय न जाना ॥ सुख
१ हरिको भक्ति जाने बिना, भव बुदि मुग्धा संसार । २ किंचित है एक तेज भुलाना ।
३ दीन नख्ता किया पयाना, मंदिर भया उजार । मरि गया सो मरि गया, बांचे बाचन हार ॥