सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation

महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

-२. ७५] परिकर्मव्यवहारः [ २३
अत्रोद्देशकः
आदिद्वौ प्रचयोऽष्टौ द्वोरूपेण त्रयाक्रमाद्वृद्धौ ।
खाङ्कौ रसाद्रिनेत्रं खेन्दुहरा वित्तमत्र को गच्छः ॥७१॥
आदिः पञ्च चयोऽष्टौ गुणरत्नाभिधनमत्र को गच्छः ।
षट् प्रभवश्च चयोऽष्टौ खद्विचतुः स्वं पदं किं स्यात् ॥७२॥
उत्तराद्यानयनसूत्रम्—
आदिधनोनं गणितं पदोनपदकृतिदलेन संभजितम् । प्रचयस्तद्धनहीनं गणितं पदभाजितं प्रभवः ॥७३॥
आद्युत्तरानयनसूत्रम्—
प्रभवो गच्छाप्तधनं विगतैकपदार्धगुणितचयहीनम् । पदहृतधनमाद्यूनं निरेकपददलहृतं प्रचयः ॥७४॥
प्रकारान्तरेणोत्तराद्यानयनसूत्रम्—
द्विहृतं संकलितधनं गच्छहृतं द्विगुणितादिना रहितम् ।
विगतैकपदविभक्तं प्रचयः स्यादिति विजानीहि ॥७५॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
प्रथम पद २ है, प्रचय ८ है; इन दोनों को उत्तरोत्तर एक द्वारा बढ़ाते जाते हैं जिससे ३ श्रेढियाँ
बन जाती हैं । इन तीन श्रेढियों के योग क्रमशः ९०, २७६ और १११० हैं । प्रत्येक श्रेढि के पदों की
संख्या क्या है ? ॥७१॥ प्रथम पद ५ है; प्रचय ८ है; श्रेढि का योग ३३३ है । पदों की संख्या क्या है ?
अन्य श्रेढि का प्रथमपद ६ है, प्रचय ८ है और योग ४२० है । पदों की संख्या क्या है ? ॥७२॥
प्रचय और प्रथम पद को निकालने का नियम—
श्रेढि का योग आदिधन द्वारा हासित किया जाता है, और इसे, पदों की संख्या द्वारा हासित पदों
की संख्या के वर्ग द्वारा निरूपित राशि की आधी राशि द्वारा विभाजित करने पर प्रचय प्राप्त होता है ।
श्रेढि के योग को उत्तरधन द्वारा हासित करने पर प्राप्त फल को पदों की संख्या द्वारा विभाजित
करने पर श्रेढि का प्रथम पद प्राप्त होता है ॥७३॥
प्रथम पद और प्रचय प्राप्त करने का नियम—
श्रेढि में पदों की संख्या द्वारा भाजित श्रेढि का योग, जब प्रचय और एक कम पदों की संख्या
की आधी राशि के गुणन फल द्वारा हासित कर दिया जाता है तो श्रेढि का प्रथम पद प्राप्त होता है ।
योग को, पदों की संख्या से भाजित कर प्रथम पद द्वारा हासित करते हैं । प्राप्तफल को एक कम पदों
की संख्या की आधी राशि द्वारा विभाजित करने पर प्रचय प्राप्त होता है ॥७४॥
प्रचय और प्रथम राशि को अन्य विधि द्वारा निकालने के दो नियम:—
श्रेढि के योग को २ से गुणित कर और पदों की संख्या से विभाजित कर प्रथम पद की दुगुनी
राशि से हासित करते हैं । प्राप्तफल को एक कम पदों की संख्या की आधी राशि द्वारा विभाजित करने
पर प्रचय प्राप्त होता है ॥७५॥ श्रेढि के योग की दुगुनी राशि को पदों की संख्या से विभाजित कर
( ७३ ) आदि-धन और उत्तरधन के लिये इस अध्याय के ६३ और ६४ वें सूत्र की पाद टिप्पणी
देखिये । इस सूत्र को प्रतीक रूपसे प्रदर्शित करने पर वह निम्नरूप में साधित होता है—
न (न - १)
य - --------- ब
य - न अ     और         २
ब = -----------        अ = -----------------
(न² - न)/२               न
य  न - १     ( य/न ) - अ
( ७४ ) बीजीय रूप से : अ = --- - ------ ब; और ब = -------------
न   २      ( न - १ )/२
( २ य/न ) - २ अ
( ७५ ) प्रतीक रूप से : ब = -----------------
न - १

२४ ] गणितसारसंग्रहः [ २. ७६-
द्विगुणितसंकलितधनं गच्छहृतं रूपरहितगच्छेन । ताडितचयेन रहितं द्वयेन संभाजितं प्रभवः ॥७६॥
अत्रोद्देशकः
नववदनं तत्त्वपदं भावाधिकशतधनं कियान्प्रचयः ।
पञ्च चयोऽष्ट पदं षट्पञ्चाशच्छतधनं मुखं कथय ॥७७॥
स्वेष्टाद्युत्तरगच्छानयनसूत्रम्—
संकलिते स्वेष्टहृते हारो गच्छोऽत्र लब्ध इष्टोने । ऊनितमादिः शेषे व्येकपदार्धोद्धृते प्रचयः ॥७८॥
अत्रोद्देशकः
चत्वारिंशत्सहिता पञ्चशती गणितमत्र संदृष्टम् । गच्छप्रचयप्रभवान्¹ गणितज्ञशिरोमणे कथय ॥७९॥
आद्युत्तरगच्छ सर्वमिश्रधनविश्लेषणे सूत्रत्रयम्—
उत्तरधनेन रहितं गच्छेनैकेन संयुतेन हृतम् । मिश्रधनं प्रभवः स्यादिति गणकशिरोमणे विद्धि ॥८०॥
१ M विगणय्य सखे ममाचक्ष्व ।
एक कम पदों की संख्या की आधी राशि द्वारा ह्रासित करते हैं । प्राप्तफल को प्रचय द्वारा गुणित कर,
जब दो के द्वारा विभाजित करते हैं तो श्रेढि का प्रथम पद प्राप्त होता है ॥७६॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
प्रथम पद ९ है; पदों की संख्या ७ है; और श्रेढि का योग १०५ है । प्रचय का मान क्या है ?
अन्य श्रेढि का प्रचय ५ है, पदों की संख्या ८ है और योग १५६ है । बतलाओ प्रथम पद क्या है ?॥७७॥
जब योग दिया गया हो तो इच्छानुसार प्रथम पद, प्रचय और पदों की संख्या निकालने
का नियम—
जब योग को किसी चुनी हुई संख्या द्वारा विभाजित करते हैं तो भाजक श्रेढि के पदों की संख्या
बन जाता है । जब इस भजनफल को किसी फिर से चुनी हुई संख्या द्वारा ह्रासित करते हैं तो यह
घटाई गई संख्या श्रेढि का प्रथम पद बन जाती है । घटाने के बाद प्राप्त शेष जब एक कम पदों की
संख्या की आधी राशि द्वारा विभाजित किया जाता है तो प्रचय उत्पन्न होता है ॥७८॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
इस प्रश्न में योग ५४० है । हे गणितज्ञों के शिरोमणि ! बतलाओ कि पदों की संख्या, प्रचय
और प्रथम पद क्या होंगे ? ॥७९॥
प्रथम पद से संयुक्त अथवा प्रचय अथवा पदों की संख्या से अथवा इन सभी से संयुक्त
समान्तर श्रेढि के योग को विश्लेषित करने के लिये तीन नियम—
हे गणक शिरोमणि ! मिश्रधन को उत्तर धन से ह्रासित कर, एक अधिक पदों की संख्या
द्वारा विभाजित किया जाता है तो प्रथम पद प्राप्त होता है—ऐसा समझो ॥८०॥ मिश्रधन को
( ७६ ) बीजीय रूप से : अ = [ ( २ य / न ) - ( न - १ ) ब ] / २
( ७८ ) प्रतीक रूप से, इस प्रश्न में, जब य दिया गया होता है और अ तथा न को किसी भी
तरह चुनना होता है, तब ब का मान निकालना पड़ता है । इसलिये, दिये गये य के लिये, ब के
कितने ही मान हो सकते हैं जो अ और न के चुने जाने पर निर्भर हों । जब अ और न चुन लिये
जाते हैं तो ब को निकालने के लिये यहाँ दिया गया नियम सूत्र ७४ से मिलता है ।

)->( भङ्ग )`

  • करते हैं, जब कि सब पदों को संवादरूप से ( correspondingly ) बढ़ाने के लिये प्रथम पद
  • को एक द्वारा बढ़ा हुआ मान लिया जाय ॥८१॥ मिश्रधन को विश्लेषित करने की विधि इस प्रकार है—
  • मिश्रधन को मन से चुने हुए प्रथम पद और पदों की संख्या द्वारा ह्रासित करते हैं और तब उत्तर-
  • मिश्रधन को भङ्ग करने वाले नियम को इस अंतर में प्रयुक्त करने पर प्रचय प्राप्त होता है ॥८२॥
  • उदाहरणार्थ प्रश्न
  • ४० में क्रमशः २, ३, ५ और १० जोड़कर आदि मिश्रधन और अन्य मिश्रधन बनाते हैं । मुझे
  • बतलाओ कि इन दशाओं में प्रथम पद, प्रचय, पदों की संख्या और कुल तीनों, क्रमशः क्या-क्या होंगे ? ॥८३॥
  • ( दृष्ट ) ज्ञात योग से दी हुई समान्तर श्रेढि का प्रथम पद और प्रचय, द्वितीय श्रेढि के प्रथम पद
  • और प्रचय; जहाँ मन से चुना हुआ योग दी हुई श्रेढि के ज्ञात योग का दुगुना, तिगुना, आधा, तिहाई
  • `अथवा इसी तरह का गुणक अथवा भिन्नीय रूप है, निम्नलिखित

२६ ] गणितसारसंग्रहः [ २. ८४-
दृष्टधनाद्युत्तरतो द्विगुणत्रिगुणद्विभागत्रिभागादीष्टधनाद्युत्तरानयनसूत्रम्—
दृष्टविभक्तेष्टधनं द्विष्ठं तत्प्रचयताडितं प्रचयः । तत्प्रभवगुणं प्रभवो गुणभागस्येष्टवित्तस्य ॥८४॥
अत्रोद्देशकः
समगच्छश्चत्वारः षष्टिर्मुखमुत्तरं ततो द्विगुणम् । तद्द्व्यादि² हतविभक्तस्वेष्टस्याद्युत्तरे ब्रूहि ॥८५॥
इष्टगच्छयोर्व्यस्ताद्युत्तरसमधनद्विगुणत्रिगुणद्विभागत्रिभागादिधनानयनसूत्रम्—
व्येकात्महतो गच्छः स्वेष्टघ्नो द्विगुणितान्यपदहीनः ।
मुखमात्मोनान्यकृतिर्द्विकेष्टपदघातवर्जिता प्रचयः ॥८६॥
१ M गुणभागाद्युत्तरेच्छायाः । २ M गुण° ।

सरलता के लिये, चुने हुए योग को ज्ञात योग द्वारा विभाजित कर दो स्थानों में रखते हैं ।
इस भजनफल को जब ज्ञात प्रचय द्वारा गुणित करते हैं तो इष्ट प्रचय प्राप्त होता है । वही भजनफल जब
ज्ञात प्रथम पद से गुणित किया जाता है तो चाहा हुआ प्रथम पद उस श्रेढि का प्राप्त होता है जिसका
कि योग ज्ञात श्रेढि के योग का या तो अपवर्त्य अथवा भिन्नात्मक अंश ( भाग ) होता है ॥८४॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
६०, ज्ञात प्रथम पद है, ज्ञात प्रचय उससे दुगुना है, और पदों की संख्या ( ज्ञात दी हुई श्रेढि
में तथा इष्ट समस्त श्रेणियों में ) ४ है । ज्ञात योग को २ से आरम्भ होने वाली संख्याओं द्वारा गुणित
अथवा भाजित करने पर प्राप्त हुए योगों वाली श्रेणियों के प्रथम पद और प्रचय निकालो ॥८५॥
जिनके पदों की संख्या मन से चुनी जाती है ऐसी दो श्रेणियों के पारस्परिक विनिमित प्रथम
पद और प्रचय तथा उन श्रेणियों के योगों ( जो बराबर हों, अथवा जिनमें से एक दूसरे का दुगुना,
तिगुना, आधा, तिहाई अथवा ऐसा ही कोई अपवर्त्य या भाग रूप हो, ) को निकालने का नियम—
किसी एक श्रेढि के पदों की संख्या स्वतः से गुणित होकर तथा एक द्वारा ह्रासित होकर और
फिर चुने हुए ( दो श्रेणियों के योग के ) अनुपात द्वारा गुणित होकर, और तब दूसरी श्रेढि के पदों की
संख्या की दुगुनी राशि द्वारा ह्रासित होकर कोई एक श्रेढि के ( परस्पर बदलने योग्य ) प्रथम पद को
प्राप्त होती है । दूसरी श्रेढि के पदों की संख्या की वर्गराशि पदों की संख्या द्वारा ही स्वतः ह्रासित
होकर और तब चुनी हुई निष्पत्ति द्वारा तथा प्रथम श्रेढि के पदों की संख्या के गुणनफल की दुगुनी राशि
द्वारा ह्रासित होकर, उस श्रेढि के परस्पर बदलने योग्य प्रचय को उत्पन्न करती है ॥८६॥

(८४) प्रतीक रूप से, अ₁ = (य₁ / य) अ; ब₁ = (य₁ / य) ब; जहाँ य₁, अ₁, ब₁ ऐसी श्रेढि के क्रमशः
योग,प्रथम पद और प्रचय हैं जिसका योग चुन लिया जाता है । यदि दो श्रेणियों का योग दिया गया
हो, तो दो प्रथम पदों की निष्पत्ति (ratio) और दो प्रचयों का अनुपात य₁ / य ही सर्वदा नहीं रहता ।
यहाँ जो हल दिये गये हैं वे कुछ विशिष्ट दशाओं में प्रयुक्त होते हैं ।
(८६) बीजीय रूप से, अ = न (न - १) × प - २ न₁ और ब = (न₁)² - न₁ - २ प न; जहाँ,
अ, ब और न क्रमशः प्रथमपद, प्रचय और श्रेढि के पदों की संख्या हैं; न₁ द्वितीय श्रेढि के पदों की
संख्या है, और प दो योगों की निष्पत्ति है। अ और ब इस तरह निकालने के बाद दूसरी श्रेढि के
प्रथमपद और प्रचय क्रमशः ब और अ होंगे ।

-२. ९०] परिकर्मव्यवहारः [ २७
अत्रोद्देशकः
पञ्चाष्टगच्छपुंसोर्व्यस्तप्रभवोत्तरे समानधनम् ।
द्वित्रिगुणादिधनं वा ब्रूहि त्वं गणक विगणय्य ॥८७॥
द्वादशषोडशपदयोर्व्यस्तप्रभवोत्तरे समानधनम् ।
व्यादिगुणभागधनमपि कथय त्वं गणितशास्त्रज्ञ ॥८८॥
असमानोत्तरसमगच्छसमधनस्याद्युत्तरानयनसूत्रम्—
अधिकचयस्यैकादिश्चाधिकचयशेषचयविशेषो गुणितः ।
विगतैकपदार्धेन सरूपश्च मुखानि मित्र शेषचयानाम् ॥८९॥
अत्रोद्देशकः
एकादिषडन्तचयानामेकत्रितयपञ्चसप्तचयानाम् ।
नवनवगच्छानां समवित्तानां चाशु वद मुखानि सखे ॥९०॥
१ M गणकमुखतिलक ।
उदाहरणार्थ प्रश्न
दो मनुष्यों के धन क्रमशः दो समान्तर श्रेणियों के योग से ज्ञात होते हैं । श्रेणियों-सम्बन्धी
पदों की संख्या ५ और ८ है । दोनों श्रेणियों के प्रथम पद और प्रचय परस्पर बदलने योग्य हैं । श्रेणियों
के योग बराबर हैं अथवा उनमें से एक का योग दूसरे का दुगुना, तिगुना, आधा अथवा ऐसा ही कोई
अपवर्त्य है । हे गणितवेत्ता, शुद्ध गणना के पश्चात् बतलाओ कि इन योगों के तथा परस्पर बदलने योग्य
प्रथमपद और प्रचय के मान क्या हैं ? ॥८७॥ दो समान्तर श्रेणियों के सम्बन्ध में, जिनके पदों की
संख्या १२ और १६ है, प्रथमपद और प्रचय परस्पर बदलने योग्य हैं । श्रेणियों के योग बराबर हैं
अथवा उनमें से एक का योग दुगुना अथवा कोई ऐसा ही अपवर्त्य अथवा भाग है । हे गणितशास्त्रज्ञ
बतलाओ कि इन योगों के तथा परस्पर बदलने योग्य प्रथमपद और प्रचय के मान क्या होंगे ? ॥८८॥
असमान प्रचयौं, समगच्छ और समयोग धनवाली समान्तर श्रेणियों के प्रथम पद प्राप्त करने
का नियम—
जिसका प्रचय सबसे बड़ा है ऐसी श्रेढि का प्रथमपद एक ले लिया जाता है । इस सबसे बड़े प्रचय
और शेष प्रचय के अन्तर को एक से ह्रासित गच्छ की आधी राशि द्वारा गुणित करते हैं । जब इस गुणन-
फल में एक मिलाते हैं तो हे मित्र हमें शेष प्रचय वाली श्रेणियों के प्रथमपद प्राप्त होते हैं ॥८९॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
हे सखे ! बराबर योग वाली दो श्रेणियों के प्रथमपदों को बतलाओ जब कि उनमें से प्रत्येक
में ९ गच्छ है तथा प्रचय क्रमशः १ से आरम्भ होकर ६ तक एक दशा में और १, ३, ५ और ७
दूसरी दशा में हो ॥९०॥
(८९) यहाँ दिया गया हल साधारण नियम की विशेष दशा है । अ₁ = (न - १)/२ ( ब₁ - ब) + अ,
जहाँ अ और अ₁ दो श्रेणियों प्रथमपद हैं; ब और ब₁ उनके संवादी प्रचय हैं । इस सूत्र ( formula )
में, जहाँ ब, ब₁ और न दिये गये हैं; अ₁ का मान अ के किसी मान को चुन लेने पर निकाला जा
सकता है । इस नियम में अ का मान १ लिया गया है ।

२८ ] गणितसारसंग्रहः [ २. ९१-
विसदृशादिसदृशगच्छसमधनानामुत्तरानयनसूत्रम्—
अधिकमुखस्यैकचयश्चाधिकमुखशेषमुखविशेषो भक्तः ।
विगतैकपदार्धेन सरूपश्च चया भवन्ति शेषमुखानाम् ॥९१॥
अत्रोद्देशकः
एकत्रिपञ्चसप्तनवैकादशवदनपञ्चपञ्चपदानाम् ।
समवित्तानां कथयोत्तराणि गणिताब्धिपारदृश्वन् गणक ॥९२॥
अथ गुणधनगुणसंकलितधनयोः सूत्रम्—
पदमितगुणहतिगुणितप्रभवः स्याद्गुणधनं तदाद्यूनम् ।
एकोनगुणविभक्तं गुणसंकलितं विजानीयात् ॥९३॥
ऐसी समान्तर श्रेणियों के प्रचयों को निकालने का नियम जिनमें प्रथम पद विसदृश, पदों की
संख्या सदृश और योग बराबर हों—
जिसका प्रथमपद सबसे बड़ा हो उस श्रेढि का प्रचय एक लेते हैं । इस सबसे बड़े प्रथम-
पद और शेष श्रेणियों में से प्रत्येक के प्रथमपद के अन्तर को एक कम पदों की संख्या की आधी
राशि द्वारा विभाजित करते हैं और इस प्रकार प्रत्येक दशा में प्राप्त भजनफल में एक मिलाते हैं ।
इस तरह, भिन्न-भिन्न शेष श्रेणियों के प्रचयों को प्राप्त करते हैं ॥९१॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
हे गणितरूपी समुद्र के दूसरे किनारे का दर्शन करने वाले गणक ! उन सब बराबर योगवाली
श्रेणियों के प्रचयों को निकालो जिनके प्रथमपद १,३,५,७,९ और ११ हों तथा पदों की संख्या
( प्रत्येक में ) ५ हो ॥९२॥
गुणधन और गुणोत्तर श्रेढि का योग निकालने की विधि—
गुणोत्तर श्रेढि के प्रथमपद को जब ऐसी वारंवार स्वतः से गुणित साधारण निष्पत्ति द्वारा गुणित
करते हैं, जहाँ इस गुणनफल में श्रेढि के पदों की संख्या द्वारा साधारण निष्पत्ति की वारंवारता
( frequency ) को मापा जाता है; तब गुणधन प्राप्त होता है । यह गुणधन जब प्रथमपद द्वारा
हासित किया जाता है तथा एक कम साधारण निष्पत्ति द्वारा विभाजित किया जाता है तब गुणोत्तर श्रेढि
का योग प्राप्त होता है ॥९३॥
(९१) इस दशा में साधारण सूत्र (formula) यह है : ब₁ = (अ – अ₁) / ((न – १)/२) + ब, जहाँ कि ब का
मान इस नियम में १ लिया गया है ।
(९३) न पदों की गुणोत्तर श्रेढि का गुणधन (न + १) वें पद के तुल्य होता है, जब कि श्रेढि संतत
रहती है । बीजीय रूप से, इस गुणधन की अर्हा ( २ × २ × २......न गुणन खंडों तक × अ ) अर्थात्
(अ रⁿ) होती है, जहाँ कि “र” साधारण निष्पत्ति है । इसकी तुलना उत्तरधन से कर सकते हैं ।
योग निकालने का नियम बीजीय रूप से यह है—
य = (अ रⁿ – अ) / (र – १) , जहाँ अ प्रथम पद है, र साधारण निष्पत्ति है और न पदों की संख्या है ।

-२. ९४ ] परिकर्मव्यवहारः [ २९
गुणसंकलिते अन्यदपि सूत्रम्—
समदलविषमस्वरूपो गुणगुणितो वर्गताडितो गच्छः ।
रूपोनः प्रभवघ्नो व्येकोत्तरभाजितः सारम् ॥९४॥
गुणोत्तर श्रेढि का योग निकालने का अन्य नियम—
एक अलग स्तम्भ में श्रेढि के पदों की संख्या को शून्य और एक द्वारा क्रमशः दर्शाया जाता है ।
जब संख्या का मान युग्म ( even ) हो तो उसे आधा किया जाता है और मान अयुग्म ( odd )
हो तो उसमें से एक घटा कर प्राप्त फल को आधा किया जाता है—यह तब तक किया जाता है जब
तक कि शून्य प्राप्त नहीं होता । तब यह निरूपित श्रेढि जो शून्य और एक द्वारा बनी हुई होती है,
क्रम से अंतिम 'एक' से प्रयोग में लायी जाती है । वहाँ जहाँ एक प्ररूपक होता है साधारण निष्पत्ति
द्वारा गुणित वह एक पुनः साधारण निष्पत्ति द्वारा गुणित किया जाता है; और जहाँ शून्य प्ररूपक होता
है वहाँ भी गुणित किया जाता है ताकि वर्ग प्राप्त हो । जब यह फल एक द्वारा हासित होकर, प्रथम-
पद द्वारा पुनः गुणित किया जाता है और एक कम साधारण निष्पत्ति द्वारा विभाजित किया जाता है
तब वह श्रेढि के योग को उत्पन्न करता है ॥९४॥

(९४) यह नियम पिछले नियम से केवल इसलिये भिन्न है कि इसमें वर्ग और सरल गुणन की
विधियों को उपयोग में लाकर ( रⁿ ) को नई रीति से निकाला गया है । निम्नलिखित उदाहरण द्वारा
रीति स्पष्ट हो जावेगी—
मान लो रⁿ में न का मान १२ है । ( न = १२ )
१२ युग्म राशि है, इसलिये इसे २ के द्वारा विभाजित करते हैं और ० द्वारा प्रदर्शित करते हैं ।
१२/२ = ६ भी युग्म राशि है, " २ के " " " " " ० " " " " ।
६/२ = ३ अयुग्म राशि है, इसलिये इसमें से १ घटाते हैं और १ " " " " ।
३ - १ = २ युग्म राशि है, इसलिये इसे २ द्वारा विभाजित करते हैं और ० " " " " ।
२/२ = १ अयुग्म राशि है, इसलिये इसमें से एक घटाते हैं और १ " " " " ।
१ - १ = ०, जो क्रिया के इस भाग को समाप्त करती है ।
० | अब, निरूपक स्तम्भ में ( जिसमें अङ्क उपर्युक्त विधि द्वारा निकालते हैं ) अंतिम
० | एक को र द्वारा गुणित करते हैं, जिससे र प्राप्त होता है; क्योंकि इस अंतिम एक
१ | में ० उसके ऊपर है, र को ऊपर की तरह प्राप्त कर वर्गित करते हैं जिससे र² प्राप्त होता
० | है; क्योंकि इस ० के ऊपर १ है, र² जो प्राप्त होता है अब र के द्वारा गुणित करने पर
१ | र³ देता है; चूँकि इस १ के ऊपर ० है, इस र³ को वर्गित करते हैं जो र⁶ देता है; और
चूँकि फिर से इस ० के ऊपर दूसरा शून्य है, इस र⁶ को वर्गित करते हैं जो र¹² देता है । इस तरह
र का मान सरल वर्ग करने और गुणन करने की क्रियाओं द्वारा प्राप्त होता है । इस विधि का उपयोग
केवल रⁿ के मान को सरलता से प्राप्त करने हेतु होता है । और, यह सरलतापूर्वक देखा जाता है कि
यह रीति न की समस्त धनात्मक और अभिन्नात्मक ( integral ) अर्हाओं ( values ) के लिये
प्रयुक्त की जा सकती है ।

३० ] गणितसारसंग्रहः [ २. ९५-
गुणसंकलितान्त्यधनानयने तत्संकलितधनानयने च सूत्रम्—
गुणसंकलितान्त्यधनं विगतैकपदस्य गुणधनं भवति । तद्गुणगुणं मुखोनं व्येकोत्तरभाजितं सारम् ॥९५॥
गुणधनस्योदाहरणम्—
स्वर्णद्वयं गृहीत्वा त्रिगुणधनं प्रतिपुरं संमार्जयति । यः पुरुषोऽष्टनगर्यां तस्य कियद्वित्तमाचक्ष्व ॥९६॥
गुणधनस्याद्युत्तरानयनसूत्रम्—
गुणधनमादिविभक्तं यत्पदमितवधसमं स एव चयः । गच्छप्रमगुणघातप्रहृतं गुणितं भवेत्प्रभवः ॥९७॥
गुणधनस्य गच्छानयन सूत्रम्—
मुखभक्ते गुणवित्ते यथा निरग्रं तथा गुणेन हृते । यावत्योऽत्र शलाकास्तावान् गच्छो गुणधनस्य ॥९८॥
१ M समर्पयति ।
गुणोत्तर श्रेढि के अंतिम पद तथा योग को निकालने का नियम—
गुणोत्तर श्रेढि का अंतिम पद अथवा अन्त्यधन, (जिसमें पदों की संख्या एक कम होती है
ऐसी) दूसरी श्रेढि, का गुणधन होता है। यह अन्त्यधन, साधारण निष्पत्ति द्वारा गुणित किया जाने पर
प्रथमपद द्वारा हासित किया जाता है, तथा एक कम साधारण निष्पत्ति द्वारा विभाजित किया जाता है
तो श्रेढि का योग प्राप्त होता है ॥९५॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी नगर में २ स्वर्ण मुद्राएँ प्राप्त कर एक मनुष्य एक नगर से दूसरे नगर को जाता है; और
प्रत्येक स्थान में पिछले स्थानों से प्राप्त मुद्राओं से तिगुनी मुद्राएँ प्राप्त करता है । बतलाओ कि आठवें
नगर में उसे कितनी मुद्राएँ मिलेंगी ? ॥९६॥
किसी दिये गये गुणधन सम्बन्धी प्रथमपद और साधारण निष्पत्ति निकालने का नियम—
गुणधन जब प्रथमपद द्वारा विभाजित होता है तब वह ऐसी स्वगुणित राशि के गुणनफल के
तुल्य हो जाता है जिस गुणन में कि वह राशि, पदों की संख्या की राशि बार (वारंवार) प्रकट
होती है; और यह राशि चाही हुई साधारण निष्पत्ति है। गुणधन जब साधारण निष्पत्ति के वारंवार
गुणन से प्राप्त गुणनफल द्वारा विभाजित किया जाता है—(साधारण निष्पत्ति के वारंवार स्वगुणन
से प्राप्त ऐसा गुणनफल जिसमें इस साधारण निष्पत्ति का वारंवार प्रकटपना, पदों की संख्या द्वारा मापा
जाता है) तब प्रथमपद प्राप्त होता है ॥९७॥
किसी गुणोत्तर श्रेढि में दिये गये गुणधन सम्बन्धी पदों की संख्या निकालने का नियम—
श्रेढि के गुणधन को प्रथमपद द्वारा विभाजित करो। तब इस भजनफल को साधारण निष्पत्ति
द्वारा वारंवार तब तक विभाजित करो जब तक कि भाजनयोग्य कुछ न बच रहे। ऐसे वारंवार दिये गये
भाग की संख्या का निरूपण करनेवाली शलाकाओं की संख्या जो भी हो वही दिये हुए गुणधन के
सम्बन्ध में पदों की संख्या का मान होता है ॥९८॥
(९५) बीजीय रूप से, य = (अरⁿ⁻¹ × र - अ) / (र - १) . अन्त्यधन, गुणोत्तर श्रेढि के अंतिम पद के मान के
तुल्य होता है; गुणधन के अर्थ और मान के लिये सूत्र ९१ देखिये । न पदों वाली गुणोत्तर श्रेढि का
अन्त्यधन अरⁿ⁻¹ के तुल्य होता है, जब कि इसी श्रेढि का गुणधन अरⁿ होता है । इसी तरह
न - १ पदों वाली गुणोत्तर श्रेढि का अन्त्य धन अरⁿ⁻² के तुल्य होता है, जब कि गुणधन अरⁿ⁻¹
होता है । यहाँ स्पष्ट है कि न पदों की श्रेढि का अन्त्यधन उतना ही होगा जितना की न - १ पदों
वाली-श्रेढि का गुणधन ।
( ९७, ९८ ) स्पष्ट है कि अरⁿ में अ का भाग देने पर रⁿ प्राप्त होता है, और यह र द्वारा

-२. १०१ ] परिकर्मव्यवहारः [ ३१
गुणसंकलितोदाहरणम्—
दीनारपञ्चकादिद्विगुणं धनमर्जयन्नरः कश्चित् । प्राविक्षदष्टनगरीः कति जातास्तस्य दीनाराः ॥९९॥
सप्तमुखत्रिगुणचयत्रिवर्गगच्छस्य किं धनं वणिजः । त्रिकपञ्चकपञ्चदशप्रभवगुणोत्तरपदस्यापि ॥१००॥
गुणसंकलितोत्तराद्यानयनसूत्रम्—
असकृद्धेयं मुखहृतवित्तं येनोद्धृतं भवेत्स चयः ।
व्येकगुणगुणितगणितं निरेकपदमात्रगुणवधाप्तं प्रभवः ॥१०१॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
एक मनुष्य नगर से नगर भ्रमण करते हुए गुणोत्तर श्रेढि में धन कमाता है जिसका प्रथमपद
५ दीनार और साधारण निष्पत्ति २ है। इस तरह उसने आठ नगरों में प्रवेश किया । बतलाओ उसके
पास कितने दीनार हैं ? ॥९९॥ गुणोत्तर श्रेढि के योग द्वारा धन का माप किया जाता है । एक मनुष्य
के पास गुणोत्तर श्रेढि वाला कितना धन होगा जब कि श्रेढि का प्रथमपद ७ है, साधारण निष्पत्ति ३ है
और पदों की संख्या ९ है । पुनः, जिसके प्रथमपद, साधारण निष्पत्ति और पदों की संख्या क्रमशः
३, ५, १५ हैं ऐसी गुणोत्तर श्रेढि वाला धन बतलाओ ॥१००॥
गुणोत्तर श्रेढि के दिये गये योग सम्बन्धी प्रथमपद और साधारण निष्पत्ति निकालने का नियम—
वह राशि जिसके द्वारा, श्रेढि के योग को प्रथम पद द्वारा विभाजित करने से प्राप्त हुई राशि
को १ द्वारा ह्रासित कर उत्पन्न हुई राशि में कथित भाजन सम्भव हो (जब कि समय समय पर सब
उत्तरोत्तर भजनफलों में से एक घटाने के पश्चात् भाग देने की यह विधि की जाती हो) तो वह राशि
साधारण निष्पत्ति है। वह योग, जो एक कम साधारण निष्पत्ति द्वारा गुणित होकर, और तब स्वतः में
वारंवार गुणित साधारण निष्पत्ति के (स्वगुणित साधारण निष्पत्ति का ऐसा गुणनफल जिसमें साधारण
निष्पत्ति उतने बार प्रकट होती है जितनी कि पदों की संख्या रहती है ) गुणनफल द्वारा विभाजित होकर
और तब इस स्वतः में वारंवार गुणित साधारण निष्पत्ति के गुणनफल को एक द्वारा ह्रासित करने से
प्राप्त राशि द्वारा विभाजित होकर प्रथमपद उत्पन्न करता है ॥१०१॥
न बार भाग देने योग्य है और ‘न’ ही श्रेढि के पदों की संख्या है । इसी तरह र × र × र × ......न
पदों तक, रⁿ होता है; और गुणधन अर्थात् अरⁿ , इस रⁿ द्वारा विभाजित होकर अ देता है जो कि
श्रेढि का चाहा हुआ प्रथमपद है ।
(१०१) निम्नलिखित उदाहरण से नियम का प्रथमभाग स्पष्ट हो जावेगा—
श्रेढि का योग ४०९५ है, प्रथमपद ३ है, पदों की संख्या ६ है । यहाँ ४०९५ को ३ द्वारा
भाजित करने पर हमें १३६५ प्राप्त होता है । अब, १३६५ - १ = १३६४ है । तब अन्वीक्षा द्वारा ४
चुनकर, १३६४/४ = ३४१; ३४१ - १ = ३४०; ३४०/४ = ८५; ८५ - १ = ८४; ८४/४ = २१; २१ - १ = २०;
२०/४ = ५; ५ - १ = ४; ४/४ = १ है । इसलिये ४ यहाँ साधारण निष्पत्ति है । निम्नलिखित से इस विधि-
का आधारभूत सिद्धान्त स्पष्ट हो जावेगा—
{अ (रⁿ - १)} / (र - १) ÷ अ = (रⁿ - १) / (र - १) ; और (रⁿ - १) / (र - १) - १ = (रⁿ - र) / (र - १) जो कि स्पष्टतः र के
द्वारा भाज्य है । दूसरा भाग बीजीय रूप से इस तरह है—
अ = [{अ (रⁿ - १)} / (र - १)] × [(र - १) / (रⁿ - १)]

३२ ] गणितसारसंग्रहः [ २. १०२-
अत्रोद्देशकः
त्रिमुखर्तुगच्छबाणाङ्गाम्बरजलनिधिधने कियान्प्रचयः ।
षड्गुणचयपञ्चपदाम्बरशशिहिमगुत्रिवित्तमत्र मुखं किम् ॥१०२॥
गुणसंकलितगच्छानयनसूत्रम्—
एकोनगुणाभ्यस्तं प्रभवहृतं रूपसंयुतं वित्तम् । यावत्कृत्वो भक्तं गुणेन तद्वारसंमितिर्गच्छः ॥१०३॥
अत्रोद्देशकः
त्रिप्रभवं षट्कगुणं सारं समत्युपेतसप्तशती । समाशु ब्रूहि सखे कियत्पदं गणक गुणनिपुण ॥१०४॥
पञ्चादिद्विगुणोत्तरे शरगिरिद्वयेकप्रमाणे धने सप्तादि¹ त्रिगुणे नगेभदुरितस्तम्बेरभर्तुप्रमे ।
ड्यास्ये पञ्चगुणाधिके हुतवहोपेन्द्राक्षवह्निद्विपश्वेतांगुद्विरदेभकर्मकरदृग्ज्ञानेऽपि गच्छः कियान् ॥१०५।
इति परिकर्मविधौ सप्तमं संकलितं समाप्तम् ॥
व्युत्कलितम्
अष्टमे व्युत्कलितपरिकर्मणि करणसूत्रं यथा—
सपदॆष्टं स्वेष्टमपि व्येकं दलितं चयाहतं समुखम् । शेषेष्टगच्छगुणितं व्युत्कलितं स्वेष्टवित्तं च ॥१०६॥
१ M च ।
उदाहरणार्थ प्रश्न
यदि गुणोत्तर श्रेढि में प्रथम पद ३ है, पदों की संख्या ६ है, और योग ४०९५ है तो उसकी
साधारण निष्पत्ति बतलाओ । यदि साधारण निष्पत्ति ६ हो, पदों की संख्या ५ हो, और योग ३११० हो
तो ऐसी गुणोत्तर श्रेढि का प्रथमपद क्या है ? ॥१०२॥
गुणोत्तर श्रेढि के पदों की संख्या निकालने का नियम—
गुणोत्तर श्रेढि के योग को एक कम साधारण निष्पत्ति द्वारा गुणित करो; तब इस गुणनफल को
प्रथमपद द्वारा भाजित करो और तब इस भजनफल में एक जोड़ो । यह परिणामी राशि साधारण निष्पत्ति
द्वारा जितनी बार उत्तरोत्तर भाजित होगी, वह संख्या श्रेढि के पदों की संख्या होगी ॥१०३॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
हे गुणनिपुण गणक मित्र ! मुझे बतलाओ कि जिस श्रेढि में प्रथमपद ३ है; साधारण निष्पत्ति
६ है, और योग ७७७ है, उसके पदों की संख्या कितनी होगी ? ॥१०४॥ जिस श्रेढि में ५ प्रथमपद हैं,
२ साधारण निष्पत्ति है, १२७५ योग है; और उस श्रेढि में जिसका प्रथमपद ७ है; योग ६८८८७
है और साधारण निष्पत्ति ३ है तथा उस श्रेढि में जिसका प्रथमपद ३ है, साधारण निष्पत्ति ५ है और
योग २२८८८१८४५९३ है—पदों की संख्या अलग-अलग निकालो ॥१०५॥
इस प्रकार परिकर्म व्यवहार में, संकलित नामक परिच्छेद समाप्त हुआ ।
व्युत्कलित
परिकर्म क्रियाओं में आठवीं क्रिया व्युत्कलित¹ सम्बन्धी नियम—
श्रेढि के कुल पदों की संख्या को चुने हुए पदों की संख्या से मिला लो, और अपनी चुनी हुई
पदों की संख्या अलग से लो; इन राशियों में से प्रत्येक को एक द्वारा ह्रासित कर आधी करो और तब
प्रचय द्वारा गुणित करो; और तब इन प्रत्येक परिणामी गुणनफलों में प्रथमपद को जोड़ दो । प्राप्त
परिणामी राशियों को जब क्रमशः शेष पदों की संख्या तथा चुने हुए पदों की संख्या द्वारा गुणित करते
हैं तो क्रमशः शेष श्रेढि का योग और श्रेढि के चुने हुए भाग का योग प्राप्त होता है ॥१०६॥
१ किसी दी हुई श्रेढि में आरम्भ से चुना हुआ कोई भाग इष्ट भाग कहलाता है और शेष श्रेढि
में शेष पद रहने के कारण वह शेष श्रेढि कहलाती है । इन शेष पदों का योग ही व्युत्कलित कहलाता है ।
(१०६) बीजीय रूप से व्युत्कलित = य_व = { (न + द - १)/२ * ब + अ } ( न - द ), और
चुने हुए भाग ( इष्ट ) का योग = य_इ = ( (द - १)/२ * ब + अ ) द; जहाँ द श्रेढि का चुने हुए भाग
के पदों की संख्या है ।

-२. १०९ ] परिकर्मव्यवहारः [ ३३
प्रकारान्तरेण व्युत्कलितधनस्वेष्टधनानयनसूत्रम्—
गच्छसहितेष्टमिष्टं चैकोनं चयहतं द्विहादियुतम् । शेषेष्टपदार्धगुणं व्युत्कलितं स्वेष्टवित्तमपि ॥१०७॥
चयगुणभवव्युत्कलितधनानयने व्युत्कलितधनस्य शेषेष्टगच्छानयने च सूत्रम् –
इष्टधनोनं गणितं¹ व्यवकलितं चयभवं गुणोत्थं च । सर्वेष्टगच्छशेषे शेषपदं जायते तस्य ॥१०८॥
शेषगच्छस्याद्यानयनसूत्रम्—
प्रचयगुणितेष्टगच्छः सादिः प्रभवः पदस्य शेषस्य । प्राक्तन एव चयः स्याद्यदृच्छस्येष्टस्य तावेव ॥१०९॥
१ M गणितं ।
दूसरी रीति द्वारा शेष श्रेढि ( व्युत्कलित ) तथा दी गई श्रेढि के चुने हुए इष्ट भाग के योगफलों
को प्राप्त करने का नियम—
श्रेढि के कुल पदों की संख्या को चुने हुए पदों की संख्या में मिला लो और अपनी चुनी हुई
पदों की संख्या अलग से लो; इन राशियों में से प्रत्येक को एक द्वारा हासित करो और तब प्रचय द्वारा
गुणित करो । इन परिणामी गुणनफलों में प्रथमपद की दुगुनी राशि जोड़ो। प्राप्त परिणामी राशियों को
जब क्रमशः शेष पदों की संख्या की आधी राशि द्वारा और चुनी हुई पदों की संख्या की आधी राशि
द्वारा गुणित करते हैं तब शेष श्रेढि का योग और श्रेढि के चुने हुए भाग का योग प्राप्त होता है ॥१०७॥
समान्तर और गुणोत्तर श्रेढि के शेष श्रेढि की योग तथा उसके शेष पदों की संख्या निकालने
का नियम—
दी हुई श्रेढि का योग, श्रेढि के चुने हुए भाग द्वारा हासित होकर समान्तर तथा गुणोत्तर
श्रेढि के शेष भाग के योग को उत्पन्न करता है । श्रेढि के कुल पदों की संख्या और चुनी हुई श्रेढि के
पदों की संख्या का अन्तर शेष श्रेढि के पदों की संख्या होता है ॥१०८॥
शेष श्रेढि के पदों सम्बन्धी प्रथमपद निकालने का नियम—
चुनी हुई पदों की संख्या को प्रचय द्वारा गुणित करने और श्रेढि के प्रथमपद में मिलाने पर
शेष श्रेढि के ( शेष ) पदों का प्रथमपद उत्पन्न होता है । उपर्युक्त प्रचय, शेष पदों का भी प्रचय
होता है । चुने हुए भाग के पदों की संख्या सम्बन्धी प्रथमपद और प्रचय, दी हुई श्रेढि के प्रथमपद
और प्रचय के तुल्य होते हैं ॥१०९॥
(१०७) फिर से, व्युत्कलित = यव् = { ( न + द - १ ) ब + २ अ } (न - द) / २
और इष्ट का योग = यइ = { ( द - १ ) ब + २ अ } द / २
(१०९) शेष श्रेढि का प्रथमपद = द × ब + अ है यह श्रेढि स्पष्टतः समान्तर श्रेढि है ।
ग० सा० सं०-५

३४ ] गणितसारसंग्रहः [ २. ११०-
गुणव्युत्कलितशेषगच्छस्याद्यानयनसूत्रम्—
गुणगुणितेऽपि चयादी तथैव भेदोऽयमत्रशेषपदे ।
इष्टपदमितिगुणाहतिगुणितप्रभवो भवेद्वक्त्रम् ॥११०॥
अत्रोद्देशकः
द्विमुखस्त्रिचयो गच्छश्चतुर्दश स्वेप्सितं पदं सप्त । अष्टनवषट्कपञ्च च किं व्युत्कलितं समाकलय ॥१११॥
षडादिरष्टौ प्रचयोऽत्र षट्कृतिः पदं दश द्वादश षोडशेप्सितम् ।
मुखादिरन्यस्य तु पञ्चपञ्चकं शतद्वयं ब्रूहि शतं व्ययः कियान् ॥११२॥
षड्घनमानो गच्छः प्रचयोऽष्टौ द्विगुणसप्तकं वक्त्रम् ।
सप्तत्रिंशत्स्वेष्टं पदं समाचक्ष्व फलमुभयम् ॥११३॥
अष्टकृतिरादिरुत्तरमूनं चत्वारि षोडशात्र पदम् । इष्टानि तत्त्वकेशवरुद्रार्कपदानि किं शेषम् ॥११४॥

गुणोत्तर श्रेढि की शेष श्रेढि के (शेष) पदों की संख्या सम्बन्धी प्रथमपद निकालने का नियम—
गुणोत्तर श्रेढि के विषय में भी दी गई श्रेढि में तथा इष्ट भाग में साधारण निष्पत्ति तथा प्रथम
पद समान होते हैं । परन्तु, शेष श्रेढि के पदों का प्रथमपद भिन्न होता है । दी हुई श्रेढि का प्रथमपद
ऐसे गुणनफल द्वारा गुणित होकर, जो साधारण निष्पत्ति के स्वतः उतनी बार गुणित होने से उत्पन्न
होता है जितनी बार कि चुने हुए पदों की संख्या होती है, शेष श्रेढि के प्रथमपद को उत्पन्न
करता है ॥११०॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
समान्तर श्रेढि की शेष श्रेढि के योग की गणना करो जब कि प्रथम पद २ हो, प्रचय ३ हो
और पदों की संख्या १४ हो तथा चुनी हुईं पदों की संख्या क्रमशः ७, ८, ९, ६ और ५ हो ॥१११॥
समान्तर श्रेढि के सम्बन्ध में यहाँ प्रथमपद ६ है, प्रचय ८ है, पदों की संख्या ३६ है और चुनी हुई
पदों की संख्या क्रमशः १०, १२ और १६ है । इसी तरह की दूसरी श्रेढि के प्रथमपद और प्रचय
आदि क्रमशः ५, ५, २०० और १०० है । बतलाओ कि संवादी शेष श्रेढियों के योग क्या-क्या
हैं ? ॥११२॥ समान्तर श्रेढि के पदों की संख्या २१६ है; प्रचय ८ है; प्रथमपद १४ है; इष्ट भाग के
पदों की संख्या ३७ है । शेष श्रेढि और इष्ट श्रेढि ( चुने हुए भाग ) के योग क्या-क्या होंगे ? ॥११३॥
समान्तर श्रेढि का प्रथमपद ६४ है, प्रचय - ४ ( ऋण चार ) है तथा पदों की संख्या १६ है ।
बतलाओ कि शेष श्रेढि के योग क्या-क्या होंगे जब कि इष्ट भाग के पदों की संख्या क्रमशः ७, ९, ११
और १२ हो ॥११४॥

(११०) शेष गुणोत्तर श्रेढि का प्रथमपद अर^द है ।

-२. ११५ ] परिकर्मव्यवहारः [ ३५
गुणव्युत्कलितस्योदाहरणम्—
चतुरादिद्विगुणात्मकोत्तरयुतो गच्छश्चतुर्णां कृतिर्
दश वाञ्छापदमङ्कसिन्धुरगिरिद्रव्येन्द्रियाम्भोधयः ।
कथय व्युत्कलितं फलं सकलसङ्ख्याग्रिमं व्योमवान्
करणस्कन्धवनान्तरं गणितविन्मत्तेभविक्रीडितम् ॥११५॥
इति परिकर्मविधावष्टमं व्युत्कलितं समाप्तम् ॥
इति सारसंग्रहे गणितशास्त्रे महावीराचार्यस्य कृतौ परिकर्मनामा प्रथमो व्यवहारः समाप्तः ॥
१ M प्रा. ।
गुणोत्तर श्रेढि सम्बन्धी व्युत्कलित पर प्रश्न
क्रमबद्ध गुच्छेवाले वृक्षों के फलों की संकलन क्रिया में ४ प्रथमपद है, २ प्रचय है, पदों की
संख्या १६ है जब कि इष्ट भाग में पदों की संख्या क्रमशः १०, ९, ८, ७, ६, ५ और ४ है । हे जंगली
हस्तियों द्वारा क्रीड़ित वन के अंतस्थल रूपी व्यावहारिक गणित की क्रियाओं के वेधक ! बतलाओ कि
कथित विभिन्न उत्तम वृक्षों के शेष फलों की कुल संख्या क्या है ? ॥११५॥
इस प्रकार, परिकर्म व्यवहार में व्युत्कलित नामक परिच्छेद समाप्त हुआ ।
इस प्रकार, महावीराचार्य की कृति सारसंग्रह नामक गणित शास्त्र में परिकर्म नामक प्रथम
व्यवहार समाप्त हुआ ।
(११५) इस प्रश्न में भिन्न-भिन्न ७ फलों के वृक्ष हैं जिनमें से प्रत्येक में फलों के १६ गुच्छे हैं ।
प्रत्येक वृक्ष में सबसे छोटा गुच्छा ४ फलों वाला है; बड़े-बड़े गुच्छों में गुणोत्तर श्रेढि में बढ़ते हुए फलों
की संख्याएँ हैं, जिसकी साधारण निष्पत्ति २ है । ७ वृक्षों में से हटाये हुए गुच्छों की संख्या नीचे से
क्रमशः १०, ९, ८, ७, ६, ५ और ४ है । यहाँ विभिन्न उत्तम वृक्षों पर शेष फलों की कुल संख्या
निकालना है । 'मत्तेभवि क्रीडितं' जो इस सूत्र में आया है, उसी सूत्र का छन्द ( metre ) है
जिसमें कि वह संरचित किया गया है । इसका अर्थ वन्यहस्तियों की क्रीड़ा भी होता है ।

३. कलासवर्णव्यवहारः
१त्रिलोकराजेन्द्रकिरीटकोटिप्रभाभिरालीढपदारविन्दम् ।
निर्मूलमुन्मूलितकर्मवृक्षं जिनेन्द्रचन्द्रं प्रणमामि भक्त्या ॥ १ ॥
इतः परं कलासवर्णं द्वितीयव्यवहारमुदाहरिष्यामः ।
भिन्नप्रत्युत्पन्नः
तत्र भिन्नप्रत्युत्पन्ने करणसूत्रं यथा—
गुणयेदंशानंशैर्हारान् हारैर्घटेत यदि तेषाम् । वज्रापवर्तनविधिर्विधाय तं भिन्नगुणकारे ॥ २ ॥
अत्रोद्देशकः
शुण्ठ्याः पलेन लभते चतुर्नवांशं पणस्य यः पुरुषः ।
किमसौ ब्रूहि सखे त्वं त्रिगुणेन पलाष्टभागेन ॥ ३ ॥
मरिचस्य पलस्यार्धः पणस्य सप्ताष्टमांशको यत्र । तत्र भवेत्किं२ मूल्यं पलषट्पञ्चांशकस्य वद ॥ ४ ॥
१ यह श्लोक P में छूट गया है । २ M मौ. ।
३. कलासवर्ण व्यवहार१
( भिन्न )
जिन्होंने कर्मरूपी वृक्ष को पूर्णतः निर्मूल कर दिया है और जिनके चरण कमल तीनों लोकों के
राजेन्द्रों के झुके हुए मस्तक पर लगे हुए मुकुटों द्वारा उत्पन्न प्रभामंडल द्वारा वेष्टित हैं, ऐसे जिनेन्द्र
चन्द्रनाथ भगवान् को मैं भक्तिपूर्वक प्रणाम करता हूँ ॥१॥
इसके पश्चात् हम कलासवर्ण ( भिन्न ) नामक द्वितीय व्यवहार को प्रकट करेंगे ।
भिन्न प्रत्युत्पन्न ( भिन्नों का गुणन )
भिन्नों के गुणन के सम्बन्ध में निम्नलिखित नियम है—
भिन्नों के गुणन में अंशों को अंशों से गुणित किया जाता है और हरों को हरों से गुणित किया
जाता है जब कि उनके सम्बन्ध में ( सम्भव ) तिर्यक् प्रहासन ( वज्र अपवर्तन ) की क्रिया की
जा चुकी हो ॥२॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
हे मित्र, मुझे बतलाओ यदि अदरक ( ginger ) का एक पल ४/९ पण में मिलता हो तो किसी
व्यक्ति को ३/८ पल के लिये क्या मिलेगा ? ॥३॥ ७/८ पण में १ पल मिर्च मिलती हो तो बतलाओ
कि ५/६ पल मिर्च की क्या कीमत होगी ? ॥४॥ एक व्यक्ति को लम्बी मिर्च एक पण में २/५ पल मिलती
१ कलासवर्ण का शाब्दिक अर्थ १/१६ भाग होता है, क्योंकि कला का अर्थ सोलहवाँ भाग होता
है । इसलिये, कलासवर्ण का उपयोग भिन्न को साधारण रूप से दर्शाने के लिये किया गया है ।
( २ ) जब ४/९ × ३/८ प्रहासित किये जाते हैं तो तिर्यक् प्रहासन द्वारा १/३ × १/२ प्राप्त होता है ।

-३. ११] कलासवर्णव्यवहारः [ ३७
कश्चित्पणेन लभते त्रिपञ्चभागं पलस्य पिप्पल्याः ।
नवभिः पणैर्द्विभक्तैः किं गणकाचक्ष्व गुणयित्वा ॥ ५ ॥
क्रीणाति पणेन वणिग्जीरकपालनवदशांशकं यत्र । तत्र पणैः पञ्चार्धैः कथय त्वं किं समग्रमते ॥ ६ ॥
द्व्यादयो द्वितयवृद्धयोंऽशकास्त्र्यादयो द्वयचया हराः पुनः ।
ते द्वये दशपदाः कियत्फलं ब्रूहि तत्र गुणने द्वयोर्द्वयोः ॥ ७ ॥
इति भिन्नगुणाकारः ।
भिन्नभागहारः
भिन्नभागहारे करणसूत्रं यथा—
अंशीकृत्यच्छेदं प्रमाणराशेस्ततः क्रिया गुणवत् ।
प्रमितफलेऽन्यहरघ्ने विच्छिदि वा सकलवच्च भागहृतौ ॥ ८ ॥
अत्रोद्देशकः
हिङ्गोः पलार्धमौल्यं पणत्रिपादांशको भवेद्यत्र । तत्रार्धे विक्रीणन् पलमेकं किं नरो लभते ॥ ९ ॥
अगरोः पलाष्टमेन त्रिगुणेन पणस्य विंशतित्र्यंशान् । उपलभते यत्र पुमानेकेन पलेन किं तत्र ॥१०॥
पणपञ्चमैश्चतुर्भिर्नखस्य पलसप्तमो व्यशीतिगुणः । संप्राप्यो यत्र स्यादेकेन पणेन किं तत्र ॥११॥
हो तो हे गणितज्ञ ! गुणन के पश्चात् कहो कि उसे ९/२ पण में कितनी मिर्च मिलेगी ? ॥५॥ एक वणिक
एक पण में ९/१० पल जीरा (cumin seeds) खरीदता है । हे समग्रमते ! बतलाओ कि वह ५/२ पण में
कितना खरीदेगा ? ॥६॥ दिये गये भिन्नों में अंश २ से आरम्भ होकर २ से बढ़ते चले जाते हैं; उनके
हर ३ से आरम्भ होकर २ से बढ़ते चले जाते हैं; वे अंश और हर दोनों दशाओं में संख्या में दस रहते
हैं । बतलाओ कि दो भिन्नों को एक बार में लेने पर उनके गुणनफल अलग-अलग क्या होंगे ? ॥७॥
इस प्रकार, कलासवर्ण व्यवहार में भिन्न गुणकार नामक परिच्छेद समाप्त हुआ ।
भिन्न भागहार ( भिन्नों का भाग )
भिन्नों के भाग के सम्बन्ध में निम्नखित नियम है—
भाजक के हर को अंश तथा अंश को हर बनाने के पश्चात् केवल गुणन की क्रिया करना
पड़ती है । अथवा, भाजक और भाज्य को एक दूसरे के हरों द्वारा गुणित कर प्राप्त हर रहित गुणनफलों
का भाग केवल पूर्ण संख्याओं के भाग की भाँति किया जाता है ॥८॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
जब ३/४ पण में १/२ पल हींग मिलती है तो एक व्यक्ति को एक पल हींग उसी भाव से बेचने
पर क्या मिलेगा ? ॥९॥ १/८ पल ( लाल चंदन की लकड़ी ) का मूल्य ३/२० पण है तो एक पल अगुरु
का क्या मूल्य होगा ? ॥१०॥ नख इत्र के ४/५ पल का मूल्य ५/८ पण है तो एक पण में ( उसी अर्घ से )
कितने पल इत्र मिलेगा ? ॥११॥ दिये गये भिन्नों के अंश ३ से आरम्भ होकर क्रमशः १ द्वारा
( ७) यहाँ कथित भिन्न २/३, ४/५, ६/७ इत्यादि हैं ।
( ८) ( i ) अ/ब ÷ स/द = अ/ब × द/स ; ( ii ) अ/ब ÷ स/द = अद ÷ बस

३८ ] गणितसारसंग्रहः [ ३. १२-
त्र्यादिरूपपरिवृद्धियुजोऽशा यावदष्टपदमेकविहीनाः ।
हारकास्तत इह द्वितयाद्यैः किं फलं वद परेषु हृतेषु ॥१२॥
इति भिन्नभागहारः ।
भिन्नवर्गवर्गमूलघनघनमूलानि
१भिन्नवर्गवर्गमूलघनघनमूलेषु करणसूत्रं यथा—
कृत्वाच्छेदांशकयोः कृतिकृतिमूले घनं च घनमूलम् । तच्छेदरैंरहृतौ वर्गादिफलं भवेद्भिन्ने ॥१३॥
अत्रोद्देशकः
पञ्चकसप्तनवानां दलितानां कथय गणक वर्गं त्वम् । षोडशविंशतिशतकद्विशतानां च त्रिभक्तानाम् ॥१४॥
त्रिकादिरूपद्वयवृद्धयोंऽशा द्विकादिरूपोत्तरका हराश्च ।
पदं मतं द्वादशवर्गमेषां वदाशु मे त्वं गणकाग्रगण्य ॥१५॥
पादनवांशकषोडशभागानां पञ्चविंशतितमस्य । षट्त्रिंशद्भागस्य च कृतिमूलं गणक भण शीघ्रम् ॥१६॥
भिन्ने वर्गे राशयो वर्णिता ये तेषां मूलं सप्तशत्याश्च किं स्यात् ।
त्र्यष्टोनायाः पञ्चवर्गोद्धृताया ब्रूहि त्वं मे वर्गमूलं प्रवीण ॥१७॥
१ M भिन्नवर्गभिन्नवर्गमूलभिन्नघनतन्मूलेषु ।
बढ़ते चले जाते हैं जब तक कि उनकी संख्या ८ नहीं हो जाती । हर भी दो से आरम्भ होकर संवादी
अंशों से क्रमशः एक कम हैं । मुझे बतलाओ कि यदि प्रत्येक अग्रिम भिन्न को पूर्ववर्ती भिन्न के द्वारा
विभाजित किया जाय तो क्या फल होगा ? ॥१२॥
इस प्रकार, कलासवर्ण व्यवहार में, भिन्न भागहार नामक परिच्छेद समाप्त हुआ ।
भिन्न सम्बन्धी वर्ग, वर्गमूल, घन, घनमूल
भिन्नों के सम्बन्ध में वर्ग करने वर्गमूल निकालने, घन करने, और घनमूल निकालने के
लिये नियम—
जब हल किये गये भिन्न के अंश और हर का अलग-अलग वर्ग, वर्गमूल, घन अथवा घनमूल
निकाल लिया जाता है तब इस तरह प्राप्त नये अंश को नये हर द्वारा भाजित किया जाता है। इस
प्रकार भिन्न के सम्बन्ध में वर्ग अथवा वर्गमूल, घन अथवा घनमूल प्राप्त होता है ॥१३॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
हे अंकगणितज्ञ ! मुझे बतलाओ कि ५/२, ७/२, ९/२, १६/३, २०/३, १००/३ और २००/३ के वर्ग क्या
होंगे ? ॥१४॥ दिये गये भिन्नों के अंश ३ से आरम्भ होते हैं और उत्तरोत्तर क्रमशः २ द्वारा बढ़ते चले
जाते हैं; हर २ से आरम्भ होते हैं और उत्तरोत्तर १ द्वारा बढ़ते चले जाते हैं । इन भिन्नों की संख्या
१२ है । हे अंकगणितज्ञों में अग्रणी ! मुझे उनके वर्ग शीघ्र बतलाओ ? ॥१५॥ हे अंकगणितज्ञ ! मुझे
शीघ्र बताओ कि १/४, १/९, १/१६, १/२५ और १/३६ के वर्गमूल क्या होंगे ? ॥१६॥ हे कुशल व्यक्ति ! मुझे भिन्नों
के वर्गों से सम्बन्धित प्रश्नों में प्राप्त वर्गित राशियों के वर्गमूल तथा ६७६/२५ का वर्गमूल बतलाओ ॥१७॥
( १७ ) यहाँ ६७६/२५ को मूल गाथा में (७०० - ३ × ८) / ५² के रूप में दर्शाया गया है ।

३. २३- ] कलासवर्णव्यवहारः [ ३९
अर्धत्रिभागपादाः पञ्चांशकषष्ठसप्तमाष्टांशाः । दृष्टा नवमश्चैषां पृथक् पृथग्ब्रूहि गणक घनम् ॥१८॥
त्रितयादि चतुश्रयकोऽशगणो द्विमुखद्विचयोऽत्र हरप्रचयः ।
दशकं पदमाशु तदीयघनं कथय प्रिय सूक्ष्ममते गणिते ॥१९॥
शतकस्य पञ्चविंशस्याष्टविभक्तस्य कथय घनमूलम् ।
नैवयुतसप्तशतानां विंशानामष्टभक्तानाम् ॥२०॥
भिन्नघने परिदृष्टघनानां मूलमुदग्रमते वद मित्र ।
त्र्यूनशतद्वययुग्द्विसहस्रया श्चापि नवप्रहतत्रिहृतायाः ॥२१॥
इति भिन्नवर्गवर्गमूलघनघनमूलानि ।
भिन्नसंकलितम्
भिन्नसंकलिते करणसूत्रं यथा—
पदमिष्टं प्रचयहतं द्विगुणप्रभवान्वितं चयेनोनम् ।
गच्छाधेनाभ्यस्तं भवति फलं भिन्नसंकलिते ॥२२॥

१ M सप्तशतस्यापि सखे व्येकोनत्रिंशकाष्टकासस्य ।

१/२, १/३, १/४, १/५, १/६, १/७, १/८ और १/९ राशियाँ दी गई हैं; इनके घन अलग-अलग बतलाओ ॥१८॥ दिये गये
भिन्नों के अंश ३ से आरम्भ होकर ४ द्वारा उत्तरोत्तर बढ़ते हैं; हर २ से आरम्भ होकर उत्तरोत्तर २ द्वारा
बढ़ते हैं । ऐसे भिन्नात्मक पदों की संख्या १० है । हे तीव्र बुद्धिधारी गणक मित्र ! बतलाओ कि उनके
घन क्या होंगे ? ॥१९॥ १२५/८ और ७२९/८ के घनमूल निकालो ॥२०॥ हे अग्रमते मित्र ! भिन्नों के घन
निकालने के प्रश्नों में प्राप्त घन राशियों के घनमूल और २१९७/२७ का घनमूल निकालकर बतलाओ ।
इस प्रकार कलासवर्ण व्यवहार में भिन्न सम्बन्धी वर्ग, वर्गमूल, घन, घनमूल नामक परिच्छेद
समाप्त हुआ ।
भिन्न संकलित ( भिन्नात्मक श्रेणियों का योगकरण )
भिन्नात्मक श्रेणियों का संकलन सम्बन्धी नियम—
समान्तर श्रेढि में भिन्नात्मक श्रेढि को बनाने वाले पदों की चुनी हुई संख्या को प्रचय द्वारा
गुणित करते हैं और प्रथमपद की द्विगुणित राशि में मिलाते हैं । प्राप्त फल को प्रचय से हासित करते
हैं । जब यह परिणामी राशि पदों की संख्या की आधी राशि से गुणित की जाती है, तब वह समान्तर
श्रेढि की भिन्नात्मक श्रेढि के योग को उत्पन्न करती है ॥२२॥

( २२ ) बीजीयरूप से, य = ( नब + २अ - ब ) न/२ है । इसके लिये द्वितीय अध्याय की ६२वीं
गाथा देखिये ।

४० ] गणितसारसंग्रहः [ २. २४-
अत्रोद्देशकः
द्वित्र्यंशः षड्भागस्त्रिचरणभागो मुखं चयो गच्छः ।
द्वौ पञ्चमौ त्रिपादो द्वित्र्यंशोऽन्यस्य कथय किं वित्तम् ॥२३॥
आदिः प्रचयो गच्छस्त्रिपञ्चमः पञ्चमस्त्रिपादांशः ।
सर्वांशहरौ वृद्धौ द्वित्रिभिरा सप्तकाच्च का चितिः ॥२४॥
इष्टगच्छस्याद्युत्तरवर्गरूपघनरूपधनानयनसूत्रम्—
पदमिष्टमेकमादिर्व्यकेष्टदलोद्धृतं मुखोनपदम् । प्रचयो वित्तं तेषां वर्गो गच्छाहतं वृन्दम् ॥२५॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
जिस श्रेढि में प्रथम पद, प्रचय और पदों की संख्या क्रमशः २/३, १/६ और ३/४ हों तथा ऐसी ही एक
और श्रेढि में ये क्रमशः २/५, ३/४ और २/३ हों तो इन श्रेढियों के योग बतलाओ ॥२३॥ समानान्तर श्रेढि में
दी गई एक श्रेढि के प्रथम पद, प्रचय और पदों की संख्या क्रमशः ३/५, १/५ और ३/४ है। इन सब
भिन्नात्मक राशियों के अंश और हर उत्तरोत्तर २ और ३ द्वारा क्रमशः बढ़ाये जाते हैं जब तक कि ७
श्रेढियाँ इस प्रकार तैयार नहीं हो जातीं । बतलाओ कि इनमें से प्रत्येक श्रेढि का योग क्या है ?॥२४॥
जब योग, दी हुई श्रेढि के पदों की संख्या का वर्गरूप या घनरूप हो तो चुने हुए पदों वाली
श्रेढि के सम्बन्ध में प्रथम पद, प्रचय और योग निकालने का नियम—
जो भी पदों की संख्या चुनी गई हो उसे लो और प्रथम पद को एक मान लो। पदों की संख्या
को प्रथम पद द्वारा हासित कर और तब एक कम पदों की संख्या की आधी राशि द्वारा भाजित करने
से प्रचय प्राप्त होता है । इनके सम्बन्ध में श्रेढि का योग पदों की संख्या की राशि का वर्ग होता है ।
यह जब पदों की संख्या द्वारा गुणित किया जाता है तो योग का घन प्राप्त होता है ॥२५॥
( २३ ) जब श्रेढि में पदों की संख्या भिन्न के रूप में दी गई हो तो स्पष्ट है कि ऐसी श्रेढि
साधारणतः बनाई नहीं जा सकती । परन्तु, अभिप्राय यह प्रतीत होता है कि दिया गया नियम इन
दशाओं में ठीक उतरता है ।
( २५ ) स्पष्ट है कि, सूत्र में य = (न/२)(२अ + न - १ ब), और जब अ = १ और ब = २(न - अ)/(न - १)
हो तो य का मान न² के तुल्य हो जाता है । इस योग में न का गुणन करने में, अ और ब का न
द्वारा गुणन भी अंतर्भूत है ताकि जब अ = न और ब = ((न - अ)/(न - १)) २न हो, तब य = न³ हो। कुछ और विचार
करने पर ज्ञात होगा कि अ का मान चाहे पूर्णांक अथवा भिन्नीय हो फिर भी ब का २(न ~ अ)/(न - १)
रूपवाला मान य की अर्हा को न² के रूप में ला सकता है ।
‘~’ चिह्न का अर्थ अन्तर होता है ।

-२, २८ ] कलासवर्णव्यवहारः [ ४१
अत्रोद्देशकः
'पदमिष्टं द्वित्र्यंशो रूपेणांशो हरश्च संवृद्धः । यावद्दशपदमेषां वद मुखचयवर्गवृन्दानि ॥२६॥
इष्टघनधनाद्युत्तरगच्छानयनसूत्रम्—
इष्टचतुर्थः प्रभवः प्रभवात्प्रचयो भवेद्द्विसंगुणितः ।
प्रचयश्चतुरभ्यस्तो गच्छस्तेषां युतिर्वृन्दम् ॥२७॥
अत्रोद्देशकः
द्विमुखैकचया अंशास्त्रिप्रभवैकोत्तरा हरा उभये ।
पञ्चपदा वद तेषां घनधनमुखचयपदानि सखे ॥२८॥

१ यह श्लोक M में अप्राप्य है ।

उदाहरणार्थ प्रश्न
दी हुई श्रेढि में पदों की चुनी हुई संख्या २/३ है; इस भिन्न के अंश और हर उत्तरोत्तर एक द्वारा
बढ़ाये जाते हैं जब तक कि १० विभिन्न भिन्नात्मक पद प्राप्त नहीं होते । इन भिन्नों को संवादी समान्तर
श्रेढियों के पदों की संख्या मानकर उनके सम्बन्ध में प्रथम पद, प्रचय और योग के वर्ग तथा घन
निकालो ॥२६॥
समान्तर श्रेढि के दिये हुए योग (जो कि किसी इष्ट राशि का घन हो) के सम्बन्ध में प्रथम
पद, प्रचय और पदों की संख्या निकालने का नियम—
इष्ट राशि का चतुर्थांश प्रथम पद है । इस प्रथम पद में दो का गुणन करने पर प्रचय उत्पन्न
होता है । प्रचय में चार का गुणा करने पर (एक) इष्ट श्रेढि के पदों की संख्या प्राप्त होती है । इनसे
सम्बन्धित योग इष्ट राशि का घन होता है ॥२७॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
अंश २ से आरम्भ होते हैं और उत्तरोत्तर १ द्वारा बढ़ते हैं; हर को १ द्वारा बढ़ाते हैं जो कि
आरम्भ में ३ है । ये दोनों प्रकार के पद (अंश और हर) में से प्रत्येक संख्या में पाँच है । इन चुनी
हुई भिन्नात्मक राशियों के सम्बन्ध में, हे मित्र, घनात्मक योग और संवादी प्रथमपद, प्रचय और पदों
की संख्या निकालो ॥२८॥

(२७) यह नियम केवल विशेष दशा में प्रयुक्त किया गया है । यह साधारण रूप से भी प्रयोग
में लाया जा सकता है । नियम इस तरह है :
क/४ + ३क/४ + ५क/४ + ······ २ क पदों तक = क/४ (२ क)² = क³
इस क्रिया की साधारण प्रयोज्यता, समीकरण क/प² × (प क)² = क³ से शीघ्र स्पष्ट हो सकती
है । इन सब दशाओं में श्रेढिके पदों की संख्या प्रथम पद को प³ से गुणित करने पर प्राप्त हो सकती है
क्योंकि प्रथम पद क/प² है । प्रत्येक दशा में प्रचय प्रथमपद से द्विगुणित लिया जाता है ।
ग० सा० सं०–६

४२ ] गणितसारसंग्रहः [ ३. २९-
दृष्टधनाद्युत्तरतो द्विगुणत्रिगुणद्विभागत्रिभागादीष्टधनाद्युत्तरानयनसूत्रम्—
दृष्टविभक्तेष्टधनं द्विष्ठं^२ तत्प्रचयताडितं प्रचयः ।
तत्प्रभवगुणं प्रभवो गुणभागस्येष्टवित्तस्य^३ ॥२९॥
अत्रोद्देशकः
प्रभवस्त्र्यर्धो रूपं प्रचयः पञ्चाष्टमः समानपदम् ।
इच्छाधनमपि तावत्कथय सखे कौ मुखप्रचयौ ॥३०॥
प्रचयादादिर्द्विगुणस्त्रयोदशाष्टादशं पदं स्वेष्टम् । वित्तं तु सप्तषष्टिः षड्घनभक्ता वदादिचयौ ॥३१॥
मुखमेकं द्वित्र्यंशः प्रचयो गच्छः समश्चतुर्नवमः ।
धनमिष्टं द्वाविंशतिरेकाशीत्या वदादिचयौ ॥३२॥
१ M गुणभागाद्युत्तरानयनसूत्रम् ।
२ M प्रचयेन ।
३ M गुणभागाद्युत्तरेच्छायाः ।
४ यह श्लोक M में ३१ वें श्लोक के स्थान में है तथा B में छूटा हुआ है ।
दी हुईं समान्तर श्रेढि के ज्ञात योग, प्रथम पद और प्रचय से किसी श्रेढि के प्रथमपद और
प्रचय निकालना जबकि इष्ट योग दी गई श्रेढि के ज्ञात योग से दुगुना, तिगुना, आधा, एक तिहाई,
अथवा उसका अपवर्त्य या अंश हो—
हल करने की सुविधा के लिए इष्ट योग को ज्ञात योग द्वारा विभाजित कर दो स्थानों में रखो ।
यह भजनफल, जब ज्ञात प्रचय द्वारा गुणित किया जाता है तब चाहा हुआ प्रचय प्राप्त होता है । और
वही भजनफल, जब ज्ञात प्रथमपद द्वारा गुणित होता है तब चाहे हुए प्रथम पद को उत्पन्न
करता है ॥२९॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी श्रेढि का प्रथम पद ३/२ है, प्रचय १ है और पदों की संख्या ( जो दी हुईं तथा इष्ट, दोनों
श्रेढियों, के लिये उभयनिष्ठ है ) ५/८ है । इष्ट श्रेढि तथा दी गई श्रेढि का योग अलग-अलग ५/८ हैं । हे
मित्र ! इष्ट श्रेढि का प्रथमपद तथा प्रचय निकालो ॥३०॥ ( प्रचय १ है ) और प्रथमपद प्रचय का
दुगुना है; पदों की संख्या १३/१८ है; इष्ट श्रेढि का योग ६७/२१६ है । प्रथमपद और प्रचय निकालो ॥३१॥
प्रथम पद १ है, प्रचय २/३ और पदों की संख्या दोनों ( दी गई श्रेढि और इष्ट श्रेढि ) के लिये उभय-
साधारण ४/९ है । इष्ट श्रेढि का योग २२/८१ है । इष्ट श्रेढि के प्रथमपद और प्रचय निकालो ॥३२॥
(२९) ८४ वीं गाथा का नोट अध्याय २ में देखिये ।
√[ २ बय + ( ब/२ - अ )² ] + ब/२ - अ
*(३३) प्रतीक रूप से, न = ———————————————————————————
ब
अध्याय २ की गाथा ६९ वीं का नोट भी देखिये ।