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सर्वकोश
गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation

महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 86, कुल 421 में से

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पृष्ठ 86

३२ ] गणितसारसंग्रहः [ २. १०२-
अत्रोद्देशकः
त्रिमुखर्तुगच्छबाणाङ्गाम्बरजलनिधिधने कियान्प्रचयः ।
षड्गुणचयपञ्चपदाम्बरशशिहिमगुत्रिवित्तमत्र मुखं किम् ॥१०२॥
गुणसंकलितगच्छानयनसूत्रम्—
एकोनगुणाभ्यस्तं प्रभवहृतं रूपसंयुतं वित्तम् । यावत्कृत्वो भक्तं गुणेन तद्वारसंमितिर्गच्छः ॥१०३॥
अत्रोद्देशकः
त्रिप्रभवं षट्कगुणं सारं समत्युपेतसप्तशती । समाशु ब्रूहि सखे कियत्पदं गणक गुणनिपुण ॥१०४॥
पञ्चादिद्विगुणोत्तरे शरगिरिद्वयेकप्रमाणे धने सप्तादि¹ त्रिगुणे नगेभदुरितस्तम्बेरभर्तुप्रमे ।
ड्यास्ये पञ्चगुणाधिके हुतवहोपेन्द्राक्षवह्निद्विपश्वेतांगुद्विरदेभकर्मकरदृग्ज्ञानेऽपि गच्छः कियान् ॥१०५।
इति परिकर्मविधौ सप्तमं संकलितं समाप्तम् ॥
व्युत्कलितम्
अष्टमे व्युत्कलितपरिकर्मणि करणसूत्रं यथा—
सपदॆष्टं स्वेष्टमपि व्येकं दलितं चयाहतं समुखम् । शेषेष्टगच्छगुणितं व्युत्कलितं स्वेष्टवित्तं च ॥१०६॥
१ M च ।
उदाहरणार्थ प्रश्न
यदि गुणोत्तर श्रेढि में प्रथम पद ३ है, पदों की संख्या ६ है, और योग ४०९५ है तो उसकी
साधारण निष्पत्ति बतलाओ । यदि साधारण निष्पत्ति ६ हो, पदों की संख्या ५ हो, और योग ३११० हो
तो ऐसी गुणोत्तर श्रेढि का प्रथमपद क्या है ? ॥१०२॥
गुणोत्तर श्रेढि के पदों की संख्या निकालने का नियम—
गुणोत्तर श्रेढि के योग को एक कम साधारण निष्पत्ति द्वारा गुणित करो; तब इस गुणनफल को
प्रथमपद द्वारा भाजित करो और तब इस भजनफल में एक जोड़ो । यह परिणामी राशि साधारण निष्पत्ति
द्वारा जितनी बार उत्तरोत्तर भाजित होगी, वह संख्या श्रेढि के पदों की संख्या होगी ॥१०३॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
हे गुणनिपुण गणक मित्र ! मुझे बतलाओ कि जिस श्रेढि में प्रथमपद ३ है; साधारण निष्पत्ति
६ है, और योग ७७७ है, उसके पदों की संख्या कितनी होगी ? ॥१०४॥ जिस श्रेढि में ५ प्रथमपद हैं,
२ साधारण निष्पत्ति है, १२७५ योग है; और उस श्रेढि में जिसका प्रथमपद ७ है; योग ६८८८७
है और साधारण निष्पत्ति ३ है तथा उस श्रेढि में जिसका प्रथमपद ३ है, साधारण निष्पत्ति ५ है और
योग २२८८८१८४५९३ है—पदों की संख्या अलग-अलग निकालो ॥१०५॥
इस प्रकार परिकर्म व्यवहार में, संकलित नामक परिच्छेद समाप्त हुआ ।
व्युत्कलित
परिकर्म क्रियाओं में आठवीं क्रिया व्युत्कलित¹ सम्बन्धी नियम—
श्रेढि के कुल पदों की संख्या को चुने हुए पदों की संख्या से मिला लो, और अपनी चुनी हुई
पदों की संख्या अलग से लो; इन राशियों में से प्रत्येक को एक द्वारा ह्रासित कर आधी करो और तब
प्रचय द्वारा गुणित करो; और तब इन प्रत्येक परिणामी गुणनफलों में प्रथमपद को जोड़ दो । प्राप्त
परिणामी राशियों को जब क्रमशः शेष पदों की संख्या तथा चुने हुए पदों की संख्या द्वारा गुणित करते
हैं तो क्रमशः शेष श्रेढि का योग और श्रेढि के चुने हुए भाग का योग प्राप्त होता है ॥१०६॥
१ किसी दी हुई श्रेढि में आरम्भ से चुना हुआ कोई भाग इष्ट भाग कहलाता है और शेष श्रेढि
में शेष पद रहने के कारण वह शेष श्रेढि कहलाती है । इन शेष पदों का योग ही व्युत्कलित कहलाता है ।
(१०६) बीजीय रूप से व्युत्कलित = य_व = { (न + द - १)/२ * ब + अ } ( न - द ), और
चुने हुए भाग ( इष्ट ) का योग = य_इ = ( (द - १)/२ * ब + अ ) द; जहाँ द श्रेढि का चुने हुए भाग
के पदों की संख्या है ।