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गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation

महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 83, कुल 421 में से

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पृष्ठ 83

-२. ९४ ] परिकर्मव्यवहारः [ २९
गुणसंकलिते अन्यदपि सूत्रम्—
समदलविषमस्वरूपो गुणगुणितो वर्गताडितो गच्छः ।
रूपोनः प्रभवघ्नो व्येकोत्तरभाजितः सारम् ॥९४॥
गुणोत्तर श्रेढि का योग निकालने का अन्य नियम—
एक अलग स्तम्भ में श्रेढि के पदों की संख्या को शून्य और एक द्वारा क्रमशः दर्शाया जाता है ।
जब संख्या का मान युग्म ( even ) हो तो उसे आधा किया जाता है और मान अयुग्म ( odd )
हो तो उसमें से एक घटा कर प्राप्त फल को आधा किया जाता है—यह तब तक किया जाता है जब
तक कि शून्य प्राप्त नहीं होता । तब यह निरूपित श्रेढि जो शून्य और एक द्वारा बनी हुई होती है,
क्रम से अंतिम 'एक' से प्रयोग में लायी जाती है । वहाँ जहाँ एक प्ररूपक होता है साधारण निष्पत्ति
द्वारा गुणित वह एक पुनः साधारण निष्पत्ति द्वारा गुणित किया जाता है; और जहाँ शून्य प्ररूपक होता
है वहाँ भी गुणित किया जाता है ताकि वर्ग प्राप्त हो । जब यह फल एक द्वारा हासित होकर, प्रथम-
पद द्वारा पुनः गुणित किया जाता है और एक कम साधारण निष्पत्ति द्वारा विभाजित किया जाता है
तब वह श्रेढि के योग को उत्पन्न करता है ॥९४॥

(९४) यह नियम पिछले नियम से केवल इसलिये भिन्न है कि इसमें वर्ग और सरल गुणन की
विधियों को उपयोग में लाकर ( रⁿ ) को नई रीति से निकाला गया है । निम्नलिखित उदाहरण द्वारा
रीति स्पष्ट हो जावेगी—
मान लो रⁿ में न का मान १२ है । ( न = १२ )
१२ युग्म राशि है, इसलिये इसे २ के द्वारा विभाजित करते हैं और ० द्वारा प्रदर्शित करते हैं ।
१२/२ = ६ भी युग्म राशि है, " २ के " " " " " ० " " " " ।
६/२ = ३ अयुग्म राशि है, इसलिये इसमें से १ घटाते हैं और १ " " " " ।
३ - १ = २ युग्म राशि है, इसलिये इसे २ द्वारा विभाजित करते हैं और ० " " " " ।
२/२ = १ अयुग्म राशि है, इसलिये इसमें से एक घटाते हैं और १ " " " " ।
१ - १ = ०, जो क्रिया के इस भाग को समाप्त करती है ।
० | अब, निरूपक स्तम्भ में ( जिसमें अङ्क उपर्युक्त विधि द्वारा निकालते हैं ) अंतिम
० | एक को र द्वारा गुणित करते हैं, जिससे र प्राप्त होता है; क्योंकि इस अंतिम एक
१ | में ० उसके ऊपर है, र को ऊपर की तरह प्राप्त कर वर्गित करते हैं जिससे र² प्राप्त होता
० | है; क्योंकि इस ० के ऊपर १ है, र² जो प्राप्त होता है अब र के द्वारा गुणित करने पर
१ | र³ देता है; चूँकि इस १ के ऊपर ० है, इस र³ को वर्गित करते हैं जो र⁶ देता है; और
चूँकि फिर से इस ० के ऊपर दूसरा शून्य है, इस र⁶ को वर्गित करते हैं जो र¹² देता है । इस तरह
र का मान सरल वर्ग करने और गुणन करने की क्रियाओं द्वारा प्राप्त होता है । इस विधि का उपयोग
केवल रⁿ के मान को सरलता से प्राप्त करने हेतु होता है । और, यह सरलतापूर्वक देखा जाता है कि
यह रीति न की समस्त धनात्मक और अभिन्नात्मक ( integral ) अर्हाओं ( values ) के लिये
प्रयुक्त की जा सकती है ।