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सर्वकोश
गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation

महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 85, कुल 421 में से

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पृष्ठ 85

-२. १०१ ] परिकर्मव्यवहारः [ ३१
गुणसंकलितोदाहरणम्—
दीनारपञ्चकादिद्विगुणं धनमर्जयन्नरः कश्चित् । प्राविक्षदष्टनगरीः कति जातास्तस्य दीनाराः ॥९९॥
सप्तमुखत्रिगुणचयत्रिवर्गगच्छस्य किं धनं वणिजः । त्रिकपञ्चकपञ्चदशप्रभवगुणोत्तरपदस्यापि ॥१००॥
गुणसंकलितोत्तराद्यानयनसूत्रम्—
असकृद्धेयं मुखहृतवित्तं येनोद्धृतं भवेत्स चयः ।
व्येकगुणगुणितगणितं निरेकपदमात्रगुणवधाप्तं प्रभवः ॥१०१॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
एक मनुष्य नगर से नगर भ्रमण करते हुए गुणोत्तर श्रेढि में धन कमाता है जिसका प्रथमपद
५ दीनार और साधारण निष्पत्ति २ है। इस तरह उसने आठ नगरों में प्रवेश किया । बतलाओ उसके
पास कितने दीनार हैं ? ॥९९॥ गुणोत्तर श्रेढि के योग द्वारा धन का माप किया जाता है । एक मनुष्य
के पास गुणोत्तर श्रेढि वाला कितना धन होगा जब कि श्रेढि का प्रथमपद ७ है, साधारण निष्पत्ति ३ है
और पदों की संख्या ९ है । पुनः, जिसके प्रथमपद, साधारण निष्पत्ति और पदों की संख्या क्रमशः
३, ५, १५ हैं ऐसी गुणोत्तर श्रेढि वाला धन बतलाओ ॥१००॥
गुणोत्तर श्रेढि के दिये गये योग सम्बन्धी प्रथमपद और साधारण निष्पत्ति निकालने का नियम—
वह राशि जिसके द्वारा, श्रेढि के योग को प्रथम पद द्वारा विभाजित करने से प्राप्त हुई राशि
को १ द्वारा ह्रासित कर उत्पन्न हुई राशि में कथित भाजन सम्भव हो (जब कि समय समय पर सब
उत्तरोत्तर भजनफलों में से एक घटाने के पश्चात् भाग देने की यह विधि की जाती हो) तो वह राशि
साधारण निष्पत्ति है। वह योग, जो एक कम साधारण निष्पत्ति द्वारा गुणित होकर, और तब स्वतः में
वारंवार गुणित साधारण निष्पत्ति के (स्वगुणित साधारण निष्पत्ति का ऐसा गुणनफल जिसमें साधारण
निष्पत्ति उतने बार प्रकट होती है जितनी कि पदों की संख्या रहती है ) गुणनफल द्वारा विभाजित होकर
और तब इस स्वतः में वारंवार गुणित साधारण निष्पत्ति के गुणनफल को एक द्वारा ह्रासित करने से
प्राप्त राशि द्वारा विभाजित होकर प्रथमपद उत्पन्न करता है ॥१०१॥
न बार भाग देने योग्य है और ‘न’ ही श्रेढि के पदों की संख्या है । इसी तरह र × र × र × ......न
पदों तक, रⁿ होता है; और गुणधन अर्थात् अरⁿ , इस रⁿ द्वारा विभाजित होकर अ देता है जो कि
श्रेढि का चाहा हुआ प्रथमपद है ।
(१०१) निम्नलिखित उदाहरण से नियम का प्रथमभाग स्पष्ट हो जावेगा—
श्रेढि का योग ४०९५ है, प्रथमपद ३ है, पदों की संख्या ६ है । यहाँ ४०९५ को ३ द्वारा
भाजित करने पर हमें १३६५ प्राप्त होता है । अब, १३६५ - १ = १३६४ है । तब अन्वीक्षा द्वारा ४
चुनकर, १३६४/४ = ३४१; ३४१ - १ = ३४०; ३४०/४ = ८५; ८५ - १ = ८४; ८४/४ = २१; २१ - १ = २०;
२०/४ = ५; ५ - १ = ४; ४/४ = १ है । इसलिये ४ यहाँ साधारण निष्पत्ति है । निम्नलिखित से इस विधि-
का आधारभूत सिद्धान्त स्पष्ट हो जावेगा—
{अ (रⁿ - १)} / (र - १) ÷ अ = (रⁿ - १) / (र - १) ; और (रⁿ - १) / (र - १) - १ = (रⁿ - र) / (र - १) जो कि स्पष्टतः र के
द्वारा भाज्य है । दूसरा भाग बीजीय रूप से इस तरह है—
अ = [{अ (रⁿ - १)} / (र - १)] × [(र - १) / (रⁿ - १)]