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गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation

महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 84, कुल 421 में से

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पृष्ठ 84

३० ] गणितसारसंग्रहः [ २. ९५-
गुणसंकलितान्त्यधनानयने तत्संकलितधनानयने च सूत्रम्—
गुणसंकलितान्त्यधनं विगतैकपदस्य गुणधनं भवति । तद्गुणगुणं मुखोनं व्येकोत्तरभाजितं सारम् ॥९५॥
गुणधनस्योदाहरणम्—
स्वर्णद्वयं गृहीत्वा त्रिगुणधनं प्रतिपुरं संमार्जयति । यः पुरुषोऽष्टनगर्यां तस्य कियद्वित्तमाचक्ष्व ॥९६॥
गुणधनस्याद्युत्तरानयनसूत्रम्—
गुणधनमादिविभक्तं यत्पदमितवधसमं स एव चयः । गच्छप्रमगुणघातप्रहृतं गुणितं भवेत्प्रभवः ॥९७॥
गुणधनस्य गच्छानयन सूत्रम्—
मुखभक्ते गुणवित्ते यथा निरग्रं तथा गुणेन हृते । यावत्योऽत्र शलाकास्तावान् गच्छो गुणधनस्य ॥९८॥
१ M समर्पयति ।
गुणोत्तर श्रेढि के अंतिम पद तथा योग को निकालने का नियम—
गुणोत्तर श्रेढि का अंतिम पद अथवा अन्त्यधन, (जिसमें पदों की संख्या एक कम होती है
ऐसी) दूसरी श्रेढि, का गुणधन होता है। यह अन्त्यधन, साधारण निष्पत्ति द्वारा गुणित किया जाने पर
प्रथमपद द्वारा हासित किया जाता है, तथा एक कम साधारण निष्पत्ति द्वारा विभाजित किया जाता है
तो श्रेढि का योग प्राप्त होता है ॥९५॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी नगर में २ स्वर्ण मुद्राएँ प्राप्त कर एक मनुष्य एक नगर से दूसरे नगर को जाता है; और
प्रत्येक स्थान में पिछले स्थानों से प्राप्त मुद्राओं से तिगुनी मुद्राएँ प्राप्त करता है । बतलाओ कि आठवें
नगर में उसे कितनी मुद्राएँ मिलेंगी ? ॥९६॥
किसी दिये गये गुणधन सम्बन्धी प्रथमपद और साधारण निष्पत्ति निकालने का नियम—
गुणधन जब प्रथमपद द्वारा विभाजित होता है तब वह ऐसी स्वगुणित राशि के गुणनफल के
तुल्य हो जाता है जिस गुणन में कि वह राशि, पदों की संख्या की राशि बार (वारंवार) प्रकट
होती है; और यह राशि चाही हुई साधारण निष्पत्ति है। गुणधन जब साधारण निष्पत्ति के वारंवार
गुणन से प्राप्त गुणनफल द्वारा विभाजित किया जाता है—(साधारण निष्पत्ति के वारंवार स्वगुणन
से प्राप्त ऐसा गुणनफल जिसमें इस साधारण निष्पत्ति का वारंवार प्रकटपना, पदों की संख्या द्वारा मापा
जाता है) तब प्रथमपद प्राप्त होता है ॥९७॥
किसी गुणोत्तर श्रेढि में दिये गये गुणधन सम्बन्धी पदों की संख्या निकालने का नियम—
श्रेढि के गुणधन को प्रथमपद द्वारा विभाजित करो। तब इस भजनफल को साधारण निष्पत्ति
द्वारा वारंवार तब तक विभाजित करो जब तक कि भाजनयोग्य कुछ न बच रहे। ऐसे वारंवार दिये गये
भाग की संख्या का निरूपण करनेवाली शलाकाओं की संख्या जो भी हो वही दिये हुए गुणधन के
सम्बन्ध में पदों की संख्या का मान होता है ॥९८॥
(९५) बीजीय रूप से, य = (अरⁿ⁻¹ × र - अ) / (र - १) . अन्त्यधन, गुणोत्तर श्रेढि के अंतिम पद के मान के
तुल्य होता है; गुणधन के अर्थ और मान के लिये सूत्र ९१ देखिये । न पदों वाली गुणोत्तर श्रेढि का
अन्त्यधन अरⁿ⁻¹ के तुल्य होता है, जब कि इसी श्रेढि का गुणधन अरⁿ होता है । इसी तरह
न - १ पदों वाली गुणोत्तर श्रेढि का अन्त्य धन अरⁿ⁻² के तुल्य होता है, जब कि गुणधन अरⁿ⁻¹
होता है । यहाँ स्पष्ट है कि न पदों की श्रेढि का अन्त्यधन उतना ही होगा जितना की न - १ पदों
वाली-श्रेढि का गुणधन ।
( ९७, ९८ ) स्पष्ट है कि अरⁿ में अ का भाग देने पर रⁿ प्राप्त होता है, और यह र द्वारा