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सर्वकोश
गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation

महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 82, कुल 421 में से

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पृष्ठ 82

२८ ] गणितसारसंग्रहः [ २. ९१-
विसदृशादिसदृशगच्छसमधनानामुत्तरानयनसूत्रम्—
अधिकमुखस्यैकचयश्चाधिकमुखशेषमुखविशेषो भक्तः ।
विगतैकपदार्धेन सरूपश्च चया भवन्ति शेषमुखानाम् ॥९१॥
अत्रोद्देशकः
एकत्रिपञ्चसप्तनवैकादशवदनपञ्चपञ्चपदानाम् ।
समवित्तानां कथयोत्तराणि गणिताब्धिपारदृश्वन् गणक ॥९२॥
अथ गुणधनगुणसंकलितधनयोः सूत्रम्—
पदमितगुणहतिगुणितप्रभवः स्याद्गुणधनं तदाद्यूनम् ।
एकोनगुणविभक्तं गुणसंकलितं विजानीयात् ॥९३॥
ऐसी समान्तर श्रेणियों के प्रचयों को निकालने का नियम जिनमें प्रथम पद विसदृश, पदों की
संख्या सदृश और योग बराबर हों—
जिसका प्रथमपद सबसे बड़ा हो उस श्रेढि का प्रचय एक लेते हैं । इस सबसे बड़े प्रथम-
पद और शेष श्रेणियों में से प्रत्येक के प्रथमपद के अन्तर को एक कम पदों की संख्या की आधी
राशि द्वारा विभाजित करते हैं और इस प्रकार प्रत्येक दशा में प्राप्त भजनफल में एक मिलाते हैं ।
इस तरह, भिन्न-भिन्न शेष श्रेणियों के प्रचयों को प्राप्त करते हैं ॥९१॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
हे गणितरूपी समुद्र के दूसरे किनारे का दर्शन करने वाले गणक ! उन सब बराबर योगवाली
श्रेणियों के प्रचयों को निकालो जिनके प्रथमपद १,३,५,७,९ और ११ हों तथा पदों की संख्या
( प्रत्येक में ) ५ हो ॥९२॥
गुणधन और गुणोत्तर श्रेढि का योग निकालने की विधि—
गुणोत्तर श्रेढि के प्रथमपद को जब ऐसी वारंवार स्वतः से गुणित साधारण निष्पत्ति द्वारा गुणित
करते हैं, जहाँ इस गुणनफल में श्रेढि के पदों की संख्या द्वारा साधारण निष्पत्ति की वारंवारता
( frequency ) को मापा जाता है; तब गुणधन प्राप्त होता है । यह गुणधन जब प्रथमपद द्वारा
हासित किया जाता है तथा एक कम साधारण निष्पत्ति द्वारा विभाजित किया जाता है तब गुणोत्तर श्रेढि
का योग प्राप्त होता है ॥९३॥
(९१) इस दशा में साधारण सूत्र (formula) यह है : ब₁ = (अ – अ₁) / ((न – १)/२) + ब, जहाँ कि ब का
मान इस नियम में १ लिया गया है ।
(९३) न पदों की गुणोत्तर श्रेढि का गुणधन (न + १) वें पद के तुल्य होता है, जब कि श्रेढि संतत
रहती है । बीजीय रूप से, इस गुणधन की अर्हा ( २ × २ × २......न गुणन खंडों तक × अ ) अर्थात्
(अ रⁿ) होती है, जहाँ कि “र” साधारण निष्पत्ति है । इसकी तुलना उत्तरधन से कर सकते हैं ।
योग निकालने का नियम बीजीय रूप से यह है—
य = (अ रⁿ – अ) / (र – १) , जहाँ अ प्रथम पद है, र साधारण निष्पत्ति है और न पदों की संख्या है ।