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गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation

महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

-७. १२२½ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ २१५
कर्णो द्विगुणो बाहुस्त्रिगुणःकोटिश्चतुर्गुणा मिश्रः ।
रज्ज्वा सह तत्क्षेत्रस्यायतचतुरश्रकस्य रूपसमः ॥ ११९½ ॥
पुनरपि जन्यायतचतुरश्रक्षेत्रस्य बीजसंख्यानयने करणसूत्रम्—
कोट्यूनकर्णदलतत्कर्णान्तरमुभयोश्च पदे ।
आयतचतुरश्रस्य क्षेत्रस्येयं क्रिया जन्ये ॥ १२०½ ॥
अत्रोद्देशकः
आयतचतुरश्रस्य च कोटिः पञ्चाशदधिकपञ्च भुजा ।
साष्टाचत्वारिंशत्सप्ततिः श्रुतिरथात्र के बीजे ॥ १२१½ ॥
इष्टकल्पितसंख्याप्रमाणवत्कर्णसहितक्षेत्रानयनसूत्रम्—
यत्तत्क्षेत्रं जातं बीजैः संस्थाप्य तस्य कर्णेन ।
इष्टं कर्णं विभजेल्लाभगुणाः कोटिदोः कर्णाः ॥ १२२½ ॥
मुझे शीघ्र बतलाओ कि लम्ब भुजा और आधार के माप क्या-क्या हैं ? ॥ ११८½ ॥ आयत क्षेत्र के
संबंध में कर्ण से दुगुनी राशि, आधार से तिगुनी राशि और लंब से चौगुनी राशि, इन सबको जोड़ कर,
जब परिमिति के माप में जोड़ते हैं, तो योग फल १ हो जाता है । आधार का माप बतलाओ ॥११९½॥
प्राप्त आयत क्षेत्र के संबंध में बीजों का निरूपण करने वाली संख्या को निकालने की रीति
संबंधी नियम—
आयत क्षेत्र के संबंध में, उत्पन्न करने वाले बीजों को निकालने की क्रिया में, ( १ ) लंब द्वारा
हासित कर्ण की अर्द्ध राशि तथा ( २ ) इस राशि और कर्ण का अंतर, इनके द्वारा निरूपित दो राशियों
का वर्गमूल निकालना पड़ता है ॥ १२०½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
आयत क्षेत्र के संबंध में लंब भुजा ५५ है, आधार ४८ है, और कर्ण ७३ है । यहाँ बीज
क्या-क्या हैं ? ॥१२१½ ॥
इष्ट कल्पित संख्यात्मक प्रमाण के कर्ण वाले आयत क्षेत्र को प्राप्त करने के लिये नियम—
दिये गये बीजों की सहायता से प्राप्त विभिन्न आकृतियों में से प्रत्येक लिख लिये ( स्थापित
किये ) जाते हैं, और उसके कर्ण के माप के द्वारा दिया गया कर्ण का माप भाजित किया जाता है ।
इस आकृति की लंब भुजा, आधार और कर्ण, यहाँ प्राप्त हुए भजनफल द्वारा गुणित होकर, इष्ट क्षेत्र की
लंब भुजा, आधार और कर्ण को उत्पन्न करते हैं ।
(१२०½) इस अध्याय की ९५½वीं गाथा का नियम आयत क्षेत्र के कर्ण अथवा लंब अथवा आधार
से बीजों को प्राप्त करने की रीति प्रदर्शित करता है । परन्तु इस गाथा का नियम आयत के लंब और कर्ण
से बीजों को प्राप्त करने के विषय में रीति निरूपित करता है । वर्णित की हुई रीति निम्नलिखित सर्वसमिका
( identity ) पर आधारित है—
√[ {अ² + ब² - (अ² - ब²)} / २ ] = ब; और √[ अ² + ब² - {अ² + ब² - (अ² - ब²)} / २ ] = अ,
जहाँ अ² + ब² कर्ण का माप है, अ² - ब² आयत की लम्ब-भुजा का माप है। अ और ब इष्ट बीज हैं ।
(१२२½) यह नियम इस सिद्धान्त पर आधारित है कि समकोण त्रिभुज की भुजाएं कर्ण की अनुपाती
होती हैं । यहाँ कर्ण के उसी मापके लिये भुजाओं के मानो के विभिन्न कुलक ( sets ) हो सकते हैं ।

२१६ ] गणितसारसंग्रहः [ ७. १२३½-
अत्रोद्देशकः
एकद्विकद्विकत्रिकचतुष्कसप्तैकसाष्टकानां च ।
गणक चतुर्णां शीघ्रं बीजैरुत्थाप्य कोटिभुजाः ॥ १२३½ ॥
आयतचतुरश्राणां क्षेत्राणां विषमबाहुकानां च ।
कर्णोऽत्र पञ्चषष्टिः क्षेत्राण्याचक्ष्व कानि स्युः ॥ १२४½ ॥
इष्टजन्यायताचतुरश्रक्षेत्रस्य रज्जुसंख्यां च कर्णसंख्यां च ज्ञात्वा तज्जन्यायताचतुरश्रक्षेत्रस्य
भुजकोटिसंख्यानयनसूत्रम्—
कर्णकृतौ द्विगुणायां रज्ज्वर्धकृतिं विशोध्य तन्मूलम् ।
रज्ज्वर्धे संक्रमणीकृते भुजा कोटिरपि भवति ॥ १२५½ ॥
अत्रोद्देशकः
परिधिः स चतुस्त्रिंशत् कर्णाश्चात्र त्रयोदशो दृष्टः ।
जन्यक्षेत्रस्यास्य प्रगणय्याचक्ष्व कोटिभुजौ ॥ १२६½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
हे गणितज्ञ, दिये गये बीजों की सहायता से, ऐसे चार आयत क्षेत्रों की लंब भुजाएँ और
आधारों के मानों को शीघ्र बतलाओ, जिनके क्रमशः १ और २, २ और ३, ४ और ७, तथा १ और
८ बीज हैं, तथा जिनके आधार भिन्न भिन्न हैं । ( इस प्रश्न में ) यहाँ कर्ण का मान ६५ है । इस
दशामें, इष्ट क्षेत्रों के मापों को बतलाओ ॥ १२३½-१२४½ ॥
जिसकी परिमिति का माप और कर्ण का माप ज्ञात है ऐसे जन्य आयत क्षेत्र के आधार और
उसकी लम्ब भुजा के संख्यात्मक मानों को निकालने के लिये नियम—
कर्ण के वर्ग को २ से गुणित करो । परिणामी गुणनफल में से परिमिति की अर्द्धराशि के वर्ग
को घटाओ । तब परिणामी अंतर के वर्गमूल को प्राप्त करो । यदि यह वर्गमूल आधी परिमिति के
साथ संक्रमण क्रिया में लाया जाय, तो इष्ट आधार और लम्ब भुजा भी उत्पन्न होती हैं ॥ १२५½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
इस दशामें परिमिति ३४ है, और कर्ण १३ है । इस जन्य आकृति के संबंध में लंब भुजा और
आधार के मापों को गणना के बाद बतलाओ ॥ १२६½॥
(१२५½) यदि किसी आयत की भुजाएं अ और ब द्वारा प्ररूपित हों, तो √(अ² + ब²) कर्ण
का माप होता है और परिमिति का माप २अ + २ब होता है । यह सरलतापूर्वक देखा जा सकता
है कि
{ (२अ + २ब)/२ + √[ २ ( √(अ² + ब²) )² - ( (२अ + २ब)/२ )² ] } ÷ २ = अ; और
{ (२अ + २ब)/२ - √[ २ ( √(अ² + ब²) )² - ( (२अ + २ब)/२ )² ] } ÷ २ = ब ।
ये दो सूत्र वर्णित रीति का यहां बीजीय रूप से निरूपण करते हैं ।

-७. १३०½ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ २१७
क्षेत्रफलं कर्णसंख्यां च ज्ञात्वा भुजकोटिसंख्यानयनसूत्रम्—
कर्णकृतौ द्विगुणीकृतगणितं हीनाधिकं कृत्वा ।
मूलं कोटिभुजौ हि ज्येष्ठे ह्रस्वेन संक्रमणे ॥ १२७½ ॥
अत्रोद्देशकः
आयतचतुरश्रस्य हि गणितं षष्ठिस्त्रयोदशास्यापि ।
कर्णस्तु कोटिभुजयोः परिमाणे श्रोतुमिच्छामि ॥ १२८½ ॥
क्षेत्रफलसंख्यां रज्जुसंख्यां च ज्ञात्वा आयतचतुरश्रस्य भुजकोटिसंख्यानयनसूत्रम्—
रज्ज्वर्धवर्गात्क्षेत्रगणितं चतुराहतं विशोध्याथ ।
मूलेन हि रज्ज्वर्धे संक्रमणे सति भुजाकोटी ॥ १२९½ ॥
अत्रोद्देशकः
सप्ततिशतं तु रज्जुः पञ्चशतोत्तरसहस्रमिष्टधनम् ।
जन्यायतचतुरश्रे कोटिभुजौ मे समाचक्ष्व ॥ १३०½ ॥
जब आकृति का क्षेत्रफल और कर्ण का मान ज्ञात हो, तब आधार और लम्ब भुजा के संख्यात्मक
मानों को प्राप्त करने के लिये नियम—
क्षेत्रफल के माप से दुगुनी राशि कर्ण के वर्ग में से घटाई जाती है। वह कर्ण के वर्ग में
जोड़ी भी जाती है। इस प्रकार प्राप्त अंतर और योग के वर्गमूलों से इष्ट लंब भुजा और आधार के माप
प्राप्त हो सकते हैं, जब कि वर्गमूलों में से बड़ी राशि के साथ छोटी (वर्गमूल राशि) के संबंध में
संक्रमण किया जावे ॥ १२७½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी आयतक्षेत्र के संबंध में क्षेत्रफलका माप ६० है, और कर्ण का माप १३ है। मैं तुमसे
लम्ब भुजा और आधार के मापों को सुनने का इच्छुक हूँ ॥ १२८½ ॥
जब आयत क्षेत्र के क्षेत्रफल का तथा परिमिति का संख्यात्मक माप दिया गया हो, तब उस
आकृति के संबंध में आधार और लम्ब भुजा के संख्यात्मक मानों को प्राप्त करने के लिये नियम—
परिमिति की अर्द्धराशि के वर्ग में से ४ द्वारा गुणित क्षेत्रफल का माप घटाया जाता है। तब
इस परिणामी अंतर के वर्गमूल के साथ परिमिति की अर्द्धराशि के सम्बन्ध में संक्रमण क्रिया करने से
इष्ट आधार और लंबभुजा सचमुच में प्राप्त होती है। ॥ १२९½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी प्राप्त आयत क्षेत्र में परिमिति का माप १७० है। दिये गये क्षेत्र का माप १५०० है।
लंब भुजा और आधार के मानों को बतलाओ ॥ १३०½ ॥
(१२७½) गाथा १२५½ वीं के नोट के समान ही प्रतीक लेकर यहाँ दिया गया नियम निम्नलिखित
रूप में निरूपित होता है:—दशानुसार
{ √( √(अ² + ब²)² + २ अ ब ) ± √( √(अ² + ब²)² - २ अ ब ) } ÷ २ = अ अथवा ब
(१२९½) यहाँ भी, { (२ अ + २ ब)/२ ± √[ ((२ अ + २ ब)/२)² - ४ अ ब ] } ÷ २ = अ अथवा ब,
जैसी दशा हो ।
ग० सा० सं०-२८

२१८ ] गणितसारसंग्रहः [ ७. १३१ १/२-
आयतचतुरश्रक्षेत्रद्वये रज्जुसंख्यायां सदृक्षायां सत्यां द्वितीयक्षेत्रफलात् प्रथमक्षेत्रफले
द्विगुणिते सति, अथवा क्षेत्रद्वयेऽपि क्षेत्रफले सदृशे सति प्रथमक्षेत्रस्य रज्जुसंख्याया अपि
द्वितीयक्षेत्ररज्जुसंख्यायां द्विगुणायां सत्याम् , अथवा क्षेत्रद्वये प्रथमक्षेत्ररज्जुसंख्याया अपि
द्वितीयक्षेत्रस्य रज्जुसंख्यायां द्विगुणायां सत्यां द्वितीयक्षेत्रफलादपि प्रथमक्षेत्रफले द्विगुणे सति,
तत्तत्क्षेत्रद्वयस्यानयनसूत्रम् —
स्वाल्पहृतरज्जुधनहत्कृतिरिष्टघ्नैव कोटिःस्यात् ।
व्येका दोस्तुल्यफलेऽन्यत्राधिकगणितगुणितेष्टम् ॥ १३१ १/२ ॥
व्येकं तदूनकोटिः त्रिगुणा दोः स्यात्तथान्यस्य ।
रज्ज्वर्धवर्गराशेरिति पूर्वोक्तेन सूत्रेण ।
तद्गणितरज्जुमितिभिः समानयेत्तद्भुजाकोटी ॥ १३३ ॥
इष्ट आयत क्षेत्रों के क्रमिक युग्मों को प्राप्त करने के लिये नियम (१) जब कि परिमिति के
संख्यात्मक माप बराबर हैं, और प्रथम आकृति का क्षेत्रफल दूसरे के क्षेत्रफल से दुगुना है; अथवा (२)
जब कि दोनों आकृतियों के क्षेत्रफल बराबर हैं, और दूसरी आकृति की परिमिति का संख्यात्मक माप
प्रथम आकृति की परिमिति से दुगुना है; अथवा (३) जब कि दो क्षेत्रों के संबंध में दूसरो आकृति की
परिमिति का संख्यात्मक माप, प्रथम आकृति की परिमिति से दुगुना है, और प्रथम आकृतिका क्षेत्रफल
दूसरी आकृति के क्षेत्रफल से दुगुना है—
दो इष्ट आयत क्षेत्रों संबंधी परिमितियों तथा क्षेत्रफलों की दी गई निष्पत्तियों में बड़ी संख्याओं को
उनकी संवादी छोटी संख्याओं द्वारा भाजित किया जाता है । परिणामी भजनफलों को एक दूसरे से
परस्पर गुणित कर वर्गित किया जाता है। यही राशि जब दिये गये मन से चुने गुणकार (multiplier)
द्वारा गुणित की जाती है, तब लंबभुजा का मान उत्पन्न होता है। और उस दशा में जब कि दो इष्ट
आकृतियों के क्षेत्रफल बराबर हों, यह लंब भुजा का माप एक द्वारा हासित होकर, आधार का माप बन
जाता है । परंतु दूसरी दशा में जब कि इष्ट आकृतियों के क्षेत्रफल बराबर नहीं होते, तब बढ़ी निष्पत्ति
संख्या जो क्षेत्रफलों से संबंधित होती है, दिये गये मन से चुने गुणकार द्वारा गुणित की जाती है
और परिणामी गुणनफल १ द्वारा हासित किया जाता है। ऊपर प्राप्त लंब भुजा इस परिणामी राशि
द्वारा हासित की जाती है, और तब ३ द्वारा गुणित की जाती है । इस प्रकार आधार का माप
प्राप्त होता है । तत्पश्चात् दो इष्ट चतुर्भुज क्षेत्रों में से दूसरे चतुर्भुज के माप को प्राप्त करने के
लिए, ज्ञात क्षेत्रफल और परिमिति की सहायता से, गाथा १२९ १/२ में दिये गये नियमानुसार उसका
आधार तथा लंब निकालना पड़ते हैं ॥१३१ १/२-१३३॥
(१३१ १/२-१३३) यदि प्रथम आयत की दो आसन्न भुजाएँ क और ख हों, तथा दूसरे आयत की
दो आसन्न भुजाएँ अ और ब हों, तो इस नियम में दी गई तीन प्रकार की समस्याओं में कथित दशाओं
को इस प्रकार से प्ररूपित किया जा सकता है—
( १ ) क + ख = अ + ब; क ख = २ अ ब
( २ ) २ (क + ख) = अ + ब; क ख = अ ब
( ३ ) २ (क + ख) = अ + ब; क ख = २ अ ब
इस नियम में दिया गया हल केवल १३४-१३६ गाथाओं में दिये गये प्रश्नों की विशेष
दशाओं के लिये ही उपयुक्त दिखाई देता है ।

-७. १३७ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ २१९
अत्रोद्देशकः
असमन्तासायामाक्षेत्रे द्वे द्वावथेष्टगुणकारः ।
प्रथमं गणितं द्विगुणं रज्जू तुल्ये किमत्र कोटिभुजे ॥ १३४ ॥
आयतचतुरश्रे द्वे क्षेत्रे द्वयमेवगुणकारः । गणितं सदृशं रज्जुर्द्विगुणा प्रथमात् द्वितीययस्य ॥१३५॥
आयतचतुरश्रे द्वे क्षेत्रे प्रथमस्य धनमिह द्विगुणम् ।
द्विगुणा द्वितीयरज्जुस्तयोर्भुजां कोटिमपि कथय ॥ १३६ ॥
द्विसमत्रिभुजक्षेत्रयोः परस्पररज्जुधनसमानसंख्ययोरिष्टगुणकगुणितरज्जुधनवतोर्वा द्विसम-
त्रिभुजक्षेत्रद्वयानयनसूत्रम्—
रज्जुकृतिघ्नान्योन्यधनाल्पाप्तं षड्द्विघ्नमल्पमेकोनम् ।
तच्छेषं द्विगुणालपं बीजे तज्जन्ययोर्भुजाद्यः प्राग्वत् ॥ १३७ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
दो चतुर्भुज क्षेत्र हैं जिनमें से प्रत्येक असमान लंबाई और चौड़ाई वाला है । दिया गया
गुणकार २ है । प्रथम क्षेत्र का क्षेत्रफल दूसरे के क्षेत्रफल से दुगुना है, और दोनों में परिमितियाँ
बराबर हैं । इस प्रश्न में लंब भुजाएँ और आधार क्या-क्या हैं ?॥१३४॥ दो आयत क्षेत्र हैं और दिया
गया गुणकार भी २ है । उनके क्षेत्रफल बराबर हैं परंतु दूसरे क्षेत्र की परिमिति पहिले की परिमिति से
दुगुनी है । उनकी लंब भुजाएँ और आधारों को निकालो ॥१३५॥ दो आयत क्षेत्र दिये गये हैं । प्रथम
का क्षेत्रफल दूसरे के क्षेत्रफल से दुगुना है । दूसरी आकृति की परिमिति पहिले की परिमिति से दुगुनी
है । उनके आधारों और लंब भुजाओं के मानों को प्राप्त करो ॥ १३६ ॥
ऐसे समद्विबाहु त्रिभुजों के युग्म को प्राप्त करने के लिये नियम, जिनकी परिमितियाँ और
क्षेत्रफल आपस में बराबर हों अथवा एक दूसरे के अपवर्त्य हों—
इष्ट समद्विबाहु त्रिभुजों की परिमितियों के निष्पत्तिरूप मानों के वर्गों में उन त्रिभुजों के
क्षेत्रफल के निष्पत्तिरूप मानों द्वारा एकान्तर गुणन किया जाता है । इस प्रकार प्राप्त दो गुणनफलों में
से बड़ा छोटे के द्वारा विभाजित किया जाता है । तथा अलग से दो के द्वारा भी गुणित किया जाता
है । इस प्रकार प्राप्त गुणनफलों में से छोटा गुणनफल १ के द्वारा ह्रासित किया जाता है । बड़ा
गुणनफल और ह्रासित छोटा गुणनफल ऐसे आयतक्षेत्र के संबंध में दो बीजों की संरचना करते हैं,
जिनसे इष्ट त्रिभुजों में से एक प्राप्त किया जाता है । उपर्युक्त इन दो बीजों के अंतर और इन बीजों
में छोटे की दुगुनी राशि : ये दोनों ऐसे आयत क्षेत्र के संबंध में बीजों की संरचना करते हैं, जिनसे
दूसरा इष्ट त्रिभुज प्राप्त किया जाता है । अपने क्रमवार बीजों की सहायता से बनी हुई दो आयताकार
आकृतियों में से, इष्ट त्रिभुजों संबंधी भुजाएँ और अन्य बातें ऊपर समझाये अनुसार प्राप्त की
जाती हैं ॥१३७॥
(१३७) दो समद्विबाहु त्रिभुजों की परिमितियों की निष्पत्ति अ : ब हो, और उनके क्षेत्रफलों की
निष्पत्ति स : द हो, तब नियमानुसार, ६ब² स / अ² द और २ब² स / अ² द - १ तथा ४ब² स / अ² द + १ और ४ब² स / अ² द - २ ;
ये बीजों के दो कुलक ( sets ) हैं, जिनकी सहायता से दो समद्विबाहु त्रिभुजों के विभिन्न

२२० ] गणितसारसंग्रहः [ ७. १३८-
अत्रोद्देशकः
द्विसमत्रिभुजक्षेत्रद्वयं तयोः क्षेत्रयोःसमं गणितम् ।
रज्जू समे तयोःस्यात् को बाहुः का भवेद्भूमिः ॥ १३८ ॥
द्विसमत्रिभुजक्षेत्रे प्रथमस्य धनं द्विसंगुणितम् ।
रज्जुः समा द्वयोरपि को बाहुः का भवेद्भूमिः ॥ १३९ ॥
द्विसमत्रिभुजक्षेत्रे द्वे रज्जुर्द्विगुणिता द्वितीयस्य ।
गणिते द्वयोःसमाने को बाहुः का भवेद्भूमिः ॥ १४० ॥
द्विसमत्रिभुजक्षेत्रे प्रथमस्य धनं द्विसंगुणितम् ।
द्विगुणा द्वितीयरज्जुः को बाहुः का भवेद्भूमिः ॥ १४१ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
दो समद्विबाहु त्रिभुज हैं। उनका क्षेत्रफल एक सा है। उनकी परिमितियाँ भी बराबर हैं।
भुजाओं और आधारों के मान क्या क्या हैं ? ॥ १३८ ॥ दो समद्विबाहु त्रिभुज हैं। पहिले का क्षेत्रफल
दूसरे के क्षेत्रफल से दुगुना है। उन दोनों की परिमितियाँ एक सी हैं। भुजाओं और आधारों के मान
क्या क्या हैं ? ॥ १३९ ॥ दो समद्विबाहु त्रिभुज हैं। दूसरे त्रिभुज की परिमिति पहिले त्रिभुज की
परिमिति से दुगुनी है। उन दो त्रिभुजों के क्षेत्रफल बराबर हैं। भुजाओं और आधारों के माप क्या क्या
हैं ? ॥ १४० ॥ दो समद्विबाहु त्रिभुज दिये गये हैं। प्रथम त्रिभुज का क्षेत्रफल दूसरे के क्षेत्रफल से
दुगुना है, और दूसरे की परिमिति पहिले की परिमिति से दुगुनी है। भुजाओं और आधारों के
माप क्या क्या हैं ? ॥ १४१ ॥
इष्ट तत्त्वों को प्राप्त कर सकते हैं । इस अध्याय की १०८½ वीं गाथा के अनुसार, इन बीजों से
निकाली गई भुजाओं और ऊँचाइयों के मापों को जब क्रमशः परिमितियों की निष्पत्ति में पाई जाने
वाली राशियों अ और ब द्वारा गुणित करते हैं, तब दो समद्विबाहु त्रिभुजों की इष्ट भुजाओं और ऊँचाइयों
के माप प्राप्त होते हैं । वे निम्नलिखित हैं—
( १ ) बराबर भुजा = अ × { ( ६ब²स / अ²द )² + ( २ब²स / अ²द - १ )² } ......,
आधार = अ × २ × २ × ( ६ब²स / अ²द ) × ( २ब²स / अ²द - १ ) ......,
ऊँचाई = अ × { ( ६ब²स / अ²द )² - ( २ब²स / अ²द - १ )² } ......।
( २ ) बराबर भुजा = ब × { ( ४ब²स / अ²द + १ )² + ( ४ब²स / अ²द - २ )² } ......,
आधार = ब × २ × २ × ( ४ब²स / अ²द + १ ) × ( ४ब²स / अ²द - २ ) ......,
ऊँचाई = ब × { ( ४ब²स / अ²द + १ )² - ( ४ब²स / अ²द - २ )² } ......।
अब इन अर्हाओं (मानों) से सरलतापूर्वक सिद्ध किया जा सकता है कि परिमितियों की निष्पत्ति
अ : ब और क्षेत्रफलों की निष्पत्ति स : द है, जैसा कि आरम्भ में ले लिया गया था ।

-७. १४२ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ २२१
एकद्वयादिगणनातीसंख्यासु इष्टसंख्यामिष्टवस्तुनो भागसंख्यां परिकल्प्य तदिष्टवस्तु-
भागसंख्यायाः सकाशात् समचतुरश्रक्षेत्रानयनस्य च समवृत्तक्षेत्रानयनस्य च समत्रिभुजक्षेत्रा-
नयनस्य चायतचतुरश्रक्षेत्रानयनस्य च सूत्रम् -
स्वसमीकृतापवृत्तिहृतधनं चतुर्घ्नं हि वृत्तसमचतुरश्रव्यासः ।
षड्गुणितं त्रिभुजायत चतुरश्रभुजार्धमपि कोटिः ॥ १४२ ॥
वर्ग, अथवा समवृत्त क्षेत्र, अथवा समत्रिभुज क्षेत्र, अथवा आयत को इनमें से किसी उपयुक्त
आकृति के अनुपाती भाग के संख्यात्मक मान की सहायता से प्राप्त करने के लिये नियम, जब कि
१, २ आदि से प्रारम्भ होने वाली प्राकृत संख्याओं में से कोई मन से चुनी हुई संख्या द्वारा उस दी
गईं उपर्युक्त आकृति के अनुपाती भाग के संख्यात्मक मान को उत्पन्न कराया जाता है—
(अनुपाती भाग के) क्षेत्रफल (का दिया गया माप हस्त में) लिए गए (समुचित रूप से)
अनुरूपित (similarised) माप द्वारा भाजित किया जाता है। इस प्रकार प्राप्त भजनफल
यदि ४ के द्वारा गुणित किया जाय, तो वर्ग तथा वृत्त की भी चौड़ाई का माप उत्पन्न होता है। वही
भजनफल, यदि ६ द्वारा गुणित किया जाय, तो समत्रिभुज तथा आयत क्षेत्र के आधार का माप भी
उत्पन्न होता है। इसकी अर्द्धराशि आयत क्षेत्र की लंब भुजा का माप होती है ॥१४२॥
(१४२) इस नियम के अन्तर्गत दिये गये प्रश्नों के प्रकार में, वृत्त, या वर्ग, या समद्विबाहु
त्रिभुज, या आयत मन चाहे समान भागों में विभाजित किया जाता है। प्रत्येक भाग, एक ओर परिमिति
के किसी विशिष्ट भाग द्वारा सीमित होता है। जो अनुपात परिमिति के उस विशिष्ट भाग और पूरी
परिमिति में होता है वही अनुपात उस सीमित भाग और आकृति के पूर्ण क्षेत्रफल में रहना चाहिए ।
वृत्त के संबंध में प्रत्येक खंड, त्रैत्रिज्य ( sector ) होता है; वर्गाकार आकृति होने पर और आयताकार
आकृति होने पर वह भाग आयताकार होता है, तथा समत्रिभुज आकृति होने पर वह त्रिभुज होता है।
प्रत्येक भाग का क्षेत्रफल और मूल परिमिति की लम्बाई दोनों दत्त महत्ता की होती हैं। यह गाथा, वृत्त
के व्यास, वर्ग की भुजाओं, अथवा समत्रिभुज या आयत की भुजाओं का माप निकालने के लिये नियम
का कथन करती है। यदि प्रत्येक भाग का क्षेत्रफल 'म' हो और संपूर्ण परिमिति की लम्बाई का कोई
भाग 'न' हो तो नियम में दिये गये सूत्र ये हैं—
म / न × ४ = वृत्त का व्यास, अथवा वर्ग की भुजा;
और म / न × ६ = समत्रिभुज या आयत की भुजा;
और म / न × ६ का अर्द्धभाग = आयत की लंब भुजा की लम्बाई ।
अगले पृष्ठ पर दिये गये समीकारों से मूल आधार स्पष्ट हो जावेगा, जहाँ प्रत्येक आकृति के
विभाजित खंडों की संख्या 'क' है। वृत्त की त्रिज्या अथवा अन्य आकृति संबंधी भुजा 'अ' है, और
आयत की लंब भुजा 'ब' है।

२२२ ] गणितसारसंग्रहः [ ७. १४३-
अत्रोद्देशकः
स्वान्तःपुरे नरेन्द्रः प्रासादतले निजाङ्गनामध्ये ।
दिव्यं स रत्नकम्बलमपीपतत्तच्च समवृत्तम् ।। १४३ ।।
ताभिर्देवीभिर्धृतमेभिर्भुजयोश्च मुष्टिभिर्लब्धम् ।
पञ्चदशैकस्याः स्युः कति वनिताः कोऽत्र विष्कम्भः ।। १४४ ।।
समचतुरश्रभुजाः के समत्रिबाहौ भुजाश्चात्र ।
आयतचतुरश्रस्य हि तत्कोटिभुजौ सखे कथय ।। १४५ ।।
क्षेत्रफलसंख्यां ज्ञात्वा समचतुरश्रक्षेत्रानयनस्य चायतचतुरश्रक्षेत्रानयनस्य च सूत्रम्—
सूक्ष्मगणितस्य मूलं समचतुरश्रस्य बाहुरिष्टहृतम् ।
धनमिष्टफले स्यातामायतचतुरश्रकोटिभुजौ ।। १४६ ।।
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी राजा ने अपने अंतःपुर के प्रासाद में अपनी रानियों के बीच में ऊपर से फर्श पर समवृत्त
आकार वाला उत्कृष्ट रत्नकंबल नीचे गिराया । वह उन देवियों द्वारा हाथ में ग्रहण कर लिया गया ।
उनमें से प्रत्येक ने अपनी दोनों भुजाओं की मुष्टियों में पंद्रह, पंद्रह दंड क्षेत्रफल का कंबल
ग्रहण कर रखा । यहाँ बतलाओ कि इस नरेन्द्र की वनितायें कितनी हैं, और वृत्ताकार कंबल का
व्यास ( विष्कंभ ) कितना है ? यदि यह कंबल वर्गाकार हो, तो इसकी प्रत्येक भुजा कितने माप की
होगी ? यदि वह समत्रिभुजाकार हो तो उसकी भुजा कितनी होगी ? हे मित्र, मुझे बतलाओ
कि यदि कंबल आयताकार हो, तो उसकी लंब भुजा और आधार का माप क्या होगा ? ॥१४३-१४५॥
वर्गाकार आकृति अथवा आयताकार आकृति प्राप्त करने के लिये नियम, जबकि आकृति के क्षेत्रफल
का संख्यात्मक मान ज्ञात हो—
दिये गये क्षेत्रफल के शुद्ध माप का वर्गमूल इष्ट वर्गाकार आकृति की भुजा का माप होता है ।
दिये गये क्षेत्रफल को मन से चुनी हुई ( केवल क्षेत्रफल के वर्गमूल को छोड़कर ) कोई भी राशि
द्वारा भाजित करने पर परिणामी भजनफल और यह मन से चुनी हुई राशि आयत क्षेत्र के संबंध में
क्रमशः आधार और लंब भुजा की रचना करती हैं ॥१४६॥
वृत्त की दशा में, (क × म) / (क × न) = π अ² / (२π अ) , जहाँ π = परिधि / व्यास ;
वर्ग की दशा में, (क × म) / (क × न) = अ² / ४अ ;
समत्रिभुज की दशा में, (क × म) / (क × न) = (अ² / २) / ३अ
आयत की दशा में, (क × म) / (क × न) = (अ × ब) / (२(अ + ब)) , जहाँ ब = अ / २ लिया गया है ।
अध्याय की ७ वीं गाथा में दिये गये नियम के अनुसार समभुजत्रिभुज के क्षेत्रफल का व्यावहारिक
मान यहाँ उपयोग में लाया गया है । अन्यथा, इस नियम में दिया गया सूत्र ठीक सिद्ध नहीं होता ।
(१४३-१४५) इस प्रश्न में मुट्ठीभर का अर्थ चार अंगुल प्रमाण होता है ।

-७. १४८ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ २२३
अत्रोद्देशकः
कस्य हि समचतुरश्रक्षेत्रस्य फलं चतुष्षष्टिः ।
फलमायतस्य सूक्ष्मं षष्टिः के वात्र कोटिभुजे ॥ १४७ ॥
इष्टद्विसमचतुरश्रक्षेत्रस्य सूक्ष्मफलसंख्यां ज्ञात्वा, इष्टसंख्यां गुणकं परिकल्प्य, इष्टसंख्या-
ङ्कबीजाभ्यां जन्यायतचतुरश्रक्षेत्रं परिकल्प्य, तदिष्टद्विसमचतुरश्रक्षेत्रफलवदिष्टद्विसमचतुर-
श्रानयनसूत्रम्—
तद्धनगुणितेष्टकृतिर्जन्यधनोना भुजाहता मुखं कोटिः ।
द्विगुणा समुखा भूर्दोर्लम्बः कर्णौ भुजे तदिष्टहृताः ॥ १४८ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
६४ क्षेत्रफल वाली वर्गाकार आकृति वास्तव में कौन सी है ? आयत क्षेत्र के क्षेत्रफल का
शुद्ध मान ६० है । बतलाओ कि यहाँ लंब भुजा और आधार के मान क्या क्या हैं ? ॥१४७॥
दो बराबर भुजाओं वाले ऐसे चतुर्भुज क्षेत्र को प्राप्त करने के लिये नियम, जिसे बीजों की
सहायता से आयत क्षेत्र को प्राप्त करने पर और साथ ही किसी दी हुई संख्या को इष्ट गुणकार की तरह
उपयोग में लाकर प्राप्त करते हैं, तथा जब ( दो बराबर भुजाओंवाले ) ऐसे चतुर्भुज क्षेत्र के क्षेत्रफल
के बराबर ज्ञात सूक्ष्म क्षेत्रफल वाले चतुर्भुज का क्षेत्रफल होता है—
दिये गये गुणकार का वर्ग दिये गये क्षेत्रफल द्वारा गुणित किया जाता है । परिणामी गुणनफल,
दिये गये बीजों से प्राप्त आयत के क्षेत्रफल द्वारा हासित किया जाता है । शेषफल जब इस आयत
के आधार द्वारा भाजित किया जाता है, तब ऊपरी भुजा का माप उत्पन्न होता है । प्राप्त आयत की
लंब भुजा का मान, जब २ द्वारा गुणित होकर ( पहिले ही ) प्राप्त ऊपरी भुजा के मान में जोड़ा
जाता है, तब आधार का मान उत्पन्न होता है । इस आयत क्षेत्र के आधार का मान ऊपरी भुजा
के अंतरों से आधार पर गिराये गये लंब के समान होता है, तथा व्युत्पादित आयत क्षेत्र के कर्णों का
मान भुजाओं के मान के समान होता है । इस प्रकार प्राप्त दो समान भुजाओं वाले चतुर्भुज के ये
तत्त्व दिये गये गुणकार द्वारा भाजित किये जाते हैं, ताकि दो समान भुजाओं वाला इष्ट चतुर्भुज
प्राप्त हो ॥१४८॥
(१४८) यहाँ दिये गये क्षेत्रफल और दो बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज की रचना संबंधी प्रश्न का
विवेचन किया गया है । इस हेतु मन से कोई संख्या चुनी जाती है । दो बीजों का एक कुलक ( set )
भी दिया गया रहता है । इस नियम में वर्णित रीति दूसरी गाथा में दिये गये प्रश्न में प्रयुक्त करने पर
स्पष्ट हो जावेगी । उल्लिखित बीज यहाँ २ और ३ हैं । दिया गया क्षेत्रफल ७ है, तथा मन से चुनी हुई
संख्या ३ है ।

२२४ ] गणितसारसंग्रहः [ ७. १४९-
अत्रोद्देशकः
सूक्ष्मधनं सप्तेष्टं त्रिकं हि बीजे द्विके त्रिके दृष्टे ।
द्विसमचतुरश्रबाहु मुखभूम्यवलम्बकान् ब्रूहि ॥ १४९ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
दिये गये क्षेत्रफल का ठीक माप ७ है, मन से चुना हुआ गुणकार ३ है, और दत्त बीज २
और ३ हैं। दो बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज क्षेत्र को बराबर भुजाओं, ऊपरी भुजा, आधार और
लंब के मानों को प्राप्त करो ॥१४९॥
नोट—आकृतियों के माप अनुमाप ( scale ) रहित हैं ।
सबसे पहिले इस अध्याय की ९० १/२ वीं गाथानुसार दिये गये बीजों की सहायता से आयत की
रचना करते हैं । उस आयत की छोटी भुजा का माप ५
और बड़ी भुजा का माप १२ तथा कर्ण का माप १३ होता
है । उसका क्षेत्रफल मान में ६० होता है । अब इस
प्रश्न में दिये गये क्षेत्रफल को प्रश्न में दी गई मन से चुनी
हुई संख्या के वर्ग द्वारा गुणित करते हैं, जिससे हमें
७ × ३² = ६३ प्राप्त होता है । इस ६३ में से हमें दिये
गये बीजों से संरचित आयत का क्षेत्रफल ६० घटाना
पड़ता है, जिससे ३ शेष प्राप्त होता है । ३ क्षेत्रफल वाला
एक आयत बनाना पड़ता है, जिसकी एक भुजा बीजों
से प्राप्त आयत की बड़ी भुजा के बराबर होती है । यह
बड़ी भुजा माप में १२ है, इसलिये इस आयत की छोटी
भुजा आकृति में दिखलाये अनुसार १/४ के माप की होती है ।
बीजों से प्राप्त आयत के दो भाग कर्ण द्वारा प्राप्त करते
हैं, जो दो त्रिभुज होते हैं । इन दो त्रिभुजों को, आकृति
में दिखाये अनुसार, १/४ × १२ क्षेत्रफल वाले आयत के दोनों
ओर जमाते हैं, ताकि लंबी भुजाएँ संपाती हों ।
इस प्रकार अंत में हमें दो बराबर १३ मापवाली
भुजाओं का चतुर्भुज प्राप्त होता है, जिसकी ऊपरी भुजा
१/४ और आधार १० १/४ होता है । इसकी सहायता से
प्रश्न में इष्ट चतुर्भुज की भुजाओं के माप, मन से चुनी हुई
संख्या ३ द्वारा, भुजाओं के माप १३, १/४, १३ और
१० १/४ को भाजित कर, प्राप्त कर सकते हैं ।

-७. १५१ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ २२५
इष्टसूक्ष्मगणितफलवत्रिसमचतुरश्रक्षेत्रानयनसूत्रम्—
इष्टधनभक्तधनकृतिरिष्टयुतार्धं भुजा द्विगुणितेष्टम् ।
विभुजं मुखमिष्टाप्तं गणितं ह्यवलम्बकं त्रिसमजन्ये ॥ १५० ॥
अत्रोद्देशकः
कस्यापि क्षेत्रस्य त्रिसमचतुर्बाहुकस्य सूक्ष्मधनम् ।
षण्णवतिरिष्टमष्टौ भूबाहुमुखावलम्बकानि वद ॥ १५१ ॥
तीन बराबर भुजाओं वाले ज्ञात क्षेत्रफल के चतुर्भुज क्षेत्र को प्राप्त करने के लिये नियम जब कि
गुणक ( multiplier ) दिया गया हो—
दिये गये क्षेत्रफल के वर्ग को दिये गये गुणक के घन द्वारा भाजित किया जाता है ।
तब दिये गये गुणकार को परिणामी भजनफल में जोड़ा जाता है । इस प्रकार प्राप्त योग की अर्द्धराशि
बराबर भुजाओं में से किसी एक का माप देती है । दिया गया गुणक २ से गुणित होकर, और
तब प्राप्त बराबर भुजा ( जो अभी प्राप्त हुई है ऐसी समान भुजा ) द्वारा हासित होकर, ऊपरी भुजा
का माप देता है । दिया गया क्षेत्रफल दिये गये गुणक द्वारा भाजित होकर, तीन बराबर भुजाओं
वाले इष्ट चतुर्भुज क्षेत्र के संबंध में ऊपरी भुजा के अंतों से आधार पर गिराये गये समान लंबों में से
किसी एक का मान देता है ॥१५०॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी ३ बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज क्षेत्र के संबंध में क्षेत्रफल का शुद्ध मान ९६ है । दिया
गया गुणक ८ है । आधार, भुजाओं, ऊपरी भुजा और लंब के मापों को बतलाओ ॥ १५१ ॥
(१५०) नियम में कथन है कि दिये गये क्षेत्रफल को मन से चुनी हुई दत्त संख्या द्वारा भाजित
करने पर इष्ट आकृति संबंधी लंब प्राप्त होता है । क्षेत्रफल का मान, आधार और ऊपरी भुजा के योग
की अर्द्धराशि तथा लंब के गुणनफल के बराबर होता है । इसलिये ब स
दी गई चुनी हुई संख्या ऊपरी भुजा और आधार के योग की अर्द्धराशि
का निरूपण करती है । यदि अ ब स द तीन बराबर भुजाओं वाला
चतुर्भुज है, और स इ, स से अद पर गिराया गया लंब है, तो
अ इ, अ द और ब स के योग की आधी होती है, और दी गई चुनी
हुई संख्या के बराबर होती है । यह सरलता पूर्वक दिखाया जा सकता
है कि २अ द × अ इ = (स इ)² + (अ इ)² । अ इ द
( स इ² × अ इ² )
( स इ )² + ( अ इ )² ( स इ )² अ इ ———————— + अ इ
∴ अ द = ————————— = ———— + —— = ( अ इ ³ )
२अ इ २अ इ २ —————————————
२
( स इ × अ इ )²
——————— + अ इ
( अ इ )³
= ——————————
२
यहाँ स इ × अ इ = चतुर्भुज का दिया गया क्षेत्रफल है । यह अंतिम सूत्र, प्रश्न में तीन बराबर भुजाओं
वाले चतुर्भुज की कोई भी एक बराबर भुजा का मान निकालने के लिये दिया गया है ।
ग० सा० सं०-२९

२२६ ] गणितसारसंग्रहः [ ७. १५२-

सूक्ष्मफलसंख्यां ज्ञात्वा चतुर्भिरिष्टच्छेदैश्च विषमचतुरश्रक्षेत्रस्यमुखभूजप्रमाणसंख्यान-

यनसूत्रम्-

धनकृतिरिष्टच्छेदैश्चतुर्भिरामैव लब्धानाम् ।

युतिदलचतुष्टयं तैरूना विषमाख्यचतुरश्रभुजसंख्या ॥ १५२ ॥

अत्रोद्देशकः

नवतिर्हि सूक्ष्मगणितं छेदः पञ्चैव नवगुणः ।

दशधृतिविंशतिषट्कृतिहतः क्रमाद्विषमचतुरश्रे ॥

मुखभूमिभुजासंख्या विगणय्य ममाशु संकथय ॥ १५३½ ॥


४ दिये गये भाजकों की सहायता से, जब कि इष्ट चतुर्भुज क्षेत्र का क्षेत्रफल ज्ञात है, विषम

चतुर्भुज क्षेत्र के संबंध में ऊपरी भुजा, आधार और अन्य भुजाओं के संख्यात्मक मान निकालने के

लिये नियम-

दिया गया क्षेत्रफल का वर्ग अलग अलग चार दिये गये भाजकों द्वारा भाजित किया

जाता है, और चार परिणामी भजनफलों को अलग-अलग लिखा जाता है। इन भजनफलों के योग

की अर्द्धराशि को चार स्थानों में लिखा जाता है, और क्रम में ऊपर लिखे हुए भजनफलों द्वारा क्रमशः

ह्रासित किया जाता है। इस प्रकार प्राप्त शेष, विषम चतुर्भुज की असमान नामक भुजाओं के संख्यात्मक

मान को उत्पन्न करते हैं ॥ १५२ ॥

उदाहरणार्थ प्रश्न

विषम चतुर्भुज के संबंध में क्षेत्रफल का शुद्ध माप ९० है। ५ को क्रमशः ९, १०, १८, २०

और ३६ द्वारा गुणित करने पर चार दिये गये भाजकों की उत्पत्ति होती है। गणना के पश्चात् ऊपरी

भुजा, आधार और अन्य भुजाओं के संख्यात्मक मानों को शीघ्र बतलाओ ॥ १५३-१५३½ ॥

......................................................................................................................................

(१५२) असमान भुजाओं वाले चतुर्भुज क्षेत्र का क्षेत्रफल पहिले ही बताया जा चुका है :

√य (य - अ) (य - ब) (य - स) (य - द) = चतुर्भुज का क्षेत्रफल, जहाँ य = परिमिति की अर्द्धराशि

है, और अ, ब, स और द भुजाओं के माप हैं ( इसी अध्याय की ५० वीं गाथा देखिये ) । इस नियम

के अनुसार क्षेत्रफल के मान को वर्गित कर, और तब चार मन से चुने हुए भाजकों द्वारा अलग-अलग

भाजित करते हैं। यदि (य - अ) (य - ब) (य - स) (य - द) को ऐसे चार उपयुक्त चुने हुए भाजकों

द्वारा भाजित किया जाय कि य - अ, य - ब, य - स और य - द भजनफल प्राप्त हों, तो इन भजनफलों

को जोड़कर, और उनके योग को आधा करने पर, य प्राप्त होता है। यदि य को क्रम से य - अ,

य - ब, य - स और य - द ह्रासित किया जाय, तो शेष क्रमशः विषम चतुर्भुज की भुजाओं के मानों की

प्ररूपणा करते हैं ।

-like curve, and a bottom loop!
Wait, look at र्हा: that's ह with repha!
Wait, but is it र्हा?
Wait, what if it's र्द्धा?
Look at द्दि in द्विसमत्रिबाहु (line 8): द्दि has द् and दि.
Look at र्ध in वर्गीकृत्या? No.
What about र्घा?
Whatever it is, let's look at अर्धा vs अर्हा vs अह्र:
Wait, could it be अर्धा?
Wait, why would anyone write अर्धा (मान)?
Wait, is there a word अर्घा?
In Hindi, अर्घ is masculine. But here it has की before it.
Wait! Could it be अर्हा (मान)?
Wait, what does अर्हा mean? In Hindi dictionaries:
No common word अर्हा.
Wait! What if the text says अर्धा (माप)?
Wait, look at the word in parentheses:
( म ा न )
Wait, is that a न or a प or त्र?
It is म, ा, न -> (मान).
Wait, why would it say:
क्षेत्रफल की अर्धा (मान)?
Wait

, exactly ध. But ध has a broken bar. Here the bar is broken! You can clearly see a tiny gap above the loop. So the typesetter definitely set ध! Let's transcribe अष्टगुणितेष्टकृतियुतधनमिष्टपदहृदिष्टार्धम् ।.)
Wait, in L7: भूः स्यादूनं দ্বिपदाहृतेष्टवर्गे भुजे च संक्रमणम् ॥ १५८½ ॥
Wait, look at स्यादूनं: भूः स्यादूनं द्विपदाहृतेष्टवर्गे भुजे च संक्रमणम् ॥ १५८½ ॥
Everything looks extremely accurate and faithful to the source.२२८ ] गणितसारसंग्रहः [ ७. १५७½ -
अत्रोद्देशकः
कस्यापि क्षेत्रस्य द्विसमत्रिभुजस्य सूक्ष्मगणितमिनाः ।
त्रीणीच्छा कथय सखे भुजभूम्यवलम्बकानाशु ॥ १५७½ ॥
सूक्ष्मगणितफलसंख्यां ज्ञात्वा तत्सूक्ष्मगणितफलवद्विषमत्रिभुजानयनस्य सूत्रम्—
अष्टगुणितेष्टकृतियुतधनमिष्टपदहृदिष्टार्धम् ।
भूः स्यादूनं द्विपदाहृतेष्टवर्गे भुजे च संक्रमणम् ॥ १५८½ ॥
उदाहरण

-७. १६३½ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ २२९
अत्रोद्देशकः
कस्यापि विषमबाहोरुत्र्यश्रक्षेत्रस्य सूक्ष्मगणितमिदम् ।
द्वे रूपे निर्दिष्टे त्रीणीष्टं भूमिबाहवः के स्युः ॥ १५९½ ॥
पुनरपि सूक्ष्मगणितफलसंख्यां ज्ञात्वा तत्फलवद्विषमत्रिभुजानयनसूत्रम्—
स्वाष्टहतात्सेष्टकृतेः कृतिमूलं चेष्टमितरदितरहृतम् ।
ज्येष्ठं स्वाल्पार्धोनं स्वल्पार्धं तत्पदेन चेष्टेन ॥ १६०½ ॥
क्रमशॊ हत्वा च तयोः संक्रमणे भूसुजौ भवतः ।
इष्टार्धमितरदोः स्याद्विषमत्रैकोणके क्षेत्रे ॥ १६१½ ॥
अत्रोद्देशकः
द्वे रूपे सूक्ष्मफलं विषमत्रिभुजस्य रूपाणि ।
त्रीणीष्टं भूदोषौ कथय सखे गणिततत्त्वज्ञ ॥ १६२½ ॥
सूक्ष्मगणितफलं ज्ञात्वा तत्सूक्ष्मगणितफलवत्समवृत्तक्षेत्रानयनसूत्रम्—
गणितं चतुरभ्यस्तं दशपदभक्तं पदे भवेद्व्यासः ।
सूक्ष्मं समवृत्तस्य क्षेत्रस्य च पूर्ववत्फलं परिधिः ॥ १६३½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी असमान भुजाओं वाली त्रिभुजाकार आकृति के संबंध में यह बतलाया गया है कि
शुद्ध क्षेत्रफल का माप २ है, और मन से चुनी हुई राशि ३ है। आधार का मान तथा भुजाओं का
मान क्या है ? ॥ १५९½ ॥
पुनः, विषम भुजाओं वालेतथा दत्त शुद्ध माप क्षेत्रफल वाले त्रिभुज क्षेत्र को प्राप्त करने के लिये
दूसरा नियम—
दिये गये क्षेत्रफल के माप में ८ का गुणा कर, और तब उसमें मन से चुनी हुई राशि के वर्ग
को जोड़कर, प्राप्त योगफल का वर्गमूल प्राप्त किया जाता है। यह और मन से चुनी हुई राशि एक
दूसरे के द्वारा भाजित की जाती हैं। इन भजनफलों में से बड़ा, छोटे भजनफल की अर्द्धराशि द्वारा
ह्रासित किया जाता है। इस प्रकार प्राप्त शेष राशि और यह छोटे भजनफल की अर्द्धराशि क्रमशः ऊपर
लिखित वर्गमूल और मन से चुनी हुई संख्या द्वारा गुणित की जाती हैं। इस प्रकार प्राप्त गुणनफलों
के संबंध में संक्रमण क्रिया करने पर आधार और भुजाओं में से किसी एक का मान प्राप्त होता है।
मन से चुनी हुई राशि की आधी राशि विषम त्रिभुज की दूसरी भुजा की अर्धा होती है ॥ १६०-१६१½॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
विषम त्रिभुज के संबंध में क्षेत्रफल का शुद्ध माप ३ है। हे गणितज्ञ सखे, आधार तथा भुजाओं
के माप बतलाओ ॥ १६२½ ॥
दत्त सूक्ष्म क्षेत्रफल वाले, किसी समवृत्त क्षेत्र को प्राप्त करने के लिये नियम—
सूक्ष्म क्षेत्रफल का माप ४ द्वारा गुणित कर, १० के वर्गमूल द्वारा भाजित किया जाता है।
इस प्रकार परिणामी भजनफल के वर्गमूल को प्राप्त करने से व्यास का मान प्राप्त होता है। समवृत्त
क्षेत्र के संबंध में, ऊपर समझाये अनुसार, क्षेत्रफल और परिधि का माप प्राप्त किया जाता है ॥ १६३½ ॥
(१६३½) इस गाथा में दिया गया नियम सूत्र, क्षेत्रफल = (द² / ४) × √१०, जहाँ द वृत्त
का व्यास है, से प्राप्त किया गया है ।

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का देवनागरी में पंक्ति-दर-पंक्ति पूर्ण एवं शुद्ध पाठ दिया गया है:

२३० ] गणितसारसंग्रह [ ७. १६४½-
अत्रोद्देशकः
समवृत्तक्षेत्रस्य च सूक्ष्मफलं पञ्च निर्दिष्टम्।
विष्कम्भः को वास्य प्रगणय्य ममाशु तं कथय ॥ १६४½ ॥
व्यावहारिकगणितफलं च सूक्ष्मफलं च ज्ञात्वा तद्व्यावहारिकफलवत्तत्सूक्ष्मगणितफलवद्द्वि
समचतुरश्रक्षेत्रानयनस्य त्रिसमचतुरश्रक्षेत्रानयनस्य च सूत्रम्—
धनवर्गान्तरपदयुतिवियुतीष्टं भूमुखे भुजे स्थूलम्।
द्विसमे सपदस्थूलात्पदयुतिवियुतीष्टपदहृतं त्रिसमे ॥ १६५½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
समवृत्त क्षेत्र के संबंध में क्षेत्रफल का शुद्ध माप ५ है। वृत्त का व्यास गणना कर शीघ्र
बतलाओ ॥ १६४½ ॥
किसी क्षेत्रफल के व्यावहारिक तथा सूक्ष्म माप ज्ञात होने पर, दो समान भुजाओं वाले तथा
तीन समान भुजाओं वाले उन क्षेत्रफलों के माप के चतुर्भुज क्षेत्रों को प्राप्त करने के लिये नियम—
दो समान भुजाओंवाले क्षेत्रफल के संबंध में, क्षेत्रफल के सन्निकट और सूक्ष्म मापों के वर्गों के
अन्तर के वर्गमूल को प्राप्त करते हैं। इस वर्गमूल को मन से चुनी हुई राशि में जोड़ते हैं, तथा उसी
मन से चुनी हुई राशि में से वही वर्गमूल घटाते हैं। आधार और ऊपरी भुजा को प्राप्त करने के लिये
इस प्रकार प्राप्त राशियों को मन से चुनी हुई राशि के वर्गमूल से भाजित करना पड़ता है। इसी
प्रकार, सन्निकट क्षेत्रफल में मन से चुनी हुई राशि का भाग देने पर समान भुजाओं का मान प्राप्त
होता है ॥ १६५½ ॥
(१६५½) यदि 'रा' किसी दो बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज क्षेत्र के सन्निकट क्षेत्रफल को, और
'र' सूक्ष्म मान को प्ररूपित करते हों, और प मन से चुनी हुई संख्या हो, तो
आधार = [√(रा² - र²) + प] / √प ; ऊपरी भुजा = [प - √(रा² - र²)] / √प ;
और प्रत्येक बराबर भुजाओं का मान = रा / √प ।
यदि दो बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज क्षेत्र की भुजाओं के माप क्रमशः अ, ब, स, द हों, तो
रा = अ (ब + द) / २ ; प = [(ब + द) / २]² ;
और र = [(ब + द) / २] × √[अ² - ((ब - द)² / ४)] ।
आधार और ऊपरी भुजा के लिये ऊपर दिये गये सूत्र रा, र
और प के इन मानों का प्रतिस्थापन करने पर सरलतापूर्वक
सत्यापित किये जा सकते हैं। इसी प्रकार तीन बराबर
भुजाओं वाले चतुर्भुज के संबंध में भी यह नियम ठीक सिद्ध होता है।

-७. १६८½ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ २३१
अत्रोद्देशकः
गणितं सूक्ष्मं पञ्च त्रयोदश व्यावहारिकं गणितम् ।
द्विसमचतुरश्रभूमुखदोषः के षोडशेच्छया च ॥ १६६½ ॥
त्रिसमचतुरश्रस्योदाहरणम् ।
गणितं सूक्ष्मं पञ्च त्रयोदश व्यावहारिकं गणितम् ।
त्रिसमचतुरश्रबाहून् संचिन्त्य सखे ममाचक्ष्व ॥ १६७½ ॥
व्यावहारिकस्थूलफलं सूक्ष्मफलं च ज्ञात्वा तद्व्यावहारिकस्थूलफलवत् सूक्ष्मगणितफलवत्सम-
त्रिभुजानयनस्य च समवृत्तक्षेत्रव्यासानयनस्य च सूत्रम्—
धनवर्गान्तरमूलं यत्तन्मूलाद्द्विसंगुणितम् ।
बाहुस्त्रिसमत्रिभुजे समस्य वृत्तस्य विष्कम्भः ॥ १६८½ ॥
सन्निकट क्षेत्रफल का माप, मन से चुनी हुई राशि द्वारा भाजित होकर, भुजाओं के मान को
उत्पन्न करता है ।
तीन बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज क्षेत्र की दशा में, ऊपर बतलाये हुए दो क्षेत्रफलों के वर्गों के
अंतर के वर्गमूल को क्षेत्रफल के सन्निकट माप में जोड़ते हैं । इस परिणामी योग को कल्पित राशि
मानकर उसमें ऊपर बतलाये हुए वर्गमूल को जोड़ते हैं । पुनः, उसी कल्पित राशि में से उक्त वर्गमूल
को घटाते हैं । इस प्रकार प्राप्त राशियों में वर्गमूल का भाग अलग-अलग देकर, आधार और ऊपरी भुजा
प्राप्त करते हैं । यहाँ भी क्षेत्रफल के व्यावहारिक माप को इस कल्पित राशि के वर्गमूल द्वारा भाजित
करने पर अन्य भुजाओं के माप प्राप्त होते हैं ।
उदाहरणार्थ प्रश्न
सूक्ष्म क्षेत्रफल का माप ५ है, क्षेत्रफल का सन्निकट माप १३ है, और मन से चुनी हुई राशि
१६ है । दो बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज क्षेत्र के संबंध में आधार, ऊपरी भुजा और अन्य भुजा के
मान क्या-क्या हैं ? ॥ १६६½ ॥
तीन बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज क्षेत्र संबंधी एक उदाहरण—
क्षेत्रफल का सूक्ष्म रूप से शुद्ध माप ५ है, और क्षेत्रफल का व्यावहारिक माप १३ है । हे मित्र,
सोचकर मुझे बतलाओ कि तीन बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज क्षेत्र की भुजाओं के माप क्या-क्या
हैं ? ॥ १६७½ ॥
समत्रिबाहु त्रिभुज और समवृत्त के व्यास को प्राप्त करने के लिये नियम, जब कि उनके व्याव-
हारिक और सूक्ष्म क्षेत्रफल के माप ज्ञात हों—
क्षेत्रफल के सन्निकट और सूक्ष्म रूप से ठीक मापों के वर्गों के अंतर के वर्गमूल के वर्गमूल
को २ द्वारा गुणित किया जाता है । परिणाम, इष्ट समत्रिभुज की भुजा का माप होता है । वह, इष्ट
वृत्त के व्यास का माप भी होता है ॥ १६८½ ॥
(१६८½) किसी समबाहुत्रिभुज के व्यावहारिक और सूक्ष्म क्षेत्रफल के मानों के लिये इस
अध्याय की गाथा ७ और ५० के नियमों को देखिये ।

२३२ ] गणितसारसंग्रहः [ ७. १६९१/२-
अत्रोद्देशकः
स्थूलं धनमष्टादश सूक्ष्मं त्रिघनो नवाहतः करणिः ।
विगणय्य सखे कथय त्रिसमत्रिभुजप्रमाणं मे ॥ १६९१/२ ॥
पञ्चकृतेर्वर्गो दशगुणितः करणिर्भवेदिदं सूक्ष्मम् ।
स्थूलमपि पञ्चसप्ततिरेतत्को वृत्तविष्कम्भः ॥ १७०१/२ ॥
व्यावहारिकस्थूलफलं च सूक्ष्मगणितफलं च ज्ञात्वा तद्व्यावहारिकफलवत्तत्सूक्ष्मफलवद्विसमत्रिभुजक्षेत्रस्य भूभुजाप्रमाणसंख्ययोरानयनस्य सूत्रम्-
फलवर्गान्तरमूलं द्विगुणं भूर्व्यावहारिकं बाहुः ।
भूम्यर्थमूलभक्ते द्विसमत्रिभुजस्य करणिमिदम् ॥ १७११/२ ॥
अत्रोद्देशकः
सूक्ष्मधनं षष्टिरिह स्थूलधनं पञ्चषष्टिborderदिष्टम् ।
गणयित्वा ब्रूहि सखे द्विसमत्रिभुजस्य भुजसंख्याम् ॥ १७२१/२ ॥
इष्टसंख्यावद्विसमचतुरश्रक्षेत्रं ज्ञात्वा तद्विसमचतुरश्रक्षेत्रस्य सूक्ष्मगणितफलसमान-
सूक्ष्मफलवदन्यद्विसमचतुरश्रक्षेत्रस्य भूभुजमुखसंख्यानयनसूत्रम्-
उदाहरणार्थ प्रश्न
व्यावहारिक क्षेत्रफल १८ है । क्षेत्रफल का सूक्ष्म रूप से शुद्ध माप ( ३ )³ को ९ से गुणित
करने से प्राप्त राशि का वर्गमूल है । हे सखे, मुझे गणना के पश्चात् बतलाओ कि इष्ट समत्रिभुज
की भुजा का माप क्या है ? ॥ १६९१/२ ॥ क्षेत्रफल का सूक्ष्म माप ६२५० का वर्गमूल है । क्षेत्रफल का
सन्निकट माप ७५ है । ऐसे क्षेत्रफलों वाले समवृत्त के व्यास का माप बतलाओ ॥ १७०१/२ ॥
जब किसो क्षेत्रफल के व्यावहारिक और सूक्ष्म माप ज्ञात हों, तब ऐसे क्षेत्रफल के मापोंवाले
समद्विबाहु त्रिभुज के आधार और भुजा के संख्यात्मक मानों को निकालने के लिये नियम-
क्षेत्रफल के व्यावहारिक और सूक्ष्म मापों के वर्गों के अंतर के वर्गमूल की दुगुनी राशि को
किसी समद्विबाहु त्रिभुज का आधार मान लेते हैं। दत्त व्यावहारिक क्षेत्रफल का माप बराबर भुजाओं
में से किसी एक का माप मान लिया जाता है। आधार तथा भुजा के इन मानों को आधार के प्राप्त मान
की अर्द्धराशि के वर्गमूल द्वारा भाजित करते हैं। तब इष्ट समद्विबाहु त्रिभुज का आधार और भुजा के
इष्ट माप प्राप्त होते हैं। यह नियम समद्विबाहु त्रिभुज के संबंध में है ॥ १७११/२ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
यहाँ क्षेत्रफल का सूक्ष्म रूप से ठीक माप ६० है, और व्यावहारिक माप ६५ है । हे मित्र,
गणना के पश्चात् बतलाओ कि इष्ट समद्विबाहु त्रिभुज की भुजाओं के संख्यात्मक माप क्या-क्या
हैं ॥ १७२१/२ ॥
जब चुनी हुई संख्या और दो बराबर भुजाओं वाला चतुर्भुज क्षेत्र दिया गया हो, तब किसी ऐसे
दूसरे दो बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज क्षेत्र का आधार, ऊपरी भुजा और अन्य भुजाओं को निकालने
के लिये नियम, जिसका सूक्ष्म क्षेत्रफल दिये गये दो बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज के सूक्ष्म क्षेत्रफल
के तुल्य हो-

-७. १७४ ½ ] क्षेत्रगणितव्यवहारः [ २३३
लम्बकृताविष्टोनासमसंकर्मणीकृते भुजा ज्येष्ठा ।
ह्रस्वयुतिवियुति मुखभूयुतिदलितं तलमुखे द्विसमचतुरश्रे ॥ १७३ ½ ॥
अत्रोद्देशकः
भूरिन्द्रा दोर्विश्वे वक्त्रं गतयोऽवलम्बको रवयः ।
इष्टं दिक् सूक्ष्मं तत्फलवद्द्विसमचतुरश्रमन्यत् किम् ॥ १७४ ½ ॥

यदि दिये गये दो बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज क्षेत्र के लंब का वर्ग दत्त विकल्पित संख्या के
साथ विषम संक्रमण क्रिया करने के उपयोग में लाया जाता है, तो प्राप्त दो फलों में से बड़ा मान दो
बराबर भुजाओंवाले इष्ट चतुर्भुज क्षेत्र की बराबर भुजाओं में से किसी एक का मान होता है। दो बराबर
भुजाओं वाले दिये गये चतुर्भुज की ऊपरी भुजा और आधार के मानों के योग की अर्द्धराशि को,
क्रमशः, उपर्युक्त विषम संक्रमण में प्राप्त दो फलों में से छोटे फल द्वारा बढ़ाकर और हासित करने
पर दो बराबर भुजाओं वाले इष्ट चतुर्भुज क्षेत्र के आधार और ऊपरी भुजा के माप उत्पन्न
होते हैं ॥ १७३ ½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
दिये गये चतुर्भुज क्षेत्र का आधार १४ है, दो बराबर भुजाओं में से प्रत्येक का माप १३ है,
ऊपरी भुजा ४ है, लम्ब १२ है, और दत्त विकल्पित संख्या १० है । दो बराबर भुजाओं वाला ऐसा
कौन सा चतुर्भुज है, जिसके सूक्ष्म क्षेत्रफल का माप दिये गये चतुर्भुज के क्षेत्रफल के बराबर है ?
॥ १७४ ½ ॥

(१७३ ½) इस नियम में ऐसे प्रश्न पर विचार किया गया है, जिसमें ऐसे दो बराबर भुजाओं
वाले चतुर्भुज क्षेत्र की रचना करना है, जिसका क्षेत्रफल किसी दूसरे दो बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज
के तुल्य हो, और जिसकी ऊपरी भुजा से आधार तक की लम्ब दूरी भी उसी के समान हो । मान लो
दिये गये चतुर्भुज की बराबर भुजाएँ अ और स हैं, और ऊपरी भुजा तथा आधार क्रमशः ब और द हैं ।
यह भी मान लो कि लंब दूरी प है । यदि इष्ट चतुर्भुज की संवादी भुजाएँ अ₁, ब₁, स₁, द₁ हों, तो
क्षेत्रफल और लम्ब दूरी, दोनों चतुर्भुजों के संबंध में बराबर होने से हमें यह प्राप्त होता है—
द₁ + ब₁ = द + ब .........( १ );
और अ₁² - ((द₁ - ब₁)/२)² = प² .........( २ );
अर्थात् (अ₁ + (द₁ - ब₁)/२) (अ₁ - (द₁ - ब₁)/२) = प² ।
मानलो अ₁ - (द₁ - ब₁)/२ = ना; तब अ₁ + (द₁ - ब₁)/२ = प²/ना ,
और (अ₁ + (द₁ - ब₁)/२) + (अ₁ - (द₁ - ब₁)/२) = प²/ना + ना ।
∴ ((प²/ना) + ना) / २ = अ₁, ............( ३ )
ग० सा० सं०-३०

२३४ ] गणितसारसंग्रहः [ -७. १७५½ ]
द्विसमचतुरश्रक्षेत्रव्यावहारिकस्थूलफलसंख्यां ज्ञात्वा तद्व्यावहारिकस्थूलफले इष्टसंख्या-
विभागे कृते सति तद्द्विसमचतुरश्रक्षेत्रमध्ये तत्तद्भागस्य भूमिसंख्यानयनेऽपि तत्तत्स्थानावल-
म्बकसंख्यानयनेऽपि सूत्रम्—
खण्डयुतिभक्ततलमुखकृत्यन्तरगुणितखण्डमुखवर्गयुतम् ।
मूलमधस्तलमुखयुतदलहृतलब्धं च लम्बकः क्रमशः ॥१७५½॥
जब कोई दत्त व्यावहारिक माप वाला क्षेत्रफल किसी दी गई संख्या के भागों में विभाजित
किया जाय, तब दो बराबर भुजाओं वाले चतुर्भुज क्षेत्र के उन विभिन्न भागों के आधारों के संख्यात्मक
मानों तथा विभिन्न विभाजन बिन्दुओं से मापी गईं भुजाओं के संख्यात्मक माप को निकालने के लिये
नियम, जब कि दो भुजाओं वाले चतुर्भुज क्षेत्र के व्यावहारिक क्षेत्रफल का संख्यात्मक माप
दिया गया हो—
दो बराबर भुजाओं वाले दिये गये चतुर्भुज क्षेत्र के आधार और ऊपरी भुजा के संख्यात्मक
मानों के वर्गों के अंतर को इष्ट अनुपाती भागों के कुल मान द्वारा भाजित किया जाता है । इस प्रकार
प्राप्त भजनफल के द्वारा विभिन्न भागों के निष्पत्तियों के मान क्रमशः गुणित किये जाते हैं । प्राप्त
गुणनफलों में से प्रत्येक में दिये गये चतुर्भुज की ऊपरी भुजा के माप का वर्ग जोड़ा जाता है ।
इस प्रकार प्राप्त योग का वर्गमूल, प्रत्येक भाग के आधार के मान को उत्पन्न करता है । प्रत्येक
भाग का क्षेत्रफल, आधार और ऊपरी भुजा के योग की अर्धराशि द्वारा भाजित होकर, इष्ट क्रम में
लंब का माप उत्पन्न करता है, जो सन्निकट माप के लिये भुजा की तरह वर्ता जाता है ॥ १७५½ ॥
और (द + ब)/२ ± [ (प²/ना) - ना ] / २ = (द₁ + ब₁)/२ ± { (अ₁ + (द₁ - ब₁)/२) - (अ₁ - (द₁ - ब₁)/२) } / २
= द₁ अथवा ब₁...............(४)
यहाँ 'ना' इष्ट अथवा दत्त विकल्पित संख्या है । तीसरे और चौथे सूत्र वे हैं, जो प्रश्न का साधन
करने के नियम में दिये गये हैं ।
( १७५½ ) यदि च छ ज झ दो बराबर भुजाओं वाला चतुर्भुज हो, और इफ, गह और कल
चतुर्भुज को इस तरह विभाजित करते हों कि विभाजित भाग क्षेत्रफल के संबंध में क्रमशः म, न, प, ख
के अनुपात में हों, तो इस नियम के अनुसार,
जब भुजा च छ = अ, छ ज = द, ज झ = स और झ च = ब है, तब
इफ = √ [ { (द² - ब²) / (म + न + प + ख) } × म + ब² ] ;
गह = √ [ { (द² - ब²) / (म + न + प + ख) } × (म + न) + ब² ] ;
कल = √ [ { (द² - ब²) / (म + न + प + ख) } × (म + न + प) + ब² ] ;
इत्यादि ।
इसी प्रकार,