सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation

महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 225, कुल 421 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 225

-६. ३१०½ ] मिश्रकव्यवहारः [ १७१
अत्रोद्देशकः
सप्ताष्टनवदशानां षोडशपञ्चाशदेकषष्टीनाम् ।
ब्रूहि चतुःसंकलितं सूत्राणि पृथक् पृथक् कृत्वा ॥ ३०८½ ॥
संघातसंकलितानयनसूत्रम्—
गच्छस्त्रिरूपसहितो गच्छचतुर्भागताडितः सैकः ।
सपद्पदकृतिविघ्नो भवति हि संघातसंकलितम् ॥ ३०९½ ॥
अत्रोद्देशकः
सप्तकृतेः षट्षष्ट्यास्त्रयोदशानां चतुर्दशानां च ।
पञ्चाग्रविंशतीनां किं स्यात् संघातसंकलितम् ॥ ३१०½ ॥
भिन्नगुणसंकलितानयनसूत्रम्—
समदलविषमखरूपं गुणगुणितं वर्गताडितं द्विष्टम् ।
उदाहरणार्थ प्रश्न
दी हुई संख्याएँ ७, ८, ९, १०, १६, ५० और ६१ हैं । आवश्यक नियमों को विचारकर, प्रत्येक
दशा में, चार निर्दिष्ट राशियों के योग को बतलाओ ॥३०८½॥
( पूर्व व्यवहृत चार प्रकार की श्रेणियों के ) सामूहिक योग को निकालने के लिये नियम—
पदों की संख्या को ३ में जोड़ते हैं, और प्राप्तफल को पदों की संख्या के चतुर्थ भाग द्वारा
गुणित करते हैं । तब उसमें एक जोड़ा जाता है । इस परिणामी राशि को जब पदों की संख्या के वर्ग
को पदों की संख्या द्वारा बढ़ाने से प्राप्तराशि द्वारा गुणित किया जाता है, तब वह इष्ट सामूहिक योग
को उत्पन्न करती है ॥३०९½॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
४९, ६६, १३, १४ और २५ द्वारा निरूपित विभिन्न श्रेणियों के सम्बन्ध में इष्ट सामूहिक योग
क्या होगा ? ॥३१०½॥
गुणोत्तर श्रेढि में भिन्नों की श्रेढि के योग को निकालने के लिये नियम—
श्रेढि के पदों की संख्या को अलग-अलग स्तम्भ में, क्रमशः, शून्य तथा १ द्वारा चिह्नित
( marked ) कर लिया जाता है । चिह्नित करने की विधि यह है कि युग्ममान को आधा किया
जाता है, और अयुग्म मान में से १ घटाया जाता है । इस विधि को तब तक जारी रखा जाता है, जब
तक कि अन्ततोगत्वा शून्य प्राप्त नहीं होता । तब इस शून्य और १ द्वारा बनी हुई प्ररूपक श्रेढि को,
क्रमवार, अन्तिम १ से उपयोग में लाते हैं, ताकि यह १ साधारण निष्पत्ति द्वारा गुणित हो । जहाँ १
अभिधानी पद (denoting item) रहता है, वहाँ इसे फिर से साधारण निष्पत्ति द्वारा गुणित करते
हैं । और जहाँ शून्य अभिधानी पद होता है, वहाँ वर्ग प्राप्त करने के लिये उसे साधारण निष्पत्ति द्वारा
( ३०९½ ) बीजीय रूप से, { ( न + ३ ) न/४ + १ } ( न² + न ) योगों का सामूहिक योग •
है, अर्थात् नियम २९६, ३०१ और ३०५ से ३०५½ में बतलाई गई श्रेणियों के योगों तथा 'न' तक की
प्राकृत संख्याओं के योग ( इन सब योगों ) का सामूहिक योग है ।