गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation
महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा
पृष्ठ 230, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ें१७६ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. ३२७½-
अत्रोद्देशकः
नवयोजनानि कश्चित्प्रयाति योजनशतं गतं तेन ।
प्रतिदूतो व्रजति पुनस्त्रयोदशाप्नोति कैर्दिवसैः ॥३२७½॥
विषमबाणैस्तूणीरबाणपरिधिकरणसूत्रम्—
परिणाहस्त्रिभिरधिको दलितो वर्गीकृतस्त्रिभिर्भक्तः ।
सैकः शरास्तु परिधेरानयने तत्र विपरीतम् ॥३२८½॥
अत्रोद्देशकः
नव परिधिस्तु शराणां संख्या न ज्ञायते पुनस्तेषाम् ।
त्र्युत्तरदशबाणास्तत्परिणाहशरांश्च कथय मे गणक ॥३२९½॥
श्रेढीबद्धे इष्टकानयनसूत्रम्—
तरवर्गो रूपोनस्त्रिभिर्विभक्तस्तरेण संगुणितः ।
तरसंकलिते स्वेष्टप्रताडिते मिश्रतः सारम् ॥३३०½॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
कोई व्यक्ति ९ योजन प्रतिदिन की गति से यात्रा करता है । उसके द्वारा १०० योजन की दूरी
पहिले ही तय की जा चुकी है । एक संदेशवाहक उसके पीछे १३ योजन प्रति दिन की गति से भेजा
गया । यह कितने दिनों में उससे जाकर मिलेगा ? ॥३२७½॥
तरकश में भरे हुए ज्ञात अयुग्म संख्या के शरों की सहायता से तरकश के शरों की परिध्यान-
संख्या निकालने के लिये ( तथा विलोम क्रमेण ) नियम—
परिध्यान शरों की संख्या को ३ द्वारा बढ़ाकर आधा किया जाता है। इसे वर्गित किया जाता है, और
तब ३ द्वारा भाजित किया जाता है । इस परिणामी राशि में १ जोड़ने पर तरकश के शरों की संख्या प्राप्त
होती है। जब परिध्यान शरों की संख्या निकालनी होती है, तो विपरीत क्रिया करनी पड़ती है ॥३२८½॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
शरों की परिध्यान संख्या ९ है । उनकी कुल संख्या अज्ञात है । वह कौन सी है ? तरकश में
कुल शरों की संख्या १३ है । हे गणितज्ञ, परिध्यान शरों की संख्या बतलाओ ॥३२९½॥
किसी भवन की श्रेणीबद्ध ( एक के ऊपर दूसरी ) इष्टकाओं ( ईंटों ) की संख्या निकालने के
लिये नियम—
सतहों की संख्या के वर्ग को १ द्वारा ह्रासित कर ३ द्वारा भाजित किया जाता है, और तब
सतहों की संख्या द्वारा गुणित किया जाता है । इस प्रकार प्राप्त राशि में वह गुणनफल जोड़ते हैं, जो सबसे
ऊपर की सतह की ईंटों को प्ररूपित करनेवाली ( मन से चुनी हुई ) संख्या और एक से आरंभ होकर
दी गई सतहों की संख्या तक की प्राकृत संख्याओं के योग का गुणन करने से प्राप्त होता है । प्राप्तफल
इष्ट उत्तर होता है ॥३३०½॥
- ( ३३०½ ) बीजीय रूप से- $\frac{न^२ - १}{३} \times न + अ \times \frac{न (न + १)}{२}$, यह, बनावट की कुल ईंटों की
संख्या है; जहाँ ‘न’ सतहों की संख्या है, और ‘अ’ सर्वोच्च सतह में ईंटों की मन से चुनी हुई संख्या है ।